
Questioner (Q): Good afternoon, Sir. I have a doubt. In the market, there are a number of Bhagavad Gitas available. Somebody told me that there are eighty varieties of the Gita. Even though the slokas are the same, from what I have seen, the explanation was not making sense. In…



Questioner: Shankaracharya proclaimed the Advait (non-dualism) philosophy and Madhavacharya proclaimed Dvait (dualism) philosophy. We cannot say who is correct and who is incorrect. That was their truth. These two are extremely opposite. Which is the exact Truth?






प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि ‘प्रश्नोत्तरी श्री आदि शंकराचार्य रचित’ में बताया गया है कि स्त्री नरक का प्रधान द्वार है। नारी-रूपी पिशाचिनी से बचकर जो रह गया वह समझदार है। प्राणियों के लिए साँकल नारी ही है। तो मेरा प्रश्न ये है कि ये कितना सच

यत्राज्ञानाद्भवेद्दवैतमितरस्तत्र पश्यति। आत्मत्वेन यदा सर्वं नेतरस्तत्र चाण्वपि।।

प्रश्नकर्ता: अपरोक्षानुभूति में बताया गया है कि मैं सब गुणों, सब क्रियाओं के पार हूँ, मैं अमर और मुक्त हूँ। तो फिर जीवन में किए गए कार्यों के लिए मैं ज़िम्मेदार कैसे हुआ?




कर्माणि कतिविधानी सन्तीति चेत् आगामीसंचितप्रारब्धभेदेन त्रिविधानी सन्ति।


ध्यानमूलं गुरुर्मूर्ति, पूजामूलं गुरुर्पदम्। मन्त्रमूलं गुरुर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरूर्कृपा॥

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जैसे पहले दुनियादारी बोझ लगती थी, अब सत्य को जानना, अध्यात्म में उतरना भी एक दायित्व लगता है, वासना ही लगती है। हर वक़्त बोझिल रहता हूँ, सहज नहीं हूँ; चाहता हूँ कि सत्य अभी मिल जाए। कृपया मदद करें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कृपया मन और बुद्धि के सम्बन्ध पर प्रकाश डालने की कृपा करें। क्या बुद्धि मन को सही विकल्प चुनने हेतु दी गई है?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। गुरु शंकराचार्य जी ने आत्मा को इस तरह परिभाषित किया है – "स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से जो पृथक है, जो तीनों अवस्थाओं का साक्षी है तथा जो सच्चिदानंदस्वरूप है, वह आत्मा है”, और वहीं यह भी कहा है कि "स्थूल शरीर अभिमानी आत्मा को

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसा आपने अपने सत्रों में आध्यात्मिक मनोरंजन का ज़िक्र किया है व निंदा की है, तो मैं जानना चाहती हूँ कि कथा और सत्संग इत्यादि में जो सामूहिक भजन-कीर्तन और नाम जपा जाता है, वह क्या माना जाएगा?




प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। बोध का अर्थ शायद अनुभूतिपूर्ण अपरोक्ष ज्ञान है। जगद्गुरू आदिशंकराचार्य ने इसके लिए जो आवश्यक साधन-चतुष्टय बताए हैं, उनको उपलब्ध किए बिना इस ज्ञान का सिर्फ़ श्रवण या पठन क्या एक दुविधा अथवा एक प्रकार का मानसिक अनुकूलन नहीं पैदा करेगा? यह दुविधा या मानसिक अनुकूलन

