जब आप न स्वयं को जानते, न ज़िंदगी को जानते, तो ये आप क्या करने जा रहे हो? आपकी ज़िंदगी में कोई अजनबी आएगा और अब वो उम्र भर आपके साथ रहेगा। ये आपकी ज़िंदगी का सेंटर बन जाना है। ज़िंदगी इसी काम के लिए है? बेहोशी में, अनजाने में रिश्ता बना लो और फिर उम्र भर उसकी खिदमत करो। मैं कह रहा हूँ, इंसान बेहतर हो जाएगा तो उसके सारे कर्म बेहतर हो जाएँगे, सारे संबंध बेहतर हो जाएँगे, जिसमें शादी भी सम्मिलित है। उसके बाद तुम जो भी निर्णय करो, अच्छा है। करनी है शादी, शौक से करो, मौज में करो।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने कई बार शादी के खिलाफ़ बोला है।
आचार्य प्रशांत: किसके?
प्रश्नकर्ता: शादी।
आचार्य प्रशांत: शांति?
प्रश्नकर्ता: शादी, शादी।
आचार्य प्रशांत: इनको लग रहा है मैंने सुना नहीं था पहली बार में।




