
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आई एम सुलग्ना देव फ्रॉम एनआईएफटी, नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलॉजी। सो, आई हैव अ क्वेश्चन दैट वी ऑफन अंडरस्टैंड व्हाट इज़ राइट? बट इंटेंटिवली, ऑर येट इन डेली लाइफ़, वी स्टिल एक्ट आउट ऑफ फियर ऑर कंपैरिजन, ऑर वी आस्क आउट फॉर, यू नो, वैलिडेशन। सो, माय क्वेश्चन इज़, हाउ डज़ वन ब्रिज द गैप बिटवीन हाउ टू लीव इट और हाउ टू ओवरकम दैट? एंड व्हाट इज़ द ट्रुथ बिहाइंड इट?
आचार्य प्रशांत: गिव मी एन एग्जांपल वेयर दिस हैपेंस, टू मेक इट मोर इंटिमेट। हम तो हिंदी में बात करने वाले थे, क्या हो गया?
प्रश्नकर्ता: मैं ये पूछना चाहती हूँ कि हम अपने डेली लाइफ़ में काफ़ी हद तक ये अंडरस्टैंड करते हैं, समझते हैं कि हमारे लिए क्या सही है और क्या सही हो सकता है, बट फिर भी हम ख़ुद को कंपेयर करने लगते हैं या फियर होता है, डर बैठ जाता है, या वी आस्क आउट फॉर वैलिडेशन कि अगर कोई दूसरा, हम आस्क आउट करते हैं कि हम सही हैं कि गलत हैं, एंड देन वी स्टार्ट टू वर्क। एंड दैट इज़ माय क्वेश्चन कि हाउ टू ओवरकम दैट, और इज़ दैट अ राइट वे टू गो, लाइक दैट? और व्हाट इज़ द ट्रुथ बिहाइंड इट?
आचार्य प्रशांत: क्या नाम है आपका?
प्रश्नकर्ता: सुलगना देव।
आचार्य प्रशांत: आओ, (श्रोता को बुलाते हैं)। ठीक है, ऐसे बंदूक रख दो (अपने सर में बंदूक रखने का अभिनय करने को कहते हैं)। आप मुझे कुछ-कुछ समझाइए, जो सही हो, आपके ही क्षेत्र से संबंधित। आप जो भी पढ़ाती हैं। आप क्या पढ़ाती हैं?
श्रोता: एनस्थीसिया एंड क्रिटिकल केयर।
आचार्य प्रशांत: एनस्थीसिया। तो आप मुझे बताइए कि ज़्यादा एनस्थीसिया देने से आदमी मर जाता है?
श्रोता: जी।
आचार्य प्रशांत: ठीक है। इन्होंने बताया और मुझे बात समझ में आ गई। इन्होंने सारी केमिकल इक्वेशंस दिखा दीं, केस स्टडीज़ दिखा दीं। आप अपने क्षेत्र की विदुषी हैं, अनुभव भी है, जानती हैं; किताबें हैं, ज्ञान है। बता दिया मुझे। ठीक है? बता दिया आपने। क्या बता दिया? ऐसा-ऐसा होता है। अब तुम (अभिनय करते हुए श्रोता) बोलो कि एनस्थीसिया से तू बाद में मरेगा, मैं अभी मार दूँगा।
श्रोता: एनस्थीसिया से आप बाद में मरेंगे, पहले मैं मार दूँगा।
आचार्य प्रशांत: ठीक है। मैं सच को मानूँ या अपनी जान बचाऊँ?
श्रोता: जान बचाएँगे।
आचार्य प्रशांत: समझ में आया, हम सच क्यों नहीं मानते। ये तो पता है कि आप जो बता रही हैं, वो बात ठीक है, बिल्कुल। पर यहाँ लोग खड़े कर रखे हैं, जो कह रहे हैं कि सच वग़ैरह तो ठीक है, हम तुमको अभी इतनी तकलीफ़ दे देंगे कि सब भूल जाओगी। पर आप अपने सवाल में उनका ज़िक्र कहीं नहीं कर रही हैं। आप कह रही हैं कि जैसे समस्या आपके और ज्ञान के बीच में हो। मैं आप हूँ और आप ज्ञान हैं। आप एनस्थीसिया वग़ैरह, आप मान लीजिए जो वृहत क्षेत्र है ज्ञान का उसकी प्रतिनिधि हैं। आप ज्ञान हैं। मैं कौन हूँ? आप हूँ। ठीक? सवाल में किन दो की बात कर दी गई? कि ज्ञान रहता है, मैं फिर भी डरी रहती हूँ और मैं गलत काम कर लेती हूँ। ज्ञान रहता है, मैं फिर भी डरी रहती हूँ, मैं गलत काम कर लेती हूँ।
मैं हूँ कौन? अहंकार। मैं अहंकार हूँ, मेरी वैसे ही साँस रुकी रहती है, मुझे पता है हूँ तो मैं नकली। तो हर समय मुझे यही ख़तरा रहता है कि कहीं मैं मर न जाऊँ। हर आदमी को यही रहता है न, कोई नुकसान न हो जाए, कहीं मर न जाऊँ। मरना माने नुकसान होना; वो जो आख़िरी डेथ होती है, वो सबसे बड़ा नुकसान होती है। लेकिन जो माइक्रो लॉसेस हैं, वो लगातार होते रहते हैं, वो भी मौत जैसे ही हैं; कुछ टूट गया, कुछ छूट गया, कुछ नुकसान हो गया।
एक तो मुझे हर समय वैसे ही ये लगा रहता है कि कुछ नुकसान न हो जाए। मैं तो अहंकार हूँ। ये ज्ञान है, ज्ञान बड़ा अच्छा लगता है। बढ़िया-बढ़िया बातें बताते हैं, सुनने में अच्छी लगती हैं। तर्क से समझ में भी आती हैं। बुद्धि राज़ी भी हो जाती है, हाँ, जो बोला जा रहा है, वो तो ठीक ही है भाई। पर ये नहीं बताया कि पीछे किसको खड़ा कर रखा है बंदूक लेकर के।
अगर मैं अहंकार हूँ, तो मैंने पीछे किसको खड़ा कर रखा होगा बंदूक लेकर? आप बताइए। कोई भी किसी को क्यों खड़ा करेगा पीछे बंदूक लेकर के? कोई क्यों खड़ा करेगा?