प्रश्नकर्ता: लड़कियों से बात करने में झिझक क्यों होती है?
आचार्य प्रशांत: तुम हर समय लड़के बनकर क्यों घूमते हो? तुम जितना ज़्यादा देहभाव में जियोगे, उतना अपने लिए परेशानियाँ खड़ी करोगे। लड़कों के सामने कौन शर्माती है? लड़की। लड़की माने क्या? लड़की का हाथ, लड़की का जिस्म, लड़की के…
Adi Shankaracharya goes to his teacher and is asked to introduce himself, and he says, “Cidānandarūpaḥ Śivoham Śivoham — I am pure blissful consciousness; I am Shiv, I am Shiv." My real identity is not at all related to the body. The great teacher is very clearly telling us that Shiv is the one who has nothing bodily about himself. But because we are bodily, our ego does not allow us to admit that there can be anything beyond who we are. And that’s also the cause of all human suffering.
सांसारिक कर्म आप कर ही नहीं रहे हैं। सांसारिक कर्म हो रहे हैं अपनेआप। मूल भ्रम यही है कि सांसारिक कर्म करने वाले आप हैं। इन्द्रियाँ हैं, मस्तिष्क है, बुद्धि है, अंतःकरण है, स्मृति है, ये सब अपना काम करना बख़ूबी जानते हैं। आप न जाने किस दंभ में हैं कि ये सब काम दुनिया के आप कर रहे हैं!
Acharya Prashant: One may put it in words of his personal choice. And…
Intelligence isn’t the same as knowledge. Knowledge relies on history, memory, and experience, while intelligence allows one to relate to others in the present moment. Knowledge helps with comprehension, but true understanding comes from intelligence, which goes beyond knowledge. Even without knowing the language, intelligence can still enable a deep connection. If knowledge is there—wonderful! Even without knowledge, intelligence isn’t limited or lame. It can still operate effectively, allowing one to relate and understand fully.
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम गवाक्ष जोशी है। मैं आइआइटी कानपुर में पीएचडी का छात्र हूँ। और विद्युत अभियान्त्रिकी विभाग से। मेरा प्रश्न धर्म को लेकर है। मैं हितोपदेश मित्रलाभ पढ़ रहा था! तो एक श्लोक आया था मेरे सामने, जिसका अर्थ ये था — भोजन, निद्रा, भय और…
प्रश्नकर्ताः धन्यवाद, सभा में उपस्थित सभी लोगों का अभिनन्दन! मैं डा. कुमार मनोज, मैं आधुनिक चिकित्सा में यूरोप से प्रशिक्षित एक चिकित्सक हूँ। और फिलहाल मैं दिल्ली के एक शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय में मनोरोग विभाग में कार्यरत हूँ। मैं जब भारत वापस आया तो मैं अपने भारतीय समाज की सेवा…
Questioner: The entire universe, the gross and subtle objects, people, gods and goddesses, feelings, thoughts, they are all nothing but mind stuff. As I live in this world, being an entity, I am unable to see this world as non-existent; I still see differences. I am unable to wake up.…
अतीताननुसन्धानं भविष्यदविचारणम् । अउदासीन्यमपि प्राप्तं जीवन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥
atītānanusandhānaṃ bhaviṣyadavicāraṇam audāsīnyamapi prāptaṃ jīvanmuktasya lakṣaṇam
Not dwelling in the past, taking no thought for future, and looking with indifference upon the present, are characteristics of the liberated-in-life.
