
आचार्य प्रशांत: देखिए, मैं पूरी सावधानी और सम्मान के साथ कह रहा हूँ, महिलाओं का एक वर्ग ऐसा है जिसको ज़रा भी झिझक नहीं होती नौकरी छोड़ देने में ये कहकर कि अब तो फ़ैमिली रिस्पॉन्सिबिलिटीज़ हैं। ये बात ठीक नहीं है। कई बार तो ऐसा भी लगता है, सब महिलाओं की नहीं, कुछ की बात कर रहा हूँ, जैसे वो फिराक़ में ही थीं कि कोई बहाना मिले और नौकरी छोड़ दें और घर बैठ जाएँ। बस किसी तरीके से कोई सम्मानजनक तरीका मिल जाए नौकरी छोड़ने का।
सब महिलाएँ ऐसी नहीं हैं, मुझे गलत न समझा जाए लेकिन एक वर्ग है ऐसा; खट से रिज़ाइन करती हैं और बैठ जाती हैं घर पर। पुरुष ऐसा नहीं करते। नतीजा ये है कि एम्प्लॉयर्स भी कुछ बातें जानते हैं हायरिंग के समय, और वो उन बातों को फिर ध्यान में रखकर हायरिंग करते हैं। स्त्री-पुरुष में वो फिर भेद करते हैं, डिस्क्रिमिनेशन करते हैं। उन्हें पता है कि दोनों का व्यवहार अलग-अलग होने वाला है। शादी होगी, प्रेग्नेंसी होगी। संभावना है कि ये अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे हट जाए।
और इसमें, मैं कह रहा हूँ, स्त्री की चालाकी जितनी होगी तो होगी; स्त्री का शोषण बहुत ज़्यादा है, क्योंकि हमने उसे सिखा दिया है कि उसको सम्मान का अधिकारी बनाता है उसका मातृत्व, जो कि है एक बिल्कुल शारीरिक बात।
तो हमने कह दिया है कि तुम्हारे शरीर से जो हो रहा है, उतने भर से तुम सम्मान की अधिकारी हो गई। वो सब बातें सारी, कि “माँ से ऊँची जगह तो भगवान की भी नहीं होती,” वग़ैरह-वग़ैरह। सुना है न खूब? “माँ कैसी भी हो उसके चरणों में जन्नत होती है।” ये सब बातें।
न पढ़ी-लिखी हो, न उसमें कोई गुण हो, न योग्यता हो, न संसार को जानती हो, न अध्यात्म को जानती हो, अगर उसको गर्भ हो गया तो वो भगवान हो गई। ये कोई बात है? आप बताइए। मैं महिलाओं से पूछ रहा हूँ। आप बताइए। पुरुषों को हटाइए आप ही लोग बताइए। ये बात न्यायपूर्ण है? महिला बाद में है, इंसान तो पहले है न।
एक ऐसा इंसान जिसने ज़िंदगी में कुछ हासिल करने की कोशिश नहीं की, ज्ञान पाने की कोशिश नहीं की, कोई कौशल विकसित करने की कोशिश नहीं की; जिसके भीतर हिम्मत नहीं, साहस नहीं, स्पष्टता नहीं, ऐसा इंसान अगर गर्भधारण कर ले, तो वो भगवान बराबर हो जाएगा क्या? महिलाएँ ही बताएँ। आपसे ही पूछ रहा हूँ, आप न्याय कीजिए। बोलिए, नहीं होगा न। तो फिर?
लेकिन ये धारणा खूब चलती है, गिव हर रिस्पेक्ट, शी इज़ अ मदर। ये कोई बात है?
आप एक मनुष्य हैं, महिला बाद में हैं। आप बिल्कुल वैसे ही एक अतृप्त चेतना हैं, जैसे एक पुरुष होता है। तो आपका भी अपने प्रति वही कर्तव्य है, जो एक पुरुष का होता है: जीवन को सार्थकता देना, पूर्णता देना, चेतना को उसकी ऊँचाइयों पर पहुँचाना। आपका भी तो यही धर्म है न जीवन में। तो किसने आपका शोषण करा है, आपको ये पट्टी पढ़ाकर कि आपका पहला धर्म है माँ बनना? मुझे बताइए।
अगर पुरुष का पहला धर्म बाप बनना नहीं है, तो स्त्री के लिए मात्र मातृत्व पहली चीज़ कैसे हो गई? किसने ये झूठा पाठ पढ़ाया आपको?
