इससे बड़ी विडम्बना नहीं हो सकती कि जिस ज़मीन पर ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ उच्चारित हुआ, उस ज़मीन पर जाति और लिंग आधारित इतनी क्रूरता चली। कोई दलित महिला अतीत से बंध कर रहे, इससे ज़्यादा ताज्जुब की बात नहीं हो सकती। आपके लिए अतीत में रूढ़ियों और बंधनों के अलावा है क्या? उनसे आपको कुछ नहीं मिलने वाला। जितना उनका मुँह देखोगे, उतना आपका दिल टूटेगा। अपने आपको सही ज़मीन और सही आसमान दीजिए। अतीत को तोड़कर उड़ जाओ, इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम कुसुम है, मैं आपके सामने कुछ बोलना चाह रही हूँ कि लोग मुझसे भी दुखी हैं और मेरा भी दुख है। मुझसे दुखी ये हैं क्योंकि ढोंग और आडंबरों को मानना मेरे बस की बात भी नहीं है। मैं जब छोटी थी, थोड़ी सी समझ आई तो मैं क्वेश्चन करती थी पेरेंट्स से कि एक तो मैं एस.सी. समुदाय से हूँ, तो मैंने मेरे गाँव में ये बर्बरता देखी है कि जो एस.सी. समाज के साथ होता है, वो मैंने देखा है।
तो मेरे पेरेंट्स ही नहीं, पूरा एस.सी. समुदाय बिल्कुल डर-डर के रहता था और मैंने उस पर क्वेश्चन उठाया, कि हम लोग पहले आते हुए भी हैंडपंप से पानी क्यों नहीं भर सकते? घर में पानी की कमी भी है। उसके बावजूद भी हम क्यों नहीं भर सकते? तो मैंने ये क्वेश्चन उठाया। तो मेरे घरवाले मुझसे दुखी क्योंकि, “सब चलता आ रहा है न, तू कौन सी कहाँ की आ गई है?" तो फिर वो मुझसे दुखी। तो मैंने कसम खाई कि मम्मी से पापा से बोला, "नहीं, मैं कुछ नहीं लूँगी तुमसे। मुझे ज़िंदगी में कभी कुछ नहीं चाहिए।" जहाँ पर भी कर्मकांड होते हैं, तो एक लड़की होने के नाते एक साठिया बना दो दीवार पर, उसका मुझे पैसा दिया जाएगा। मुझे तो यही समझ में नहीं आता था। इस वजह से भी मैंने नकार दिया, मैंने कहा मुझे कुछ चाहिए ही नहीं। तो भी वो दुखी हैं कि अब ये लड़की हमसे कुछ लेती ही नहीं है। वो तो भी दुखी। मैं देख रही हूँ, वो सब दुखी हैं।




