अहंकार मनुष्य की मूल समस्या है। हम ज्ञान समझते हैं पर उस पर चल नहीं पाते क्योंकि अहंकार को अपनी पहचान के लिए दूसरों की आवश्यकता है। परिवार, समाज, विचारधारा से हम सौदा करते हैं - अपनी स्वतंत्रता बेचते हैं। सच्चा प्रेम स्वयं को और दूसरों को मुक्त करना है, न कि बंधन में रखना। ईमानदारी से अपने झूठ को देखना ही सत्य है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आई एम सुलग्ना देव फ्रॉम एनआईएफटी, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलॉजी। सो, आई हैव अ क्वेश्चन दैट वी ऑफन अंडरस्टैंड व्हाट इज़ राइट? बट इंटेंटिवली, ऑर येट इन डेली लाइफ़, वी स्टिल एक्ट आउट ऑफ फियर ऑर कंपैरिजन, ऑर वी आस्क आउट फॉर, यू नो, वैलिडेशन। सो, माय क्वेश्चन इज़, हाउ डज़ वन ब्रिज द गैप बिटवीन हाउ टू लीव इट और हाउ टू ओवरकम दैट? एंड व्हाट इज़ द ट्रुथ बिहाइंड इट?
आचार्य प्रशांत: गिव मी एन एग्जांपल वेयर दिस हैपेंस, टू मेक इट मोर इंटिमेट। हम तो हिंदी में बात करने वाले थे, क्या हो गया?
प्रश्नकर्ता: मैं ये पूछना चाहती हूँ कि हम अपने डेली लाइफ़ में काफ़ी हद तक ये अंडरस्टैंड करते हैं, समझते हैं कि हमारे लिए क्या सही है और क्या सही हो सकता है, बट फिर भी हम ख़ुद को कंपेयर करने लगते हैं या फियर होता है, डर बैठ जाता है, या वी आस्क आउट फॉर वैलिडेशन कि अगर कोई दूसरा, हम आस्क आउट करते हैं कि हम सही हैं कि गलत हैं, एंड देन वी स्टार्ट टू वर्क। एंड दैट इज़ माय क्वेश्चन कि हाउ टू ओवरकम दैट, और इज़ दैट अ राइट वे टू गो, लाइक दैट? और व्हाट इज़ द ट्रुथ बिहाइंड इट?




