लोग ऋषिकेश शांति या आत्मबोध के लिए नहीं, बल्कि अपनी वही तनावपूर्ण और भ्रमित जीवनशैली को बनाए रखने के लिए आते हैं। महादेव का अर्थ अंत और अहंकार की समाप्ति है, पर तीर्थ भी मनोरंजन और पलायन का साधन बन गया है। दुख से मुक्त होने के बजाय लोग उसी दुख को बचाए रखने के उपाय खोजते रहते हैं।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, लोग ऋषिकेश आते क्यों हैं?
आचार्य प्रशांत: लोग तो आते हैं ताकि जैसी उनकी ज़िंदगी चल रही है, वैसी ही चलती रहे। जो उन्होंने कामनाएँ रखी हुई हैं, वही कामनाएँ पूरी होती रहें। जो उनके ढर्रे हैं, वही ढर्रे आगे बढ़ते रहें। जो उनके रोज़ के दर्द हैं, ज़ख्म हैं, बस उन पर इसी तरह मलहम लगता रहे ताकि वो कुछ देर के लिए अपने दर्द को भूल जाएँ और अगले दिन फिर वही काम कर सकें जो उन्हें वही दर्द देगा। अगले दिन फिर उसी ज़िंदगी में वापस कूद सकें, जिसमें उन्हें दोबारा वही घाव, वही ज़ख्म लगेंगे।
लोग ऋषिकेश इसलिए आते हैं, जैसी उनकी ज़िंदगी चल रही है, वैसा ही उसको चलाने के लिए, बल्कि जो कुछ भी उनकी ज़िंदगी में ग़लत है, उसको बचाने के लिए, उसको सुरक्षा देने के लिए आते हैं। ऐसे समझ लो कि जैसे कोई अपने कर्मफल से बचने के लिए यहाँ आ रहा हो। आपके कर्म ऐसे हैं कि उनके नतीजे में आपको तनाव होगा ही होगा। तो ये देखो न, ये जा तो रहे हैं। ये जेबरदस्त तरीके से गंगा में जा तो रहे हैं। ये कोई गंगा के पास इसलिए आए हैं कि इनको शांति मिलेगी, मुक्ति मिलेगी, ज्ञान मिलेगा। ये तो यहाँ इसलिए आए हैं क्योंकि ये ज़िंदगियाँ ऐसी जी रहे हैं, जिनमें इनको तनाव होगा ही होगा। ज़िंदगियाँ ही ग़लत जी रहे हैं।
तो ये पूरे हफ़्ते ग़लत ज़िंदगियाँ जीते हैं और उसके बाद वीकेंड




