जीवन का उद्देश्य: अस्तित्ववाद से अध्यात्म तक

Acharya Prashant

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जीवन का उद्देश्य: अस्तित्ववाद से अध्यात्म तक
"हम बंधन में हैं, बंधन ही दुख है और जिज्ञासा उस दुख के पार जाने का उपाय है। अस्तित्ववादी विचारकों ने कहा था कि वास्तव में एक ही प्रश्न है — “To be, or not to be?” दुख इतना है कि इसके साथ जिएँ भी या न जिएँ? फिर कामू इसका उत्तर देते हैं, “जीना तो ऐसे ही पड़ेगा, बस अपनी हालत पर हँसकर जियो।” जो कुछ भी हो रहा है, उसे समझना तुम्हारा दायित्व है। जब समझकर सहते हो तो मुस्कुराहट आ जाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं, “इस जीवन में जो इंसान प्राकृतिक वेगों को तितिक्षा से सहने में सक्षम हो जाता है, वह जीवन-मुक्त है।” यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

आचार्य प्रशांत: बहुत आम सवाल रहता है कि “ज़िंदगी किसलिए है? जीवन का उद्देश्य क्या है?” उस पर बहुत तरह की बातें होती हैं, जितने मुँह उतनी बातें। ख़ासकर धर्म के क्षेत्र में कह सकते हैं बातों के अलावा कुछ होता ही नहीं। लोक धर्म है, लोक धर्म माने शब्द, बातें। गीता प्रामाणिक रूप से आख़िरी बात कहे दे रही है, इसके बाद किसी बात की ज़रूरत नहीं रह जानी चाहिए।

“हम कौन हैं?” इस पर तो निरंतर प्रकाश डलता ही रहता है। “हम किस लिए हैं, हम जिंदा ही क्यों हैं?” उस पर जो आज श्रीकृष्ण का वक्तव्य है, उसको माना जाना चाहिए आख़िरी शब्द, की इसके बाद अब बहस मत कर लेना। क्या है वो आख़िरी बात? हमारे पैदा होने का अर्थ क्या होता है कि एक देह है, वो देह पहले नहीं थी, वो दिखाई दे रही है। उसको हम जीव या प्राणी बोलते हैं, बालक या मनुष्य बोलते हैं।

हम कैसे कह पाते हैं कि अब एक प्राणी आ गया दुनिया में, इसी भाषा में बोलते हैं न। देखो, दुनिया में एक नया जीव आ गया, कैसे कह पाते हैं क्योंकि उसका शरीर एक ख़ास आकार लिए हुए है। तो जैसे हम आम को देख के बता देते हैं, ये आम है। जबकि सब आम एक-दूसरे से थोड़ा अलग-अलग होते हैं, फिर भी हमें आम दिखता है तो हम बोल देते हैं, ये आम है। तो वैसे ही एक बच्चा नया पैदा हुआ है, बच्ची है। हम उसको देख के तुरंत बोल देंगे कि ये तो इंसान की औलाद है, हो गया एक और पैदा हो गया, बता देंगे। तो ये शुरुआत होती है। तो शुरुआत का मतलब ही क्या है? देह। ठीक है न?

एक ख़ास रूप रेखा संरचना वाले पदार्थ का अस्तित्व में आ जाना और उसके अस्तित्व में आने की भी एक तय प्रक्रिया होती है, उसके अलावा कुछ और हो नहीं सकता माध्यम उसके दुनिया में आने का। दो विपरीत लिंग के मनुष्यों का संसर्ग होता है, फिर उसकी माँ उसको नौ महीने पेट में धारण करती है और उसके बाद एक तयशुदा प्रक्रिया है। सब हम जानते है। ठीक वैसे ही तयशुदा जैसे हमें पता है कि अगर इंसान पैदा हुआ है तो दो हाथ दो टांगें लेकर पैदा हुआ होगा। ये सब निश्चित है।

तो ये (देह) जो चीज़ पैदा होती है न, चीज़ मैं उसको जान बूझ कर बोल रहा हूँ क्योंकि पदार्थ है, भौतिक पदार्थ है न, छू सकते हो ऐसे। तो ये जो चीज़ पैदा होती है, इसका गुणधर्म तो निश्चित हो जाता है इसकी संरचना से। ठीक वैसे जैसे आप कुछ खाते हैं, तो आप बोलते हैं कि इसका गुण इस बात से तय हो जाता है कि इसमें माल डला क्या है। कोई चीज़ सरसों के तेल से बनी है और कोई चीज़ जैतून के तेल से बनी है, अलग-अलग हो जाती है वो। वैसे ही इसके अन्दर जो है, उससे तय हो जाता है कि ये जो चीज़ अस्तित्व में आई है, ये किस प्रकार का व्यवहार करेगी। है न?

कोई चीज़ आप नारियल के तेल से बनाओ और वही चीज़ आप मिट्टी के तेल से बना दो, तो उसका व्यवहार अलग हो जाएगा कि नहीं हो जाएगा? हो जाएगा। तो वैसे ही इसके भीतर क्या डला हुआ है, उससे इसका व्यवहार तय होता है बहुत सीधी सी बात है। क्योंकि ये एक चीज़ है, पदार्थ है, और इसके भीतर जो डला हुआ है चूँकि वो पदार्थ है तो इसलिए वो अपने बहुत तयशुदा तरीक़ों से ही व्यवहार करेगा और उसको आप नहीं बदल सकते। उसको बदलने का कोई उपाय नहीं है। ठीक है।

वो नहीं बदलता लेकिन उसके अतिरिक्त कुछ होता है मनुष्य में, जो उसे पदार्थ से एक सीमा तक भिन्न बना देता है। पदार्थ हम भी हैं, पदार्थ ये (बाहर की ओर इंगित करते हुए) भी है। और बिल्कुल अगर ऊपर से देखोगे, पारमार्थिक दृष्टि से, तो ये दोनों बिल्कुल एक हैं। यहाँ (बाहर की ओर इंगित करते हुए) भी अणु-परमाणु घूम रहे हैं, यहाँ (अपनी ओर इंगित करते हुए) भी घूम रहे हैं, कुछ है नहीं। मिट्टी से ये बना, मिट्टी से हम बने, कुछ है नहीं। लेकिन जब थोड़ा नीचे आ जाते हो व्यवहारिक दृष्टि से, तो आप भेद करते हो, आप बोलते हो, ये (बाहर की ओर इंगित करते हुए) जड़ है, ये (अपनी ओर इंगित करते हुए) चेतन है। ठीक है न? पारमार्थिक दृष्टि से दोनों एक हैं, व्यवहारिक दृष्टि से आप ऐसा नहीं बोलोगे। कोई इसको (चाय के कप की ओर इंगित करते हुए) उठा कर के तोड़ दें और कोई मेरा सिर तोड़ दे तो आप नहीं कहोगे, की एक ही घटना घट गई है।

ये (कप) टूट गया तो थोड़ा अफ़सोस करोगे, इसका (अपने सिर की ओर इंगित करते हुए) सिर टूट जाएगा तो थोड़ा ज़्यादा अफ़सोस करोगे। क्योंकि आप भेद करते हो, ये चेतन है। तो चेतना जो भी है पारमार्थिक दृष्टि से तो चेतना भी पदार्थ का ही एक सह-उत्पाद है, ऐसे भी कहा जा सकता है, और तरीक़ों से भी कहा जा सकता है। ठीक। जैसे हम कह रहे हैं कि चेतना पदार्थ का उत्पाद है, वैसे ही उसका जो बिल्कुल विपरीत है वो भी सही है कि पदार्थ चेतना का सह-उत्पाद है, कैसे भी कह लो, लेकिन ये पक्का है कि व्यवहारिक तल पर इन दोनों में थोड़ा अंतर होता है, चेतना में और जड़ता में अंतर होता है।

तो ये जो जीव पैदा होता है, इसमें जड़ता तो होती ही होती है। इसमें (अपने शरीर की ओर इंगित करते हुए) जो माल लगा हुआ है भीतर, माल। किसी भी चीज़ का स्वाद, व्यवहार, काम, क्वालिटी, गुणवत्ता, उसमें माल क्या लगा हुआ, उससे तय होता है न। तो इसमें जो माल लगा हुआ है, उससे बहुत हद तक इसका जो व्यवहार है वो पूर्व निर्धारित हो जाता है। लेकिन इसके पास एक चीज़ और होती है, जिसको हम कह सकते हैं — चेतना। वो चेतना वास्तव में जड़ता से भिन्न नहीं है, चेतना और जड़ता को भिन्न मानोगे तो द्वैत में पहुँच जाओगे। फिर कह दो कि दृश्य अलग दृष्टा अलग, वो सब। लेकिन वो बहुत ऊँचा सत्य है कि जड़ और चेतन तो एक होते हैं, कि दृश्य और दृष्टा तो एक होते हैं। वो बहुत आख़िरी बात। व्यवहार में तो हम इनमें अंतर करते ही है।

तो ये जो चेतना होती है न, यही तय करती है कि आपके जीवन की गुणवत्ता क्या है। अपनी जड़ता से तो कोई छेड़छाड़ आप कर नहीं सकते। कोई अपनी नाक का आकार बदल सकता है? सर्जरी वग़ैरह अलग से करा लो, वो अलग बात है। बालों का रंग नहीं बदल सकते, उसमें भी कुछ अलग से करा लो तो अलग बात है। कुछ नहीं बदल सकते आप, खाल का रंग नहीं बदल सकते, कद नहीं बदल सकते, लिंग नहीं बदल सकते, बहुत सारी बातें। बहुत सारे लोग पैदा होते हैं बीमारियाँ लेकर के, वो क्या करें। और बहुत सारे लोगों की अनुवांशिक बदनसीबी होती है कि उनको दिल की बीमारी डायबिटीज़ या कैंसर भी इसलिए होगा, क्योंकि वो उनकी जेनेटिक परंपरा में बैठा हुआ है। तो सबको होता आया है उनके यहाँ, इनको भी होने की बड़ी संभावना है। वो सब आप नहीं बदल सकते। पर कुछ और है जो हम बदल सकते हैं, जिसका नाम हमने कहा…

श्रोता: चेतना।

आचार्य प्रशांत: चेतना। अब ये चेतना, हम इसकी बात क्यों कर रहे हैं? एक ओर तो हम कह रहे हैं, पारमार्थिक तल पर चेतना और जड़ता एक ही होते हैं। तो हम इसकी बात क्यों कर रहे हैं? बड़े व्यवहारिक कारण से बात कर रहे हैं, कारण ये है कि दुख तो चेतना ही पाती है न। व्यवहारिक कारण ये है कि ये सवाल भी कि “जीवन क्यों है?” कभी ये (कप) थोड़ी पूछने वाला है। मैं और ये (कप) एक हो सकते हैं, पर इसको कभी देखा कि अपने आप ही अपना ढक्कन खोल कर के सवाल पूछने लगे, “मैं हूँ क्यों? किसने मुझे बनाया? क्यों मैं आया? जीवन भर दूसरों का ही माल डालता रहेगा, कुछ मेरा भी होगा? यही चक्र चलेगा कि आवागमन से कुछ मुक्ति है?” ये तो पूछता नहीं। हम पूछते हैं तो दुख भी किसको है? चेतना को। जिज्ञासा भी किसको है?