श्रोता: स्वार्थ।
आचार्य प्रशांत: कुछ मिल रहा होगा इससे, तभी मैंने… (आ जाओ, फिर से आ जाओ, खड़े हो जाओ।) ठीक है? कुछ इसको इनको नाम दे देते हैं। क्या नाम दे दें? और कोई बढ़िया सा नाम? कुछ तो नाम बताओ इनके लिए बढ़िया। तुम्हारा नाम क्या है?
श्रोता: विनय।
आचार्य प्रशांत: विनय डकैत। अब ठीक है? जैसी दुनिया है हमारी। तो इनको खड़ा कर रखा है। मैं क्यों बर्दाश्त करूँगा किसी को ऐसे खड़ा करना? बोलो।
श्रोता: स्वार्थ।
आचार्य प्रशांत: स्वार्थ। मैं अहंकार हूँ, ग़ौर से बताना, मेरा क्या स्वार्थ हो सकता है इसको यहाँ खड़ा करना? मेरे पास कौन-सी चीज़ नहीं है, जो मुझे इससे मिल रही होगी? सबसे पहली चीज़, जो मुझ में गायब है, कमी है, मिसिंग है, वो क्या है? एग्ज़िस्टेंस, एग्ज़िस्टेंस, एग्ज़िस्टेंस। अहंकार कौन-सी तीन चीज़ें बोलता है? आई एग्ज़िस्ट, आई डिज़ायर, आई एक्ट। आई एग्ज़िस्ट, आई डिज़ायर, आई एक्ट। और हैं तीनों ही चीज़ें झूठ, क्योंकि न तो वो एग्ज़िस्ट करता है, न उसकी डिज़ायर्स उसकी अपनी हैं, न उसका एक्शन उसका अपना है, है न? तो उसको अपनी हस्ती ही किसी और से लेनी पड़ती है। लेनी पड़ती है न? अपनी कामना-पूर्ति के लिए भी वो दूसरों पर आश्रित है। है न?
तो ये कौन होगा? ये इनसे मुझे क्या मिल रहा होगा? ये वो हैं जो मुझे मेरी हस्ती दे रहे हैं। चूँकि ये मुझे मेरी हस्ती दे रहे हैं, इसीलिए मैंने इन्हें हक़ दे दिया है यहाँ मेरी कनपटी पर बंदूक रखने का। ये एक ट्रेड है। तुम मुझे हस्ती दो, मैं तुम्हें माथा दूँगा। इनसे मुझे मेरी आइडेंटिटी मिल रही है, कोई छोटी-मोटी चीज़ नहीं। ईगो की अपनी तो कोई आइडेंटिटी है ही नहीं। तो आइडेंटिटी किससे लेती है? दुनिया से लेती है। जो उसे आइडेंटिटी दे, वो उसके लिए बहुत बड़ा हो गया। वो इतना बड़ा हो गया कि उसको बंदूक लगाने का हक़ मिल जाएगा, कलाई मरोड़ने का हक़ मिल जाएगा। मरोड़ो, मरोड़ो। नहीं तो मैं इसे झटक के हटा न दुने एक बार में।
निश्चित रूप से यहाँ कोई सौदा चल रहा है। आपके सवाल में वो सौदा छुपा हुआ है, ये बेईमानी है छोटी-सी। सवाल में बस ये बता दिया कि ज्ञान और मैं; ज्ञान आता है, अच्छी-अच्छी बातें होती हैं, मैं समझ जाती हूँ, पर उन बातों पर चल नहीं पाती हूँ, मैं तो बड़ी मासूम हूँ। ये डकैत, इसका तो कुछ बताया ही नहीं। ये वो है जिससे मुझे पहचान मिली है। चूँकि इसे पहचान मिली है, इसीलिए इसका हक़ हो गया मेरे ऊपर। ये वो है जो मेरी कामनाओं की पूर्ति करता है, मुझे सुख-सुविधाएँ देता है। चूँकि ये सब करता है, तो इसीलिए इसको अधिकार मिल गया मेरे ऊपर। और ये बोलता है, ज्ञान वग़ैरह तो ठीक है, पहले मेरी सुन।
अब आपको अपनी ज़िंदगी में झाँककर देखना होगा कि कौन-सी ताक़तें हैं, कौन-से लोग हैं, जिनसे आपको नाम और पहचान मिल रही है। वही हैं, जिनके कारण ज्ञान की ओर नहीं बढ़ पा रहे। अब आपको अपनी ज़िंदगी में देखना होगा कि डिज़ायर्स कहाँ हैं और कौन-से लोग आपकी डिज़ायर्स पूरी कर सकते हैं या बाधित कर सकते हैं। वही दिशा है, जो आपको सही ज़िंदगी जीने नहीं दे रही। नहीं तो कोई क्यों रुकेगा? कोई किसी के ऊपर हावी कैसे हो सकता है, जब तक वो व्यक्ति ख़ुद अपनी सहमति, अनुमति, कंसेंट न दे? कंसेंट तो बड़ा क़ीमती शब्द होता है न। छोटे-मोटे बातों में भी हम बोलते हैं कि कंसेंट ज़रूरी है।
