
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम अमन चौहान है। तो बेसिकली, एज अ स्टूडेंट, वी इंटेंड टू सप्रेस आवर फीलिंग्स। हम ये सोचते हैं, लॉन्ग टर्म में सोचते हैं, कि हम अभी के टाइम अपनी जो फीलिंग्स हैं, जो भी हैं, उनको हम सप्रेस करेंगे। लेट्स से, पैशन में, रिलेशनशिप में, किसी भी चीज़ में, तो हम अपनी फीलिंग्स को सप्रेस करने की कोशिश करते हैं और किसी बिग एम्स की तरह हम बढ़ते रहते हैं। लेकिन फिर उस चक्कर में, जब कॉन्फ्लिक्ट तो चलता ही रहता है हमारे इंटरनल, एक होलोनेस क्रिएट हो जाती है। और फिर वो दुखी मन से, लोनलीनेस में, अकेले-अकेले हम वही करते रहते हैं फिर।
आचार्य प्रशांत: मन करता है कि मज़े करें, लेकिन प्रेशर रहता है कि पढ़ाई करो। यही कुल मिलाकर कह रहे हो न? फीलिंग कह रही है कि चलो मज़े करते हैं, लेकिन सोसाइटी, रिस्पॉन्सिबिलिटी, डिसिप्लिन, यह सब कह रहे हैं कि चलो पढ़ाई करो।
यहाँ तक तो ठीक बताया कि ऐसा होता है, पर जो प्रॉब्लम स्टेटमेंट ही है उसके डिस्क्रिप्शन में ही एक छोटा-सा एरर हो गया है। एरर यह है कि यहाँ तक ठीक बता दिया कि रिस्पॉन्सिबिलिटी, ड्यूटी, डिसिप्लिन यह सब तो बाहर से आप पर इनफोर्स होता है। ये सब तो बाहरी चीज़ें हैं कि, "हाँ, नहीं, आपको अपने फ्यूचर का ख़याल रखना है, थोड़ा एम्बिशस बनिए, कुछ करके दिखाइए।" यह सब आपको बाहर से आ गया, तो आप कह रहे हो कि इसका पालन करना ही पड़ता है। पर जो दूसरी चीज़ थी, उसके बारे में आपने कह दिया कि वह बाहर से नहीं आई है, वह तो अपनी है।
इन्होंने जिस शब्द का प्रयोग किया, वो था, "हमारी फीलिंग्स"। हमारी फीलिंग्स। तो टास्क, टारगेट्स, रिस्पॉन्सिबिलिटी, डिसिप्लिन, इसको तो हम मान रहे हैं। अभी मैं आपका जो प्रॉब्लम स्टेटमेंट है मैं उसको ही इन्वेस्टिगेट कर रहा हूँ। टास्क, टारगेट, रिस्पॉन्सिबिलिटी, डिसिप्लिन, इन सब चीज़ों को तो हम मान रहे हैं कि ये एक्सटर्नल हैं, किसी ने बाहर से हमारे ऊपर डाल दी हैं। ठीक है न?
इंस्टीट्यूशन ने कहा है कि आपको पढ़ाई करनी है, इतनी सीजीपीए लानी है। सीजीपीए सिस्टम ही है आपके यहाँ? इतनी सीजीपीए लानी है, इतनी डिपार्टमेंटल रैंक रखनी है। पेरेंट्स की कुछ एक्सपेक्टेशंस हैं वो पूरी करनी हैं। एक पीयर ग्रुप है उसके भी स्टैंडर्ड्स हैं, उनके साथ चलना है। तो ये सब चीज़ें बाहर ही हैं हमको इतना दिख जाता है। क्योंकि आपको पता है कि आपका करिकुलम आपने नहीं सेट करा, किसी बाहर वाले ने आपका करिकुलम सेट करा है। आपको यह भी दिखता है। मोबाइल पर आप घर पर फ़ोन करते हो, मम्मा से। वो आपसे बोलती हैं, "बेटा, हमें तुमसे बहुत उम्मीदें हैं, अब तुम वहाँ पहुँच गए हो तो अब कुछ करके दिखाना, नाम रोशन करना," वग़ैरह।
तो वहाँ भी आपको स्पष्ट हो जाता है कि वो जो फ़ोन पर आवाज़ आ रही है वो बाहरी है मेरी नहीं है। क्लासरूम में प्रोफ़ेसर की आवाज़ भी साफ़ दिखाई दे जाती है। वो व्यक्ति है, वो बाहरी है, वो अलग है, वो सामने खड़ा है, वो मैं नहीं हूँ और वो मुझसे कह रहा है कि यह असाइनमेंट है, ये टास्क है, ये टारगेट है, ये एग्ज़ाम है, ये सबमिशन है। इतना तुम्हें करके देना है। यह सब मुझ पर बाहर से आरोपित किया गया है, इम्पोज़ किया गया है, दिख जाता है। मम्मी कुछ कह रही हैं, वो भी बाहरी हैं, वो भी दिख जाता है। पीयर्स भी बाहरी हैं अपने दोस्त-यार, वो भी दिख जाता है। पर फीलिंग्स को हम क्या कह रहे हैं? हमारी अपनी हैं। और फीलिंग्स कह रही हैं, "मज़े करो।" फीलिंग्स कह रही हैं, "मज़े करो।"
क्या सचमुच वो फीलिंग्स आपकी अपनी हैं?
वही मूवी थी, जिसमें हीरो बहुत अमीर था, जब वह चलता था, तो कारों का काफ़िला चलता था और उसके पास प्राइवेट जेट था। और वही मूवी थी, जिसमें वो किसी स्विस पहाड़ी पर या थाईलैंड के किसी बीच पर या अमेरिका के किसी कैसीनो में मज़े भी कर रहा था। वो एक ही मूवी है, वही मूवी है जिसने आपको बताया कि ज़िंदगी में आपको बड़ा आदमी बनना है, किसी एमएनसी के साथ, किसी डेवलप्ड कंट्री के साथ आपका नाम जुड़ा होना चाहिए। वही मूवी है। और उसी मूवी ने आपको बताया कि ज़िंदगी इसलिए है भाई कि मज़े मार ले। उसी मूवी ने आपको बताया कि वह बंदा अब ऐसा हो गया है कि सब उसकी इज़्ज़त करते हैं, सब उसके आगे सर झुकाते हैं। और उसी मूवी में उस हीरो के पास एक आकर्षक गर्लफ्रेंड या वाइफ़ भी थी।
जिसको आप अपने ऊपर पड़ा बाहरी प्रभाव कह रहे हैं, और जिसको आप भीतरी कह रहे हैं, वह दोनों एक ही जगह से आ रहे हैं। तो एक को बाहरी और एक को भीतरी क्यों बोल रहे हो? आपने अपनी समस्या का जो विवरण दिया है उसी में त्रुटि है, द प्रॉब्लम स्टेटमेंट इटसेल्फ इज़ फ्लॉड। आपकी फीलिंग्स आपकी अपनी नहीं हैं। आपकी फीलिंग्स भी आपके भीतर उसी मूवी ने डाली हैं जिस मूवी ने आपको सिखाया है कि, "भाई, ज़िंदगी में तरक़्क़ी कर, मेहनत करके आगे बढ़ते हैं।" तमाम तरह की जो पॉप फिलॉसफी होती है वो उसी मूवी से आपके पास आई है।
यह भ्रम बिल्कुल भीतर से निकाल दीजिए कि आपकी फीलिंग्स आपकी अपनी हैं, नहीं हैं। आपकी एक-एक फीलिंग किसी सामाजिक मूवी से आ रही है। उस मूवी का नाम परिवार हो सकता है, परिवेश हो सकता है, धर्म हो सकता है, मीडिया हो सकता है। कुछ भी हो सकता है उस मूवी का नाम। पर इंसान बड़े-से-बड़े धोखे में रह जाता है जब वह सोचता है कि उसकी फीलिंग्स उसकी अपनी हैं। नहीं हैं।
वास्तव में, हमारे पास फीलिंग्स तो होती भी नहीं हैं, फीलिंग्स तो बड़ी शुद्ध चीज़ होती हैं, प्राकृतिक एकदम। हमारे पास इमोशंस होते हैं, फीलिंग्स और इमोशंस में अंतर है।
फीलिंग्स पर जब अहंकार चढ़ बैठता है, फीलिंग्स को जब ईगो डिस्टॉर्ट कर देती है तो वो इमोशंस बन जाते हैं।
हमारे पास इमोशंस होते हैं, एंड ऑल इमोशंस आर ईगो-मीडिएटेड एंड ईगो-डायरेक्टेड, कोई आपका इमोशन आपका अपना नहीं है। अभी भारत में क्रिकेट का बुखार था, फ़ाइनल किसके-किसके बीच था भाई? भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच में। आप न्यूज़ीलैंड में पैदा हुए होते तो फ़ाइनल का जो परिणाम आया, आप क्या प्रतिक्रिया देते?