श्रोता: चेतना को।

आचार्य प्रशांत: तो जीवन का उद्देश्य भी चेतना के लिए है। ये बहुत छोटी सी बात है, मैं आपको शुरू के एक वाक्य में बता देता पर पूरी प्रक्रिया के साथ, पूरे डेरिवेशन के साथ इस पर पहुँचना ज़रूरी है।

जीवन का उद्देश्य, आपकी नाक के लिए नहीं है, होंठ के लिए नहीं है, कान के लिए नहीं है, ऊँगलियों के लिए नहीं है, इनका कोई उद्देश्य नहीं होता। तो तन के लिए जीवन का कोई उद्देश्य नहीं होता, तन का तो जो भी उद्देश्य है, वो उसी दिन स्थापित हो गया था।

श्रोता: पैदा होंने से पहले हो गया था।

आचार्य प्रशांत: हाँ, पैदा होने से पहले ही हो गया था। तो तन का तो उद्देश्य बहुत बँधा बँधाया है। पर चूँकि ये सवाल चेतना ने पूछा है, कि “मैं हूँ क्यों? मैं दुख क्यों पा रही हूँ?” तो जो सारा उद्देश्य वग़ैरह है, वो चेतना के लिए होगा।

अब चेतना ने सवाल ही इसलिए पूछा है क्योंकि वो एक विशेष अनुभव कर रही है, जिसको हम कहते हैं, दुख। दुख क्या है? एक प्रकार का अनुभव ही है न। तो एक विशेष प्रकार का अनुभव है, दुख, जो जब हमें होता है, तब हम पूछते हैं कि “मैं क्यों आ गया? अरे! कब तक रहना पड़ेगा? यही है कि कुछ और भी है? मरने तक ही फँसे रहेंगे या मरने के बाद भी फँसे रहेंगे?” ये सब सवाल कब पूछते हो जब दुखी होते हो, तो दुख केंद्रीय समस्या है, ये समझना बहुत ज़रूरी है।

सब प्रश्नों के पीछे जो केंद्रीय समस्या है, वो दुख है। और इसीलिए मुक्ति और आनंद हमेशा एक साँस में बोले जाते हैं। मुक्ति और आनंद कभी भी आपको दो अलग-अलग संदर्भों में उल्लिखित नहीं मिलेंगे, और मिल रहे हैं तो फिर बात नासमझी की है। मुक्ति और आनंद हमेशा एक साँस में बोले जाएँगे, और उसी तरीक़े से दुख और बंधन एक साँस में बोले जाएँगे। “मैं फँसा हुआ हूँ,” जब फँसे होते हो तभी तो पूछते हो न, कि “बाहर कैसे निकलें?”

बंदर मस्त डाल पर बैठा हुआ है, उस को कोई जिज्ञासा है क्या? बताएगा है? मस्त पड़ा हुआ है। और एक चूहे को चूहेदानी में बंद कर दीजिए और फिर उसकी हालत देखिए, वो क्या कर रहा है, वो लगातार अब जिज्ञासा कर रहा है, वो शाब्दिक जिज्ञासा नहीं कर सकता। तो वो किस तरह से जिज्ञासा करता है? वो एक-एक तीली को धक्का देता है और गोल-गोल वो घूमता ही रहता है। ये उसकी जिज्ञासा है, ये वो प्रश्न पूछ रहा है क्योंकि वो?

श्रोता: बंधन में है।

आचार्य प्रशांत: बंधन में है।

चूँकि हम बंधन में हैं, हमारे पास प्रश्न होते हैं, बंधन ही दुख है। और जिज्ञासा उस दुख के पार जाने का उपाय है।

अब ये जो दुख है, इसको हम थोड़ा और टटोलते हैं, मामला क्या है। तो ये जो पैदा हुआ है, हमने कहा कि ये है तो ऐसे पूरा पदार्थ ही और फिर भी इसके भीतर दो प्रकार के तत्व होते हैं, व्यवहारिक दृष्टि से एक जड़ और एक चेतन। अब इन दोनों की दिशाएँ या तल एकदम अलग-अलग होते हैं। आप जड़ को देखिए, तो आप इसको (कप) यहाँ छोड़ दीजिए और दो साल बाद वापस आइए, तो ये कहाँ मिलेगा? यहीं मिलेगा। मरा-गिरा मिलेगा, धूल-धूसरित मिलेगा, पर मिलेगा यहीं पर। जड़ पदार्थ को कहीं पहुँचना नहीं है, कहीं नहीं जाना उसको, वो जहाँ है, जैसा है, ठीक है। और अगर उसे कहीं जाना भी है, वो कोई गति करता भी है तो वो गति भी बँधे बँधाए नियमो से होती है।

उदाहरण के लिए, एक गति ये हो सकती है कि आप इसके भीतर कुछ छोड़ कर जाएँ और वापस आएँ तो पाएँ वो बुरी तरह सड़ चुका है, सड़ ही नहीं चुका है, वो तो कब का भाप बन गया। दो साल बाद वापस आएँगे, इसमें छोड़ के गए तो कुछ नहीं मिलेगा, वो अब उड़ चुका है। तो गति तो हुई पर वो गति भी बँधे बँधाए नियमों से हुई, ये जड़ पदार्थ है, ठीक। और चेतना की जो प्रकृति होती है, वो बिल्कुल भिन्न होती है। हम जिसको कहते हैं न, “मनुष्य का स्वभाव” वो वास्तव में हम चेतना की प्रकृति की बात कर रहे हैं। तो हम क्या हैं, जड़ हैं। ऐसे देखिए, हम हैं:

जड़ - एक और जड़ - दो।

दो तरह की जड़ताएँ हैं हम। पहले तरह की जड़ता को हम सिर्फ़ बोल देते हैं, जड़ता। और दूसरे तरह की एक ख़ास जड़ता होती है जिसको हम बोल देते हैं, चेतना। तो शुरुआत तो इससे करेंगे कि ये जो डब्बा (देह) पैदा होता है, ये एक जड़ डब्बा है जैसे फैक्ट्री से कोई माल पैदा हुआ, माल तैयार हुआ। और ये दो तरह की जड़ताएँ लेकर पैदा हुआ है, तो जड़ - एक, जड़ - दो, ताकि हमसे कोई गलती न हो जाए, ताकि हम भूल न जाएँ की पारमार्थिक तल पर जड़ और चेतन?

श्रोता: एक हैं।

आचार्य प्रशांत: तो इसी लिए हम चेतना को भी जड़ - दो लिख रहे है। तो शुरुआत करेंगे कहने से, जड़ - एक है, जड़ - दो है। जड़ - एक को फिर हम बोलने लगते हैं, जड़ता। और जड़ - दो को बोलने लग जाते हैं, चेतना।

अब जड़ता की भी अपनी एक प्रकृति है और चेतना की भी अपनी एक प्रकृति है। तो “जड़ता की प्रकृति” और “चेतना की प्रकृति।” और फिर बातचीत इस अंदाज में आगे बढ़ती है कि जड़ता की जो प्रकृति है, उसको हम कहने लग जाते हैं, “सिर्फ़ प्रकृति” और चेतना की जो प्रकृति है, उसको हम कहने लग जाते हैं, “स्वभाव।”

तो जिसको आप मनुष्य का स्वभाव इत्यादि बोलते हो, सच्चिदानंद इत्यादि बोलते हो, वो भी वास्तव में प्रकृति ही है। वो चेतना की प्रकृति है, पर चेतना भी क्या है?

श्रोता: जड़।

आचार्य प्रशांत: है सब प्रकृति ही। सारा खेल प्रकृति का है ताकि हम भूले नहीं कि हम जितनी बातें कर रहे हैं, वो सब मन के दायरे की ही हैं। याद नहीं रखोगे कि सब प्रकृति है, तो फिर पता नहीं कहाँ पहुँच जाते हो कौन से लोक में। याद रखना होता है कि जो बातें हैं, हैं तो सब भौतिक ही। प्राकृतिक माने, भौतिक, है तो सब वही। तो उसको हम स्वभाव बोलना शुरू कर देते है।

तो हमारे हत्थे ये दो शब्द आ गए, एक प्रकृति और एक स्वभाव। मैं यहाँ से शुरुआत भी कर सकता था, पर हम यहाँ तक पहुँचे हैं एक प्रक्रिया से, वो प्रक्रिया याद रखनी बहुत ज़रूरी है। ठीक है। तो अब हमारे पास, हमारे माने, हम यही लोग नहीं, हर जीव जो पैदा हुआ है, अब उसके पास दो चीज़ें हो जाती हैं — एक प्रकृति, एक स्वभाव।

श्रोता: दृष्टा और स्वभाव किसके अंदर आते हैं?

आचार्य प्रशांत: वो चेतन जब वहाँ पर भेद करा न, जड़ - एक, जड़ - दो, तो वहाँ पर आपने दृश्य को कहाँ डाल दिया था, जड़ - एक में। और दृष्टा को कहाँ डाल दिया था, जड़ - दो में। ठीक है।

अब ये हमने जो पूरा खाका खींचा है, ये माया है, क्योंकि पारमार्थिक दृष्टि से ये सत्य नहीं है। पारमार्थिक दृष्टि से तो भाई एक ही तत्व है, तुम उसके दो खंड कर भी क्यों रहे हो। लेकिन अगर हम समझना चाहते हैं तो हम इस प्रक्रिया से गुजर रहे हैं अभी तोड़-फोड़ दिया है, हिस्से बना दिए है, फिर वापस आ जाएँगे, सब बंद कर देंगे डब्बा। ठीक है।

तो हमारे पास दो चीज़ें आ गईं, हम से संबंधित — प्रकृति और स्वभाव, ये सबके पास होते हैं। कोई जीव है तो उसके पास ये दो चीज़ें होंगी, एक उसकी प्रकृति होगी और उसका एक स्वभाव होगा, ठीक है। प्रकृति किसकी होती है, शरीर की और स्वभाव किसका होता है, चेतना का। ये जो चेतना है जिसका स्वभाव होता है, इसके केंद्र में जो बैठा होता है, जो अपने आप को दृष्टा आदि बोलता है, उसको हम क्या बोलते हैं? अहंकार। वो कहता है न, “मैं देख रहा हूँ,” तो ये अहंकार है, “मैं देख रहा हूँ।”

तो कोई पूछे की तात्विक दृष्टि से बताओ, अहंकार जड़ है कि नहीं? तो क्या बोलेंगे, है तो जड़ ही। पूरी चेतना ही जड़, लेकिन अगर ऐसे बोल दिया तो फिर दुख का कोई समाधान भी नहीं निकलेगा। या तो कोई ऐसा पारखी हो कि उसको बस इतना बोल दो, कि सारी चेतना बस जड़ है और रासायनिक नियमों का पालन करती है। वो इतना समझने से ही दुख मुक्त हो जाए, तब तो अलग बात है। वरना हम जिस केंद्रीय समस्या से जूझ रहे हैं, वो समस्या किसकी है, बंधन की और दुख की। ये कह देने भर से है की अहंकार तो जड़ होता है, जी केमिकल होता है अगर किसी का दुख दूर होता हो तो बहुत अच्छी बात है, पर आमतौर पर नहीं होता। नहीं होता, तो इसलिए फिर एक श्लोक को दो घंटे तक, है न। बात समझ में आ रही है? नहीं तो श्लोक अपने आप में, वास्तव में पर्याप्त है, अगर आप ऐसे हों कि एक नजर में ही उसके सार तक पहुँच जाएँ, उसकी गहराई को छू पाएँ, पर वो हो नहीं पाता आमतौर पर।