~ Verse 432
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Questioner (Q): My mind wanders into the past…
छायया स्पृष्टमुष्णं वा शीतं वा सुष्ठु दुःष्ठु वा । न स्पृशत्येव यत्किंचित्पुरुषं तद्विलक्षणम् ॥
chāyayā spṛṣṭamuṣṇaṃ vā śītaṃ vā suṣṭhu duḥṣṭhu vā na spṛśatyeva yatkiṃcitpuruṣaṃ tadvilakṣaṇam
If the shadow of a man is touched by heat or cold, good or evil, it does not in the least affect the man,…
यावद्वा यत्किंचिद्विषदोषस्फूर्तिरस्ति चेद्देहे । कथमारोग्याय भवेत्तद्वदहन्तापि योगिनो मुक्त्यै ॥
yāvadvā yatkiṃcidviṣadoṣasphūrtirasti ceddehe kathamārogyāya bhavettadvadahantāpi yogino muktyai
As long as there is even a trace of poison left in the body, how can one hope for complete recovery? Even so, the yogi cannot attain liberation as long as a trace of…
atyantavairāgyavataḥ samādhiḥ samāhitasyaiva dṛḍhaprabodhaḥ prabuddhatattvasya hi bandhamuktiḥ muktātmano nityasukhānubhūtiḥ
For the extremely dispassionate man alone there is samādhi, and the man of samādhi alone gets steady realization, the man who has realized the Truth is alone free from bondage,…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। 'निर्वाण षटकम्' की एक पंक्ति है —
'न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्।'
तो इसमें जो मोक्ष के विषय में कहा गया है कि मैं मोक्ष भी नहीं हूँ, तो क्या शिव को मोक्ष भी नहीं चाहिए?
आचार्य प्रशांत: हाँ,…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपको सादर प्रणाम। मैंने एक लेख पढ़ा था स्वामी विवेकानन्द जी के ऊपर जिसमें उनका एक वक्तव्य था कि यू आर नीयरली गॉड इफ यू नो योर सेल्फ़ देट यू आर अ सोल (तुम अपनेआप को यदि आत्मा जानते हो, तो तुम ब्रह्म ही हो)। तो मुझे…
आचार्य प्रशांत: महाशिवरात्रि का समय है और आपकी बहुत-सी जिज्ञासाएँ आयी हैं। आपने कहा कि जैसे अभी पूरी बात समझायी आपने कि ईश्वर माने क्या, आत्मा माने क्या, माया माने क्या, चार राम कौन से होते हैं — और श्री कृष्ण की गीता पर तो लंबे और पूरे व्याख्यान होते…
श्रवणादिभिरुद्दीप्तज्ञानाग्निपरितापितः । जीवः सर्वमलान्मुक्तः स्वर्णवद्द्योतते स्वयम् ॥
हृदाकाशोदितो ह्यात्मा बोधभानुस्तमोऽपहृत् । सर्वव्यापी सर्वधारी भाति भासयतेऽखिलम् ॥
दिग्देशकालाद्यनपेक्ष्य सर्वगं शीतादिहृन्नित्यसुखं निरंजनम् । यः स्वात्मतीर्थं भजते विनिष्क्रियः स सर्ववित्सर्वगतोऽमृतो भवेत् ॥
जब जीव श्रवण आदि द्वारा प्रज्वलित ज्ञानाग्नि में भलीभाँति तप्त होता है, तो वह साड़ी मलिनताओं से मुक्त होकर स्वर्ण की…
आत्मा को आत्मा के द्वारा ही जाना जा सकता है।
~ विवेक चूड़ामणि, आदि शंकराचार्य
प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न तो कम है, मेरी जिज्ञासा है। अभी सुबह जब मैं गया था तपोवन घाट पर, तो विवेक चूड़ामणि पढ़ रहा था उस समय। उसमे ये दिया हुआ है स्पष्ट तरीक़े से कि…
एवं देहद्वयादन्य आत्मा पुरुष ईश्वरः। सर्वात्मा सर्वरूपश्चसर्वातीतोऽहमव्ययः।।
इस प्रकार आत्मा पुरुष या ईश्वर स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों प्रकार के शरीरों से भिन्न है। अतः मैं सर्वात्मा, सर्वरूप, अविनाशी और सबसे परे हूँ।
