वंश चलाना चाहते हो - किसके लिए?

Acharya Prashant

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वंश चलाना चाहते हो - किसके लिए?
जीवन सीमित है, इसलिए उसका केंद्र मृत्यु के बाद की कल्पनाएँ नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए जागरूकता और मुक्ति होनी चाहिए। रस्में, कर्मकांड और मृत्यु के बाद की कथाएँ अक्सर जीवन की वास्तविक ज़िम्मेदारियों से ध्यान हटाती हैं। जो प्रेम, सहायता और सम्मान देना है, वह जीवित लोगों को देना सार्थक है। मृत्यु की स्मृति समय का मूल्य सिखाती है, अधूरी कहानियों को छोड़ना सिखाती है, और वर्तमान जीवन को पूरी गंभीरता और ईमानदारी से जीने की प्रेरणा देती है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक और बात मैं चेक कराना चाह रहा था आपसे। इस पाँच–छह साल की यात्रा में आपके साथ जो मैं सीखे हुआ हूँ, जैसे घर-परिवार में कभी मृत्यु हो गई है, तो मृत्यु के दिन मैं शामिल होता हूँ, जब तक उसका अंतिम संस्कार होता है। उसके बाद मैं ख़ुद अनाउंस किया हूँ कि अगर मेरे साथ कुछ ऐसा होता है, तो मैं देहदान तो प्रोसेस में है, मैं कर रहा हूँ, और मेरी शरीर को अगर किसी के यूज़ में है, तो आप दीजिएगा। बस वहीं तक मेरा काम ख़त्म करिएगा। अगर मेरे प्रति अश्रद्धा नहीं है आपका, तो यही करिएगा।

शादियों में मुझे कुछ लगता नहीं है, मैं क्यों जाऊँ? जितने कर्मकांड हैं, जो भी चीज़ें होती हैं छूटी हुई हैं, ये मैं अनाउंस कर चुका हूँ। फिर भी जैसे कुछ पूरे फैमिली के मेंबर सुनते हैं, कुछ उसमें भी हैं ज्ञानी जो बताते हैं, नहीं, यहाँ तो शामिल हो जाना चाहिए। मुझे नहीं दिखता है कहीं भी शामिल होना चाहिए। मैं आपसे चेक करा रहा हूँ कि मैं; कुछ मौत भी हुई है, मौत में मैं जलाने तक का जो क्रम होता है वहाँ तक पहुँचता हूँ। शादी में तो जाने का कोई सवाल ही नहीं है, चूँकि मैं ख़ुद 13–14 साल शादीशुदा हूँ, मैं देख रहा हूँ क्या होता है।

तो उसमें दो बच्चियाँ बैठी हैं उनका पिता हूँ मैं और कोशिश में हूँ कि आप तक बनी रहें वो लगातार, तो शायद यही मेरी इस यात्रा का होगा। उस क्रम में लगातार बना हुआ हूँ। तो कुछ कम्युनिटी के मेंबर भी होते हैं, वो बताते हैं, नहीं, यहाँ तो शामिल हो जाना चाहिए। मैं आपसे जानना चाह रहा हूँ कि मैं सही करता हूँ इस जगह पर न?

आचार्य प्रशांत: देखो, जब मैं मरूँगा न, तो कोई मत आना, ख़ासकर वो तो बिल्कुल मत आना जो जीते जी नहीं आए। और ये लिखवा कर मरूँगा कि जो जीते जी नहीं आया, उसको तो बिल्कुल प्रतिबंधित होना चाहिए, मरने के बाद शक्ल देखना भी। मरने के बाद क्या है? जो है जीते जी है।

प्रश्नकर्ता: एक चीज़ मैं छोड़ दिया था, मैं सारे परिवार के मेंबर से कह चुका हूँ कि जो गीता का नहीं, वो मेरा नहीं। और सबको इनविटेशन भेजा हुआ है। खास करके हर हफ़्ते मेरा स्टेटस रहता है और सबको मैसेज आता है। आप अगर हो, इतनी ऊँची बात मेरे पास है, तो मैं आपके साथ हूँ। मेरा संबंध का आधार यही हो गया है, जो गीता का नहीं वो मेरा नहीं।

आचार्य प्रशांत: सारा अध्यात्म ज़िंदों के लिए है, क्योंकि मुर्दे को नहीं दुख होता। अध्यात्म दुख मिटाने के लिए है, जो जी रहा है उसका दुख मिटाओ, मरने के बाद जाकर के रस्म क्या निभा रहे हो। जो संतों ने कटाक्ष किया है, बोल रहे थे, जब तक वो ज़िंदा था तब तक तो उसके सामने नहीं गए, अब उसके मरने पर जाकर के कौवा खिला रहे हैं। वो ज़िंदा था तब तो तुम उसका ना पेट भर पाए, न दिल भर पाए। अब वो मर गया है, तो तुम जाकर के खानापूर्ति कर रहे हो, किसको खिला के? रस्म होती है।