तो ये है “मैं” जो चेतना के केंद्र पर बैठा है, यही सब दुख सुख भोगता है, यही बंधन में है इसलिए जिज्ञासा करता है चूहे की तरह कि “बाहर कैसे निकलूँ? मैं तो फँस गया चारो तरफ़। ये चूहे दानी है, मैं बाहर कैसे निकलूँ?” ये “मैं” है, ठीक है न। इसी “मैं” की जिज्ञासा से इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत हुई थी। इस “मैं” ने छटपटाहट न दिखाई होती, तो हम ये सब बैठ कर के कुछ नहीं कर रहे होते। तो अध्यात्म की शुरुआत ही होती है उस ईमानदार जीव से जो सर्वप्रथम मानता है कि वो परेशान है, दुख में है। जो माने ही न कि वो परेशान है, बंधन में है, फँसा हुआ है, दुख में है, उसके लिए अध्यात्म एक बहुत व्यर्थ की चीज़ हो जाती है, पीछे की चीज़ हो जाती है। हो सकता है वो ये न बोले खुलेआम की व्यर्थ है। तो व्यर्थ नहीं बोलेगा पर वरीयता बहुत पीछे ही दे देगा, और वो भी एक ही बात है।

आप किसी चीज़ को अपनी ज़िंदगी में बीसवी वरीयता दे दें, तो आपने यही कह दिया है कि वो व्यर्थ है। हाँ, आप में इतना साहस भी नहीं था, कि धड़ल्ले से बोल पाते कि “मैं तो इस को व्यर्थ मानता हूँ।” इतना साहस आमतौर पर संसारियों में होता नहीं कि जिस चीज़ को व्यर्थ मानते हैं, सीधे ही कह दें। तो ये नहीं कहते की व्यर्थ है, वो कहते हैं नहीं, ये ठीक है, ये ज़रूरी है, इसका महत्त्व है। पर हमें इससे पहले आठ-दस काम और निपटाने हैं, ये भी कर लेंगे, पर इससे पहले 20 काम और करेंगे। वो आप जो है व्यावहारिक रूप से डी फैक्टो यही कह रहे हो की आप उसको व्यर्थ ही मानते हो।

जिन लोगों के लिए दुख की समस्या प्राथमिक नहीं है, उनके लिए अध्यात्म शुरू भी नहीं होने पाता।

जिनके लिए उनका दुख और मुक्ति प्राथमिक नहीं होते, वो फिर अध्यात्म को, गीता को, सत्रों को भी पीछे ही रखते हैं। भाई मेरे लिए जब मेरी बीमारी महत्त्वपूर्ण नहीं है, तो दवाई क्यों महत्त्वपूर्ण होगी बताओ। जिस आदमी को अपनी बीमारी का ही कुछ ख़्याल न हो, कुछ होश न हो, वो आदमी दवाई को कितना सम्मान देगा या देगा? आप उसके पास दवाई लेके जाओगे, पीछे-पीछे भागोगे तो भी कहेगा हाँ देख लेंगे, बाद में देख लेंगे। नहीं, अभी ठीक नहीं है, समय नहीं है, कुछ और कर रहे हैं। बहुत महंगी है दवाई, कड़वी है दवाई, कुछ भी बोल देगा।

तो दुख से शुरुआत है। ये जो पूरी प्रक्रिया है, ये हमारे-आपके दुख से शुरू होती। और दुख तो है ही, क्योंकि जो जन्म ले रहा है, वो एक बहुत विचित्र पिक्यूलियर स्थिति में जन्म ले रहा है। उस स्थिति का ही नाम दुख है, तो जन्म ही दुख है।

जन्म कैसे दुख है?

जन्म ऐसे दुख है कि प्रकृति और स्वभाव को एक में जहाँ बाँध दिया गया, उसको देह कहते हैं। ये दुख है। प्रकृति और स्वभाव बिल्कुल अलग आयामों की चीज़ें हैं, और देह वो जगह है, वो साइट है जहाँ इन दोनों को कुछ ऐसे बाँध दिया गया है कि अलग ही नहीं हो सकते। अलग करने का एक ही तरीक़ा है, क्या? मर ही जाओ। बात समझ में आ रही है?

एक भयानक तरीक़े का बेमेल विवाह है — देह, कि दो ऐसे लोग बँध गए हैं, अलग हो ही नहीं सकते। और विवाह में तो फिर भी ये है कि आप जवान हो जाते हो, तब करते हो, तो कम से कम शुरू में पच्चीस साल बच जाते हैं। देह का तो ये है कि पहले क्षण से मिली हुई है, तो उसमें ये गुंजाइश भी नहीं कि शुरू के कुछ साल बचेंगे, वो पहले क्षण से मिली हुई है। और उसमें दो ऐसों को बाँध दिया गया है जो कभी साथ बँध सकते ही नहीं। इसलिए समझने वालों ने इतनी बात समझकर कहा कि बेटा, सिर्फ़ जीवन नहीं दुख है, जन्म ही दुख है; सिर्फ़ ज़रा नहीं दुख है, जन्म ही दुख है।

हम कौन हैं? आप अपनी परिभाषा समझ पा रही हैं? दो ऐसों का बेमेल गठबंधन हैं हम, जो कभी साथ चल नहीं सकते। पर जब उनको साथ बाँध दिया जाता है, तो उस स्थिति का नाम, देह है। देह माने एक ऐसी स्थिति, जहाँ दो विसंगतियों का बड़ा मायावी मिलन हो रहा है। यही माया है, देह ही माया है, पहली माया देह ही है। ये ऐसी चीज़ है जो हो नहीं सकती, पर है। प्रकृति और स्वभाव साथ तो चल नहीं सकते, क्योंकि हमने ही कहा कि भाई, जड़ और चेतन तो अलग-अलग हैं। ये रहा जड़ (कप की ओर इंगित करते हुए) इसका अपना हिसाब-किताब है। और ये है चेतन (अपने शरीर की ओर इंगित करते हुए) इसका अपना अलग हिसाब-किताब है।

देह वो जगह है लेकिन जहाँ जड़ और चेतन आपस में बँध ही नहीं गए हैं, ऐसे गुथ गए हैं, जैसे आटे में नमक, अलग करके दिखा दो। जैसे पानी में शक्कर, अलग करके दिखाओ। है कोई, जो अपनी जड़ देह से अपनी चेतना को अलग करके दिखा सके? “एक मिनट रुकिएगा जरा मैं उस कमरे में जाता हूँ, दरवाज़ा बंद करके।” जैसे कपड़े अलग करके दिखाए जाते हैं न, फिर थोड़ी देर में बाहर आए और दिखा दिया, “देखिए, ये शर्ट है, ये अलग करके आपको दिखा दी।” तो ऐसे ही करो, अंदर जाओ और वहाँ से अपनी चेतना अलग से हाथ में ऐसे टाँग के ले आओ। बाबाजी कर सकते हैं ये सब, आप नहीं कर पाओगे।

अभी फँस गए, गज़ब फँस गए। पानी से तो शक्कर फिर भी अलग?

श्रोता: हो सकती है।

आचार्य प्रशांत: और आटे से भी नमक?

श्रोता: अलग हो सकता है।

आचार्य प्रशांत: पर इससे (देह) चेतना अलग कर दी, तो उसको तो मृत्यु बोलते हैं। और वहाँ तो प्रयोग चल रहा है, तो पानी में से शक्कर अलग करोगे, तो दोबारा मिला भी दोगे। पर इसका (देह) तो ऐसा है कि एक बार अगर अलग हो गया मामला, तो फिर, “अब के बिछड़े न मिले, दूर पड़ेंगे जाय।” ये सब मूर्खों की बातें होती हैं कि अब बिछड़ गए हैं, तो दोबारा मिलन भी होगा। यहाँ तो एक होता है और आख़िरी होता है। तो ये अजीब स्थिति है दो को साथ बाँध दिया है, जो साथ रह नहीं सकते। और अगर उनको अलग करो, तो जिसको दुख मिलता है जिसने ये सवाल किया, जिसकी वजह से पूरी गीता है, जिसकी वजह से आज का सत्र है, अगर अलग करो तो उसको और दुख मिलेगा।

आप मेरे पास आकर बोलें, “आपको बड़ा बंधन है,” तो मैं कहूँ ठीक है, “मर जाओ, सारा दुख समाप्त हो जाएगा।” तो आप कहोगे, “जो छोटा-मोटा दुख है ये मूर्ख आदमी और बड़ा दुख बता रहा है, कहाँ फँस गए हम!” तो फिर इसलिए प्रतीकात्मक तौर पर ज्ञानियों ने बार-बार कहा कि “दोबारा नहीं आना,” मतलब समझ रहे हो? भैया हो गया, एक बार फँस लिए। ये जगह अच्छी नहीं है, पागल होते हैं जो कहते हैं कि अभी और मिले, अभी और मिले। ज्ञानियों ने हमेशा यही कहा है, “जितना अभी कर्जा सिर पर चढ़ा रखा है, बस उसको निपटा लें। उसके बाद हम चाहते हैं, हमारा कोई लेना-देना न बचे। चलना चाहते भी हैं तो बस तब तक, जब तक कि सिर पर कर्ज़ है।”

हम कहते हैं न, मातृ ऋण, पितृ ऋण। तो माँ-बाप तो असली पृथ्वी ही है। ये बड़ा ऋण है हमारे सबके ऊपर कि जो हमारी सबसे बड़ी माँ है, वो कितने कष्ट में है। तो मातृ ऋण तो उतारना पड़ेगा न। तो उससे पहले कैसे कहते हैं कि टाटा, बाय-बाय। उतना रुकना पड़ेगा। पर ज्ञानी कहता है, उतना ही रुकूँगा, जब तक ऋण उतारना है; इसलिए नहीं रुकूँगा कि और भोगना है।

मैं काम कर रहा हूँ, इसलिए क्योंकि सिर पर कर्ज़ चढ़ा हुआ है। तो जो पैसा आता है, उसको जाकर के उधार चुका आता हूँ। काम इसलिए नहीं कर रहा हूँ कि जो पैसा आता है, उससे जा करके मौज मारूँगा। ये ज्ञानी का वचन होता है — संसार में हूँ ताकि उऋण हो जाऊँ। और उऋण होने के बाद हमें, ये अलग बात है कि उऋण हुआ…

श्रोता: जा नहीं सकता।

आचार्य प्रशांत: क्योंकि ज्ञानी होने का मतलब ये होता है कि तुम अपना ही नहीं कर्ज़ उतारते, तुम दुनिया भर का कर्ज़ अपने माथे ले लेते हो। अब बताओ कैसे उतारोगे? तुम जितना उतारोगे, उससे ज़्यादा झुन्नू-धनिया मिल करके चढ़ाते चलेंगे। तो ज्ञानी फिर तलाश करता रह जाता है कि बस जल्दी से अब और निपट जाए, फिर हम प्रस्थान करें, प्रस्थान करें। वो फिर आता है तो देखता ये तो और बढ़ गया, ये किसने बढ़ा दिया? जब बहुत परेशान होता है तो कोई कहता है, किसने कहा था कि तुम पूरी दुनिया का अपने ऊपर ले लो? अपना व्यक्तिगत उतार लो, चले जाओ, काहे के लिए। बोले व्यक्तिगत ऋण नहीं उतारना है, जो व्यक्तिगत है वही तो उतारना है। और अगर व्यक्तिगत को नहीं उतारा तो व्यक्तिगत ऋण उतरने से क्या फ़ायदा?

अब ये चेतना है, इसकी अलग प्रकृति है, स्वभाव। और ये चाहती है मुक्ति। और इसको क्या चाहिए? नियम। और नियम माने, बंधन। तो इसीलिए लॉज़ ऑफ़ मैटर होते हैं, लॉज़ ऑफ़ कॉन्शसनेस नहीं होते। इसको (कप) क्या चाहिए? भौतिकी के सारे नियम किसके नियम हैं?

