जीवन सीमित है, इसलिए उसका केंद्र मृत्यु के बाद की कल्पनाएँ नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए जागरूकता और मुक्ति होनी चाहिए। रस्में, कर्मकांड और मृत्यु के बाद की कथाएँ अक्सर जीवन की वास्तविक ज़िम्मेदारियों से ध्यान हटाती हैं। जो प्रेम, सहायता और सम्मान देना है, वह जीवित लोगों को देना सार्थक है। मृत्यु की स्मृति समय का मूल्य सिखाती है, अधूरी कहानियों को छोड़ना सिखाती है, और वर्तमान जीवन को पूरी गंभीरता और ईमानदारी से जीने की प्रेरणा देती है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक और बात मैं चेक कराना चाह रहा था आपसे। इस पाँच–छह साल की यात्रा में आपके साथ जो मैं सीखे हुआ हूँ, जैसे घर-परिवार में कभी मृत्यु हो गई है, तो मृत्यु के दिन मैं शामिल होता हूँ, जब तक उसका अंतिम संस्कार होता है। उसके बाद मैं ख़ुद अनाउंस किया हूँ कि अगर मेरे साथ कुछ ऐसा होता है, तो मैं देहदान तो प्रोसेस में है, मैं कर रहा हूँ, और मेरी शरीर को अगर किसी के यूज़ में है, तो आप दीजिएगा। बस वहीं तक मेरा काम ख़त्म करिएगा। अगर मेरे प्रति अश्रद्धा नहीं है आपका, तो यही करिएगा।
शादियों में मुझे कुछ लगता नहीं है, मैं क्यों जाऊँ? जितने कर्मकांड हैं, जो भी चीज़ें होती हैं छूटी हुई हैं, ये मैं अनाउंस कर चुका हूँ। फिर भी जैसे कुछ पूरे फैमिली के मेंबर सुनते हैं, कुछ उसमें भी हैं ज्ञानी जो बताते हैं, नहीं, यहाँ तो शामिल हो जाना चाहिए। मुझे नहीं दिखता है कहीं भी शामिल होना चाहिए। मैं आपसे चेक करा रहा हूँ कि मैं; कुछ मौत भी हुई है, मौत में मैं जलाने तक का जो क्रम होता है वहाँ तक पहुँचता हूँ। शादी में तो जाने का कोई सवाल ही नहीं है, चूँकि मैं ख़ुद 13–14 साल शादीशुदा हूँ, मैं देख रहा हूँ क्या होता है।