प्रश्नकर्ता: उदास होते।
आचार्य प्रशांत: आप उदास हो जाते। आपकी फीलिंग्स सचमुच आपकी अपनी हैं या आपके माहौल से आ रही हैं?
प्रश्नकर्ता: माहौल से।
आचार्य प्रशांत: तो उनको अपना क्यों बोल रहे हो। अपना बोलते ही तुमने उदासी के लिए कारण तैयार कर लिया। अब आप कह रहे हो, "मेरी अपनी भावना थी और वो सम्मान नहीं पा रही है, पूर्ति नहीं पा रही है। तो अब तो मेरे पास उदास होने का वाजिब कारण है।”
वो भावना तुम्हारी है ही नहीं। एक-एक भावना कंडीशंड है, एक-एक इमोशन इगोइक है और यही बात विचार के बारे में भी कही जा सकती है। हमारे इमोशंस, हमारे थॉट्स कुछ भी हमारे नहीं हैं। हम वो सोचते हैं, जो हमसे सुचवाया जाता है, भाव हमारा वह है पूरा जो हम में आरोपित किया गया है, इम्प्लांट किया गया है। प्योर फीलिंग जैसी कोई चीज़ हम जानते ही नहीं, हम हँसते भी हैं तो वह एक कंडीशंड हँसी है, हम रोते भी हैं तो वो कंडीशंड आँसू हैं।
समस्या फिर यह नहीं है कि बाहर वाला मुझ पर हावी हो रहा है और मैं अपने दिल की नहीं कर पा रहा। बहुत बार आपको यह मलाल होता है न, कि दुनिया मुझ पर हावी हो रही है और मैं अपने दिल का नहीं कर पा रहा। यार, कब तक दूसरों के ही चलाए चलता रहूँगा? मैं अपने हिसाब से अपनी ज़िंदगी कब जिऊँगा? कई बार अफ़सोस होता है न? कितनों को होता है? "कब तक दूसरों के ही चलाए चलता रहूँगा? अपने हिसाब से अपनी ज़िंदगी कब जीना शुरू करूँगी?" यह आता है न? इतना बड़ा विद्रोह फिर उठता है।
ये विद्रोह किसी काम का नहीं है, क्योंकि बाहर तो आपको दूसरे संचालित कर ही रहे हैं, वहाँ तक आपने ठीक पकड़ा। बाहर से तो आपको दूसरे संचालित कर ही रहे हैं, आपके भीतर भी दूसरे ही बैठे हुए हैं। और वह दूसरे आपके भीतर बैठकर आपको भीतर से नियंत्रित करते हैं। वो दूसरे ही हैं जो आपका भाव और आपका विचार बन जाते हैं। आपने एक मूवी देखी; और मूवी से मेरा आशय बस वही नहीं जो चीज़ थिएटर में देखी जाती है। हमारे चारों ओर, गली, मोहल्ले, परिवार, समाज, व्यापार, बाज़ार में जो कुछ चल रहा होता है, वह सब भी मूवी ही है। तो मूवी से मेरा यह आशय है।
आपने एक मूवी देखी, जब मूवी शुरू हो रही है तो वो शायद बाहर है। पंद्रह-बीस मिनट बीतते-बीतते वो मूवी अब बाहर कम है भीतर ज़्यादा है। आपको क्या लगता है दो-तीन घंटे जब पूरे होते हैं और पर्दे पर मूवी समाप्त हो जाती है, तो क्या सचमुच समाप्त हो जाती है? नहीं। अब वो आपके भीतर प्रवेश कर चुकी है, अब आप उसे अपने साथ लेकर फिरेंगे, हो सकता है जन्म भर अब आप उस मूवी को अपने साथ लेकर फिरें और अब वो मूवी आपको भीतर से नियंत्रित करेगी। वह मालिक बन गई आपकी, आप ग़ुलाम हो गए। और इतना ही नहीं, अब वह मूवी आपसे जो करवाना चाह रही है अगर आप नहीं कर पाएँगे, तो आपको बहुत अफ़सोस और बड़ा दुख होगा कि मैं अपने हिसाब से अपनी ज़िंदगी नहीं जी पा रहा।
तुम्हारा अपना कोई हिसाब है कहाँ? अपनी कोई ज़िंदगी है कहाँ? तमाम तरीके के प्रभाव भीतर घुसकर बैठे हुए हैं, उन्हीं के चलाए चल रहे हैं, उन्हीं के चलाए दौड़ रहे हैं, रुकते भी उन्हीं से हैं, हँसते भी उन्हीं से हैं, रोते भी उन्हीं से हैं। हमारा एक-एक फ़ैसला संस्कारित है, प्रभावित है, कंडीशंड है।
मैं अक्सर ही सवाल पूछा करता हूँ, आप किस ईयर पर हो?
प्रश्नकर्ता: फ़र्स्ट ईयर।
आचार्य प्रशांत: फ़र्स्ट ईयर। अच्छा है, बहुत जल्दी।
मैं पूछता हूँ, अगर आपको बताया नहीं गया होता कि ज़िंदगी कैसे जीनी है और फ़ैसले कैसे लेने हैं; अगर आपको किसी ने कभी बताया नहीं होता, आपने न सुना होता, न पढ़ा होता, न देखा होता, तो आज तक आपने ज़िंदगी में जो फ़ैसले लिए हैं, क्या इनमें से एक भी लेते?
