
प्रश्नकर्ता: ये जो राजनीतिक शुद्धिकरण की हम बातें करते हैं, या हम सोचते हैं कि एक राजनीतिक पक्ष ऐसा आना चाहिए जो समाज की सोचता हो, या वो सोचता हो। क्या जो सत्य की खोज करते हैं, उनको इस दिशा में सोचना चाहिए या नहीं सोचना चाहिए? क्योंकि राजनीतिक पक्ष का हमारे सामाजिक जीवन पर और हमारे घरेलू-आर्थिक जीवन पर बड़ा असर पड़ता है। यहाँ तक कि हम जहाँ पर रहते हैं, आसपास का माहौल काफ़ी ख़राब होता है उन चीज़ों से। यहाँ तक कि हमें मतलब ऐसा कह सकते हैं, कि हमें अपनी निजी ज़िंदगी भी जीने में कई बार काफ़ी कठिनाई आती है।
तो क्या इस दिशा में कभी सोचना चाहिए, या ये हमारा काम ही नहीं है?
आचार्य प्रशांत: वो अपने आप होगा। आप उसको रोक नहीं पाएँगे, उसकी उपेक्षा नहीं कर पाएँगे। आप जिसे राजनीति कहते हैं, या जिन्हें राजनेता कहते हैं, उनका असर आपके जीवन पर कई तरीके से पड़ता है। सिर्फ़ इसी तरीके से नहीं कि वो सड़क, बिजली, पानी के लिए ज़िम्मेदार होते हैं, वैसे तो पड़ता ही है, अन्यथा भी कई तरीकों से वो आपके जीवन को प्रभावित करते हैं।
तो जब आदमी जागृति की ओर बढ़ने लगता है, तो अपने माहौल की तरफ़ भी बड़ा सजग होने लगता है। वो कहता है, माहौल में ऐसा कुछ क्यों रखूँ जो मुझे कुत्सित करता हो, गंदा करता हो? और अगर माहौल में राजनेता भी शामिल हैं, तो फिर वो राजनेताओं में भी जो श्रेष्ठतम होगा, उसको ही चुनना चाहेगा। इसी तरीके से जिसको आप आदर्श बनाते हैं, वो आपको बहुत दिशाओं से प्रभावित कर ले जाता है। और जब आप इस बात के प्रति ज़रा चिंतित होने लगते हैं कि समाज में जागृति आनी चाहिए, तो फिर आप इस बात को लेकर भी सजग हो जाते हैं कि समाज के जो नेता हैं, वो ठीक लोग ही होने चाहिए।
गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि देखो अर्जुन, दुनिया में जो अग्रणी लोग होते हैं, उनके व्यवहार का, जीवन का, कर्मों का ही बाक़ी सब लोग अनुकरण करते हैं। तो फिर आप भी इस बात की तरफ़ सजग हो जाएँगे कि आप जिसको गद्दी दे रहे हैं, वो कैसा है। क्योंकि जैसा वो होगा, वैसा ही उसके पीछे-पीछे पूरा समाज हो जाएगा, “यथा राजा तथा प्रजा।”
भाई, अध्यात्म में जब आप कचरे को नहीं बर्दाश्त करते, क्योंकि कचरा बाहर ही नहीं रहेगा, वो आपके भीतर भी प्रवेश कर जाएगा। उसी तरीके से आप किसी घटिया नेता को कैसे बर्दाश्त कर लोगे, या घटिया किस्म की राजनीति कैसे बर्दाश्त कर लोगे? अगर वो माहौल में है, चारों तरफ़ है, तो आपके मन को भी मैला करेगी।
तो अध्यात्म का जीवन के हर पक्ष से संबंध है। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है, या असंवेदनशील हो जाता है, या अनदेखा करने लग जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो ये है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है। जीवन के हर क्षेत्र को ही आध्यात्मिक लोगों की सख़्त ज़रूरत है। लेकिन राजनीति को तो ख़ासतौर से, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं।
न्यायालय के न्यायाधीश को भी आध्यात्मिक होना चाहिए; दुकानदार को भी आध्यात्मिक होना चाहिए; किसान को भी आध्यात्मिक होना चाहिए; व्यापारी को भी होना चाहिए। सबको होना चाहिए। लेकिन सबसे ज़्यादा आवश्यकता अगर किसी के आध्यात्मिक होने की है, तो वो राजनेता की है। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। आप बात समझ रहे हैं?
