"हम बंधन में हैं, बंधन ही दुख है और जिज्ञासा उस दुख के पार जाने का उपाय है। अस्तित्ववादी विचारकों ने कहा था कि वास्तव में एक ही प्रश्न है — “To be, or not to be?” दुख इतना है कि इसके साथ जिएँ भी या न जिएँ? फिर कामू इसका उत्तर देते हैं, “जीना तो ऐसे ही पड़ेगा, बस अपनी हालत पर हँसकर जियो।” जो कुछ भी हो रहा है, उसे समझना तुम्हारा दायित्व है। जब समझकर सहते हो तो मुस्कुराहट आ जाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं, “इस जीवन में जो इंसान प्राकृतिक वेगों को तितिक्षा से सहने में सक्षम हो जाता है, वह जीवन-मुक्त है।”
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आचार्य प्रशांत: बहुत आम सवाल रहता है कि “ज़िंदगी किसलिए है? जीवन का उद्देश्य क्या है?” उस पर बहुत तरह की बातें होती हैं, जितने मुँह उतनी बातें। ख़ासकर धर्म के क्षेत्र में कह सकते हैं बातों के अलावा कुछ होता ही नहीं। लोक धर्म है, लोक धर्म माने शब्द, बातें। गीता प्रामाणिक रूप से आख़िरी बात कहे दे रही है, इसके बाद किसी बात की ज़रूरत नहीं रह जानी चाहिए।
“हम कौन हैं?” इस पर तो निरंतर प्रकाश डलता ही रहता है। “हम किस लिए हैं, हम जिंदा ही क्यों हैं?” उस पर जो आज श्रीकृष्ण का वक्तव्य है, उसको माना जाना चाहिए आख़िरी शब्द, की इसके बाद अब बहस मत कर लेना। क्या है वो आख़िरी बात? हमारे पैदा होने का अर्थ क्या होता है कि एक देह है, वो देह पहले नहीं थी, वो दिखाई दे रही है। उसको हम जीव या प्राणी बोलते हैं, बालक या मनुष्य बोलते हैं।
हम कैसे कह पाते हैं कि अब एक प्राणी आ गया दुनिया में, इसी भाषा में बोलते हैं न। देखो, दुनिया में एक नया जीव आ गया, कैसे कह पाते हैं क्योंकि उसका शरीर एक ख़ास आकार लिए हुए है। तो जैसे हम आम को देख के बता देते हैं, ये आम है। जबकि सब आम एक-दूसरे से थोड़ा अलग-अलग होते हैं, फिर भी हमें आम दिखता है तो हम बोल देते हैं, ये आम है। तो वैसे ही एक बच्चा नया पैदा हुआ है, बच्ची है। हम उसको देख के तुरंत बोल देंगे कि ये तो इंसान की औलाद है, हो गया एक और पैदा हो गया, बता देंगे। तो ये शुरुआत होती है। तो शुरुआत का मतलब ही क्या है? देह। ठीक है न?