और आपको दिख नहीं रहा है, ये पाठ पढ़ाकर कितना शोषण किया गया है। कितनी बेड़ियों में डाला गया है आपको। मुझे आग्रह करके कह रहा हूँ, गलत न समझा जाए। मैं मातृत्व के, गर्भ रखने के और बच्चों के ख़िलाफ़ नहीं हूँ। मैं बस चेतना के पक्ष में हूँ, समझदारी के पक्ष में हूँ।
लेकिन ये देखा जाता है, और फिर इसीलिए ये होता है कि बहुत सारी भ्रमित लड़कियाँ अक्सर अपनी शिक्षा पर और अपने करियर पर ध्यान नहीं देतीं। ख़ासतौर पर अगर वो दिखने में सुंदर वग़ैरह हों, उन्हें कॉलेज जाने से ही बहुत मतलब नहीं होता। और अगर छोटे शहरों-क़स्बों की बात करें, तो उनके टीचर-प्रोफ़ेसर भी उन पर ज़ोर नहीं देते कि तुम कॉलेज आओ।
वो कहते हैं, “अरे, सुंदर लड़की है। ये बीएससी करके क्या कर लेगी, इसका करियर तो दूसरी दिशा में है। एक-से-एक करियर वाले आएँगे, इसको उठा ले जाने। ये पढ़कर क्या करेगी? सब पढ़े-लिखे अभी इसके दरवाज़े पर आने वाले हैं, बारात लेकर।”
ये बात अगर पुरुष बोल रहे होते, तो कम घातक होती। घातक बात ये है कि इस धारणा को लड़कियाँ आत्मसात कर लेती हैं। कर लेती हैं या नहीं कर लेती हैं? मुझे सावधान होना पड़ता है क्योंकि आरोप लग जाता है, कि “आप स्वयं पुरुष हैं; इसीलिए महिलाओं के बारे में अनाप-शनाप बोल रहे हैं। हम तो ऐसी होती ही नहीं हैं।”
अरे भाई, मैं कोई अपना ओपिनियन व्यक्त नहीं कर रहा, मैं आँकड़ों की बात करता हूँ। बिना जाने-समझे, पूरी सूचना के बोलना ठीक होता ही नहीं। और मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि अगर मुद्दे की जड़ तक नहीं पहुँचा हूँ, तो चुप ही रहूँ।
इतना ही नहीं होता। जो थोड़ी रूपसी लड़कियाँ होती हैं, उनमें एक अलग ही कॉन्फ़िडेंस आ जाता है। एकदम डब्बा-बंद यहाँ (बुद्धि) से कुछ नहीं आता-जाता। न भाषा आती, न गणित आता, न विज्ञान आता, न कलाएँ आतीं, न कॉमर्स आता, कुछ नहीं। लेकिन कॉन्फ़िडेंस उनका यहाँ (ऊपर) रहता है। ऐसा होता है या नहीं होता है? और ये बात स्वयं महिलाओं के लिए ही घातक है या नहीं है? अगर कोई आपको आपके ज्ञान की वजह से नहीं, बल्कि आपकी देह की वजह से ब्याह के ले जा रहा है, तो आपको दिखाई नहीं दे रहा कि वो आपका क्या इस्तेमाल करने वाला है? बोलिए।
ये बाज़ारू बात नहीं हो गई? आपने एक चीज़ देखी, वो चीज़ आपको चमकदार, आकर्षक, सेक्सी लगी, आप उसे उठा के अपने घर ले आए। यही करते हैं न बाज़ार में हम, और ये ज़हरीली धारणा लड़कियों के भीतर प्रविष्ट करा दी गई है।
उसका एक और मैं आपको बहुत सविनय बोल रहा हूँ; उसका एक और घातक परिणाम बताता हूँ। बहुत सारी लड़कियाँ और महिलाएँ फिर जीवन में कष्ट झेलने को तैयार नहीं होतीं। और कोई भी ऊँचा काम करना है, तो उसमें कष्ट तो झेलना पड़ेगा।
अब मान लीजिए वो नौकरी कर रही हैं और नौकरी में स्थिति ऐसी बन गई कि ज़्यादा घंटे देने पड़ेंगे, ज़्यादा मेहनत करनी पड़ेगी, और डाँट भी खानी पड़ेगी क्योंकि काम बहुत गंभीर है, क्रिटिकल है। उसमें ऊँच-नीच होती नहीं है कि तुरंत डाँट पड़ती है। ऐसे में, पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के रिज़ाइन कर देने की संभावना बहुत ज़्यादा रहती है, वो डाँट नहीं सहतीं। वे कहेंगी, “मेरे पास दूसरे ऑप्शंस हैं। 9 टू 5 ठीक है; पर ज़्यादा दबाव डालोगे, परेशान करोगे तो मैं रिज़ाइन कर दूँगी।”
फिर उसका नतीजा ये होता है कि बहुत सारी कंपनीज़ में, ऑर्गेनाइज़ेशन्स में महिलाओं को ज़िम्मेदारी के काम दिए ही नहीं जाते। क्योंकि हर ज़िम्मेदारी के काम में तनाव और दबाव झेलना पड़ता है। ये भूल जाना पड़ता है कि कब खाना खाया, कब सोए, कब नहाए, कब आए, कब गए।
आप में से जो लोग काम करते हैं, व्यावसायिक अनुभव है वो मेरी बात से सहमत हो रहे होंगे। होता है कि नहीं होता है? एकदम जूनियर लेवल पर ऐसा चल जाता है कि 9:00 बजे आए, 5:00 बजे निकल गए। जैसे-जैसे आपके काम की गंभीरता बढ़ती है, जैसे-जैसे आप नेतृत्व के पदों पर आते हो, वैसे-वैसे काम 24 घंटे का हो जाता है, लगातार। महिलाओं को वो पद नहीं मिलते। मुझे बताओ, इसमें महिलाओं की भलाई है?