जिसको जो दे सकते हो जीते जी दे दो, बाद में जो तुम कर रहे हो वो आडंबर है बस। हाँ, किसी की मृत्यु से उसके स्वजन दुखी हों, तो उनको सहारा देने के लिए, उनसे बात करने के लिए चले जाओ, वो एक बिल्कुल अलग मुद्दा है। आपका कोई मित्र नहीं रहा, आप चले जाइए उसके माँ-बाप हैं घर में और लोग हैं उसके, आप उनसे बात करने के लिए चले जाएँ, वो अच्छी चीज़ है, क्योंकि वो अभी जीवित हैं, मित्र तो चला गया है, मित्र के लिए अब आप कुछ नहीं कर सकते। कोई उसकी जीवात्मा नहीं है जिसकी शांति के लिए आप जाकर के रस्मों में शामिल होंगे तो कुछ होगा। हाँ, उसके माँ-बाप ज़िंदा हैं, उसके बच्चे, उसकी पत्नी ज़िंदा हैं, आप चले जाइए, उनसे बात कर लीजिए, कुछ देर उनके साथ बैठिए, यथासंभव जो कह सकते हैं, कर सकते हैं, करिए।

पर ये मत समझिएगा कि उसके तीसरे दिन, पाँचवें दिन, आठवें दिन और इस तरह की क्रियाओं में शामिल होने से आप किसी का कुछ भला कर रहे हैं। जो करिए, जीवित लोगों के लिए करिए। ये कैसी हमारी संस्कृति है जो जीते जी किसी को पानी नहीं देती और मरने के बाद उसको पूरी नदी दे देती है। जीते जी आप ध्यान ही नहीं दे रहे उस व्यक्ति पर, मर गया है तो आप उसको हफ़्तों दिए दे रहे हो। जब ज़िंदा है तब उसकी क़दर कर लो न। अगर वो इस लायक है कि क़दर की जाए तो, नहीं तो छोड़ो। आ रही है बात समझ में? जीवन की क़दर करो, जीवन की। और क्या है आपके पास? जीवन के अलावा क्या है जीव के पास?

यूँ ही नहीं, दुनिया भर के सब दर्शन पढ़ने के बाद मैंने देखा कि इनमें सबसे मूलभूत तो वेदांत ही है, क्योंकि मृत्यु की यहाँ बात ही नहीं होती है। कह रहे मुक्ति भी जीवित रहते होनी चाहिए, मरने के बाद की कोई बात ही नहीं कि मरने के बाद स्वर्ग, नरक, जन्नत, जहन्नुम ये होगा, वो होगा, जीवात्मा यहाँ जाएगी, वो सब लोकधर्म की रची कहानियाँ हैं।

वेदांत में तो मुक्ति भी अगर है, तो जीवन रहते होगी, नहीं तो नहीं होगी। अवसर बीत गया तुम्हारा। जीवनमुक्त इससे बड़ा आदर्श नहीं होता वेदांत में, जीवनमुक्त।

जीवनमुक्त माने ज़िंदा है। आपको याद दिलाता हूँ बार-बार, कि कबीर साहब के पास कोई आया था और कह रहा है कि मरने के बाद ऐसे करेंगे तो तर जाएँगे, बैतरनी कैसे तरेंगे, तो हँसते हैं और जो उनकी शैली, उनकी अदा उसमें कहते हैं, “जीयत न तरे, मरन का तरि हो। जीयत न तरे, मरै का तरि हो।” जो जीते जी नहीं तरा, वो मर के क्या तरेगा?

तो मरने के बाद जो प्रपंच करते हो, इसका कोई मूल्य नहीं है। हाँ, मरने के बाद इतना कर देना, अपने अंगदान कर देना ताकि किसी का जीवन समृद्ध हो पाए। आप तो मर गए, पर अभी बहुत ज़िंदा हैं आपके पीछे। उनकी ज़िंदगी बेहतर हो जाएगी। उनको आपकी आँख मिल जाएगी या किडनी या कुछ और मिल जाएगा, तो उनकी ज़िंदगी थोड़ी बेहतर हो जाएगी।

मृत्यु याद रखा करो, वो पूर्ण विराम है। उसके बाद कुछ नहीं है। मृत्यु के बाद के तुमने जितने किस्से गढ़े हैं, वो सिर्फ़ इसलिए हैं ताकि तुम जीवन पर ध्यान न दे पाओ। मृत्यु पूर्ण विराम है तुम्हारे लिए। प्रकृति के लिए नहीं, पर जीव के लिए निस्संदेह। प्रकृति तो चलेगी तुम नहीं चलने वाले, तुम्हारा ये एकमात्र जन्म है, तुम दोबारा नहीं आने वाले कहीं। और इतनी बार बोला है कि झूठे ज्ञानी को पहचानना हो, तो इस एक और बात से पहचान सकते हो कि वो बार-बार कहेगा, “मेरा इस जन्म में ये हुआ, मेरा उस जन्म में ये हुआ। तुम यहाँ से भटक रहे हो। तुम इस जीव में आए हो, तुम उस जीवात्मा में जा रहे हो।”