प्रश्नकर्ता: नहीं।
आचार्य प्रशांत: तो बताओ, कोई फ़ैसला तुम्हारा कहाँ है? तो इस बात का फिर अफ़सोस भी क्या करना कि मैं अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जी ही नहीं पा रहा, क्योंकि हमारा तो अपना कोई हिसाब है ही नहीं। है ही नहीं। अफ़सोस होना चाहिए, निस्संदेह; पर इस बात का नहीं कि मैं अपनी ज़िंदगी अपने भावों, अपनी फीलिंग्स के हिसाब से नहीं जी पा रहा। अफ़सोस इस बात का होना चाहिए कि मेरे विचार, मेरे निर्णय, मेरे रिश्ते और मेरी भावनाएँ, यह मेरे अपने क्यों नहीं हैं। इस बात का अफ़सोस होना चाहिए। और जब यह अफ़सोस होना शुरू हो जाता है, तो तुम पाते हो कि बाहर की कोई ताक़त फिर तुम्हें नियंत्रित नहीं कर पाएगी, काबू में नहीं रख पाएगी।
आप जो भी फ़ैसले लेते हो न, क्योंकि वह भीतर बैठे मालिकों के होते हैं इसीलिए उनमें दम नहीं होता। दम इसलिए नहीं होता क्योंकि मालिक एक नहीं है, भीतर मालिक भी सौ बैठे हैं। पूरी एक भीड़ बैठी है जो आपको अनुशासित रख रही है भीतर से। और यह सौ के सौ मालिक आपको सौ अलग-अलग दिशाओं में भेजते हैं, इसीलिए आपकी किसी भी दिशा में कोई दम नहीं होता। आप एक दिशा में चलते हो, दूसरा मालिक बोलता है, "विपरीत दिशा में चले जाओ।" आपकी दिशा रुक जाती है। दिशा नहीं भी बदलती तो गति कम पड़ जाती है, क्योंकि आप भीतर से ही बँटे हुए रहते हो।
भीतर से एक होना ही विज़डम या अध्यात्म कहलाता है, सौ जगह बँटा हुआ नहीं हूँ। मेरे भीतर सौ मालिक नहीं हैं कि एक मालिक है भीतर, कोई पुराना मेरा प्रोफ़ेसर, जो कह रहा है कि वीकेंड है, रीडिंग कर लो। एक मालिक मेरे भीतर कौन बैठा है? मेरे दोस्त-यार। वह कह रहे हैं, "वीकेंड है, आओ बैठकर के ड्रिंक्स लेते हैं।" एक मालिक मेरे भीतर कौन बैठा है, जो कह रहा है, "चलो टीवी देख लेते हैं।" और एक बैठा है, जिसने कोई इंस्टा रील देख ली है, जिसमें कोई बॉडीबिल्डर आया था। तो वह कह रहा है, "चलो आओ, अब वीकेंड है, तो जिमिंग कर लेते हैं।" और आप पाते हो कि न आप जिमिंग कर पा रहे हो, न आप रीडिंग कर पा रहे हो, न कुछ और कर पा रहे हो। एक दिशा में चलते हो दूसरी दिशा आपको बुलाने लग जाती है, आप कहीं के नहीं रहते।
यह किस-किस का अनुभव है? वो इसीलिए है क्योंकि कोई भी दिशा आपकी अपनी नहीं, आपकी हर दिशा किसी दूसरे ने तय कर रखी है। और यह तय करने वाले भी एक नहीं हैं, यह तय करने वाली पूरी एक भीड़ है। अफ़सोस इस बात का होना चाहिए कि वह भीड़ भी एक नहीं है, वो भीड़ भी लगातार बनती-बिगड़ती रहती है। जैसे एक खुली-सी जगह है, जिसमें कोई भी आकर के बैठ जाता है और हमारा मालिक बन जाता है। अफ़सोस इस बात का होना चाहिए।
यह दिल नहीं है हमारा, यह धर्मशाला है, यह कबूतरखाना है।
प्रश्नकर्ता: तो फिर अपने फ़ैसले कैसे लें?
आचार्य प्रशांत: पहले उनको तो ख़ारिज करो, जो तुम्हारे नहीं हैं। अपने फ़ैसले लेने के लिए पहले अपनापन होना चाहिए न। मैं अपने फ़ैसले लूँ, इससे पहले मुझे होना पड़ेगा न। कोई है ही नहीं तो। पूछ रहे हो कि गाड़ी ख़ुद कैसे चलाऊँ? इसके लिए पहले गाड़ी में तुम्हें होना पड़ेगा। तुम अभी हो कहाँ, अभी तो तुम्हारी गाड़ी दूसरे चला रहे हैं। पहले जो तुम्हारे वर्तमान फ़ैसले हैं, उन पर ही पुनर्विचार करो। कुछ भी, क्या मेरा है? और जहाँ दिखने लग जाए कि यह तो पक्की बात है कि सिर्फ़ प्रभावों, संस्कारों और दबावों पर चल रहा हूँ, वहाँ रुकना तो शुरू करो। और रुकने में कोई ऊर्जा नहीं लगती, भागने में लगती है। थमने में क्या श्रम लगेगा।
अध्यात्म तुम्हें और कोई ऊँची-लंबी छलाँग मारने को नहीं कहता। न कोई तगड़ी साधना या तपस्या करने की बड़ी ज़रूरत है। बस जो करे जा रहे हो, वो करने से बाज़ आ जाओ, इतना ही काफ़ी है।
क्योंकि आप जो कर रहे हो, उसमें से आपका बहुत-बहुत कम है। हमारा प्यार भी संस्कारित है। ओह! और संस्कार कोई ज़रूरी नहीं है कि समाज से ही आएँ, शरीर से भी आते हैं। आपके शरीर ने आपको बेबस कर दिया, किसी की ओर आकर्षित कर दिया। आप क्यों कह रहे हो कि यह आपका प्यार है? आपका थोड़ी ही है। अभी शरीर में दूसरे हार्मोन का कोई इंजेक्शन लगा दिया जाए, आप बिल्कुल कहोगे, "कोई आकर्षण नहीं बचा, मैं वैरागी हो गया हूँ।"
और आपको क्या लग रहा है? यह हड़बड़ी इनकी अपनी है? क्या लग रहा है? आप सब न मौजूद हों तो इनकी हड़बड़ाहट बदल जाएगी। अभी इनका जो व्यवहार भी है इस मंच पर, वो व्यवहार भी आपके द्वारा प्रभावित है। आप चाहो तो एक वैचारिक प्रयोग करके सोच सकते हो। आप में से यहाँ कोई नहीं होता, सिर्फ़ ये चार भाई यहाँ बैठे होते, तो क्या यह मुझसे वही बातें करते जो अभी कर रहे हैं? नहीं। इनकी बातें बदल जातीं। इनकी जो बातें और व्यवहार हैं, वो भी पूरे तरीक़े से कंडीशंड हैं।