श्रोता: पदार्थ।

आचार्य प्रशांत: इसके (कप) नियम हैं। कभी सुना है चेतना के नियम? और चेतना के नियम अगर निकल आएँ तो वो क्या थी? वो जड़ता थी। चेतना के भी नियम निकाले जा सकते हैं, उदाहरण के लिए, किसी को गाली दे दोगे तो क्रोधित हो जाएगा। ये एक प्रकार से चेतना का नियम है, पर ये चेतना का नियम नहीं है, ये तो जड़ता का नियम है। तो वो लगभग इसी (कप) का नियम है, ये स्थूल पदार्थ है। जो क्रोधित हो जाए, वो सूक्ष्म पदार्थ है, पर वो भी नियमबद्ध अगर हो सकता है तो पदार्थ है।

अगर किसी के बारे में आपने कोई ढर्रा पकड़ लिया, माने आपने उसका कोई नियम खोज निकाला, सूँघ लिया, डिटेक्ट कर लिया कि यह एक ढर्रे पर, पैटर्न पर, लॉ पर चलता है, तो इतने से प्रमाणित हो गया कि जिसकी आप बात कर रहे हैं, वो जड़ है। नियम सिर्फ़ जड़ पर लागू होते हैं। भाई, प्रकृति की बात है, ये हम दावा नहीं कर रहे हैं, ये हम देख कर बता रहे हैं कि ऐसा होता है, ये ऑब्ज़र्वेशन की बात है बस। ठीक है। तो इसको (कप) तो चलना है, और इसको कभी कोई दुख लगना नहीं है।

और जो चेतन है, वो नियम पर फँस गया तो यही उसका दुख है। इसको रहना हमेशा सीमाओं में, और जो चेतन है, उसको आपने सीमा दे दी तो यही उसका दुख है। और बताइए इसके बारे में, आप इसके बारे में जो कुछ बताएँगे चेतना उससे बहुत अलग निकलेगी। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, ये मूल्य-निरपेक्ष होता है, इसका जो काम है, वो वैल्यू इंडिपेंडेंट होता है। मैं इसमें अमृत भर दूँ तो इसका रंग क्या रहेगा? मैं इसमें (कप को हाथ में उठाते हुए) ज़हर भर दूँ तो इसका रंग क्या रहेगा?

श्रोता: पीला।

आचार्य प्रशांत: मैं इससे किसी की जान बचा दूँ तो भी इसका रंग क्या रहेगा?

श्रोता: पीला।

आचार्य प्रशांत: और मैं इससे किसी का खोपड़ा फोड़ दूँ तो भी इसका रंग क्या रहेगा?

श्रोता: पीला।

आचार्य प्रशांत: तो ये मूल्य-निरपेक्ष होता है, और चेतना मूल्य करती है। वो किसका मूल्य करती है? अरे इतनी देर से तो बोल रहे हैं, वो मुक्ति को मूल्य देती है। तो चेतना की बात मूल्य-सापेक्ष है, और ये होता मूल्य-निरपेक्ष। और बोलो? ये सिर्फ़ आकर्षण जानता है, और चेतना प्रेम जानती है। आकर्षण और प्रेम में क्या अंतर है? आकर्षण के नियम बता सकते हो। आकर्षण शुरू होगा, इसको दो घंटे पहले ही बता दोगे। आप सज-बजकर के कहीं जाते हो पार्टी में आपको दो घंटे पहले नहीं पता होता कि आज बहुत आकर्षित होने वाले हैं। आप तैयार हो रही होती हैं, कोई आता है बोलता है, “आज तो बिजली गिराएगी।” दो घंटे पहले ही पता है कि आज बहुत गिरने वाले हैं। इससे क्या पता चला? कि ये बात नियमगत है, ये बात नियमबद्ध है, नहीं तो पहले कैसे पता चल जाता?

और प्रेम किसी नियम पर चलता नहीं। प्रेम और आकर्षण में कोई अंतर पूछे तो बहुत आसानी से ये भी बता देंगे, तो आपको 10/10 है। बहुत तरीक़ों से अंतर बताया जा सकता है, पर ये तरीक़ा भी अच्छा तरीक़ा है, कि आकर्षण आप पहले ही बता दोगे कि होने वाला है, क्योंकि वो लोहे और चुंबक जैसा है। नियम की बात है लोहा ले के जा रहे हो चुंबक के पास, पता है खिंचेगा; लोहे की औकात नहीं कि न खींचे। प्रेम के बारे में आप ऐसा कुछ बोल नहीं सकते, वो किसी नियम को नहीं मानता।

ये (कप की ओर इंगित करते हुए) जो है, ये अपने बचने का इतना ख़्याल करता है, इतना ख़्याल करता है कि आप इसको अगर बदल भी दो तो ये बचा रहता है। है न? इसको आप किसी भी रूप में डाल दो बचेगा तो पदार्थ ही। उसको हम क्या बोलते हैं? कंज़र्वेशन ऑफ़ मास, एक तरह से इंडिस्ट्रक्टिबिलिटी ऑफ़ मैटर बोलते हैं उसको। ऊर्जा बन जाएगा, कुछ बन जाएगा पर बचा रहेगा, कहीं जाकर से दफ़्न नहीं कर पाओगे।

और चेतना जब प्रेम में होती है, तो भी वो अपना लोप माँगती है। चेतना जब मुक्ति माँगती है, तो भी वो यही कह रही है, कि “मैं न रहूँ।” ये न कभी चाह सकता कि ये न रहे, न कभी ये संभव है कि ये न रहे। और चेतना लगातार एक ही बात कहती है, “हो गया, बहुत हो गया, मैं न रहूँ; कुछ ऐसा जिसमें मैं घुल जाऊँ। और घुलूँ ऐसे नहीं जैसे पानी में शक्कर, क्योंकि पानी में शक्कर घुल भी गई है तो शक्कर अभी बची हुई है। चेतना वैसे घुलना चाहती है, वैसे मिटना चाहती है जैसे सागर में सरिता, कि अब आप अलग नहीं कर पाओगे, अब नहीं हो सकते अलग। उसकी जो इंडिविजुएलिटी है, आप अब उसको वापस नहीं ला सकते। आख़िरी मिलन हो गया या कहिए कि मृत्यु हो गई।

हर मामले में तो ये दोनों अलग निकल रहे हैं। आप 5-6 तरीक़े और निकाल लीजिएगा, एक्टिविटी के तौर पर कि चेतना और जड़ता कैसे अलग-अलग व्यवहार करते हैं। इतना अलग-अलग व्यवहार करते हैं, बाप रे बाप! और देह में क्या है? देह में क्या कर दिया? दोनों को ऐसा बाँध दिया, ऐसा बाँध दिया कि आपका रेशा-रेशा चेतन है, रेशा माने जड़ और रेशा चेतन। हम कहते हैं, हमारी कोशिकाएँ चेतन हैं। आप जिसको ये भी कहते हो, कॉन्शसनेस, वो भी न्यूरॉनिक सर्किट्स पर चलती है। तो जड़ता और चेतना ऐसे गुत्थम-गुत्था हो गए हैं इस जीव में कि उनको अलग नहीं कर सकते।

और इसका रास्ता अलग, और चेतना का रास्ता अलग। इस संगम से दुख कौन पाएगा?

श्रोता: चेतना।

आचार्य प्रशांत: इसको (कप की ओर इंगित करते हुए) कुछ नहीं फ़र्क़ पड़ता इसे कहीं डाल दो, इसने थोड़ी कहा कि, “मैं कौन हूँ? मैं कहाँ आया? जीवन का उद्देश्य क्या है?” इसने थोड़ी कहा है। चेतना दुख पाती है, जड़ता के साथ इस तरीक़े से बँध करके। तो जीवन का उद्देश्य हमारी चेतना का उद्देश्य है, क्योंकि जीवन है ही किसके लिए?

श्रोता: चेतना के लिए।

आचार्य प्रशांत: जड़ पदार्थ कभी नहीं बोला, मैं जीवित हूँ, ये थोड़ी बोलता है, “मैं जीव हूँ।” तो फिर चेतना का उद्देश्य क्या होगा? हमने आज के सत्र की शुरुआत करी थी इस प्रश्न से कि “जीवन का उद्देश्य क्या है?” तो जीवन का उद्देश्य समझने के लिए पहले हमने जीव को परिभाषित किया कि जीव माने क्या, क्योंकि जीवन माने जीव का काल, जिस काल में जीव की सत्ता उपस्थित रहती है, उसको कहते हैं — जीवन। जीवन समझने के लिए पहले हमने समझा कि जीव क्या है, और फिर हमने ये देखा कि जीवन क्या है। अगर जीव कह दो फाड़ हैं — एक जड़ और एक चेतन। तो जीवन के बारे में सवाल इन दोनों में से किसने करा है?

श्रोता: चेतन नें।

आचार्य प्रशांत: तो जीवन का उद्देश्य फिर किसका हुआ उद्देश्य? चेतना। तो चेतना का क्या उद्देश्य होगा? आप बताओ।

श्रोता: मुक्ति।

आचार्य प्रशांत: और उसका दुख ही क्या है?

श्रोता: बंधन।

आचार्य प्रशांत: किससे बंधन?

श्रोता: जड़ता से।

आचार्य प्रशांत: तो दे ही देते हैं मुक्ति, ख़त्म करो जब तुम्हारी सारी समस्या ही यही है कि तुम पैदा क्यों हो गए, तो इसलिए फिर अस्तित्ववादी विचारकों ने कहा था कि एक ही प्रश्न है वास्तव में, “टू बी ऑर नॉट टू बी।” पिछली शताब्दी का ये बड़े से बड़ा प्रश्न रहा है पश्चिम में, “आदमी क्यों जिए?” और आदमी की स्थिति को इंगित करने के लिए बड़ा साहित्य लिखा। और चूँकि दुख की बात थी, तो वो मात्र निबंधों और लेखों में अभिव्यक्त नहीं हो पाती थी, तो कहानियाँ लिखीं, उपन्यास लिखे, कविताएँ लिखीं और नाटक लिखे। ऐसे-ऐसे नाटक जो यही दिखा रहे हैं कि हमारी हालत क्या है और उस हालत से हम पार नहीं जा सकते।

"वेटिंग फ़ॉर गोडो" है: ये दो जने हैं, और ये इंतज़ार करते ही जा रहे हैं, करते ही जा रहे हैं, करते ही जा रहे हैं। और अगर मुझे सही याद पड़ता है, तो मंच पर एक पेड़ है उसमें एक पत्ता है और उस पत्ते का रंग बदलता जा रहा है। माने, समय बीत रहा है — कालचक्र — और ये दोनों खड़े हैं, इंतज़ार कर रहे हैं, "हाँ, आ रहा है, आ रहा है"। किसका इंतज़ार कर रहे हैं, दोनों में से किसी को नहीं पता। इंतज़ार करते-करते नाटक पूरा हो जाता है। आप फँसे हुए हो, आप फँस गए हो।

वैसे ही आयोनेस्को का नाटक है "द चेयर्स।" उसमें एक वृद्ध दंपत्ति है, वो रोज़ तैयारी करते हैं कि आज मेहमान आएँगे और हम उनको दावत खिलाएँगे। तो नाटक में पहले ये एक बार चेयर्स सजाते हैं, नाटक का नाम ही है "द चेयर्स।" वो चेयर्स सजाते हैं कि लोग आने वाले हैं, “सजाओ, सजाओ" और लोग कभी नहीं आते। नाटक समाप्त हो जाता है।