प्रश्नकर्ता: मैंने यही चीज़ देखी थी कि कुछ समय से, जैसे, यहाँ तक कि जिनके ऊपर न्याय की ज़िम्मेदारी है, वो तक उन राजनेताओं से डरने लगे हैं। जबकि उनके ऊपर न्याय का पूरा ज़िम्मा था, वो हटने लगे हैं सुनवाइयों से और उन चीज़ों से। तो काफ़ी डर लगता है कि देर-सवेर, अगर यही चलता रहे, तो ख़तरनाक सिचुएशन आने वाली है।
आचार्य प्रशांत: देखिए, जहाँ अध्यात्म की कमी होगी, वहाँ डर होगा। इसीलिए पद जितना ऊँचा हो, उतना ही ज़्यादा ये आवश्यक हो जाता है कि उस पद पर जो आसीन है, वो आध्यात्मिक हो। छोटी-मोटी ज़िम्मेदारी वाला आदमी अगर डरपोक भी हो, भीरू भी हो, तो बहुत नुकसान नहीं हो जाएगा। पर जब एक ऊँचा न्यायाधीश, जिसके कंधे पर ज़िम्मेदारी है कि न्याय ही हो। वो डरने लग जाए, तो फिर न्याय की, धर्म की बड़ी हानि होगी। और निर्भयता सिर्फ़ एक जगह से आती है, आत्मा से।
अध्यात्म आत्मा का अनुसंधान है, आप निर्भय हो ही नहीं सकते अगर आपके जीवन में अध्यात्म नहीं है। आप ऊपर-ऊपर से हो सकता है बड़े शूरवीर बनो, पर भीतर ही भीतर आप काँपते रहोगे। कोई-न-कोई आकर आपको डरा ही जाएगा। हो सकता है पाँच बार न डरो, छठी बार डर जाओगे। जो कभी नहीं डरता, ऐसा तो कोई आध्यात्मिक चित्त ही हो सकता है। और ऐसा ही चित्त चाहिए हमें उच्चतम पदों के लिए। जितना ऊँचा पद उस पर बैठने वाला उतना आध्यात्मिक मन होना चाहिए। नहीं तो बड़ी गड़बड़ होगी।
प्रश्नकर्ता: चुनाव करने वाले लोग कंट्राडिक्शन में देखते हैं, कि एक आध्यात्मिक व्यक्ति चुनाव कैसे लड़ सकता है? या एक भगवा कपड़ा पहनने वाला आदमी, बाबा आदमी, ये कैसे ये वाली चीज़ कर सकता है? तो चुनाव करने वाला ही जब स्टुपिडाइज़ होगा, तो वहाँ ऊपर तक जाना मुश्किल।
आचार्य प्रशांत: चुनाव करने वाले ने ख़ुद दो हिस्से कर रखे हैं न ज़िंदगी के। उसकी ज़िंदगी के दो हिस्से हैं, उसकी आंतरिक ज़िंदगी के दो हिस्से हैं। एक हिस्सा आध्यात्मिक और दूसरा हिस्सा, जिसको वो सामाजिक या व्यावसायिक या पारिवारिक बोलता है। और ये दो हिस्से हैं, और इन दोनों हिस्सों में कोई संबंध नहीं होता।
एक आम आदमी पहले हिस्से में जैसा होता है, दूसरे हिस्से में बिल्कुल वैसा नहीं होता। वो पूजा-पाठ करते वक़्त सब अच्छी-अच्छी बातें याद करने की कोशिश करता है, अरे, ब्रह्मा जी ऐसे हैं, विष्णु जी ऐसे हैं, शिव जी ने ये बात बोली, वेद-पुराण में ये लिखा। ये सब बातें वो कब याद रखता है? जीवन के आध्यात्मिक हिस्से में जब होता है, तब याद रखता है। अर्थात दिन के एक घंटे याद रखता है।
उसके जीवन का आध्यात्मिक हिस्सा क्या है? जब वो मंदिर में गया है, जब वो योगासन में बैठा है, जब वो पूजा कर रहा है। इसको वो क्या बोलता है, अपने जीवन का? आध्यात्मिक हिस्सा, इस वक़्त वो बड़ा अच्छा आदमी है। और फिर उसके जीवन का एक दूसरा हिस्सा है, जिसमें अध्यात्म नहीं है, और उसने इन दोनों हिस्सों को हमेशा अलग रखा है।