~ अपरोक्षानुभूति (श्लोक ४०)
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) शंकराचार्य के श्लोक को उद्धृत किया है, “आत्मा स्थूल…
~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ५३)
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि ह्यात्मत्वेन विजानतः। न वै तस्य भवेन्मोहो न च शोकोऽद्वितीयतः।।
“उस अवस्था में सम्पूर्ण…
आचार्य प्रशांत: अपरोक्षानुभूति कह रही है कि “जीव अमर है और मुक्त है, जीव अकर्ता है, जीव…
अहंशब्देन विख्यात एक एव स्थित: पर:। स्थूलस्त्वनेकतां प्राप्त: कथं स्याद्देहक: पुमान्।।
“ ‘अहं’ शब्द से प्रसिद्ध परमात्मा एकमात्र स्थित है, अर्थात् वह अनेक तत्वों का संघात नहीं है। फिर जो स्थूल है और अनेक भावों को प्राप्त हो रहा है, वह देह पुरुष कैसे हो सकता है?”
~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ३१)…
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) मूलतः बात ये पूछी है कि “आत्मा को कहा तो निर्गुण जाता है, और निर्गुण का अर्थ हुआ कि कोई एट्रिब्यूट (गुण) नहीं, कोई उपमा-उपाधि नहीं। तो फिर आत्मा को निर्गुण के साथ ही निर्विकार, निर्मल, निराकार, अविनाशी, नित्य, शुद्ध, अजर-अमर इत्यादि क्यों कहा जाता…
दोषोऽपि विहित: श्रुत्या मृत्योर्मृत्युं स गच्छति। इह पश्यति नानात्वं मायया वन्चितो नर:।।
“‘मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है’, ऐसा कह कर श्रुति ने दोष भी बतलाया है। मनुष्य माया से ठगा जा कर ही संसार में नानात्व देखता है।” ~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ४८)
आचार्य प्रशांत: अड़तालीसवाँ श्लोक है अपरोक्षानुभूति का।…
अविद्या उपाधि से युक्त आत्मा को जीव कहते हैं। माया उपाधि से युक्त आत्मा को ईश्वर कहते हैं।
—तत्वबोध, श्लोक २८-२९
तस्मातकारणात् न जीवेश्वरयोर्भेद बुद्धि स्वीकार्या।
इसलिए जीव-ईश्वर में भेद बुद्धि को स्वीकार नहीं करना चाहिए।
—तत्वबोध, श्लोक ३१
प्रश्नकर्ता: आचार्य…
स्थूलशरीराभिमानि जीवनामकं ब्रह्मप्रतिबिम्बं भवति। स एव जीव: प्रकुत्या स्वस्मात् ईश्वर भिन्नत्वेन जानाति।।
स्थूलशरीर अभिमानी जीव नामक ब्रह्म का प्रतिबिंब होता है। वह ही जीव स्वभाव से ही ईश्वर को अपने से भिन्न जानता है।
—तत्वबोध, श्लोक २७
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमन। मैं स्वयं विभिन्न प्रकार से स्वभाव में स्थित रहने…
यथा देहोऽहं पुरुषोऽहं ब्राह्मणोऽहं शूद्रोऽहमस्मीति दृढनिश्चयस्तथा नाहं ब्राह्मण: न शूद्र: न पुरुष:। किन्तु असंगः सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशरूपः सर्वान्तर्यामी चिदाकाशरूपोऽस्मीति दृढनिश्चयरूपः अपरोक्षज्ञानवान् जीवन्मुक्तः॥
जिस तरह हम देह हैं, हम पुरुष हैं, हम ब्राह्मण हैं, हम शूद्र हैं, इस प्रकार का दृढ़ निश्चय होता है, वैसा ही दृढ़ निश्चय हम ब्राह्मण नहीं हैं,…
ध्यान का मूल, गुरु की मूर्ति है। पूजा का मूल, गुरु के चरण कमल हैं। मंत्र का मूल, गुरु के शब्द हैं। मोक्ष का मूल, गुरु की कृपा है।
—(गुरुगीता, श्लोक ७६)
प्रश्नकर्ता: गुरुकृपा क्या होती है?
आचार्य प्रशांत: अगर तुम सच-सच…
आचार्य प्रशांत: बस मार्ग यही है – जैसे हैं इस प्रश्न को लिखते वक़्त, वैसे ही रहिए। विनम्रता तो इतनी बड़ी बात है कि…
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं, विचार…