उसको हमने देह बना डाला है। माँ बना-बनाकर उसको देह ही बना दिया। क्योंकि बच्चा जनना काम तो देह का ही है न। आप जितना ज़्यादा मातृत्व को गौरवान्वित करोगे, उतना ज़्यादा आप स्त्री को पतित करोगे। आप बोल दोगे, वो तो देह है जो बच्चा पैदा करती है। कहेंगे, “नहीं साहब, वो देह-भर थोड़ी है। देखिए, बच्चे को बड़ा भी तो कर रही है।”
बच्चा अपने आप बड़ा होता है। उसको मनुष्य बनाने के लिए जो ज्ञान चाहिए, क्या उसकी माँ ने वो स्वयं अर्जित करा है पहले? कद तो बच्चे का अपने आप ही बढ़ जाता है। हर पशु अपने आप बड़ा हो जाता है। बच्चे को बड़ा नहीं करना होता, गाय का बछड़ा अपने आप सांड बन जाता है या नहीं बन जाता है? बड़ा नहीं करना पड़ता। हाँ, उसे इंसान बनाना पड़ता है, उसे चेतना देनी पड़ती है। माँ अपने बच्चे को इंसान बना पाए, इसके लिए सर्वप्रथम क्या ज़रूरी है? माँ की चेतना ख़ुद उठी हुई हो, ऊपर की हो। उसके लिए तो माँ को ख़ुद ज्ञान अर्जित करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी।
वो ज्ञान अर्जित करने के रास्ते में, मेहनत के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा सामाजिक धारणाएँ हैं। उसको बोल दिया गया है, ज्ञान चाहिए नहीं, मेहनत करनी नहीं है। माँ बनना काफ़ी है, बच्चे की देखभाल करो।
आप बच्चे की देखभाल भी नहीं कर पाएँगी, अगर आप बोध चेतना के रास्ते पर नहीं चली हैं।
आपको ये भ्रम रहेगा, “मैंने अपने बच्चे की अच्छी परवरिश करी है। मैं उसे पराठे बनाकर खिलाती थी;” वग़ैरह-वग़ैरह। वो बच्चा बर्बाद ही निकलना है। हाँ, आप अपने आप को ये भुलावा देती रहेंगी कि “इतना-सा पैदा हुआ था, मैंने 6 फ़ीट का कर दिया।” आपने नहीं कर दिया वो अपने आप 6 फ़ीट का हो गया है। रही बात चेतना की, तो इतनी-सी (छोटी) पैदा हुई थी और इतनी-सी ही है। उसको आप बढ़ा ही नहीं पाईं, क्योंकि आपकी अपनी चेतना ही इतनी-सी है। शरीर देखकर के आप क्या फूल रही हैं कि “मैंने बड़ा करा है।”
आप लोगों को, महिलाओं को बुरा तो नहीं लग रहा है? 1000, 2000, शायद 10,000 महिलाओं की एक पूरी ब्रिगेड है, जो विशेषकर मेरे पीछे पड़ी रहती है।
आपकी देह आपकी पहली संपत्ति नहीं है। जैसे पुरुष की नहीं होती, वैसे आपकी भी नहीं है। इतना समय शरीर को मत दिया करिए, मन में इतना महत्त्व शरीर को मत दिया करिए। दिन में दो-दो, तीन-तीन, चार-चार घंटे मेकअप में मत लगाया करिए। कोई आदमी रोज़ नहाता है, इससे वो अच्छा आदमी नहीं हो जाता; और बुरे आदमी की पहचान ये नहीं है कि वो रोज़ नहाता नहीं।