तो इसी तरह से वो ये समझता है कि सामाजिक जीवन में भी दो अलग-अलग हिस्से होने चाहिए, दो अलग-अलग तरह के लोग होने चाहिए। एक जो आध्यात्मिक हों, और दूसरे तरह के लोग जो राजनैतिक या सामाजिक या औद्योगिक, कुछ भी व्यावसायिक हों। तो उसको बड़ी अचरज उठती है जब वो ये देखता है कि आध्यात्मिक आदमी भी राजनीति में मौजूद है। वो कहता है, नहीं, इन दोनों को तो अलग-अलग होना चाहिए न। क्योंकि मेरे घर में मेरी पूजा का समय अलग है और दुकान का समय अलग है। और पूजा में मैं धार्मिक रहता हूँ, और दुकान पर पूरी तरह अधार्मिक रहता हूँ। तो इन दोनों चीज़ों को तो अलग-अलग ही होना चाहिए।
उसको बड़ी ठेस लगती है जब वो देखता है कि आध्यात्मिक आदमी भी राजनीति में शिरकत कर सकता है। तो कहता है, नहीं, ये गलत हो रहा है। साधु राजनीति कर रहा है, तो पाप हो गया।
अच्छा, साधु राजनीति कर रहा है तो गड़बड़ हो गई, और असाधु राजनीति कर रहा है तो ठीक है। हक़ीक़त बिल्कुल दूसरी है।
हक़ीक़त ये है कि जिसमें साधुता हो, सिर्फ़ उसी को ही हक़ है राजनीति में उतरने का। बाक़ी तो अगर राजनीति में उतरें, तो न जाने क्या नर्क करेंगे।
जब तक ये सत्संग भवन और जीवन दो अलग-अलग चीज़ें रहेंगे, तब तक यही सोचते रहोगे कि जीवन का अध्यात्म से ताल्लुक या तो नहीं है या आंशिक है। और यही सोचते रहोगे कि तुम आध्यात्मिक हो, पर तुम जीवन की उपेक्षा कर सकते हो, इग्नोर कर सकते हो। तुम्हें समझ में ही नहीं आएगा, क्योंकि तुमने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि जो बातें तुम्हें प्रभावित कर रही हैं, वो कहाँ-कहाँ से आती हैं।
अध्यात्म में आते हो, यहाँ भजन गाते हो, बार-बार कहते हो, माया के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़नी है। जो चीज़ें तुम्हें परेशान और विचलित करनी हैं, उनके ख़िलाफ़ लड़ाई लड़नी है। ग़ौर करके देखोगे भी नहीं कि वे चीज़ें आ कहाँ से रही हैं, जो तुम्हें विचलित करती हैं। माया, माया गाते ही भर रहोगे?
अध्यात्म अपने आप में कोई क्षेत्र नहीं होता। अध्यात्म वो रोशनी है, जो तुम्हें सब क्षेत्रों को ठीक से दिखा देती है। अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। आध्यात्मिक आदमी का व्यापार अलग होगा, परिवार अलग होगा, तो फिर आध्यात्मिक आदमी की राजनीति भी अलग होगी। इसका मतलब ये नहीं है कि वो राजनीति त्याग देगा।
जब हम ये नहीं कहते कि आध्यात्मिक आदमी परिवार त्याग दे, जब हम ये नहीं कहते कि आध्यात्मिक आदमी व्यापार त्याग दे; हम कहते हैं, परिवार त्यागना नहीं है, परिवार ठीक रखना है, निर्मल रखना है, सात्विक रखना है, सत्यनिष्ठ रखना है। इसी तरह हम ये नहीं कहते कि कर्म त्याग दो। हम कहते हैं, सम्यक कर्म करना है। क्योंकि कर्म का त्याग तो हो ही नहीं सकता। तो सही कर्म करना है, कर्म त्यागना नहीं है।
उसी तरह हम ये कैसे कह दें कि राजनीति त्यागनी है? त्यागनी नहीं है; सही राजनीति करनी है। कुरुक्षेत्र के मैदान पर श्रीकृष्ण क्या कर रहे हैं? क्या वो राजनीति नहीं है? पर वो उच्चतम राजनीति है, शुद्धतम राजनीति है। उसी राजनीति से गीता तुम्हें मिल गई।