अब मैं कुछ बोल रहा हूँ, बंधु सुन ही नहीं पा रहे। जल्दी-जल्दी माइक ऐसे, ऐसे, ऐसे, ऐसे कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि भीतर कोई मालिक बैठा है, जिसके प्रति जवाबदेही है। जिसको जाकर के हिसाब देना है कि तुम्हें मंच पर जगह मिली, तो तुमने सवाल पूछा जल्दी से कि नहीं पूछा। बस नहीं छूटेगी, मैं आप ही के लिए आया हूँ इतनी दूर से। सोचिएगा, कोई न हो तो आप कैसे व्यवहार करते हैं और जैसे ही आपको एक ऑडियंस मिल जाती है, तो आपका व्यवहार बदल जाता है कि नहीं? बोलिए। इसीलिए कुछ भी तो हमारा अपना नहीं है, हमारी सोच भी बदल जाती है अगर हमारे आसपास लोग हों तो।
डोपामिन, ऑक्सीटोसिन, हैप्पी हार्मोन, लव हार्मोन, अभी आपको लगा दिए जाएँ, देखिए आपकी भावनाएँ कैसे बदलती हैं। सब में प्यार उमड़ने लगेगा, पुलिस बुलानी पड़ जाएगी। इतना प्यार उमड़ेगा आपस में और आप कहोगे, "यह तो मेरी भावना है।" तुम्हारी नहीं भावना है, इंजेक्शन लगा दिया गया है, ऑक्सीटोसिन है भाई।
मेरा क्या है? ये सवाल ही व्यर्थ है। पूछो, मेरा क्या नहीं है? दर्शन की विधि होती है, "नेति-नेति"। जो मेरा नहीं है, उसको क्यों पकड़े रहूँ? जो मेरा नहीं, उसको क्यों पकड़े रहूँ? मेरा क्या लाभ? पराई भावनाओं को पाल रहा हूँ, पराए कर्तव्यों को ढो रहा हूँ। उधार के सारे फ़र्ज़ निभाए जा रहा हूँ, मुझे क्या मिल रहा है? न जाने किस गुमनाम, छुपे हुए मालिक ने मुझे आदेश दे रखे हैं, उन्हीं आदेशों का पालन करे जा रहा हूँ। इसमें मुझे क्या मिल रहा है? कोई नक़ाबपोश मालिक है, फेसलेस, एनोनिमस। आप उसको जानते भी नहीं। हो सकता है, वह पंद्रहवीं शताब्दी में रहता था कभी। वो कब का मर गया, लेकिन वो आज भी आपके भीतर बैठा हुआ है। और वो आपसे कह रहा है, "बाज़ार जाओ, शक्कर खरीद लाओ।" आप बाज़ार जाकर शक्कर खरीद भी लाए, तो आपको क्या मिल गया? हो सकता है, इसमें आपने बड़े पहाड़ चढ़े हों। जो आपको आपके मालिक ने हासिल करने को कहा हो, वो बड़ी दुर्लभ वस्तु हो। बिल्कुल हो सकता है। और आपने जान लगा दी, और आप वो चीज़ हासिल कर लाए।
आप वो हासिल कर भी लाए, तो आपको क्या मिल गया? क्योंकि आपको तो वो चीज़ कभी चाहिए ही नहीं थी। आपने एक बड़ा लंबा-चौड़ा एंट्रेंस एग्ज़ाम क्लियर कर लिया, चाहे आईआईटी-जेईई, चाहे यूपीएससी। वो आपकी सक्सेस कैसे हो गई? जब वह डिज़ायर ही आपकी नहीं थी, तो वो आपका टारगेट ही नहीं था। वह टारगेट ही आपके भीतर इम्प्लांट किया गया था। यह कैमरे मुझे रिकॉर्ड कर रहे हैं। यह पूरी ख़ूबसूरती से कर लें, फ्लॉलेसली कर लें। तो क्या आप कहोगे कि कैमरे सक्सेसफुल हैं? उन्हें तो मुझे कभी रिकॉर्ड करना ही नहीं था। उनके पीछे देखो, उनके मालिक बैठे हुए हैं, वो रिकॉर्ड करवा रहे हैं। पर कैमरे इतने बुद्धू नहीं हैं कि रिकॉर्डिंग करने के बाद कहें, "वी आर सक्सेसफुल, वी आर अचीवर्स।”
कैमरे इतने बुद्धू नहीं हैं, पर इंसान यह करने लग जाता है। कोई एंट्रेंस एग्ज़ाम क्लियर कर लिया, कहीं नौकरी लग गई, कोई ग्रीन कार्ड मिल गया, पैसे आ गए, "आई एम अ हाई अचीवर। मैंने यह कर लिया, मैंने वो कर लिया।" तुम कैमरे हो, तुमने जो कुछ किया तुमसे करवाया गया है। उसमें तुम्हारा कुछ है ही नहीं। तुम तो सक्सेसफुल भी नहीं हो। तुम हो ही नहीं, तुम सफल कैसे हो जाओगे? बोलो।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा सवाल ये है कि हम सोसाइटी में दो तरह के लोगों को देखते हैं...
आचार्य प्रशांत: रुको। पहले जो बात है उसी से संबंधित है या एकदम अलग है?
प्रश्नकर्ता: नहीं, थोड़ा उसी सेसंबंधित है।
आचार्य प्रशांत: थोड़ा नहीं। पहले ये बताइए, आप में से किसी के पास कोई बात है इससे संबंधित, तो उसको पूरा कर लें, फिर आपके पास आते हैं। हाँ, बिल्कुल इससे संबंधित बात हो तो ही हाथ उठाइएगा, अलग मुद्दा मत उठाइएगा।
प्रश्नकर्ता: मेरा एक फॉलो-अप क्वेश्चन है। तो जैसे कि हम इमोशंस की बात कर रहे थे, फीलिंग्स की बात कर रहे थे। तो जैसे कि मैं फ़र्स्ट ईयर में हूँ, तो एक रेस है मेरे सर में कॉन्फ्लिक्ट है। पहला यह है कि तुम पूरी तरीके से कट जाओ। जो तुम्हारे एम्स हैं, ड्रीम्स हैं, उसके पीछे तुम फ़ोकस रहो। उसके जो भी, लेट्स से, रिलेशनशिप, जिसकी अभी बहुत बात होती है। तो जैसे कि अगर मैं रिलेशनशिप में जाता हूँ, ठीक है, तो उसमें मेरे को टाइम देना पड़ेगा, एक्सेसिव। तो उससे मेरे जो अभी मैं सोच रख पा रहा हूँ कि मैं अगर टाइम दूसरी जगह दूँ, तो उसको मैं अचीव कर सकूँगा। तो वो डिले हो जाएगा या फिर टाइम डायवर्ट हो जाएगा, मेरा माइंड। यह कॉन्फ्लिक्ट अंदर बना रहता है। तो इससे कैसे डील करें?
आचार्य प्रशांत: तुम्हें क्यों जाना है रिलेशनशिप में? मैं मना नहीं कर रहा, मैं पूछ रहा हूँ।
प्रश्नकर्ता: इच्छा होती है।
आचार्य प्रशांत: तुममें उतनी ही वो इच्छा होती अगर कैंपस में पाँच सौ जोड़े न होते तो? और तुमने उनको ताका-झाँकी करके देख न लिया होता?