जहाँ ये सब बातें सुनो, जान लो कि यहाँ जीवन से ज़्यादा मृत्यु में रुचि है। किसी के पास पाँच साल होंगे, किसी के दस साल, चालीस साल, हो सकता है किसी के पास दो ही महीने हों, हमें क्या पता।

अब समझ में आ रहा है तुम समय का अपमान क्यों कर लेते हो, क्योंकि तुम मृत्यु याद ही नहीं रखना चाहते। मृत्यु याद न रख सको, इसमें सहायक क्या बनता है? लोकधर्म। कि मर भी जाओगे तो अभी तो ऐसा होगा, वैसा होगा; 84 लाख। प्रकृति की यात्रा चलती रहेगी, प्रकृति का पुनर्जन्म होता रहेगा, बिल्कुल होता रहेगा। पुनर्जन्म बिल्कुल होता है, तुम्हारा नहीं होगा लेकिन। समष्टि ही पुनर्जन्म लेती है बार-बार। सागर लहराता है, नई-नई लहरें आती हैं, लेकिन जो लहर एक बार गिर गई वो अब दोबारा नहीं उठेगी। तुम्हारे लिए एक ही जन्म है। पुनर्जन्म प्रकृति मात्र का होता है, जीव का नहीं होता। जीव के लिए तो एक जीवन है, उसका सम्मान करो।

आप किसी के अंतिम संस्कार में जाएँ, अंत्येष्टि में जाएँ, वहाँ भी आपका उद्देश्य ये तो हो सकता है कि उसके घरवालों से मिलें, बात करें, दुख का जो जाल उन्होंने भीतर बैठा रखा हो, उसको काटने में सहायक हो जाएँ। वो ठीक है, उसमें मानवता है। कोई रो रहा है, आपने जाकर उससे बात करी, आँसू पोंछे, ये मानवता है अच्छी बात है। लेकिन वो जो पूरा लंबा-चौड़ा पाखंड होता है उसमें कुछ नहीं। आ रही है बात समझ में?

कम से कम दफ़ा तो शांति से होना सीखो। जीवन भर तो शोर ही मचाया, मरने के बाद तो शांति से विदा हो जाओ। जीवन भर शोर मचाने के बाद हम मरते भी हैं तो दुनिया भर की अशांति करेंगे, उपद्रव करेंगे, “मरने के बाद और अब ये होगा, वो होगा, वैसा होगा।” जीवन भर सबकी ज़िंदगियाँ हम अस्त-व्यस्त करते रहे, मरने के बाद और हम दूसरों की ज़िंदगी अस्त-व्यस्त करके जाते हैं।

कभी देखा है कोई मर जाता है, वो कितनों का समय ख़राब करता है फिर मरने के बाद। हम ऐसे हैं कि न तो तुम्हें जीते जी चैन लेने देंगे, न मरने के बाद। कई बार तो लोग किसी के ज़िंदा रहने की प्रार्थना सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि अगर ये मर गया तो बड़ा खर्चा होगा, और अभी है नहीं फसल हो जाए, काट लें, बेच लें, उसके बाद ये मरे तो ठीक है; अभी मर गया तो खर्चा कहाँ से निकालेंगे, सोचो।

चुपचाप विदा हो जाओ, जैसे कभी थे ही नहीं। जैसे बूंद सागर में मिलती है न, ऐसे विदा हो जाओ। जैसे कभी थे ही नहीं।

और ये उम्मीद बिल्कुल मत रखो कि यहाँ पर अपने निशान छोड़कर जाना है। रेत, वो भी तटीय रेत, उस पर तुम्हारे पाँव के निशान का क्या वजूद है? “हमारे बाद ऐसा होगा, हमारे बाद हमारी पुश्तें होंगी, घर होना चाहिए, वंश चलना चाहिए।” तुम कौन, तुम्हारा वंश क्या? कैसा लगेगा, नुन्नू बोल रहा है, मैं झुन्नू कुल का हूँ। तुम्हारी ज़िंदगी की तो कोई क़ीमत रही नहीं। मरने के बाद तुम्हारे वंश की क्या क़ीमत है?

