हम जिन भावनाओं, इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और रिश्तों को अपना मानते हैं, उनमें से अधिकांश समाज, परिवार, शिक्षा, मीडिया और वातावरण द्वारा आरोपित होते हैं। व्यक्ति अपनी ही नहीं, उधार ली हुई मान्यताओं के अनुसार जीता है और फिर उसी को अपनी पहचान समझ लेता है। वास्तविक स्वतंत्रता तब शुरू होती है जब हम अपने विचारों, भावनाओं और लक्ष्यों की जाँच करते हैं, झूठे प्रभावों को पहचानते हैं और अपने जीवन को सचेत रूप से जीना शुरू करते हैं।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा नाम अमन चौहान है। तो बेसिकली, एज अ स्टूडेंट, वी इंटेंड टू सप्रेस आवर फीलिंग्स। हम ये सोचते हैं, लॉन्ग टर्म में सोचते हैं, कि हम अभी के टाइम अपनी जो फीलिंग्स हैं, जो भी हैं, उनको हम सप्रेस करेंगे। लेट्स से, पैशन में, रिलेशनशिप में, किसी भी चीज़ में, तो हम अपनी फीलिंग्स को सप्रेस करने की कोशिश करते हैं और किसी बिग एम्स की तरह हम बढ़ते रहते हैं। लेकिन फिर उस चक्कर में, जब कॉन्फ्लिक्ट तो चलता ही रहता है हमारे इंटरनल, एक होलोनेस क्रिएट हो जाती है। और फिर वो दुखी मन से, लोनलीनेस में, अकेले-अकेले हम वही करते रहते हैं फिर।
आचार्य प्रशांत: मन करता है कि मज़े करें, लेकिन प्रेशर रहता है कि पढ़ाई करो। यही कुल मिलाकर कह रहे हो न? फीलिंग कह रही है कि चलो मज़े करते हैं, लेकिन सोसाइटी, रिस्पॉन्सिबिलिटी, डिसिप्लिन, यह सब कह रहे हैं कि चलो पढ़ाई करो।