तो ये तो एग्ज़िस्टेंशियल क्राइसिस है। कोई मेरी ज़िंदगी के केंद्र पर सवार हुआ जा रहा है, निश्चित रूप से उसमें मेरी छुपी कंसेंट शामिल है। मजबूर नहीं हूँ मैं, विवश नहीं हूँ। ये कहना गलत होगा कि मैं क्या करूँ? मैं तो बेचारी हूँ, दूसरे हावी हो जाते हैं। दूसरे हावी नहीं हो जाते; हमने उन्हें हावी होने की अनुमति दी है। ये एक बार्गेन है। तुम मेरी आज़ादी भले ही ले लो, पर मुझे नाम और पहचान दे दो, प्लीज़। तुम मेरा सच ले लो, तुम मेरा ज्ञान रौंद डालो, लेकिन मेरी सुख-सुविधाएँ छीननी नहीं चाहिए। ओढ़-रोशनी सब मेरी ज़िंदगी से छीन लो, लेकिन मेरी कामनाएँ पूरी करते रहो, प्लीज़। ये होता है।
कभी कोई बोले कि मुझे बात समझ में नहीं आती। मान लो अभी यहाँ पर बात हुई, कभी कोई बोले, बात समझ में नहीं आती। मुश्किल है। पहले तो गीता ने बहुत सरल करके बोली है; उसके बाद मैंने आपकी भाषा में, आपके समय में, और सरल करके बता दी है। ऐसा नहीं है कि समझ में नहीं आती। समझ को स्वीकार नहीं करना चाहते, क्योंकि स्वार्थ पर आँच आती है।
उसके भी आगे और लोग होते हैं, वो कहते हैं, हमें तो आती है समझ में। समझ में आती है, पर उसको जी नहीं पाते। समझ तो अपने आप, स्वतः, तत्काल ज़िंदगी बन जाती है। आप अगर कह रहे हो कि समझ लेते हैं, पर जी नहीं पाते, तो आप झूठ बोल रहे हो। आप झूठ बोल रहे हो, झूठ इसलिए बोल रहे हो क्योंकि समझे होते, तो स्वार्थों को लात मार दी होती। उन स्वार्थों से आपको कुछ मिल ही नहीं रहा है।
कमी समझ की नहीं होती, कमी स्वीकार की होती है। आप स्वीकार ही नहीं करना चाहते कि आप समझ चुके हो। क्योंकि अगर समझ गए, तो अब इसको क्यों खड़ा कर रखा है? वो क्या करेगा? उसको हटाओगे, भगाओगे, तो अधिक से अधिक क्या बोलेगा? क्या बोलेगा? तुम्हारी हस्ती छीन लूँगा। अब फिज़िकल हस्ती तो कोई छीन नहीं सकता, संविधान है, क़ानून है, पुलिस है। वो आपकी साइकोलॉजिकल हस्ती छीनते हैं। वो आपकी जो मनोवैज्ञानिक पहचानें हैं, जो इनर आइडेंटिटीज़ हैं, वो छीनते हैं।
छीनने दो न, छीनने दो। क्यों स्वार्थों का सौदा किया हुआ है? क्यों घुटने टेके हुए हैं? क्यों बिना बात की मजबूरी पकड़ी हुई है? सच और आज़ादी से बड़ा क्या होता है? उनको बेच के कुछ भी हासिल कर लो, तो क्या हासिल कर लिया है? उसके बाद कहते हो, नहीं, सारी अच्छी-अच्छी बातें तो ठीक हैं। गीता में जो लिखा है, वो तो ठीक है। सर, आपने अभी बातें बढ़िया बताई। लेकिन क्या है न, मैं लाइफ़ में इंप्लीमेंट नहीं कर पाती।
दैट्स नॉट अ सिचुएशन, दैट्स अ डिसीजन। ये फ़ैसला किया है कि ये चीज़ ज़िंदगी में उतरने नहीं देंगे, क्योंकि उतरे तो…।
बात आ रही है?