“मेरे बाद भी इस दुनिया में ज़िंदा मेरा नाम रहेगा, जो भी तुझे देखेगा, तुझे मेरा लाल कहेगा।” ये गाली दे रहे हो तुम उसको। अगर तुम्हारे बाद वो तुम्हारे नाम से पहचाना जा रहा है, तो ये उस बेचारे का दुर्भाग्य है, क्योंकि तुम्हारा नाम ही बड़ा ख़राब है। सोचो, वो बोल रहा है, “मैं झुन्नू कुल का हूँ, मैं झुन्नू वंश का हूँ।” अपने बाद कुछ छोड़ने की उम्मीद मत करो क्योंकि जो सच है, वो अवशेष की तरह छोड़ा नहीं जा सकता। जो सच है, वो किसी को विरासत में नहीं दिया जा सकता। जो असली है, उसको बस जिया जा सकता है।

जो जी रहा है, वो उसके साथ साँस लेगा, और जिस दिन उसकी साँसें रुक जाएँगी, उस दिन वो भी चला जाएगा। अपने पीछे तुम बस अपने कपड़े छोड़ सकते हो, अपनी ईंट, पत्थर, दीवारें छोड़ सकते हो। जो असली है, उसको तो बस जी सकते हो। जीने पर ध्यान दो। आ रही है बात समझ में?

और मिटने में हर्ष मनाया करो। ये बहुत ख़ूबसूरत बात होती है कि अगर कोई आदमी ऐसे मिट गया कि कुछ उसका शेष नहीं बचा, और वो जीते जी हो सकता है, मौत तुम्हें इतना नहीं मिटा सकती, जो जीते जी भविष्य के अरमान लेकर बैठा है उसने तो मौका गँवा दिया न, शरीर मर गया अरमान तो अभी मरे नहीं थे। शरीर मर गया, साहब क्या बोल गए हैं? “आशा तृष्णा ना मरी, मर मर गया शरीर।” अब? शरीर मर गया आशा-तृष्णा बची रह गई। पूरा मिटने पर ध्यान दो। हम मरें इससे पहले आशा-तृष्णा मर जाए। आ रही है बात समझ में? हो सकता है ये आपका आख़िरी साल हो 2026,हैप्पी न्यू ईयर, हैप्पी लास्ट ईयर। अब? 2027 हम में से हो सकता है कुछ लोग देखें ही नहीं। आप हो सकते हो, ये हो सकते हैं, मैं हो सकता हूँ, कोई भी हो सकता है।

जीना सीखो; एक बड़ी प्यारी फिल्मी लाइन है, “मरने का सलीका आते ही जीने का शऊर आ जाता है।” हमें मरने का सलीका नहीं आता, हम मरने से ऐसे भागते हैं जैसे पागल कुत्ता लगा हो पीछे। मरने का अदब सीखिए, मरने का भी एक अंदाज़ होता है। आख़िरी मौत की नहीं बात कर रहा, मैं दिन-प्रतिदिन मरने की बात कर रहा हूँ। उसका सलीका सीखिए। क्लोज़र्स, एंडिंग्स, विदाइयाँ बड़ी प्यारी चीज़ होती हैं। पूर्ण विराम, पूर्णता बिना विराम के आ ही नहीं सकती। विराम देना सीखिए, मरने का सलीका सीखिए। घसीटते मत रहिए ज़िंदगी को।

“क्लोजर” समझते हो? डब्बा बंद, कहानी ख़त्म। हमारी कोई कहानी कभी ख़त्म ही नहीं होती। चली जा रही है, चली जा रही है। वो तो थोड़े और धुरंधर होते हैं, वो तो हज़ार-हज़ार साल पुरानी कहानियाँ चला रहे हैं। कह रहे हैं, “वो कहानी अभी बाक़ी है, अभी इसको हम पूरा करेंगे।”

वो भाई ईरान पर सवाल ले आओ। अरे, उनको ले आना, बुरा मान गए वो। वो वहाँ क्या हो रहा है? वो पुरानी कहानियाँ पूरी करना चाह रहे हैं। वो यहूदी कह रहे हैं, “हमारे साथ बहुत नाइंसाफ़ी हुई, पुरानी कहानी है, उसको पूरा करेंगे।” वो शिया कह रहे हैं, कि “तुम, हम तुम्हें बताते हैं कि अभी पुरानी कौन सी कहानी बची है, हमें भी पूरी करनी है।” पाकिस्तान के हिसाब से कश्मीर की कहानी पूरी नहीं हुई है अभी। आप में भी कौन लोग पुरानी कहानियाँ लेकर चल रहे हो? रातों को सर उठाती हैं वो। अरे अनुभव से बता रहा हूँ। जल्दी बताओ कौन-कौन है वो। फिर से उठाओ। बंद कर दो न डब्बा, हो गया। हो गया, ड्रॉप।

आगे बढ़ो। इसलिए नहीं कि ज़िंदगी बहुत बड़ी है, इसलिए कि ज़िंदगी बहुत छोटी है। पुरानी कहानी ढोते रहने का टाइम-इच नहीं है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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