आचार्य प्रशांत: तो कुछ लोग भाग-भागकर करिअर बनाते हैं, मैं शायद रुक-रुककर बना रहा होऊँगा! इतना तो तुमने पक्का ही…
प्रश्नकर्ता: क्या अहंकार भी सात्विक, राजसिक, तामसिक होता है? कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: होता है। अहम् के साथ भी तुम इन तीनों गुणों को जोड़कर देख सकते हो। प्रकृति के गुण हैं, अहम् पर ही लागू होते हैं।
तामसिक अहंकार क्या है?
जिसने धारणा बना ली है कि, "मैं…
आचार्य प्रशांत: मन है अहम् की गति। अहम् एक तड़प है, वो शांत नहीं बैठ सकती। उसे नाचना है, और उसका ये नृत्य कोई…
आचार्य प्रशांत: यहाँ उत्पत्ति विषयों की और इंद्रियों की क्रमशः नहीं…
आचार्य प्रशांत: कुछ मानने की ज़रूरत नहीं है, जाँच…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। तत्व विवेक की परिभाषा में कहा गया है कि, "आत्मा सत्य है, उससे भिन्न सब मिथ्या है, ऐसा दृढ़विश्वास ही तत्व विवेक है।"
मेरा सवाल यह है कि सिर्फ़ आत्मा को ही सत्य समझना क्या साधना की एक उच्च अवस्था पर पहुँचने के बाद ही हो…
स्थूलशरीरं किम्? पंचीकृतपञ्चमहाभूतै: कृतं सत्कर्मजनयं सुखदुःखादिभोगायतरन शरीरं अस्ति जायते वर्धते विपरिणमते अपक्षीयते विनश्यतीति षड्विकारवदेतत्स्थूलशरीरं।
सूक्ष्मशरीरं किम्? अपंचीकृतपञ्चमहाभूतै: कृतं सत्कर्मजनयं सुखदुःखादिभोगसाधनं पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि पञ्चप्राणादयः मनश्वैचकं बुद्धिश्वैचकं एवं सप्तदशाकलाभिः सह यत्तिष्ठति तत्सूक्ष्मशरीरं।
स्थूल शरीर क्या है? जो पंचीकृत पाँच महाभूतों से बना हुआ, पुण्य कर्म से प्राप्त, सुख-दु:खादि भोगों को भोगने का…
सत् किसे कहते हैं? जो तीनों कालों में रहता है। चित् क्या है? जो ज्ञानस्वरूप है। आनंद क्या है? जो सुखस्वरूप है।
—तत्वबोध, श्लोक १६.२-१६.४
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्, चित् और आनंद के बारे में आदि शंकराचार्य बता रहे हैं। कृपया इसे…
आचार्य प्रशांत: नित्यता तो कसौटी है। नित्यता कसौटी है जिस पर तुम अनित्य को वर्जित करते हो, अनित्य को गंभीरता से लेने से इन्कार करते हो। जब भी कुछ लगे कि मन पर हावी हो रहा है, तो कसौटी का प्रयोग करना…
शमः कः? मनो निग्रहः।
शम क्या है? मन के ऊपर नियंत्रण प्राप्त करना ही शम है।
—तत्वबोध, श्लोक ५.३
आचार्य प्रशांत: दमन जो काम स्थूल रूप से करता है, शमन वही काम सूक्ष्म रूप से करता है। दमन का मतलब है यह हाथ लड्डू की ओर बढ़ना चाहता है, यह…
प्रश्नकर्ता: तितिक्षा क्या है?
आचार्य प्रशांत: तितिक्षा है कि साधक इधर-उधर के संवेगों के प्रति उदासीन हो जाता है। उसको एक चीज़ चाहिए, बाकी सबके प्रति वह अनासक्त हो जाता है, अक्रिय हो जाता है, जैसे बहुत सारी चीज़ें उसके लिए अदृश्य हो गई हों। बहुत कुछ हो जो दिखाई…
उपरमः कः? स्वधर्मानुष्ठानमेव।
उपरम क्या है? स्वधर्म का अनुष्ठान ही उपरम है।
—तत्वबोध, श्लोक ५.५
आचार्य प्रशांत: स्वधर्म क्या है और स्वधर्म का जीव के पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों से क्या लेना-देना है — इसको बहुत ध्यान से समझेंगे सभी, क्योंकि इस विषय पर भ्रम बहुत हैं और यहीं पर…
श्रद्धा कैसी होती है? गुरु और वेदान्त के वाक्यों में विश्वास रखना श्रद्धा है।
—तत्वबोध, श्लोक ५.७
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। उपरोक्त वक्तव्यों से यह साफ़-साफ़ समझ आ रहा है कि क्यों गुरु के जीवन को हमें अपने जीवन में उतारना चाहिए। गुरु के…