और वो पीछे खड़ा हो के आपको धमका और रहा है बार-बार कह रहा है कि हमने तुम्हें नाम, पहचान और ये सब दिया है। हमने दिया है, तो हम छीन भी सकते हैं। हमारे दम से हो तुम, मौत दे देंगे। स्वार्थ-डकैत की दी मौत बड़ी कसाईनुमा होती है। और आप काँप रहे हो। क्या करना है? चुपचाप आगे बढ़ जाओ। उसको बोलो, कर ले जो कर सकता है। जो असली है, वो तू छीन नहीं सकता। जो नकली है, वो तू छीन ले। वो तो वैसे भी नकली है, तो मेरा बिगड़ा क्या। छीन ले जो छीन सकता है; जो कुछ छीन सकता है, वो फालतू का ही होगा। जो फालतू का था, वो तूने छीन लिया, मेरा बिगड़ा क्या। ले ले। “भला हुआ मेरी मटकी फूटी, अब मैं पनिया भरन से छूटी।”
समझ में आ रही है बात? ये ले जाओ जो ले जा सकते हो।
इंसान वही है, जिसको एक बार सच्चाई दिख गई तो उससे मुँह नहीं मोड़ता। देखे को अनदेखा नहीं करता, सुने को अनसुना नहीं करता, समझे को अनसमझा नहीं करता। जो ऐसा करे, फिर बेईमानी का कोई इलाज नहीं, क्योंकि बेईमानी भूलना नहीं एक फ़ैसला है।
और आपके फैसले आपके हैं, उन्हें आपके अलावा कोई बदल नहीं सकता। आप अगर फ़ैसला कर ही लो कि आपको सच से ज़्यादा स्वार्थ प्यारा है, तो फिर आपका फ़ैसला, आपकी ज़िंदगी, कोई क्या करेगा? बस ये है कि दुगनी बेईमानी मत करना। ये मत कहना कि मैं मजबूर हूँ, मजबूरी वग़ैरह कुछ नहीं होती। मजबूरी वग़ैरह कुछ नहीं होती, सौदे होते हैं सौदे। मत बिको। कम से कम यहाँ पर आप लोग जो बैठे हुए हो, आप बहुत प्रिविलेज्ड लोग हो। बहुत प्रिविलेज्ड लोग हो। ये दो इंस्टिट्यूशंस एक तो ये मजज़ेदार बात देखो, क्या गज़ब ये जोड़ी बनी है। इससे अध्यात्म के बारे में कुछ पता चलता है।
क्या?
अध्यात्म अपने आप में कोई फील्ड नहीं है? इट्स द फील्ड दैट इंटीग्रेट्स ऑल फील्ड्स। इट्स द फील्ड दैट सेट्स द फाउंडेशन ऑफ ऑल फील्ड्स। नहीं तो ये दोनों फील्ड्स कैसे इंटीग्रेट होंगे? मेडिकल सूचर्स वग़ैरह बन सकते हैं, उसमें आप कुछ फैशन कर दो तो… अरे, वो जो टाँका सिलने के धागे होते हैं, तो ये मेडिकल कॉलेज में तो वही धागे चलते हैं। बस और तो यहाँ तो कोई धागा होता नहीं, आपके तो इसमें भी निफ्ट धागे जैसा ही है। कोई कन्वर्जेंस हमें आमतौर पर दिखाई नहीं देगी मेडिकल टेक्नोलॉजी और फैशन टेक्नोलॉजी में, पर कन्वर्जेंस है। दे शेयर अ फंडामेंटल कॉमन ग्राउंड। वही दर्शन है, वही अध्यात्म है। आ रही है बात समझ में?
आप लोग भी अगर मजबूरी का रोना रोने लगे, तो फिर तो आम आदमी क्या करेगा? जो लोग इस बैकग्राउंड से आ रहे हैं, आपको ये लगता होगा कि अरे, हमें भी तो तकलीफ़ें हैं। हमें भी तो जॉब की प्रॉब्लम्स होती हैं। हमें भी तो पैसा कम पड़ता है। अपनी तो देख रहे हो, पर दुनिया की देखो, भारत की देखो।
व्हेन इट कम्स टू द ट्रुथ, डोंट कंप्रोमाइज। आपके पास तो कोई दलील भी नहीं होगी देने के लिए। आप क्या बोलोगे, कैसे बोलोगे कि मजबूर थे? कहाँ मजबूरी है? पढ़े हो, लिखे हो, जवान हो, स्वस्थ हो, जानकार हो, जागरूक हो। आप कैसे बोलोगे कि मैं तो मजबूर थी, तो इसलिए मुझे दबना पड़ा, झुकना पड़ा, कई बार तो बिकना पड़ा? कैसे बोलोगे? मत करना। इसलिए बोल रहा हूँ मत करना, क्योंकि बहुत होता है। अभी लग रहा होगा कि ऐसे कोई क्यों दबेगा, हम दबने वाले नहीं। सब दब जाते हैं। मत दबना।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, नमस्कार एवरीवन। मेरा नाम स्वरूप शुभंकर है और मैं आईएमएस में फोर्थ ईयर एमबीबीएस छात्र हूँ। मेरा सवाल आपसे ये है कि भारत में एक व्यक्ति की स्वतंत्रता बहुत दब गई है और जीवन के अहम मुद्दे जैसे कि करियर और विवाह हम स्वतंत्र रूप से ख़ुद नहीं ले पा रहे हैं, बल्कि समाज और परिवार के द्वारा तय किए जा रहे हैं। तो हम ख़ुद इस पर अपना तय कैसे कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: आप अकेली मजबूर नहीं हैं। उन्हें माइक दो। मैं थोड़ा परखूँ तो कि मेरी बात उन्होंने समझी कितनी थी सुलगना। ये है वो गड़बड़ वाला चक्र। जहाँ से शुरू हुए थे, देखो, वहीं आ गए। अब ये कह रहे हैं कि सब दबा देते हैं। स्वतंत्रता व्यक्ति की छीन ली जाती है। करियर हो, कोई फ़ैसला हो, शादी-ब्याह हो, प्यार हो, दुनिया हम पर चढ़ी रहती है। हम बड़े मजबूर हैं। जवाब दीजिए, इनको जवाब दीजिए। बोलिए, बोलिए।
प्रश्नकर्ता: आपने बोल ही दिया।
आचार्य प्रशांत: मैंने आपको बोला था न, वही इनको बोल दीजिए।
प्रश्नकर्ता: बहुत लंबा हो जाएगा।
आचार्य प्रशांत: आप शुरू करो, जहाँ रोकना होगा मैं रोक दूँगा। चलो, बोलो। जब कोई कहे कि दुनिया मुझ पर चढ़ी हुई है, मेरी स्वतंत्रता का हनन कर रही है, दबाव बना रही है, विवश कर रही है, तो क्या बोलें उसको? बोलो, बोलो, ज़ोर से बोलो। पता तो है।
प्रश्नकर्ता: सर, ट्रेड चलता है। ट्रेड होता है वो बेसिकली।
आचार्य प्रशांत: लंबा नहीं हुआ। इतनी-सी बात थी, सब समझ में आ रहा है, अब पीछे मत हटना। ये जो भी ट्रेड-डील है, इससे बाहर निकलो। आ गई बात समझ में?