आप एक ऐसी हालत में हैं जहाँ आप चाहते हो कि कुछ हो जाए पर जो आप चाहते हो कि हो जाए, वो हो सकता नहीं, इसको जीवन कहते हैं। और जब चेतना पाती है कि वो जड़ता के साथ अनिवार्य रूप से बंध गई है, तो कई बार वो एक बड़ा हैरतअंगेज़, दुखद फैसला ले लेती है, वो कहती है कि जब बंध ही गए हैं तो हम ही जड़ हो जाते हैं, क्योंकि इसके साथ भिन्नता बचाए रखकर के तो बड़ा दुख मिलता है, तो हम भी इसी के जैसे हो जाते हैं। "मैं किसी से भिन्न हूँ, बहुत अलग हूँ।”

जैसे कि आपका शेयरिंग पर रूम है, आप हॉस्टल में गए हो और आपका रूम-मेट बहुत-बहुत ज़्यादा सिगरेट पीता है। और आप कह रहे हो दिन-रात स्मोकिंग तो मैं कर ही रहा हूँ, तो मैं कर ही लेता हूँ। आपने उसका खूब किया, ठीक है, आपने जाकर शिकायत भी करी वार्डन से, सब कुछ किया, आपने ये तक आवेदन किया कि कमरा बदल दो, सब कुछ किया। आप कभी बाहर भी निकल गए। जो-जो आप कर सकते थे, आपने किया। आप भिड़ भी लिए तो पिट भी गए, सब हो गया। शरीर से भिड़ने पर क्या होता है। “छोड़न की जो बात करुं, बहुत तमाचा खाय।” तो उससे भिड़े भी, तो फिर चेतना कई बार एक बड़ा गंदा समर्पण कर देती है कि हम चेतन रहेंगे ही नहीं, हम भी जड़ हो जाएँगे।

तो आयोनेस्को का नाटक है "राइनोसरस," उसमें यही है। एक शहर है जिसमें लोग राइनोसरस बनते जा रहे हैं एक-एक करके। मन, चेतना, जड़ता के आगे झुकती जा रही है, मनुष्य पशु बनता जा रहा है। राइनोसरस जड़ता का द्योतक है, प्रतीक है, सिंबल है अनकॉन्शस हो जाने का। वैसे ही आप लोग कई बार चर्चा आपस में करते ही हो, कामू: द मिथ ऑफ सिसिफस से। वो चढ़ाया-गिराया, चढ़ाया-गिराया। जैसे वो बुड्ढा-बुड्ढी बैठ के कुर्सियाँ लगा रहे हैं और रोज़ लगा रहे हैं फिर हटा भी रहे होंगे, तभी तो लगती हैं दुबारा। वैसे ही वो रोज़ ऊपर पत्थर चढ़ाता है, नीचे गिराता है, पत्थर चढ़ाता है, नीचे गिराता है। ये जीवन है, हम फँसे हुए हैं।

अब अस्तित्ववाद इससे कोई आख़िरी उपाय निकाल नहीं पाया, पर वेदांत ने उपाय भी बता रखा है पहले से। अब वैसा उपाय नहीं है कि गंडा-ताबीज कर लो या मंत्र फूँक दो तो कुछ हो जाएगा, कर्म जैसा कोई उपाय नहीं है। उपाय जो है वो आप जानते हैं, बोध का उपाय है। उस पर अभी आते हैं वही आज के श्लोक की बात है।

तो चेतना का हमने कहा, दुख ये है कि वो इसके (देह) भीतर बंधी हुई है। कोई प्रसिद्ध महिला विचारक थीं, इसके बाद एक रूमी का भी है, उन्होंने कहा था कि, “मेरी समस्या ये है कि आइ ऐम कॉन्शसनेस ट्रैप्ड इन द बॉडी ऑफ वूमन। वैसे ही रूमी ने एक बार बोला था कि, “मुझे ये नहीं पता मैं कौन हूँ, मुझे ये भी नहीं पता, मुझे जाना कहाँ है, पर मुझे ये तो अच्छे से पता है कि मैं न इस देह, न इस दुनिया का हूँ। मैं बस फँसा हुआ हूँ।” कहाँ से आया हूँ, नहीं पता, कहाँ को जाऊँगा, ये भी नहीं पता, पर ये पता है कि यहाँ तो फँसा हुआ हूँ। समझ में आ रही बात? यही वो केंद्रीय दुख है, जिसको सारा अध्यात्म सम्बोधित करता है।

मैं इस पर इतना समय क्यों ले रहा हूँ? मैं इसलिए ले रहा हूँ क्योंकि आप यात्रा शुरू कर रहे हो ये जाने बिना कि यात्री कौन है और मार्ग क्या है? यात्रा का सबब क्या है और मंज़िल क्या है? तो ये कैसी यात्रा है? घंटा बजा रहे हो बस फिर, बिना जाने कि क्यों बजा रहे हो।

द ह्यूमन कंडीशन मानव की जन्मगत, अनिवार्य स्थिति वहाँ से उपजता है — अध्यात्म — हम हैं कैसे? कैसे मतलब, सामाजिक, आर्थिक तौर पर नहीं, जन्मगत तौर पर ही। ये (देह) चीज़ क्या है? इसको समझें। हम इसको नहीं समझना चाहते क्योंकि चारों तरफ़ यही-यही दिखाई देते हैं। जहाँ देखो वहीं हाथ-पाँव वाले घूम रहे हैं, तो हमको लगता है कि ये सब साधारण है, सामान्य है, नार्मल है। यही लगता है न? नहीं। ज्ञानी वो होता है जो किसी भी चीज़ को सामान्य, नार्मल नहीं बोलते हैं। “एक मिनट, ये क्या कंफिगरेशन है? बीच में ऐसा है, ऐसा है, ये क्या है? रेक्टेंगुलर है, और चार इसमें से ऐसे झूल रहे हैं, दो ऊपर, दो नीचे, और ऊपर ये गेंद जैसा कुछ यहाँ बैठा दिया है। ये क्या? ये चीज़ क्या है? तुम कौन हो भाई? क्या मतलब है तुम्हारा? और ऊपर से बोलता है। ग़ज़ब हो गया!”

सिर्फ़ बोलता होता तो, ये बोलता है, “मैं दुखी हूँ।” सब नहीं बोलते, क्यों नहीं बोलते? क्योंकि वो आयोनेस्को के गैंडे बन चुके हैं, वो नहीं बोलेंगे दुखी हैं। मैंने उसका निर्देशन भी करा था, और उसका जो केंद्रीय चरित्र था रेंजर का, वो भी मैंने ही अभिनीत करा था। तो उसमें यही है कि पूरा शहर गैंडा बन गया। ये किसी तरीक़े से अपनी प्रेमिका को बचाए हुए है कि, “तू मत बनना, हम दोनों बचे रहेंगे।” तो दोनों चढ़ गए हैं ऊपर मकान पर। वहाँ खिड़की से नीचे देख रहे हैं तो चारों तरफ़ से गैंडों ने घेर लिया है। लंबा बहुत नाटक है, ढाई-तीन घंटे का। 17 पात्र थे इसमें फ़ोन कर रहे हैं पुलिस को, तो वहाँ से आवाज़ आ रही है, “हम्म्म्…” माने पुलिस वाले भी गैंडे बन गए हैं।

मुझे थोड़ी पता था नाटक मेरी ज़िंदगी बन जाना है। पर मेरा ऐसा ही है मैंने जितने भी नाटक अभिनीत करे थे, कहीं-न-कहीं, किसी-न-किसी तरीक़े से, वो ऐसा था जैसे-जैसे मैं अपने ही जीवन को आगे देख रहा हूँ, प्रिसिएन्स है उसमें। भविष्यवाणी थी कि यही सब होने जा रहा है बेटा, आगे तो खुल के होगा, संक्षेप में अभी कर लो मंच पर। तो उसको पकड़ के बैठा हुआ, “तु मत भागना।” वो बोलती है, “क्या मसल्स हैं इनकी, क्या ताक़त है इनकी, और कितने एकजुट हैं, और कितने सारे हैं।” फिर उसके पास आकर बोलती है, “तुम्हें तो धक्का भी दे दूँ, तुम्हारा क्या होगा?” वो उसको रोक रहा है, सब कर रहा है। बीच में एक चांटा भी मारा है बहुत ज़ोर से। वो बोलती है, “इनमें देखो कितना पावर है।” वो बोलता है, “पावर देखना है? देख ले पावर।” पटाक से मारता भी है एक।

तो ये सब होता है, लेकिन अंततः वो भी जाकर खिड़की से उन्हीं में कूद जाती है। तो अब ये अकेला बचता है, तो ये आख़िरी दृश्य है नाटक का। उसको तय करना है कि क्या करूँ? ऐसा ही रहूँ कि नहीं रहूँ? आयोनेस्को यहाँ पर बिल्कुल बात को अधर में छोड़ देते हैं, थोड़ा-सा इशारा दे के बस। यहाँ पर वो आप से एक सवाल पूछते हैं कि “बताओ, अब आपको क्या करना है?” वहाँ मैंने उसका कुछ जवाब दिया था तब।

वैसे, “पगला घोड़ा” है बादल सरकार का, उसमें चार लोग बैठे हुए हैं, वहाँ लाश जल रही है एक लड़की की और चारों वहाँ बैठकर ताश खेल रहे हैं और शराब पी रहे हैं। श्मशान का दृश्य है — एक लड़की की चिता जल रही है, जाड़े की रात है, बड़ी ठंड है, कोहरा हो रहा है। और ये चार बैठे हुए हैं और बस इंतज़ार कर रहे हैं कि ये चिता बुझ जाए तो अपने-अपने घर जाएँ, और अपने हाथ भी वहीं सेक रहे हैं।

फिर पूछना शुरू करते हैं एक-दूसरे को जानते नहीं हैं ज़्यादा, बोलते हैं, “तुम यहाँ क्यों?” पूछते हैं “तुम यहाँ क्यों?” तो पता चलता है कि सब की अपनी-अपनी प्रेम कथाएँ थीं और सब अपना-अपना दर्द लिए वहाँ बैठे हैं। तो उनमें से तीन अपनी-अपनी कथा सुनाते हैं कि क्या हुआ, क्या हुआ — वो सब भारत के समाज की प्रेम और धर्म से जुड़ी कथाएँ हैं, कि कैसे प्रेम जैसी चीज़ हमारे यहाँ हो नहीं सकती। तो तीनों अपना-अपना किस्सा बताते हैं, ब्रोकेन लव स्टोरीज़, (मायूस प्रेम कहानियाँ)। और जो चौथा है, वो उन पर बड़ी निर्ममता से हँस रहा है। बोला रहा है, “प्रेम कुछ नहीं होता तुम पागल हो।” वो जो भी अपना किस्सा सुनाता है, उसका मज़ाक उड़ाता है, पत्ते खेलता है, शराब पीता है और खूब हँसता है ज़ोर से हँसता है।

