अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।
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प्रश्नकर्ता: ये जो राजनीतिक शुद्धिकरण की हम बातें करते हैं, या हम सोचते हैं कि एक राजनीतिक पक्ष ऐसा आना चाहिए जो समाज की सोचता हो, या वो सोचता हो। क्या जो सत्य की खोज करते हैं, उनको इस दिशा में सोचना चाहिए या नहीं सोचना चाहिए? क्योंकि राजनीतिक पक्ष का हमारे सामाजिक जीवन पर और हमारे घरेलू-आर्थिक जीवन पर बड़ा असर पड़ता है। यहाँ तक कि हम जहाँ पर रहते हैं, आसपास का माहौल काफ़ी ख़राब होता है उन चीज़ों से। यहाँ तक कि हमें मतलब ऐसा कह सकते हैं, कि हमें अपनी निजी ज़िंदगी भी जीने में कई बार काफ़ी कठिनाई आती है।
तो क्या इस दिशा में कभी सोचना चाहिए, या ये हमारा काम ही नहीं है?
आचार्य प्रशांत: वो अपने आप होगा। आप उसको रोक नहीं पाएँगे, उसकी उपेक्षा नहीं कर पाएँगे। आप जिसे राजनीति कहते हैं, या जिन्हें राजनेता कहते हैं, उनका असर आपके जीवन पर कई तरीके से पड़ता है। सिर्फ़ इसी तरीके से नहीं कि वो सड़क, बिजली, पानी के लिए ज़िम्मेदार होते हैं, वैसे तो पड़ता ही है, अन्यथा भी कई तरीकों से वो आपके जीवन को प्रभावित करते हैं।
तो जब आदमी जागृति की ओर बढ़ने लगता है, तो अपने माहौल की तरफ़ भी बड़ा सजग होने लगता है। वो कहता है, माहौल में ऐसा कुछ क्यों रखूँ जो मुझे कुत्सित करता हो, गंदा करता हो? और अगर माहौल में राजनेता भी शामिल हैं, तो फिर वो राजनेताओं में भी जो श्रेष्ठतम होगा, उसको ही चुनना चाहेगा। इसी तरीके से जिसको आप आदर्श बनाते हैं, वो आपको बहुत दिशाओं से प्रभावित कर ले जाता है। और जब आप इस बात के प्रति ज़रा चिंतित होने लगते हैं कि समाज में जागृति आनी चाहिए, तो फिर आप इस बात को लेकर भी सजग हो जाते हैं कि समाज के जो नेता हैं, वो ठीक लोग ही होने चाहिए।