प्रश्नकर्ता: लेकिन सर।
आचार्य प्रशांत: हाँ या ना में बताओ पहले। वो इच्छा सचमुच तुम्हारी है भी क्या? मुझे रिलेशनशिप से कोई लेना-देना नहीं। लड़के हो, किसी लड़की के साथ घूम रहे हो, किसी के साथ भी घूम रहे हो, इंसान हो मर्ज़ी है तुम्हारी जो करना है करो। पर बात यह है कि क्या तुम्हारी मर्ज़ी है भी, या बस चलन है? या वह भी एक स्टेटस सिंबल है, दूसरों की आँखों में उठने के लिए? और हमारा तो सब कुछ ही दूसरों की आँखों में है। पूछ रहा हूँ बस।
पहला साल है, बहुतों की तो अभी दाढ़ी-मूँछ भी नहीं होती ठीक से। ख़ासकर तुमसे नहीं कह रहा हूँ। यह विचार इतना प्रबल कैसे हो जाता है कि जीवन में एक लड़की होनी ही चाहिए? कैसे हो जाता है? और कोई बुरी बात नहीं है। जीवन में लड़की हो, लड़का हो, कुछ हो, ठीक है संगति की बात है, इंसान और इंसान अगर साथ घूम रहे हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं हो गई। मैं कोई यहाँ पर नैतिक बोझा लेकर नहीं बैठा हूँ। और अगर यह सिर्फ़ एक बॉक्स को टिक करने के लिए किया जाने वाला काम है कि, "हाँ, ज़िंदगी में गर्लफ्रेंड भी आ गई", तो तुम्हारा रिश्ता भी कैसा होगा? कुछ नहीं। तुम उसका इस्तेमाल कर रहे हो बस फिर, और वो भी शायद तुम्हारा इस्तेमाल कर रही है। उसको भी तो दिखाना है कि "मैं भी कुछ हूँ।" और दोनों एक-दूसरे का इस्तेमाल कर रहे हो, दूसरों का इस्तेमाल करने के लिए। तो ये तो टॉक्सिक हो गई रिलेशनशिप।
रिलेशनशिप से कोई समस्या नहीं, बेशक रखो। पर टॉक्सिसिटी से तो समस्या होनी चाहिए न? कि नहीं होनी चाहिए? वह टॉक्सिसिटी लड़के-लड़के में भी हो सकती है, लड़की-लड़की में भी हो सकती है, और लड़के-लड़की में भी हो सकती है। किन्हीं के बीच भी हो सकती है। तुम तो सिर्फ़ अभी गर्लफ्रेंड की बात कर रहे हो, लोग शादियाँ भी इसीलिए कर लेते हैं कि लोग क्या कहेंगे इतनी उम्र हो गई, अभी तक शादी नहीं करी। अब सोचो, वो शादी कैसी होगी, फिर उसमें बच्चे पैदा होंगे। वो बच्चे कैसे होंगे, उन बच्चों की परवरिश कैसे होगी, उनको माहौल क्या मिलेगा।
पहला प्यार हमेशा अपनी सच्चाई से होना चाहिए, क्योंकि जीना तो अपने साथ है न। तुम्हारी ज़िंदगी में कोई भी आए, उससे पहले तुम आए हो अपनी ज़िंदगी में।
हाँ या ना?
जब कोई भी नहीं था तुम्हारी ज़िंदगी में, तब भी तुम थे अपनी ज़िंदगी में। तुम सबसे पहले हो, भूलो नहीं। "आई एम प्रायर टू एवरीथिंग। यस, ही इज़ देयर, दिस इज़ देयर, दैट इज़ देयर। शी इज़ देयर। बट बिफोर एनी ऑफ देम, आई एम।” मैं हूँ, तो यह सब है। और मेरे ही लिए यह सब है, मेरे ही देखे यह सब है। मैं ही इनका अनुभोक्ता, मैं ही इनका दृष्टा, मैं ही इनके केंद्र में। यह ऑब्जेक्ट्स हैं, मैं सब्जेक्ट हूँ। मैं किसी और से फिर क्या प्यार करूँगा अगर ख़ुद से नहीं करता तो। मैं किसी से क्या प्यार करूँगा अगर ख़ुद से नहीं करता तो। और ख़ुद से प्यार है मुझे, अगर मैं एक नकली ज़िंदगी जी रहा हूँ, प्रभावित ज़िंदगी जी रहा हूँ, संस्कारित ज़िंदगी जी रहा हूँ? पूछ रहा हूँ। बताइए। क्या इससे अपने प्रति सम्मान या प्रेम का इशारा मिलता है?
जो अपना ही नहीं हो पाया, वो किसी और का हो सकता है? पूछ रहा हूँ। जो अपना ही नहीं हो पाया, वो किसी और का क्या होगा। और जब आप अपने हो जाते हो, तो आप पाते हो कि सही संगति बनाना एकदम सहज हो गया है। अब आप बिल्कुल जान जाते हो कि कौन आपके पास होना चाहिए, कौन नहीं। और जो पास है, जो दूर है, उनसे भी रिश्ते की श्रेणी क्या होनी चाहिए, आप बिल्कुल जान जाते हो।
तुम कैसे तय करोगे, कि; लड़की हटा दो, कोई भी विषय तुम्हारे जीवन में आना चाहिए? विषय समझते हो? ऑब्जेक्ट। ये माइक एक ऑब्जेक्ट है। ये शर्ट एक ऑब्जेक्ट है, ये शूज़ एक ऑब्जेक्ट हैं। ये ऑडिटोरियम भी एक ऑब्जेक्ट है। तुम कैसे तय करोगे? उसके लिए मुझे मेरा पता होना चाहिए न। इन्होंने कहा था, रिक्वायरमेंट। रिक्वायरमेंट किसकी है?
प्रश्नकर्ता: जो नीड है।
आचार्य प्रशांत: मेरी है न। अगर मुझे मेरा ही नहीं पता, तो मुझे कैसे पता कि मेरी रिक्वायरमेंट क्या है? बोलो। फिर तो तुम कुछ भी ओने-पौने चीज़ ज़िंदगी में ले आओगे। लगी होगी प्यास, और ज़िंदगी में ले आओगे एविएशन फ्यूल। क्यों? क्योंकि वो महँगा होता है, हाई-फ़्लाइंग होता है, स्टेटस सिंबल होता है। चाहिए क्या था? साधारण पानी। और लेके आए जीवन में, फ्यूल भी नहीं साधारण, एविएशन फ्यूल, भाई। “अपुन हाई-फ़्लायर है, आईआईटी में आया है। जीवन में एविएशन फ्यूल लेके आएगा, *सेक्सीनेस*होना माँगता।”
क्या करेगा तू उस एविएशन फ्यूल का?तू साधारण पानी के लिए प्यासा था, पर तू स्वयं को जानता नहीं, तो न जाने क्या ले आया है, और उसको पिए भी जा रहा है। उससे तुम उड़ोगे नहीं, फटोगे, जैसा कि ज़्यादातर लोगों के साथ रिश्तों में होता है। गैसोलीन पियोगे तो क्या होगा? उड़ जाओगे? और उड़ जाओगे, तो और ख़तरनाक बात है। मैं तो कल्पना कर रहा हूँ कि एक ने पिया और ऐसे रॉकेट हो गया। कुछ आ रही है बात समझ में? किसी भी रिश्ते से पहले ख़ुद के साथ तो रिश्ता बनाना सीखो। और ख़ुद के साथ रिश्ता कैसे बनाओगे, अगर ख़ुद के नाम पर सब नकली चीज़ें पकड़कर बैठे रहोगे?
जब मैं कह रहा हूँ, "ख़ुद के साथ रिश्ता बनाओ", तो मैं नहीं कह रहा हूँ कि तुम्हारे भीतर कोई सच्चा सेल्फ बैठा है और तुम्हें उसके साथ रिश्ता बनाना है। मैं नहीं कह रहा कि भीतर कोई चीज़ है और तुम्हें उसको जानना है। मैं इतना ही कह रहा हूँ कि जो नकली पकड़ रखा है, उसको ठुकराना है। और इतनी ताक़त, इतना विद्रोह तो एक जवान आदमी में होना चाहिए न, कि नहीं होना चाहिए?