प्रश्नकर्ता: जी, आचार्य जी। हम जब जीवन में होते हैं, तब परिवार को लेकर चलना…
आचार्य प्रशांत: लेकर चलना माने क्या होता है? आ गया मुहावरा, लेकर चलना। कैसे लेकर चलना? कंधे पर लेकर चलना? कैसे लेकर चलते हो?
प्रश्नकर्ता: उनकी बातों को भी ध्यान में रखना।
आचार्य प्रशांत: ध्यान में रखना माने क्या? मुहावरों में मत उलझो। जलेबी बना रहे हो मुहावरों की, लेकर चलना, ध्यान में रखना, ये सब क्या होता है?
प्रश्नकर्ता: सबके मन का ख़याल रखना।
आचार्य प्रशांत: अरे, उसका क्या मतलब है? मन कहाँ है? मन दिखाओ, ख़याल कैसे रखते हो? पॉलिश करते हो मन को? क्या करते हो? जो बात सीधी है, उसको सीधी क्यों नहीं बोल सकते?
प्रश्नकर्ता: उनकी बात सुनना।
आचार्य प्रशांत: सुनना तो सुन लो, सुननी ही तो है। दब क्यों रहे हो? जो बात असली है, उसको वैसे बोलो। बात को, असली बात को नहीं बोल पा रहे, क्योंकि जो असली है, वो अगली है। जो असली है, वो अगली है, इसलिए बोल नहीं रहे साफ़-साफ़।
प्रश्नकर्ता: ख़ुद की स्वतंत्रता को फिर…।
आचार्य प्रशांत: अपने को हटाओ, हमारी तो स्वतंत्रता है ही नहीं। उनके साथ जो रिश्ता है, वो बताओ न जिसको बोल रहे थे कि लेकर चलना पड़ता है, श्रवण कुमार हूँ। लेकर चलना पड़ता है, माने क्या? माने क्या? मैं नहीं कह रहा, लेकर चलना वग़ैरह बुरा है। मैं बस जानना चाहता हूँ, कि घरवालों को लेकर चलना माने क्या?
प्रश्नकर्ता: उनकी इच्छा का सम्मान करना।
आचार्य प्रशांत: इच्छाओं का सम्मान करना माने क्या? कर दिया सम्मान।
प्रश्नकर्ता: हमारे डिसीज़न्स में उनकी भी सहमति हो।
आचार्य प्रशांत: उनकी भी सहमति हो, और नहीं है सहमति उनकी, तो? तो डिसीज़न नहीं लेना। है न? तो तुम सहमति नहीं माँग रहे, तुम अनुमति माँग रहे हो। सही शब्द का इस्तेमाल करो। सहमति अलग चीज़ होती है, अनुमति बिल्कुल अलग चीज़ होती है। तो कुल मिलाकर के ये कह रहे हो कि जो कोई और बोलेगा वो करूँगा। इतनी-सी बात थी। इतनी-सी बात है न?
कोई भी कभी भी किसी से भी क्यों दबता है? बताओ। हटाओ कि पुत्र का माँ-बाप के प्रति हार्दिक प्रेम है। वृद्धाश्रम भरे पड़े हैं। जब माँ-बाप से कोई स्वार्थ नहीं रह जाता, तो माँ-बाप वहाँ नज़र आते हैं। हटाओ कि ये प्रेम की बात है कि माँ-बाप से दबना पड़ता है। ये बताओ, पैतृक जायदाद कितनी है? बस यही है, और कुछ नहीं है। माँ-बाप अति ग़रीब हों, अनपढ़ हों, कुछ न करते हों, और तुम मोटा पैसा कमाते हो, तब कहोगे कि घरवालों को भी तो लेकर चलना पड़ता है? तब कहोगे?