आपका पैसा कॉस्मेटिक्स इंडस्ट्री के लिए नहीं है। अपने आप से सवाल पूछा करिए, पुरुषों के कपड़े इतने सस्ते क्यों होते हैं? और आपकी आधी कमाई क्यों जाए महँगे कपड़ों में? छोटा-सा बच्चा होगा एक साल का लड़का उसके भी कपड़े सस्ते होंगे; और एक साल की बच्ची होती है उसके भी कपड़े महँगे होते हैं। क्यों? ये देख नहीं रहे हैं समाज आपके साथ क्या कर रहा है? समाज आपसे कह रहा है कि आपकी सारी कमाई देह पर जानी चाहिए। समाज आपको संदेश दे रहा है, सीख दे रहा है महिलाओं को कि सबसे मूल्यवान चीज़ क्या है? देह पर डाले हुए कपड़े, माने देह।
मैं मुख पर राख मलने को नहीं कह रहा। मैं सहज जीने को कह रहा हूँ, जैसा एक मनुष्य को जीना चाहिए। आप मनुष्य पहले हैं; महिला बाद में हैं। और जो लोग मुझसे कहते हैं, “हाउ, ऐज़ अ मैन कैन यू टॉक अबाउट वुमेन?” ऐज़ अ ह्यूमन बीइंग, आई ऐम टॉकिंग अबाउट अनदर ह्यूमन बीइंग। या आप ह्यूमन बीइंग नहीं हैं अब। वुमन हैं, ह्यूमन नहीं हैं?
देखिए, जब कोई व्यक्ति आंतरिक रूप से मुक्त नहीं होता और आर्थिक रूप से मुक्त नहीं होता, तो उसे क्या करना पड़ता है? उसे दूसरों से गलत संबंध बनाने पड़ते हैं, और उसे दूसरों पर निर्भर होना पड़ता है, और उसे कई तरीके की चालें खेलनी पड़ती हैं। उसे घरेलू राजनीति करनी पड़ती है, क्योंकि वो असुरक्षित अनुभव करता है, इनसिक्योर फ़ील करता है।
ये जो आप घरों में इतना देखते हैं न, सास, ननद, देवरानी, जेठानी; ये सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि वे सब महिलाएँ इनसिक्योर हैं। क्यों इनसिक्योर हैं? क्योंकि वे मुक्त नहीं हैं, आत्मनिर्भर नहीं हैं। तो इसीलिए वे सौ तरह की फिर चालें खेलती हैं आपस में कि किसका हाथ ऊपर रहेगा, किसका सिक्का चलेगा। नहीं तो समय ही नहीं होगा आपके पास, ये छोटे-मोटे पचड़ों में पड़ने का।
ये क्यों चलता रहा है कि बेटे पर नियंत्रण के लिए सास और बहू में कशमकश? क्योंकि बेटा क्या है? बेटा आमदनी का स्रोत है। वो माँ को भी चाहिए, वो उसकी पत्नी को भी चाहिए, तो वो आपस में लड़ती हैं। दोनों इसलिए लड़ती हैं, क्योंकि दोनों ही नहीं कमातीं। और दोनों क्यों नहीं कमातीं? क्योंकि दोनों को ये पाठ पढ़ा दिया गया था, “तुम तो स्त्री हो न। तुम्हारे लिए कोई और कमाएगा, तुम बच्चे पैदा करो।”
हमने खरगोश पाले हैं। हम यहाँ आए हैं, तो उनके लिए पहले व्यवस्था करके आए हैं। आपको भी अगर अपने जीवन में खरगोश लाने हैं, तो पहले व्यवस्था कर दीजिए न। व्यवस्था पहले कर लीजिए, फिर खरगोश को लाइए। मैं कहूँ कि मैं यहाँ आ ही नहीं सकता, महोत्सव में भाग नहीं ले सकता, क्योंकि मेरे पास खरगोश हैं, ये कोई बात हुई? बोलिए।
और दस हैं पूरे इतु-इतु जैसे आप बोल देते हैं कि “मेरे पास मेरा बच्चा है, मैं कैसे आ सकती हूँ? मैं काम नहीं कर सकती, मैं शिविर में नहीं आ सकती, मैं कुछ नहीं कर सकती।” मेरे पास तो दस हैं खरगोश, मैं भी नहीं आऊँगा।