तो ख़ैर, वो तीनों अपना-अपना हाल सुना देते हैं। और एक-एक करके, अब जब ठंडा होने लगता है मामला, चिता ठंडी पड़ने लगती है तो एक-एक करके वो चले जाते हैं। ये जो चौथा है, जो सब पर लगातार हँसता ही रहा, अब ये अकेला बचता है। जब ये अकेला बचता है, तो ये चिता के पास जाता है। फिर प्रतीक के तौर पर, उसमें से वो लड़की खड़ी हो जाती है, वो उसकी प्रेमिका है उसी की लाश जलाने के लिए बैठा हुआ था। इसी लिए सब पर हँस रहा था। वो बाहर निकलती है, बोलती है, “मुझे पता है तुम क्या करने जा रहे हो, नहीं करना है।” वो बोलता है, “तू मर चुकी है, तू वापस जा।” उनमें आपस में कुछ बात होती है। वहाँ पर भी लेखक ने थोड़ी-सी छूट दे रखी है कि अब देख लो, क्या करना है ज़िंदगी का। क्योंकि ये दुख तो अब बंध गया।

जीवन मतलब ऐसा दुख, जो अब दूर नहीं हो सकता, जिससे तुमने प्रेम किया था वो जा चुकी है। क्या करोगे? तो ये अपनी जेब से ऐसे निकालता है और इसका जो शराब का गिलास है, वो खाली हो चुका है। सब पी गया है, पूरी बोतल लुढ़का दी, सब ख़त्म कर दिया। अब गिलास खाली है उसमें थोड़ा-सा बस पानी है। कुछ निकालता है जेब से, तो वो दर्शकों को स्पष्ट हो जाता है, वो ज़हर है। वो पीछे से चिता से चिल्ला रही है, “नहीं, नहीं, नहीं, ये मत करना, मत करना, मत करना!” तो वहाँ भी मुझे तय करना था कि अब क्या करना है, वहाँ मैंने कुछ किया।

जिन्होंने भी जीवन को जाना है, जीवन से सवाल पूछे हैं, वो अंततः यहीं पर आकर रुक गए हैं — “टू बी और नॉट टू बी?” दुख इतना है, इतना है इसके साथ जिएँ भी या न जिएँ? जान दे दें, गैंडा बन जाएँ, क्या करें? फिर कामू इसका उत्तर देते हैं बोलते हैं, “जीना तो ऐसे ही पड़ेगा, बस अपनी हालत पर हँस के जियो। हालत तो नहीं बदलने की, ये कर सकते हो कि अपनी हालत पर हँसना सीख लो।” हालत तो नहीं बदलेगी, आशा नहीं देता है अध्यात्म। चलेगा सब ऐसे ही हम इतना कह सकते हैं कि यही पत्थर ऊपर ले जाना है, यही नीचे ले आना है, सिसिफस तुमको। बस अब अगले दिन इसको हँसते हुए ले जाना, हँसते हुए वापस ले आना। और किस पर हँस रहे हो? ख़ुद पर ही हँस रहे हो, वी आर जोकिंग टू आवरसेल्व्ज़। ख़ुद पर ही हँस लो। आ रही बात समझ में?

चेतना फँसी हुई है। क्या रिश्ता रखे वो जड़ता के साथ? क्या रिश्ता रखे? क्या बोल रहे हैं श्रीकृष्ण, देखते हैं। वो कह रहे हैं — जो मनुष्य इसी जीवन में, शरीर छूटने से पूर्व, माने इसी जीवन में अभी यही जो तुम्हारा जीवन है, एकदम साफ़ कर दे रहे हैं कि भैया गीता के नाम पर अंडू-पांडू बातें मत करना, अगला जन्म, पिछला जन्म। साफ़ स्पष्ट करके बता रहे हैं, अलग से लिखकर बता रहे हैं, आपकी कल्पना के लिए कुछ नहीं छोड़ रहे हैं, स्पेसिफ़ाई कर दे रहे हैं कि इस जीवन में, इसी जन्म में, जो इंसान प्राकृतिक वेगों को, प्राकृतिक वेगों के लिए उन्होंने कहा — कामना और क्रोध — प्राकृतिक वेगों को तितिक्षा से सहने में सक्षम हो जाता है, वो जीवन मुक्त है। वो जीवन में ही मुक्त है। ये चेतना को सलाह है श्रीकृष्ण की।

जड़ता तो वो करेगी, जो करेगी, तुम उसको सहो। सहो, और सहनी है तो मुँह बिसूर के क्यों सहे? कैसे सहो?

श्रोता: हँस के सहो।

आचार्य प्रशांत: हँस के सहो, दर्द में मुस्कुराओ। इसके अलावा कोई उपाय नहीं है, श्रीकृष्ण भी इसके आगे कोई उपाय नहीं बता पाते। यही मुक्ति है जीवन-मुक्ति का अर्थ ही यही है।

दर्द तो रहेगा क्योंकि शरीर तो है, और ये शरीर ही केंद्रीय दुख है तुम्हारा।

पहला यही है, ये तो है ही है। और जब तक ये है, तो पूरा संसार है तुम्हारे लिए। तो दुख का खेल तो चलेगा, मुक्ति माने तुमने इस पर हँसना शुरू कर दिया। कर्मकांड नहीं है हँसना कि हँसने को भी एक विधि, एक प्रणाली, एक प्रथा बना लिया, जैसे कई सुबह इकट्ठा होते हैं पार्क वग़ैरह में हँस रहे हैं, उसकी नहीं बात हो रही है। ये वो मुस्कुराहट है जो बोध से उठती है, सहो। बहुत सिरदर्द हो रहा है, सहो। “छि! बेदर्द, बेदिल।” जो भी है, जैसा भी है, ऐसा ही है। श्रीकृष्ण भी इससे आगे अब कोई उपाय नहीं बता पाए, तो हम क्या बता दें तुमको? और ये सहना कोई छोटी-मोटी बात नहीं है, ये सहना कोई मजबूरी की बात नहीं है, तुम्हारी हार का द्योतक नहीं है। वो कह रहे हैं, जो सह गया वो जीवन-मुक्त हो गया।

और ये आशा तो बिल्कुल छोड़ दो कि शरीर जो हरकतें करता है, करतूतें, वो कभी भी करना बंद कर देगा। ये तो प्रकृति के नियमों पर चलता है और प्रकृति के नियम कभी भी, कोई एनलाइटनमेंट नहीं होता है। जब तक ये (देह) है, तब तक माया है। जब तक ये है, तब तक आपके भीतर जो ग्रंथियाँ हैं (ग्लैंड्स) हैं, जो रसायन हैं, वो तो सक्रिय रहेंगे न। जब वो सक्रिय हैं तो वहीं से फिर ये कामना और क्रोध भी हैं।

कामना और क्रोध क्या हैं? कोई जड़ता की, कोई चेतना की बात, ये तो जड़ता के उत्पाद हैं। शरीर है तो ये रहेंगे ही, कामना, ये सब रहेगा। सहो, तो सहने से क्या होगा, अगर कामना भी बची रहेगी और क्रोध भी बचा रहेगा? तो सहने से क्या होगा? हमने क्या कहा था? हमने कहा था सिर्फ़ सहना नहीं है, समझना है। हमारी सलाह उसको है जिसको सलाह दी जा सकती है। हम शरीर को सलाह नहीं दे रहे हैं, हम चेतना को सलाह दे रहे हैं। और चेतना क्या कर सकती है? समझ सकती है। तो हम चेतना को कह रहे हैं, समझो, समझो। कुछ उठे, समझो। दबाने की बात नहीं कर रहे, दबाना भी कर्मकांड हो जाएगा। गीता कर्मकांड के धुर विरोध में खड़ी है, कोई बात नहीं बताती कि ऐसा करो ही करो। सिर्फ़ एक बात बताती है कि तुम्हारा स्वभाव है समझना, स्वभाव पर अडिग रहोगे तो दुख से बचे रहोगे — समझो।

काम उठे, क्रोध उठे, समझो। नहीं तो समझने से क्या होगा, आप एक बात बताइए? जब शरीर जड़ है, और जड़ता के नियम बदल नहीं सकते, तो समझने से क्या होगा? समझने से ये होगा कि तुम्हारा केंद्र बच जाएगा। जब तुम्हारा केंद्र बच जाता है, तो जो कुछ शरीर में हो रहा होता है, उसका केंद्र बदल जाता है। माने क्या बोल रहे हैं आप? हमें तो ये पता है, न कामना जा सकती है, न क्रोध जा सकता है। अभी एक घंटे से आपने समझाया और उसका लब्बोलुआब यही है, कि आपका शरीर है, शरीर जड़ है, भीतर ग्रंथियाँ हैं वो काम कर रही हैं। वो काम कर रही हैं, तो कामना भी रहेगी, ईर्ष्या भी रहेगी, क्रोध भी रहेगा, भय भी रहेगा, पूरा षड्विकार, जितने हैं सब रहेंगे।

“जब सब रहेंगे ही रहेंगे, तो इतना ज्ञान क्या बता रहे हो घंटे भर से?” जब तुम अपने केंद्र पर स्थापित होते हो, तो क्रोध भी तुम्हारे ही केंद्र से आएगा न? जड़ता का तो कोई केंद्र नहीं होता न, जड़ता का कोई केंद्र होता है? जड़ता के तो नियम होते हैं। जड़ता एक प्रवाह होता है, चेतना का केंद्र होता है। श्रीकृष्ण कह रहे हैं, तुम अपने केंद्र, तुम अपनी जगह पकड़कर रखो। तुम अपनी पकड़ पर रखो, आसन से मत डोलो रे, तोहे पिया मिलेंगे। तुम मत हिलना।

“तो उससे क्या होगा इतनी बातें कर रहे हो?” उससे ये होगा कि क्रोध का भी परिशोधन हो जाएगा। अगर श्रीकृष्ण बोल दें कि क्रोध करना बुरा है, तो फिर श्रीकृष्ण नहीं हैं क्योंकि क्रोध भी एक प्रकार का व्यवहार है। अगर ये बोलते हैं कि क्रोध बुरी चीज़ है, तो उन्होंने कर्मकांड सिखा दिया। उन्होंने तो ये सिखा दिया, ये व्यवहार अच्छा, ये व्यवहार बुरा।

कामना भी एक प्रकार का कर्म है, सुक्ष्म कर्म है, पहले भीतर उठता है, फिर बाहर, आप उसमे जाके गति करते हो। रोटी खानी है तो आप हाथ बढ़ाते हो, मुँह चलाते हो, ये बाहरी कर्म है। पर पहले कर्म कहाँ हो जाता है जब रोटी खानी है, यहाँ (मस्तिष्क की ओर इंगित करते हुए) हो जाता। यहाँ कामना उठी, वो सूक्ष्म कर्म है, फिर उसके कारण आपने रोटी, हाथ उठाया खाया चबाया, तो कामना कर्म है। अगर श्रीकृष्ण कहते हैं कि कामना बुरी है तो फिर श्रीकृष्ण नहीं रह गए, क्योंकि वो भी क्या हो गया, कर्मकांड हो गया। कर्मकांड का मतलब ही क्या? समझा कुछ नहीं बस ये बता दिया गया कि बस ये अच्छा, ये बुरा।

श्रीकृष्ण ये तक नहीं बोलेंगे की कामना बुरी है, वो कह रहे हैं कामना को समझ लो तो निष्काम हो जाओगे। वो कह रहे हैं क्रोध को समझ लो तो क्रोध भी शुद्ध हो जाएगा। जैसा कृष्ण का क्रोध था, जब भीष्म की ओर भागे थे पहिया लेकर के। माने ये पूरी तुम्हारी व्यवस्था, जड़, अपना काम करती रहेगी और उसका केंद्र बदल जाएगा। कामना रहेगी पर वो कामना अपने लिए नहीं रह जाएगी, क्रोध रहेगा पर क्रोध भी अंधा नहीं रह जाएगा। सब कुछ रहेगा, सब कुछ रहेगा पर रहते हुए भी बड़े चमत्कारिक तौर पर बदल जाएगा। इर्ष्या तक रह सकती है।