ये प्यार नहीं है। ये प्यार नहीं है, ये स्वार्थ है। और इसमें तुम जिसकी आज्ञाओं का पालन कर रहे हो; इच्छाओं का सम्मान नहीं, आज्ञाओं का पालन, तुम जिसकी आज्ञाओं का पालन कर रहे हो न, उसका भी अहित है। उसका भी अहित है। कोई तुम्हें दबा रहा हो, तुम दब जाओ, तुमने अपने साथ तो गलत करा ही, जो तुम्हें दबा रहा था, तुमने उसके साथ भी गलत करा।
ज्ञानियों ने कहा है कि जो मुक्त होता है, स्वतंत्रता की बात कर रहे थे न, जो मुक्त होता है, वो अकेला नहीं मुक्त होता। जब वो मुक्त होता है, तो उसके पीछे-पीछे उसका कुल-कुटुंब सब मुक्त हो जाता है। ये है असली प्रेम। असली प्रेम ये नहीं है कि मैं भी बंधन में रहूँगा और तुम भी बंधन में पड़े रहो। और मैं ज़रा-सा आज़ादी की तरफ़ बढ़ा और तुमने मुझे रोक दिया, तो मैं रुक भी जाऊँगा। चेहरे पर डर दिख रहा है। और डर हमेशा किसी ऐसी चीज़ को खोने का होता है, जो तुम्हारी है नहीं। जो चीज़ तुम्हारी है नहीं, उसका लालच क्यों करे बैठे हो? वो लालच ही तुम्हारा डर बन रहा है।
जो व्यक्ति स्वतंत्रता के विरोध में है, वो रोगी है। पूछो क्यों? क्योंकि मुक्ति स्वभाव है। जो स्वभाव में स्थित होता है, उसको बोलते हैं स्वस्थ-स्थित, अर्थात् स्वस्थ।
तो मुक्ति स्वास्थ्य है और तुम डॉक्टर हो, बनोगे। मुक्ति स्वास्थ्य है, तुम डॉक्टर हो। कोई अगर स्वास्थ्य के ख़िलाफ़ है, तो उसको क्या बोलेंगे? बीमार। और मुक्ति स्वास्थ्य है, तो जो स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ है, वो कौन है? वो बीमारी है।
डॉक्टर का बीमारी से क्या रिश्ता होना चाहिए? उसका इलाज करोगे या कहोगे कि आपकी आज्ञाओं का पालन कर रहा हूँ? तुम्हारे पास पेशेंट आएगा तो उसका इलाज करोगे या पेशेंट की आज्ञाओं का पालन करोगे? कुछ होगा उसको, कुछ उपचार देना है, दवाई लिखनी है। उसका पर्चा लिखने से पहले कहोगे, यदि आपकी अनुमति हो तो आपको ये दवाई लिखूँ? वो कह रहा है, “नहीं, मुझे लॉलीपॉप लिखो।” और तुम लॉलीपॉप लिख रहे हो, क्योंकि देखो, पेशेंट को भी तो लेकर चलना पड़ता है।
और बहुत ऐसे डॉक्टर घूम रहे हैं जो पेशेंट को ही ले चलते हैं। घूम रहे हैं न? हाँ तो वैसा डॉक्टर मत बनो। पेशेंट को लेकर नहीं चलना पड़ता। पेशेंट को अच्छा लगे कि बुरा लगे, उसका इलाज करना पड़ता है। और यही पेशेंट के प्रति तुम्हारा प्रेम है। वो बता रहा है तुम्हें, दिल उसका ख़राब है और कह रहा है, “मेरे घुटने की सर्जरी करो,” और तुम कर भी रहे हो। क्यों? क्योंकि स्वार्थ है पैसा मिलेगा। ये कैसे डॉक्टर हो तुम?
**भूलना नहीं, जो स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ है वो बीमार है। बीमार से अनुमति, सहमति नहीं माँगी जाती। बीमार से यदि प्रेम हो तो उसका उपचार करो, और प्रेम न हो तो दूरी बना लो। दो ही चीज़ें हो सकती हैं बीमार के साथ। और अगर ख़ुद उपचार नहीं कर पा रहे, तो किसी अच्छे डॉक्टर को रेफ़र कर दो।
प्रश्नकर्ता: शुक्रिया, आचार्य जी, नमस्ते।
आचार्य प्रशांत: अस्पताल आपका है और प्रैक्टिस मैं चमका रहा हूँ।
प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। मेरा नाम अखिलेश कुमार द्विवेदी है। मैं सोआ के बीटेक स्ट्रीम से बिलॉन्ग करता हूँ। सर, मेरा एक फॉलो-अप क्वेश्चन है फर्स्ट क्वेश्चन से। सर, आपने एक वर्ड मेंशन किया था कि अगर समझ गए तो बदल गए। अपने अहंकार को समझ गए, तो आप बदल गए।
आचार्य प्रशांत: आप बदलते हैं।
प्रश्नकर्ता: हाँ, बदलते हैं। क्या ये बदलना एक निरंतर विधि है? और कोई एक बिंदु है जिसके बाद आप एफर्टलेस हो सकते हैं, या फिर इट टेक्स कंटीन्यूअस एफर्ट टू बिकम एफर्टलेस?