फ़र्ज़ी चीज़ों को ढो रहे हो, कोई मज़ा है इसमें? कोई मज़ा है क्या? गर्लफ़्रेंड भी बनाओगे तो डुगडुगी बजाओगे, पूरे हॉस्टल को जाकर बताओगे, "ये देख, ये देख, ये देख, ये देख।" तुम्हें दिख नहीं रहा वो तुम्हारे लिए क्या है? ट्रॉफ़ी। और बहुत सारे जो सक्सेसफ़ुल मैन होते हैं वो तो शादी ही ऐसे करते हैं कि उन बीवियों का नाम ही पड़ जाता है, ट्रॉफ़ी वाइफ़्स। यह भाषा का ही एक जुमला है, "ट्रॉफ़ी वाइफ़"। कि अब मैं इतना सक्सेसफ़ुल हूँ, ज़िंदगी में मैंने सब ऊँची-ऊँची चीज़ें अपने घर में लाकर रख दी हैं, तो अब एक बहुत ख़ूबसूरत दिखने वाली ट्रॉफ़ी वाइफ़ भी तो होनी चाहिए। उसका कोई काम नहीं होता ज़िंदगी में, वो बस प्रदर्शित करने के काम आती है, पार्टियों में, समाज को, कि "ये देखो, यह मेरी ट्रॉफ़ी वाइफ़ है।" इसमें प्रेम होगा? ये ज़िंदगी कैसी होगी?
और जब प्रेम नहीं होता अपने प्रति, और लड़की भी नहीं जानती है स्वयं को, तो वह भी ट्रॉफ़ी वाइफ़ बनने को तैयार हो जाती है। इसी तरीके से ट्रॉफ़ी हस्बैंड्स भी हो सकते हैं, बात बराबरी की है उसमें कुछ नहीं। तुम सही रास्ता पहले चलना तो शुरू करो, अभी तो इधर-उधर सौ तरीके की अंड-बंड राहों पर भागे जा रहे हो। इधर से किसी ने आकर्षित किया, उधर भाग गए। किसी ने बोला, अभी सेकंड ईयर में आओगे, इलेक्टिव शुरू हो जाएँगे। मार्च चल रहा है, इलेक्टिव्स तो तुमने कर ही लिए होंगे। अभी तक नहीं किए हैं, कब होता है कैंपस में?
प्रश्नकर्ता: जुलाई के टाइम पर।
आचार्य प्रशांत: जुलाई के टाइम पर होता है। तुमने सोचा है, तुम्हें कौन से ऑप्शन लेने हैं सेकंड ईयर में? नहीं सोचा है। मैं बताता हूँ, तुम कैसे करोगे। तुम इधर-उधर जाकर हॉस्टल में मुँह मारोगे और देखोगे, लोग क्या कर रहे हैं, उसी हिसाब से तुम भी टिक लगा दोगे। ऐसे ही होता है। अगर तुम अच्छी सीजीपीए वाले हो, तो तुम देखोगे कि कहाँ पर जाने से सीवी में लिखने में फ़ायदा होगा। कौन-सा कोर्स ले लूँगा, सीवी में लिखूँगा, तो जॉब प्रॉस्पेक्ट्स बेहतर हो जाएँगे। अगर पंजी-छक्की वाले हो, तो तुम देखोगे कि कौन-सा ऑप्शनल है, इलेक्टिव है, जिसको हाई सीजीपीए वाले नहीं ले रहे; क्योंकि उनके साथ फँस गया तो पाँच लाना भी मुश्किल हो जाएगा। और वहाँ जाकर टिक कर दोगे। तुम इधर का निर्णय लो कि उधर का निर्णय लो, उसमें प्रेम है कहीं पर? बताओ उस कोर्स के साथ कैसा रिश्ता होगा तुम्हारा?
तुम पहले व्यर्थ की राहें, जो ज़िंदगी में लगातार सामने आ रही हैं और स्वीकार की जा रही हैं, उनको ठुकराना शुरू करो न। उसके बाद पाओगे कि जिस राह पर चल रहे हो, यूँ ही मिल गया कोई, बिना माँगे मिल गया।
यह मैं लालच नहीं दे रहा हूँ। यह मैं तुम्हें कोई रोमांटिक सपना नहीं दिखा रहा हूँ कि तुम एक राह पर चले जा रहे हो, जाड़े की एक सुबह कोहरा है और अचानक तुम्हारे अकेलेपन में तुम पाते हो कि सामने लाल दुपट्टे वाली कोई तुम्हें दिख गई, और तुम कहते हो, "देखा! यह पुरस्कार मिलता है उनको, जो सच्चाई की राह चलते हैं।" तुम्हें ऐसा कोई दिवा-स्वप्न नहीं दे रहा हूँ। कोई मिल गया तो मिल गया, नहीं मिला तो नहीं मिला, हमें अपने साथ जीना है। तुम्हारी ज़िंदगी में हमेशा कोई आता है और फिर वह चला भी जाएगा एक दिन; या तुम चले जाओगे एक दिन। पर तुम तो हो न जब तक जीवित हो, तुम ख़ुद को तो नहीं छोड़ सकते न।
ख़ुद के साथ इंसाफ़ करना शुरू करो। संभावना है कि अगर मिलेगा फिर साथी तो अच्छा मिलेगा, और नहीं मिला तो नहीं मिला। नहीं भी मिलेगा तो तुम उनसे बेहतर होगे जो गलत साथी के साथ बँधकर रह गए हैं। और मिल ही गया कोई, तो अच्छी बात है। मिल भी जाए, तो उसे बाँधना मत। कहना कि, "मैं तेरे लिए थोड़ी इस राह पर चल रहा था। यह राह मुझे पसंद है, यह राह मेरी अपनी है, मैं इसलिए इस पर चल रहा था। तुम मिल गए हो, हम हमसफ़र हो गए, जब तक साथ चल सकते हैं, चलेंगे। और फिर कभी राहें अगर जुदा हो गईं, तो वह भी ठीक है।"
प्रश्नकर्ता: तो फिर ऐसा क्यों होता है कि जब आप अपनी इमोशन को थोड़ा-सा कंट्रोल…
आचार्य प्रशांत: अपना इमोशन?
प्रश्नकर्ता: मतलब जो सोसाइटी डाल रही है, उसके बाद थोड़ा एक ख़ुदरापन, बेचैनी-सी अंदर होती है? जब आप सोने जाते हो तो मन उदास-सा होता है। लोनलीनेस थोड़ा चरम पर होता है।
आचार्य प्रशांत: यही तो बात है न, कि हमारी उदासी भी संस्कारित है। सोचो, हमारी ग़ुलामी कितनी गहरी है, हमारा सुख तो संस्कारित है ही, हमारा दुख भी संस्कारित है। तुम यहाँ बैठे हुए हो। ये जितने लोग बैठे हैं सब एक-एक करके तुम्हें आना बोलें, कोई बोले, "भोंदू।" कोई बोले, "बेवकूफ़।" कहे, "अगली लग रहा है।" कोई बोले "पागल है बिल्कुल।" "कर क्या रहा है?" ज़रूरत भी नहीं पड़ेगी कि ये सारे के सारे हज़ार लोग आकर तुमसे ऐसा कुछ बोलें। मुश्किल से दस-बीस जने आएँगे और तुम्हें कुछ बोलेंगे, और तुम उदास हो जाओगे। बताओ, यह उदासी तुम्हारी अपनी है?