संतों ने छंद लिखे हैं, गीत गाए हैं, जिसमे वो कहते हैं कि “रघुबर, हमें तो तुम्हारे खड़ाऊ से ईर्ष्या होती है, हमें उस रेत से, उस धूल से ईर्ष्या होती है जो तुम्हारे पाँव के नीचे आ जाती है, उसे तुम्हारा स्पर्श तो मिला।” ईर्ष्या भी रहेगी, पर उसका केंद्र बदल जाएगा। आप इससे लड़ नहीं सकते, आप इसका केंद्र बदल सकते हो।

अब वो बड़ा वाला सवाल, क्योंकि जवान लोग बैठे हैं, “क्या वासना भी रहेगी?” तुम आवाज उठा के पूछो, इतना डर-डर के क्यों पूछ रहे हो, “नहीं, जैसे पूछ रहे वैसे ठीक।” रहेगी, उसका भी केंद्र बदल जाएगा, वो भी बदल गया, ऐसा नहीं होगा फिर कि किसी भी दिशा में खिंचे चले गए। फिर तुम्हारे इस दैहिक, भौतिक शारीरिक स्पर्श में भी एक दैवीयता आ जाएगी। दूर से कोई देखेगा तो उसको यही लगेगा कि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर को स्पर्श कर रहा है पर बात कुछ और हो चुकी होगी।

फिर ऐसा नहीं होगा कि मैं किसी व्यक्ति से रिश्ता बना रहा हूँ, तो वो निसंदेह कोई बड़ी कुत्सित चीज़ ही है, और उसको गाली दो। नहीं। आप अगर थोड़ा सा तटस्थ होकर देखें, तो मीरा भी श्रीकृष्ण की सगुण छवि को ही पूजती थी और साफ़ कहती थी, हमारे आपके अनुमान या कल्पना की बात नहीं है कि पति हैं। ये भी नहीं कहा भाई हैं, बाप हैं, कुछ नहीं बोला। धड़ल्ले से क्या बोला? पति हैं। न निराकार बोला, न निर्गुण बोला, न बाप बोला, न भाई बोला। सगुण है और पति है। और इससे शुद्ध मिसाल, इससे पवित्र रिश्ता हमें खोजे नहीं मिलता। क्या हम ये कहते हैं कि “अरे देखो, एक स्त्री है, एक पुरुष की छवि की ओर आकर्षित हो रही है, ये तो गलत बात है न?” क्या हम ऐसा कहते हैं? नहीं कहते, कहना भी नहीं चाहिए। तो जीव से जीव के प्रति जो सामान्य जड़ आकर्षण होता है, वो भी आसमान की ऊँचाई पा लेता है अगर चेतना अपना केंद्र न छोड़े।

ये आशा तो छोड़ दें कि शरीर अपने रंग-ढंग बदल देगा। आप पुरुष हैं तो स्त्री की ओर खिंचाव होगा, स्त्री हो तो पुरुष की ओर होगा। भूख लगी है, मच्छर काट रहा है, मच्छर काटे और आपको समस्या न हो नहीं होगा ये। कोई बोले, "मैं महीने नहीं नहाता हूँ," महीने नहाओ खुजली न हो, नहीं होगा ऐसा। तो शरीर नियमों पर चलता है भाई। नियम माने नियम, गोली किसी को भी लगेगी मरेगा, बीमारी किसी को भी होगी वो मरेगा, ये तो नियमों पर चलता है।

तो फिर महापुरुषों में खास बात क्या थी? उन्होंने चेतना को शरीर के नियमों का ग़ुलाम नहीं बनने दिया। और उन्होंने कहा, बाँध के रखा, जिस पर हमारा बस नहीं चल सकता, उस पर हम अपना बस चलाएँगे भी नहीं। पर हम जो हैं, जो सारे सवाल करता है, जिज्ञासा करता है, इसके सारे दुख होते हैं। हम ख़ुद को तो बाँध के रख सकते हैं। तो वो कहते हैं, ठीक है, एक बेमेल रिश्ता बन गया है, कोई बात नहीं हम उस रिश्ते को अपने ऊपर हावी नहीं होने देंगे। शरीर माने — एक बेमेल रिश्ता, कोई बात नहीं।

जैसे आप गए, हॉस्टल में आपने नहीं चाहा था, पर कोई उल्टा पुल्टा आदमी आपका रूम पार्टनर हो गया है। आपका कहते हो ठीक है, हो गया तो हो गया है पर हम नहीं भूलेंगे कि इंसान हमारी ज़िंदगी का मकसद थोड़ी है। मैं किस लिए आया हूँ कॉलेज में? पढ़ने आया हूँ, मैं इसलिए थोड़ी आया हूँ कि ये जो बगल में है, जो कुछ भी कर रहा है, मैं उसमें ज़्यादा तल्लीन न हो जाऊँ। वो पढ़ रहा है, अपनी जगह अपना काम करता रहे, ये ज्ञानी का रुख होता है। वो शरीर पर अधिकार नहीं जमाना चाहता, वो बस अपनी जगह नहीं छोड़ता। वो अपने रूम मेट से कहता है, "तुझे जो करना है कर, तेरे अपने नियम हैं, तेरे अपने पैटर्न हैं, ढर्रे हैं। मैं तुझ पर तो कभी हावी हो नहीं सकता, न मुझे होना चाहिए। पर एक बात पक्की है, तेरे कारण मैं अपना स्वभाव नहीं छोड़ूंगा। तू अपनी प्रकृति पर चल, मैं अपने स्वभाव पर चलूँगा। तू अपना काम कर, मैं अपना काम करूँगा।" और जब ज्ञानी ऐसा कह देता है तो हम कह रहे हैं, एक चमत्कार जैसी चीज़ देखने को मिलती है कि प्रकृति का केंद्र बदल जाता है। वो सब कुछ जो जड़ता प्रदर्शित करती है व्यवहार के तौर पर, वो सब रहता है पर वो होते हुए भी बहुत प्यारा हो जाता है।

नाराज हो गए, भक्ति मार्ग में, द्वैत मार्ग में कहते हैं, “भक्त भगवान से रूठ गया,” उसमें भी एक मिठास होती है। रूठना भी एक ऊँचाई पा गया। रो रहे हैं, अब वैसे तो शोक बड़ा दुर्गुण है। सब जो दुर्गुण गिनाए जाते हैं, शोक भी होता है। किसी आदमी को आप बहुत शोकग्रस्त देखें तो अच्छा नहीं माना जाता, पर देखो, उधर भरत राम के लिए शोक कर रहे हैं, राम सीता के लिए शोक कर रहे हैं। आगे चलकर, राम तो शोक ही शोक, आगे चलकर लव-कुश के लिए भी शोक कर रहे हैं। फिर सीता राम के लिए शोक कर रही हैं। पहले अशोक वाटिका में करती हैं, फिर दुबारा ऋषि के आश्रम पहुँच जाती हैं, वहाँ करतीं हैं। कोई बहुत हँसते हुए तो विदा भी नहीं होते हैं। वो कहती हैं, "धरती फट जाए।" तो वो धरती से ही आई थीं, प्रतीक की बात है समझिएगा, तो धरती में समा जाती है। वो जाकर जल समाधि ले लेते हैं, भाइयों के साथ।

ये तो हमें लगता है, ये तो बहुत कोई बहुत ही खुशी वाली विदाई भी नहीं है। वो कह रहे हैं कि देखो, जीवन के सहयोग हमारे हाथ में नहीं हैं। हमने थोड़ी चाहा था कि प्रजा में कोई बोल दे कि सीता ऐसी है, सीता वैसी। पर उसने बोल दिया। हमने थोड़ी चाहा था कि रावण आकर के ये सब कर दे, सुर्पणखा आ जाए, पर रावण ने?

श्रोता: कर दिया।

आचार्य प्रशांत: जीवन अपने तरीक़े का है, पहला संयोग तो यही किया कि हम पैदा हो गए, वो सब हमारे हाथ में नहीं होता। वो सब चलता रहे, हम उसको अपनी गरिमा के साथ कृष्ण कह रहे हैं — सहेंगे, और सहने का मतलब झेलना नहीं है। सहना माने, ऐसा नहीं है कि एक रील देखी मैंने वहाँ उसमें एक नया खेल निकला है आजकल, उसमें दो पहलवान आमने-सामने बैठ जाते हैं। एक दूसरे को थप्पड़ मारते हैं, बाप रे बाप! ये वो वाला सहना नहीं है। ये कौन सा वाला सहना है? ये समझ कर सहना है। जब समझ कर सहते हो तो मुस्कराहट आ जाती है, नहीं तो मुस्कराहट को भी कर्मकांड मत बना लेना। बहुत लोगों के लिए वो भी होती है कि वो जब जहाँ भी बैठे होते हैं, वो सोते भी मुस्करा कर हैं। वो नहीं, समझना।

जो कुछ भी हो रहा है, तुम अपने स्वभाव में स्थापित रहो, तुम्हारा स्वभाव बोध है और यही जीवन मुक्ति है। जो हो रहा है, उसको बदलना तुम्हारा दायित्व नहीं है। उसको समझना तुम्हारा दायित्व है। मज़े की बात ये होती है, समझ गए तो बदलाव शुरू हो जाता है। फिर बदलाव तुम रोक भी नहीं पाओगे।

"मैं क्या करूँ, मुझे नींद बहुत आती है,” नींद आती है तो आती है, इस बात से लड़ने का कोई फायदा नहीं। हम लड़ेंगे नहीं, हम समझेंगे बात क्या है? ग्लानि, क्षोभ, शोक, इनसे कुछ नहीं होगा, कि नींद आई तो माथा पीटने लग गए, ऐसे नहीं, जो हो रहा है उसको समझो न। माथा भी अगर पीट रहा हो तो उसको भी समझो, ये क्या चल रहा है, ये कैसे हो जाता है? क्यों समझो? किसी उद्देश्य से नहीं, स्वभाव से, तुम हो ऐसे।

कोई पूछे, "ये क्यों करते हो?" अगर हम समझने को कोई कार्य कह सकें, तो कोई पूछे कि “ये कार्य तुम क्यों करते हो?” तो बोलो, "करते नहीं हैं हम ऐसे हैं, ये स्वभाव है।" हमारे बस में नहीं है कि हम न समझें, हमें समझना पड़ता है। हम मर रहे होंगे न जिस पल हम मौत को भी समझ रहे होंगे, हमारे बस में नहीं है कि न समझें।

अब इसलिए परंपरा में इस बात को बड़ा महत्त्व दिया गया है कि जब मृत्यु हो रही हो, तो क्या तुम उस वक़्त होश कायम रख सकते हो। तो वो बात गहरी थी पर लोगों ने उसका अर्थ यह निकाल लिया, कि “अगर मर रहे हैं और होश कायम है तो अगला जन्म अच्छा मिलेगा,” अगला जन्म अच्छा नहीं मिलेगा। मरते समय शारीरिक वेदना होती है, शरीर में परिवर्तन हो रहे होते हैं। उस समय पर होश कायम रखना सबसे मुश्किल होता है, और उस समय भी होश में रह सकें। ज़्यादातर लोग जब मर रहे होते हैं, तो पहले ही बेहोश हो चुके होते हैं। मरने से कुछ देर पहले आप बेहोश हो चुके होते हैं।

मरते समय भी होश कायम रहे, उसके लिए अनिवार्य है कि पहले जीते समय होश कायम रहे। तो जिन्होंने कहा कि मरते समय भी होश कायम रखना, वो ये चाहते थे कि आप जीते-जी स्वभाव में स्थापित रहना सीखें और इस गहराई से स्वभाव में स्थापित हो जाएँ कि जब मर भी रहे हो, स्वभाव तब भी न छूटे, वो ये कह रहे हैं। वो ये नहीं कह रहे हैं कि मरते वक़्त ऐसा कर लोगे तो कोई टोटका जैसा है, अगले जन्म में सेठ बनोगे। ज़िंदगी भर तो नशे में बेहोश बिल्कुल और मरते वक़्त आँख फाड़ रखी है, खोल के मरेंगे।

एक शब्द रह गया, “आनंदित हैं,” आनंदित माने क्या?