आचार्य प्रशांत: प्रैक्टिकली, यस; एक्चुअली, नो। जब आगे-आगे बढ़ते जाते हो, सच के साथ जीने का अभ्यास गहरा हो जाता है, तो ये संभावना कम हो जाती है कि अब फिसलोगे। तो सीधे चलने के लिए, न फिसलने के लिए, एफर्ट कम लगाना पड़ता है। तो व्यवहारिक रूप से तुम कह सकते हो कि एफर्टलेस हो जाता है, व्यवहारिक रूप से। लेकिन टेक्निकली, एक्चुअली नो। फिसलने की संभावना कम हो सकती है; शून्य कभी नहीं होती।
कोई कितना भी आगे निकल गया हो, कभी भी फिसल सकता है। तुमने ज़िंदगी में हो सकता है पाँच सौ सही फैसले किए हों निरंतर, एक के बाद एक। तब भी हो सकता है कि पाँच सौ एकवाँ फ़ैसला तुम गलत कर दो। क्योंकि अहंकार, इसका जो कारण है न वो अहंकार के अस्तित्व से रिलेटेड है। अस्तित्व माने फिज़ियोलॉजिकल एग्ज़िस्टेंस। जिसको हम ईगो कहते हैं, दैट साइकोलॉजिकल सेल्फ वो हमारी फिज़ियोलॉजी से आता है।
तभी जब आपके खोपड़े पर कोई मार देता है हथौड़ा, तो अहंकार गायब हो जाता है कि नहीं? क्योंकि वो मटेरियल है, फिज़ियोलॉजिकल है। आप शराब पी लेते हो, तो सेंस ऑफ सेल्फ ऐसे-ऐसे वोबल करने लग जाती है कि नहीं? क्योंकि उसका रिलेशन इथेनॉल के मॉलिक्यूल से है। बात समझ में आ रही है ये? इसका मतलब ये है कि जब तक ये फिज़ियोलॉजी है, वो साइकोलॉजिकल एरर होने की प्रोबेबिलिटी बनी रहती है। क्योंकि अहंकार का संबंध इस फिज़ियोलॉजी से है। वो स्वयं मटेरियल नहीं है, पर एक विशिष्ट मटेरियल कॉन्फ़िगरेशन की पैदाइश है।
आपका जैसा ये पूरा शरीर है न, आप इवोल्यूशन के कॉम्प्लेक्स प्रोडक्ट हो। एक सिंपल प्रोडक्ट नहीं हो अमीबा जैसे या किसी और चीज़ जैसे। तो ये जो हमारी कॉम्प्लेक्स फिज़ियोलॉजी है, ईगो इसी से उठती है। और ये फिज़ियोलॉजी तो तुम कह दो कि तुम एनलाइटेंड हो गए, कुछ हो गए, बुद्ध हो गए, ये फिज़ियोलॉजी तो नहीं बदल जाएगी न। घुटना तो घुटना ही रहेगा और नाक तो नाक ही रहेगी। तुम हो गए महाज्ञानी, पर नाक तो नाक है न। माने शरीर तो नहीं बदल गया न। शरीर जब तक है, तब तक अहंकार की संभावना बनी रहेगी। क्योंकि शरीर और अहंकार सदा एक साथ चलते हैं।
तो प्रैक्टिकली,यस, एफर्टलेसनेस आ सकती है। लेकिन सावधान रहना, संभावना फिसलने की रहेगी, अंत तक रहेगी। तो तुम्हारे लिए अच्छा है कि तुम यही मानो कि बोथ प्रैक्टिकली एंड एक्चुअली द थिंग कॉल्ड एफर्टलेसनेस विल नेवर कम। इसका मतलब है कि जीवन सतत संघर्ष ही रहेगा, सतत संघर्ष रहेगा। ये जो तुम कह रहे हो कि एफर्टलेस हो जाएँ, वो हो पाना बड़ा मुश्किल होने वाला है। थोड़ा-सा एफर्ट सदा करना पड़ेगा, वो करते रहो, वही ईमानदारी है वही आध्यात्मिक साधना है।
और जब फँसे रहोगे, गड्ढे में गिरे रहोगे, तो बाहर आने के लिए तो बहुत ज़्यादा एफर्ट करना पड़ेगा। बाहर आ गए, तो भी थोड़ा एफर्ट तो जीवन भर करना ही पड़ेगा। और अच्छा है कि तुम सचेत रहो, सावधान रहो कि कभी भी फिसल सकते हो, ताकि एफर्ट करना बंद न कर दो। हम शारीरिक एफर्ट की बात नहीं कर रहे। हम इनर एफर्ट की बात कर रहे हैं, इनर एफर्ट इन द फॉर्म ऑफ कीपिंग द डिस्ट्रैक्शन अवे, सो दैट अटेंशन रिमेन्स।
प्रश्नकर्ता: मतलब, सर, हर टाइम ख़ुद को इंट्रोस्पेक्ट करना पड़ता है कि क्या?