इसी तरीके से कोई एकदम बहुत, मान लो, साधारण-सा आदमी है। कोई भी हो सकता है, मान लो तुम ही हो, और ये सब आकर बोलना शुरू कर दें, "हाय हैंडसम!"
ये देखो! इतने में ही ख़ुश हो गया। तुम्हारी ख़ुशी तुम्हारी अपनी है? तुम कठपुतली हो, कोई भी नचा सकता है बाहर से। कोई तारीफ़ कर दे, तुम ख़ुश हो जाते हो। कोई कुछ उपेक्षा कर दे, इतना ही काफ़ी होता है तुम्हें दुखी करने के लिए। तुम्हारी जो उदासी है न, तुम्हें खुरदुरापन महसूस होता है भीतर, वो भी तुम्हें दुनिया ने सिखाई है। तुम्हें कहा गया है कि तुझे उदास होना पड़ेगा मेरे ग़ुलाम अगर तेरी ज़िंदगी में मज़े नहीं हैं तो। वह तुम्हारी उदासी मौलिक, ओरिजिनल नहीं है।
ये इतने सारे जो तुमने सैड सॉन्ग सुने हैं, घर में सुने हैं, सुनें हैं घर में? लगते होंगे सैड सॉन्ग्स। कभी हॉस्टल में भी आते होंगे, एफएम पर भी आ जाते हैं, टीवी पर देख लेते हो, यूट्यूब पर देख लिया। ये सब देखते हो, सैड सॉन्ग्स। सारे सैड सॉन्ग्स में रोना है किस बात का? वहाँ क्या कहा जा रहा है? यही तो कहा जा रहा है, "मेरी ज़िंदगी में फलाना ऑब्जेक्ट नहीं है, इसलिए मैं रो रहा हूँ।" यही कहा जा रहा है? यही तो कहा जा रहा है। कोई सैड सॉन्ग यह कह रहा है कि "मैं ग़ुलाम हूँ दूसरों का, और इस बात का अफ़सोस है मुझे"? कोई नहीं कह रहा। सब में यही कहा जा रहा है। तो आप बजा लीजिए अपने दिमाग में आपके जितने भी पसंदीदा दर्द-भरे गीत हों। और सब में यही कहा जा रहा है। किसी में कहा जा रहा है कि "मैं ज़िंदगी में पीछे रह गया, क्योंकि मैं होशियार, चालाक नहीं था, और बहुत दर्द है मुझे।" किसी में कहा जा रहा है कि "कोई मुझसे बेवफ़ाई कर गया।" यही सब तो है।
तो तुम्हें यह सिखाया गया है कि ज़िंदगी में फलानी चीज़ें अगर नहीं हैं, तो तुम्हें उदास होना चाहिए। और तुमने सर झुकाकर कहा है, "जी मालिक, मेरी ज़िंदगी में फलानी चीज़ नहीं है तो अब मैं उदास हो जाऊँगा।" तुम्हारी उदासी भी एक अभिनय है, तुम्हारी उदासी भी आज्ञापालन है। तुम्हारी उदासी भी स्क्रिप्टेड है। "वक़्त करता जो वफ़ा, आप हमारे होते। हम भी औरों की तरह, आपको प्यारे होते।" उदास होना पड़ेगा, उदासी मैंडेट है। उदासी का आदेश है, वो नहीं है न मेरे जीवन में। "वक़्त करता जो वफ़ा आप हमारे होते।" आप हमारे नहीं हो पाए न तो मुझे उदास होना पड़ेगा। और वो जो उदासी है, वो सिर्फ़ लफ़्ज़ों में नहीं है। वो बैकग्राउंड म्यूज़िक में भी है। कैसा तो मनहूस बैकग्राउंड म्यूज़िक होता है। अच्छे-ख़ासे भी बैठे हो, उसको सुन लो तो उदास हो जाओगे।
और तुमसे कहा गया है कि, "नहीं, सुनो ग़ज़लें सुनो।" बैठ जाओ जितने हो हॉस्टल में, जिनकी कोई नहीं है, वो सब सैटरडे नाइट को इकट्ठे बैठ जाओ। और कहीं-कहीं तो बियर भी खुल जाती है और उसके बाद ग़ज़लें लगा दी जाती हैं। और फिर चारों बैठकर रोते हैं और छाती पीटते हैं। और उसके बाद कह रहे हैं, "खुरदुरापन कहाँ से आ रहा है?" कैंपस में हो, यहाँ इतनी चीज़ें हैं करने को, तुम उनमें से कुछ भी कर रहे हो? इतने मौक़े तुम्हें ज़िंदगी में कभी बाहर नहीं मिलने वाले। पिछले कुछ महीनों में मैं दर्जन-डेढ़ दर्जन आईआईटीज़ में गया हूँ। और सब जगह मैंने यही पूछा है कि यह बता दो कि कैंपस तुमको जितनी फ़ैसिलिटीज़ दे रहा है, यह तुम्हें बाहर कहाँ मिलने वाली हैं?
किसी गाँव वग़ैरह में अगर तुम्हारी जॉब लग गई, कुछ हो गया, मैकेनिकल या माइनिंग इस तरह का तुम्हारा डिपार्टमेंट है और तुमने कोर जॉब ले ली, और थोड़े-से किसी कम विकसित क्षेत्र में चले गए, तो तुम्हें वैसे ही वहाँ पर टेनिस कोर्ट मिलने से रहा, और स्विमिंग पूल मिलने से रहा, और स्क्वैश कोर्ट मिलने से रहा, और गोल्फ ग्राउंड मिलने से रहा। और अगर तुम्हारी जॉब नोएडा में लग गई या गुड़गाँव में लग गई, तो वहाँ पर क्लब मेंबरशिप इतनी महँगी होती है कि, बेटा, जितने की तुम्हारी नौकरियाँ यहाँ से लगनी हैं, कैंपस से, तुम वो क्लब मेंबरशिप अगले पाँच साल तक अफ़ोर्ड नहीं कर पाओगे।
ऐसा नहीं है कि यहाँ से बहुत कम पैसे की नौकरियाँ लगनी हैं। तुम्हारा अच्छा पैसा, बढ़िया पैकेज लग जाएगा। लेकिन नोएडा वग़ैरह में क्लब मेंबरशिप के रेट्स ऐसे होते हैं कि तुम फिर भी अफ़ोर्ड नहीं कर पाओगे। और यहाँ पर चार साल हो, स्विमिंग आती है? जिमिंग करते हो? जितना तुमको यहाँ दिया जा रहा है, तुम्हें उसका लाभ नहीं उठाना, उसकी जगह बैठकर तुम गर्लफ़्रेंड के खुरदुरेपन को महसूस कर रहे हो। वीकेंड अगर खाली पड़ा है, तो जाकर लाइब्रेरी में बिताओ न। यही थोड़ी है; डिपार्टमेंट क्या है?