युक्त तो समझ गए, किससे युक्त रहना है? स्वयं से युक्त रहना है, अपने स्वभाव से युक्त रहना है।

चेतना के ही स्वभाव को आत्मा कहते हैं।

तो जब युक्ति की बात हो, तो उसका और कोई मतलब नहीं होता, यही होता है। अहंकार का आत्मा के साथ हो जाना ही है युक्त हो जाना, वही योग है।

कह रहे हैं, “आनंदित रहते हैं।” तो आनंद का क्या मतलब है? दुख नहीं होगा? दुख है तुम दुख को जान रहे हो, यही आनंद है। आनंद का क्या मतलब सुख नहीं होगा? होगा। सुख है, तुम सुख को जान रहे हो, यह आनंद है। जो कुछ भी इस जड़ शरीर के साथ, इस जड़ संसार के संसर्ग में हो सकता है, वो सब होगा, तुम उसको जान रहे हो। तो इसका मतलब है कि जो हो रहा है, होने दें, माने चलने दें? बहुत सारी चीज़ें हैं जो करने का बड़ा मन करता है, होने दें, होने दें न? यही कहा जा रहा है? नहीं ये नहीं कहा जा रहा है, कहा यह जा रहा है अगर तुम जानने लग गए, तो जो हो रहा है वो स्वतः ही बदल जाता है, और बड़े गजब तरीक़े से बदलता है। तो ये नहीं हो पाएगा कि तुम जान रहे हो, और फिर भी तुम जो अपनी जड़ता में, बेहोशी में काम कर रहे थे वो यथावत चल रहे हैं, वो नहीं हो पाएगा।

जो जानने लग गया, चाहे बिना ही उसका व्यवहार, उसके कर्म बदल जाते हैं। पर कैसे बदल जाएँगे, ये पहले से बताया नहीं जा सकता। अगर पहले से ही बता दिया कि कैसे बदलना है, तो उसे बोलते हैं?

श्रोता: नियम।

आचार्य प्रशांत: नियम, कर्मकांड। और वो अध्यात्म का क्षेत्र नहीं है। तो बदलाव कर्मकांड में भी आता है और बदलाव अध्यात्म में भी आता है। बदलाव की बात लोकधर्म भी करता है और बदलाव की बात अध्यात्म भी करता है। पर लोकधर्म, बदलाव की बात ऐसे करेगा, “माँ-बाप हैं, जाओ, जा के उनके पाँव छुओ न, और माँ-बाप के पाँव नहीं छू रहे हो तो तुमको बताओ आशीर्वाद कैसे मिलेगा भगवान का। और माँ-बाप हैं उन्होंने देखो, जा कर के माँ बूढ़ी हो गई हैं, जा कर उनकी सेवा करो और वहीं पर तुम्हें अमृत मिलेगा, वहीं पर स्वर्ग मिलेगा।” ये लोकधर्म है, वो भी कह रहा है व्यवहार बदलो।

वो बेटे को या बेटी को संबोधित कर रहे हैं, जो माँ-बाप का ख़्याल नहीं रखते हैं उनको बोल रहे हैं, जा के माँ-बाप का ख़्याल करो। तो वो भी यही चाह रहे हैं कि व्यवहार बदलो। पर उन्होंने पहले ही बता दिया है कि क्या करना है। वो ये नहीं कह रहे हैं, स्वयं को बदलो, वो कह रहे हैं व्यवहार को बदलो और व्यवहार को किस तरह से बदलो। वो उन्होंने पहले ही बता दिया है कि जा के पाँव दबा दिया करो, दवा दे दिया करो, मीठी बातें कर लिया करो, उनकी बात मान लिया करो। वो ऐसा व्यवहार बता रहे हैं।

अध्यात्म भी व्यवहार को बदलता है, पर बड़े अनिश्चित तरीक़े से। वो कहता है, "ये तुम्हारे साथ दो लोग रहते हैं न, क्या तुम इनको समझना नहीं चाहोगे? क्या तुम्हें लगता है कि इनका कुछ ऋण है तुम्हारे ऊपर? उस ऋण की भी पूरी प्रक्रिया है, क्या तुम उसको जानना नहीं चाहोगे?" जानो। एक आदमी है जिसे तुम अपना बाप बोलते हो, 40 साल से एक ही घर में रहते हो। 40 साल, इतना तुमने उसका चेहरा देखा है, जब उसके साथ इतना रहे हो तो फिर उसको थोड़ा जान भी लेते हैं।

अध्यात्म बस इतना बोलेगा, “जान लो” और जानने के बाद फिर आपके संबंध में जो बदलाव आएगा, वो लोकधर्म जो बताता है उससे बहुत आगे का होगा। लोकधर्म बस ये बताता है कि फलानी-फलानी चीज़ें हैं, वो कर डालो। और अध्यात्म कहता है, "वो वादे भी निभा दो जो कभी किए ही नहीं, जिनका कुछ पता ही नहीं। जो कभी तुम्हें किसी ने बताया ही नहीं कि ये काम भी करने चाहिए, फिर तुम वो काम भी कर डालो।"

लोकधर्म ड्यूटी सिखाता है और अध्यात्म में आप कहते हो, "ड्यूटी बहुत छोटी चीज़ है, आई विल गो फ़ार बियॉन्ड ड्यूटी।" ये अंतर होता है। लोकधर्म — बस तुम जैसे हो वैसे ही रहो, बस जा के माँ-बाप के पाँव दबा दिया करो, बूढ़े हो गए हैं, हो गया इतने में। फिर तुम्हें पाप नहीं लगेगा और पाँव नहीं दबाओगे तो पाप लग जाएगा।

अध्यात्म नहीं कहता कि जा के माँ-बाप के पाँव दबा दो। वो कहता है, "माँ-बाप बोलते हो जहाँ जाते हो, इनके नाम से अपना परिचय देते हो, इनकी जमीन-जायदाद को लेकर तुम्हारे पास बड़ी कामनाएँ हैं। पचास तरीक़े का इनसे तुम्हारा व्यवहार है, रुपया-पैसा भी लेते रहते हो, कभी कुछ, कभी कुछ। क्या तुम जानना नहीं चाहते ये लोग कौन हैं?” अध्यात्म कहता है, “समझो,” वो कोई कर्म नहीं बताता है। हाँ समझने के बाद कोई बहुत अलग तरीक़े का सुंदर, प्रेमपूर्ण कर्म अपने आप हो जाता है, पर ये प्रेम ऐसा नहीं होता जो पहले से परिभाषित है।

लोकधर्म प्रेम को भी पहले से परिभाषा दे के रखता है। "माने आप बैठे हो, मैं आ कर आपको ऐसे पानी दे दूँ, तो ये प्रेम है।" अध्यात्म कहता है — जिसको परिभाषित कर दिया, वो प्रेम नहीं। वहाँ फिर जो आपका रिश्ता बनेगा, माँ-बाप से ही सही, अगर उनका उदाहरण ले रहे हैं तो फिर अलग तरह का बनेगा। और वो इस तरह का बनेगा जिसकी लोकधर्म कल्पना भी नहीं कर सकता।

तो अध्यात्म भी बदलाव लाना चाहता है। गीता बदलाव लाना चाहती है, पर तयशुदा तरीक़े से नहीं। अब गीता तो तयशुदा बदलाव लाना नहीं चाहती, पर कई बार आप गीता के पास आते हैं पहले से तय करके कि आपको क्या बदलाव चाहिए। आप कहते हैं, "मुझमें क्रोध बहुत है, मुझे क्रोध कम करना है, चलो गीता के पास चलते हैं।” और गीता कह रही है, "मैं तय करके कुछ कर ही नहीं सकती, क्योंकि बोध नियमों का पाबंद होता नहीं है, तो कुछ तय करा नहीं जा सकता। हाँ, कुछ होना होगा, बदलाव होगा ज़रूर, बिल्कुल बदलेगा, बहुत कुछ बदलेगा। तुम जितना सोच सकते हो उससे ज़्यादा बदलेगा पर बदल के कैसी तस्वीर उभरने लगेगी, ये हम आपको नहीं बता सकते।

अब साहस हो तो आ जाओ, उसको श्रद्धा कहते हैं। कि बदलाव तो होगा, निसंदेह होगा, लेकिन क्या होगा, उसमें आगे और कैसे होगा, ये हमें पहले से न पता है, न पता करना है। हमारे लिए इतना ही पर्याप्त है कि बदलाव का केंद्र बोध है। इतना ही पर्याप्त है, उसको श्रद्धा बोल लो, निष्कामता बोल लो। एक ही बात है।

आ रही बात समझ में?

आनंद इसमें नहीं है, फिर दोहराई दे रहा हूँ, कि दुख नहीं है। आनंद इसमें है कि दुख है पर दुख ने मुझे उखाड़ नहीं दिया है। दुख को आप तूफान माने तो दुख है, तूफान की तरह गरज रहा है पर मैं अपनी जगह पर खड़ा हूँ — अडिग। मुझे तूफान ने उखाड़ नहीं दिया, इसको आनंद कहते हैं। तो आनंद दुख के होते हुए भी हो सकता है। और सच पूछो तो जब दुख गहरा हो, तभी तो पता चलता है कि आनंद है या फर्जी चीज़ है कोई। जिस आनंद को दुख उखाड़ दे, वो आनंद है क्या? वो तो ऐसे ही कुछ हल्की-फुल्की।

तो इसीलिए जिसे जॉय, आनंद कहते हैं, उसका असली पता तो दुख की गहराइयों में ही चलता है, दुख की भी और सुख की भी। हमें दोनों उखाड़ देते हैं। जब बहुत दुख आता है आप तब भी बेहोश हो जाते हैं। आपने देखा, आपको बहुत दुख हो जाए, लोग “हाय! राम” बोल कर गिर पड़े, बेहोश हो गए। इतना भारी दुख आए। और जो आपका घोर सुख का क्षण होता है, उसमें भी आप पूरी तरह बेहोश हो जाते हैं। होते हैं या नहीं? जब एकदम जो चरम सुख का क्षण होता है, उसमें एकदम होश गायब हो जाता है, और नहीं गायब होता तो कहते हैं, "यार अभी ड्रिंक्स बनाओ।" नहीं तो सुख का संबंध शराब से इतना ज़्यादा क्यों होता, और दुःख का भी। क्योंकि दोनों का ही संबंध बेहोशी से है।

आनंद का मतलब है कि दुख गरज रहा हो, चाहे सुख चहचहा रहा हो, हम अपनी जगह पर स्थापित हैं।

और हम न सुख को रोकने जा रहे हैं, न दुख को रोकने जा रहे हैं। हम बस अपनी जगह बैठे हैं हमारा काम है, अपनी जगह रहना। हाँ, हमारे अपनी जगह होने भर से दुनिया बदल जाती है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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