तुम जो पढ़ाई करना चाहती हो, अगर वो तुम्हारी नज़रों में सबसे कीमती चीज़ है, तो फिर उसके लिए कुछ भी छोड़ा जा सकता है। कोई तुम्हारा कर्तव्य नहीं है कि तुम वहाँ मौजूद रहो जहाँ तुम्हारे मन को मलिन किया जा रहा हो। लेकिन अगर पूरे तरीके से उस माहौल से दूर न हो पाओ, तो जितना ज़्यादा बाहर शोरगुल बढ़े, उतना ज़्यादा तुम अपने भीतर याद करने लग जाओ कि तुम्हें क्या करना है। जो चीज़ वाक़ई महत्त्वपूर्ण है, उसमें ज़ोर लगाओ तो ज़िंदगी बन जाती है।
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प्रश्नकर्ता: जिस माहौल में, जिस परिवार में हूँ वहाँ पर सब बड़ा अस्त-व्यस्त रहता है, उथल-पुथल मची रहती है, शोरगुल लड़ाई-झगड़ा ये सब बहुत चलता रहता है, पर मैं पढ़ना चाहती हूँ। मैं पढ़ना चाहती हूँ पर माहौल ऐसा है कि मुझे बार-बार डिस्टर्ब कर देता है, तो मन कैसे लगाऊँ पढ़ाई में?
आचार्य प्रशांत: देखो एक चीज़ को केंद्रीयता देनी पड़ती है, केंद्रीयता माने सबसे प्राथमिक जगह, सबसे ऊँचा महत्त्व। तुम जो पढ़ाई करना चाहती हो अगर वो तुम्हारी नज़रों में सबसे कीमती चीज़ है तो फिर उसके लिए कुछ भी क़ुर्बान किया जा सकता है कुछ भी छोड़ा जा सकता है।
अपने आप को साफ़ बता दो कि तुम्हारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है ऐसे मौकों पर, ऐसे समयों पर मौजूद रहने की जहाँ तुम्हारे मन को मलिन किया जा रहा हो मन में नाहक हलचल और विक्षेप पैदा किए जा रहे हों; कोई तुम्हारा कर्तव्य नहीं है कि तुम्हें वहाँ मौजूद रहना ही रहना है।
लेकिन छात्रा हो व्यवहारिक दिक़्क़त भी समझता हूँ, शायद पूरे तरीके से उस माहौल से उस समय पर दूर न हो पाओ। तो फिर दूसरा सूत्र ये है, कि जितना ज़्यादा बाहर शोरगुल बढ़े उतना ज़्यादा तुम अपने भीतर याद करने लग जाओ, कि तुम्हें क्या करना है। बढ़ता हुआ शोरगुल तुम्हारा सहायक बन जाए, वो तुम्हें और ज़्यादा याद दिला दे जाए, कि बाहर जो चल रहा है तुम्हें उस तरह के माहौल में आगे भी नहीं रहे आना है। और अगर तुम्हें उस तरह के माहौल में आगे भी नहीं रहे आना है तो फ़िलहाल तुम उस शोरगुल में प्रतिभागी बिल्कुल नहीं हो सकती।