प्रश्नकर्ता: मटेरियल्स एंड टेक्नोलॉजी।
आचार्य प्रशांत: तो यही थोड़ी है कि बस मटेरियल साइंस पढ़ ली, तो तुम बिल्कुल बादशाह हो जाओगे। दुनिया में बहुत कुछ है पढ़ने को। और टेक और साइंस के आगे भी बहुत कुछ है पढ़ने को। लिटरेचर, ह्यूमैनिटीज़ यह सब कौन पढ़ेगा? फिलॉसफी कौन पढ़ेगा? वह सब छोड़कर तुम बता रहे हो कि वह ऐसा है, वैसा है। अभी चार साल बीत जाएँगे। एक साल तो बीत ही गया, तीन साल बचे हैं। कहते हैं न कि "चार दिन लाए थे माँगकर, और दो आरज़ू में कट गए, दो इंतज़ार में।" तो ऐसे ही चार साल मिलते हैं आईआईटी में, दो आरज़ू में काट देते हो कि गर्लफ़्रेंड मिल जाए, और दो इंतज़ार में कि प्लेसमेंट हो जाए।
लाइब्रेरी है? देखी है? कितने घंटे बिताए वहाँ आज तक? और अब तो फ़िज़िकल लाइब्रेरी तक जाना भी उतना ज़रूरी नहीं होता है, भाई। सब वर्चुअल है। बैठकर अपने लैपटॉप पर, क्या अपने मोबाइल पर पढ़ लो। कितना समय उसको दे रहे हो? कितने क्रिएटिव काम कर सकते हो! इतना बड़ा तुम्हें कैंपस मिला हुआ है। असल में आप लोग क्या करते हो कि सीधे अपने होमटाउन से उठकर आ जाते हो कैंपस में, वाया कोटा, ऑब्वियसली। ज़िंदगी आपने देखी होती है नहीं, तो आप यह भी नहीं समझ पाते हो कि इस कैंपस की क़ीमत क्या है। आप बिल्कुल अजीब तरीके के कामों में अपना समय ख़राब करके यहाँ से चौथे साल निकल भी जाते हो। और फिर यही वजह होती है कि जो एवरेज बीटेक होता है, वो लगभग अनएजुकेटेड होता है।
बीटेक कर रखी है नौ की सीजीपीए है, उसको आप लिटरेट तो बोल सकते हो, *प्रोफेशनली ट्रेंड * भी बोल सकते हो, पर एजुकेटेड नहीं बोल सकते। सौ तरीके के सुपरस्टिशन्स वो लेकर घूम रहा है, ज़िंदगी को उसने समझा नहीं, क्योंकि न साइकोलॉजी, न फिलॉसफी उसने कभी पढ़ी। वह बस इतना ही कर रहा है कि अब यहाँ से निकला, तो उसकी कहीं पर हैदराबाद, बेंगलुरु में, या कि अब्रॉड जॉब लग गई; या कहीं भी कुछ भी अपना वहाँ जाकर कमाने-खाने लग गया। ये एजुकेशन थोड़ी है।
अभी मैं आपसे पूछना शुरू कर दूँ दुनिया के ही मुद्दों के बारे में। आप में से बहुत कम लोग होंगे, जो कुछ बता पाएँगे। और यह बड़े अफ़सोस की बात है, यह कोई ख़ुशी नहीं हो रही है मुझे, ये बोलते हुए। मैं आपसे पूछना शुरू कर दूँ कि वॉर एंड क्लाइमेट, कुछ रिश्ता बताइए। आप नहीं बता पाएँगे। मैं आपसे कहूँ, जियोपॉलिटिक्स एंड रिसोर्सेज बताइए। नहीं बता पाएँगे। मैं आपसे कहूँ, आइडियोलॉजी और जियोग्राफी, इसमें रिश्ता बताइए। अब वो भी आपके लिए मुश्किल हो जाएगा। तो आप जिओगे कैसे? आप क्या करोगे बाहर? आप बस यही करोगे कि कहीं जाकर कोडिंग कर रहे हो, या कि कैट वग़ैरह कर लिया, मैनेजमेंट कर लिया, तो कहीं जाकर डाटा एनालिटिक्स कर रहे हो। उससे आपको कुछ पैसे मिल जा रहे हैं। इतना ही हो रहा है। और पैसे भी कोई बहुत ज़्यादा नहीं मिलते, ठीक है न? अभी बोला था कि क्लब की मेंबरशिप भी नहीं ले पाओगे।
हाँ, इतना है कि 99% लोग भारत में जितना कमाते हैं उससे ज़्यादा कमाओगे आप, यह पक्का है। पर भारत तो है ही ग़रीब देश, यहाँ पर 99 परसेंटाइल में आ भी गए तो क्या उखाड़ लिया? ये सब चीज़ें अगर होनी होंगी तो अपने आप हो जाएँगी, लड़की ज़िंदगी में आनी होगी तो आ जाएगी। लड़कियों को भी लड़के चाहिए, डिमांड दोनों तरफ़ से है। तुम काहे के लिए बावले, डेस्परेट हुए जा रहे हो बिल्कुल कि, "अरे, मैं ही रह गया।" और कौन-सी तुम्हारी उम्र बीत गई? देखो अभी तो ठीक से (मूँछों को इंगित करते हुए)।
तुम वो काम करो, जिसमें सार्थकता है। सिर्फ़ कोर्सेज़ पास करने के लिए आप आईआईटी में नहीं आए हैं, आप अपने आप को यहाँ फुली एजुकेटेड बनाने के लिए आए हैं। आप अपना पूर्ण विकास करने के लिए यहाँ पर आए हैं। वैसे ही मत निकल जाइएगा यहाँ से जैसे प्रवेश लिया था, डांस, ड्रामेटिक्स, डिबेट, क्रिएटिविटी, वीडियोग्राफी, फ़ोटोग्राफी, कोरियोग्राफी, ये सब किस लिए होते हैं? राइटिंग कौन शुरू करेगा? अभी तक तो, जब दसवीं के बाद आए, तो यही कर रहे थे बस कि, "हाँ, चलो, सिंपल हार्मोनिक मोशन लगाना है।" लिखना कब शुरू करोगे? ट्रैवल करना कब शुरू करोगे? जिमिंग, स्विमिंग, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल, टेनिस, ये तुम्हारी ज़िंदगी में कब आएँगे?
कैंपस ने एक्सचेंज प्रोग्राम्स भी आयोजित कर रखे होंगे, जिनमें शायद आप एक सेमेस्टर या एक साल के लिए किसी फ़ॉरेन यूनिवर्सिटी में जा सकते हो। कर रखे होंगे, कुछ होगा। उसका फ़ायदा कौन उठाने वाला है? आप में से ज़्यादातर लोग मिडिल क्लास फ़ैमिली से और साधारण शहरों से आते हैं। आपको अगर विदेशों का एक्सपोज़र मिल रहा है, तो आप वो क्यों नहीं लेना चाहते? या बस एक कंडीशंड गुड्डे-गुड़िया का खेल खेलना है जल्दी से और कहना है, "मेरा झंडा ऊँचा हो गया"?
अब तो एंटरप्रेन्योरशिप और इनक्यूबेशन इनकी फ़ैसिलिटीज़ भी हैं, हमारे समय पर तो थीं भी नहीं। आप इसका फ़ायदा क्यों नहीं उठा रहे हैं? और इन सबका अपना रोमांच होता है, अपनी थ्रिल होती है। यह वो रास्ते होते हैं, जिनको आप फिर भी कह सकते हो कि मेरे अपने हैं। कम से कम दूसरे रास्तों की अपेक्षा, रिलेटिवली मेरे अपने हैं। उन पर चलना शुरू करिए।