आचार्य प्रशांत: नहीं, नॉट इंट्रोस्पेक्शन। ये वही बात हो गई जो उन्होंने कहा था कि “आई विल रिमूव मायसेल्फ।” वैसे ही कह रहे हैं, “आई विल इंट्रोस्पेक्ट।” तुम चोर को पुलिस बना रहे हो। तुम चोर को ही कह रहे हो, “गो एंड इंस्पेक्ट;” इंट्रोस्पेक्ट, इंस्पेक्ट, इंस्पेक्टर।” तुमने जो चोर है, कौन? अहंकार, उसको ही तो कह दिया है, “गो एंड इंट्रोस्पेक्ट।” वो क्या करेगा? ये इंट्रोस्पेक्शन की नहीं बात है, ये ईमानदारी की बात है।
सेल्फ ऑब्ज़र्वेशन रियल टाइम होता है, और इंट्रोस्पेक्शन एक फ़ेज़ लैग के बाद होता है। इंट्रोस्पेक्शन हमेशा डिलेड होगा। तुमने काम कर दिया, बाद में इंट्रोस्पेक्ट करोगे। हम बात कर रहे हैं त्वरित ईमानदारी की, दैट स्पॉन्टेनियस ऑनेस्टी। मुझे पता है अभी क्या हो रहा है, और मुझे नहीं पता होगा तो किसको पता होगा? क्योंकि कहाँ हो रहा है? यहाँ (मस्तिष्क की ओर इंगित करते हुए) हो रहा है। तो जब हो रहा है, ठीक तभी पता है, विदाउट अ गैप, विदाउट अ लैग। मुझे अभी पता है।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम रीत है। तो मेरा ये प्रश्न था कि बहुत लोग होते हैं कि कुछ लोग किसी आइडियोलॉजी में मानते हैं और कुछ लोग नहीं मानते। वो कुछ भी हो सकता है, लाइक रिलीजन, कास्ट, लाइक कुछ भी। तो कभी-कभी क्या होता है जो लोग मानते हैं उनके बीच में और जो लोग नहीं मानते उनके बीच में कॉन्फ्लिक्ट हो जाता है। तो वो क्यों होता है, और उसको प्रिवेंट कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: आई एम एक्स। मैं कौन हूँ? एक्स हूँ। एक्स एक आइडियोलॉजी भी हो सकती है। मैं कम्युनिस्ट हूँ। मैं कुछ भी हो सकता हूँ, सोशलिस्ट हूँ, एनीथिंग, इस्लामिस्टज़ हूँ, हिंदुत्ववादी हूँ। आई एम एक्स। एक्स कुछ भी हो सकता है। एक्स हटा दिया तो क्या हो जाएगा? “आई एम” गिर गया। उस बेचारे के पास जीने के लिए वो आइडियोलॉजी नाम की बैसाखी है। और तुम वो भी छीन लोगे तो वो लड़ेगा नहीं तुमसे?
ये आइडियोलॉजी वालों से बहुत सावधानी से बात किया करो, क्योंकि ये वो लोग होते हैं जिन्होंने अपनी टाँग यूँ मोड़ रखी होती है और यहाँ बैसाखी पकड़ रखी होती है। लँगड़े नहीं होते, ख़ुद ही टाँग मोड़ी भी नहीं होती; मोड़ के बाँध ली होती है। और यूँ बैसाखी पकड़ ली होती है, बोलते हैं बैसाखी हटी तो हम गिर जाएँगे। और दो आइडियोलॉजी आपस में कभी भी मेल खा नहीं सकतीं, क्योंकि सब आइडियोलॉजीज़, ले-दे के, कहानियाँ होती हैं, ट्रुथ तो कहीं होता नहीं। तो कोई भी दो आइडियोलॉजीज़ आपस में कभी पूरी तरह मैच नहीं कर सकतीं। विसंगत होंगी हमेशा।
तो अगर तुम्हारी आइडियोलॉजी ट्रुथ है, तुम्हारे अनुसार, तो तुम्हारे अनुसार दूसरे की आइडियोलॉजी अनिवार्य रूप से क्या होगी? फॉल्स होगी। नहीं तो लड़ोगे नहीं, तो क्या करोगे? तुम उसकी आइडियोलॉजी को फॉल्स बोलोगे, क्योंकि एक्सक्लूसिव होता है मामला यहाँ। तुम्हारी अगर आइडियोलॉजी सही है, तो उसकी आइडियोलॉजी को गलत होना पड़ेगा। कई बार तो एक आइडियोलॉजी दूसरी आइडियोलॉजी के विरोध में ही पैदा भी होती है। तो तुम्हारी आइडियोलॉजी सही है, तो उसकी गलत है। उसके अनुसार उसकी सही है, तुम्हारी गलत है। तो अब लड़ोगे नहीं, तो क्या करोगे? मामला हस्ती का है, क्योंकि अगर उसकी आइडियोलॉजी सही है, तो मेरी गलत हो गई। कि मेरी गलत हो गई, तो मैं तो मर गया, तो उसको मारना ज़रूरी है।
ये एक ऐसा क्लैश ऑफ वैल्यूज़ बनता है जिसमें जो दुश्मन है, उसको जीने की इजाज़त भी नहीं दी जाती। तेरी हस्ती भी अपराध है, क्योंकि तेरी मान्यता मेरी मान्यता के ख़िलाफ़ है, मैं तुझे मार के ही दम लूँगा। जो जितना ज़्यादा आइडियोलॉजिकली ऑब्स्टिनेट होगा, वो आदमी उतना वहसी होगा दरिंदा होगा, ख़तरनाक होगा।
सत्य कोई विचारधारा नहीं होता, सत्य कोई सिद्धांत नहीं होता। सत्य होता है स्वयं को देखना।
सत्य का संबंध किसी ऑब्जेक्ट से नहीं है; सब्जेक्ट से है, स्वयं से है। सत्य माने ये नहीं कि मैं यहाँ से सत्य ढूँढ़ लाया, ये पकड़ लाया, फलानी चीज़ सत्य हो गया। सत्य माने, मैं जो हूँ न, मैं, मैं ही सबसे बड़ा झूठ हूँ। ये लगातार देखते रहना ही सत्य है। ठीक है? आइडियोलॉजी वाले तो एक-दूसरे का सिर फोड़ेंगे ही फोड़ेंगे।
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद।