
आचार्य प्रशांत: अभी यहाँ पर दो-चार बच्चे छोड़ दो, स्वस्थ हों, उनका पेट भरा हो, दो साल, चार साल, पाँच साल वाले, तो देखो अभी वो क्या करते हैं। और फिर बताना, वो जो कर रहे हैं उससे उनको मिला क्या।
पंद्रह मिनट के लिए यहाँ दो-चार बच्चे छोड़ दो। बीमार नहीं होने चाहिए, खाए-पिए होने चाहिए। और फिर बताओ, पंद्रह मिनट तक उन्होंने क्या करा? क्या करा? बताओ, क्या करा? यहाँ उछले, “हा, हेया-हा…।” एक खंभा पकड़ के घूम रहा है, एक ज़मीन पर लोट गया, एक मेज़ पर चढ़ गया, एक ने छलाँग मार दी, एक ने दूसरे की टाँग खींच दी। ये सब चल रहा है, पंद्रह मिनट तक यही चल रहा है।
पंद्रह मिनट के बाद का मेरा सवाल है, बताओ, उन्हें इससे मिला क्या? क्या मिला? कुछ नहीं मिला। जब कुछ नहीं मिला, तो बेचारे बड़े निराश होंगे, जैसे ठग लिए गए हों। पंद्रह मिनट तक उन्होंने बड़ी मेहनत करी। उन्हें मिला क्या? और मेहनत करे बिना वो रहेंगे नहीं। तुम यहाँ चार बच्चे छोड़ दो, और ग़ज़ब मेहनत करके दिखाएँगे वो। एक फ़्रिज के अंदर घुस जाएगा। बहुत तरह की मेहनत होगी। यहाँ ये सोफ़े पड़े हैं, इन पर गद्दे पड़े हैं, कोई उछाल के फेंक रहा है। मेहनत लगती है भाई, इन सब कामों में। एक क्षण को नहीं रुकेंगे वो, तुम मुझे दिखा दो कि कोई एक बैठ गया थोड़ी देर को, हो ही नहीं सकता।
इतनी मेहनत करी। बताओ, मिला क्या? क्या मिला? क्या मिला? कुछ नहीं मिला। तो कुछ नहीं मिला, तो फिर रोएँगे पंद्रह मिनट बाद, इतनी मेहनत कर रहे थे कुछ मिला नहीं। क्यों नहीं रोएँगे? क्यों नहीं रोएँगे?
श्रोता: कुछ चाहिए नहीं।
आचार्य प्रशांत: क्योंकि जो मिलना था वो मिल गया। उसी समय मिल गया, जो कर रहे हो उसी में मिल गया। मुक्त केंद्र के कर्म की, मुक्त कर्म की, मुक्ति से आते कर्म की ये पहचान होती है कि उससे कुछ माँगा नहीं जाता, इसलिए मुक्त कर्म ही निष्काम कर्म होता है। उसमें तो बल्कि धन्यवाद निहित होता है कि कर्म हुआ। मैं और क्या माँगूँ, मुझे करने को मिला यही पर्याप्त है।
बच्चा इस बात पर उदास नहीं होगा कि पंद्रह मिनट खेला और खेलने से कुछ नहीं मिला। बच्चा इस बात पे उदास होगा कि उसे खेलने को नहीं मिला। पंद्रह मिनट तक बच्चा खेला, और खेलने के बाद न रुपया मिल रहा है, न पैसा मिल रहा है, न तुम उसकी तारीफ़ें कर रहे हो, न नए कपड़े दिला रहे हो। न ये कह रहे हो कि, “तू पंद्रह मिनट खेलेगा तब तुझे खाना दूँगा।” बच्चा उदास हो रहा है क्या? बच्चा इस बात पर नहीं उदास होगा कि पंद्रह मिनट उसे खेलने के बाद कुछ नहीं मिला। हाँ, वो इस बात पर ज़रूर उदास हो जाता है कि उसे पंद्रह मिनट खेलने को नहीं मिला।
मुक्त कर्म अपना परिणाम और पुरस्कार आप होता है, उसमें कुछ माँगा नहीं जाता। उसमें इसी बात के लिए अनुग्रह रहता है कि ये कर्म हो पाया संभव। मैं कर पा रहा हूँ, इतना ही पर्याप्त है, पर्याप्त से भी आगे है।
मैं खेल रहा हूँ, तो मैं किसी और पर उपकार थोड़ी कर रहा हूँ। मैं खेल रहा हूँ, तो किसी दूसरे पर थोड़ी एहसान कर दिया। मैं खेल रहा हूँ, इसमें मेरी अपनी मौज है। ये मुक्त कर्म की निशानी है। वो मौज है, मौज है तो उसमें तुम किसी से माँगने नहीं जाते कि मैंने करा, तो मुझे अब पैसा दो। बड़ा ग़ज़ब होगा ऐसा कोई बच्चा, जो पंद्रह मिनट खेले, और पंद्रह मिनट खेलने के बाद तुमसे आकर कहे, “पैसा।” और एक बोले, “नहीं, पंद्रह मिनट नहीं, साढे पंद्रह मिनट, तीस सेकंड का बोनस चाहिए, ओवरटाइम।” होगा ऐसा?
बल्कि उसको तुम पंद्रह की जगह कहो कि बाक़ी सब पंद्रह, ये वाला पचीस, तो और किलकारी मारेगा। “हुत् तू तू तू!” बोल के बिल्कुल एकदम छत पर चढ़ जाएगा, और बोलो, क्या-क्या करना है? कपड़े फाड़ देगा किसी के, डोर तोड़ देगा, कुछ करेगा, दरवाज़े पर लात मारेगा। वो थोड़ी कहेगा कि, “मुझसे ज़्यादा क्यों कराया? ये मेरे साथ नाइंसाफ़ी हो रही है। बाक़ी सब पंद्रह मिनट, मुझसे पचीस मिनट। ऐसे नहीं चलेगा।” वो तो और मौज में है।
फिर एक शर्त पर उसका काम रुकेगा, कि वो थक गया। फिर वही जहाँ खेल रहा है, बिल्कुल हो सकता है वहीं खेलते-खेलते वहीं पर सो जाए। अब ये ठीक है, इतना खेला, इतना खेला कि थक गया, वहीं गिर के पड़ के सो गया। और फिर उठेगा तो क्या करेगा? मुआवज़ा माँगेगा? कि “तुम्हारी वजह से हम बिस्तर पर भी नहीं सो पाए, यहीं ज़मीन पर पड़ गए। मुआवज़ा दो।” क्या करेगा? जहाँ पर जगेगा, वहीं पर फिर खेलना शुरू कर देगा। उसकी शारीरिक ज़रूरतें पूरी करो बस। अब ये नहीं कि वो सो के उठा है, भूखा है, तुम उसे खाना भी नहीं दे रहे, खाना-वाना उसका होता रहे। समझ में आ रही है बात?
तो मुक्त कर्म सदैव निष्काम होता है, वो अपना पूर्ण परिणाम स्वयं होता है। उसका परिणाम भविष्य में, आगत में नहीं होता; उसका परिणाम वर्तमान में, कर्म में ही निहित होता है, आगे नहीं मिलेगा।
ये मुक्त केंद्र से आते कर्म की पहचान है। लेकिन जो कर्म तुम करते हो ग़ुलामी के कारण, हमने कहा था नंबर एक तो ये बात है कि मुक्त कर्म से वंचित रह जाते हो। नंबर दो वाली बात हमने क्या कही थी? कि चूँकि वो काम तुम्हारे अपने हृदय से नहीं आता, तो बाहर के मालिकों से आता है। और जो काम बाहर के मालिकों से आएगा, उसके साथ ये जुड़ा रहेगा कि तुम उसमें से परिणाम की आशा रखोगे।
मुक्त कर्म से कोई परिणाम नहीं माँगा जाता। वो निष्काम होता है। लेकिन मालिक द्वारा जब भी काम दिया जाएगा, तुम उसमें कहोगे, “हैं हैं हैं, कर तो दूँगा, दोगे कितना?” और हमेशा गणना ये रहेगी कि कम-से-कम करके ज़्यादा-से-ज़्यादा मिल जाए। दुनिया का हर कर्मचारी इसी हिसाब को लेकर चलता है, करूँ कम पाऊँ ज़्यादा। और ठीक जैसे हमने कहा था, इससे बड़ा सौभाग्य नहीं हो सकता कि तुम करते जा रहे हो, करते जा रहे हो और गिन नहीं रहे कि इससे मिला क्या। इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता अगर तुम करते जा रहे हो और मन इसी गिनती में लगा हुआ है कि जो कर रहा हूँ, इससे मिलेगा क्या।
तो जो अस्वतंत्र चित्त, अमुक्त चित्त होता है, जो बंधन के केंद्र से, माने सामाजिक और सामयिक मालिकों के प्रभाव से संचालित होता है, वो निश्चित रूप से सकामी हो जाता है। वो भविष्य-उन्मुखी हो जाता है, वो परिणाम-केंद्रित हो जाता है। और ये वही कोढ़ में खाज वाली बात है, एक तो किसी की ग़ुलामी कर रहे हो। दूसरे, जो कर रहे हो उसमें कोई आनंद भी नहीं है। तो इसीलिए सोच रहे हो, आनंद कब मिलेगा? आगे जब क्या मिलेगा? परिणाम। जब मुआवज़ा मिलेगा।
अभी जो कर रहे हो, उसमें तो पहली बात ग़ुलामी है, और दूसरी बात, चलो ये भी चल जाता कि किसी ने डंडा मार के ही सही पर तुमसे कुछ ऐसा करा दिया जिसमें तुम्हें मौज आ गई। नहीं, पहले तो डंडा खाया, जो करा उसमें मौज भी नहीं आई। और चूँकि उसमें मौज नहीं आई, इसीलिए भविष्य के लिए आशा रखी। “एक दिन ऐसा आएगा जब सपने साकार होंगे। एक दिन ऐसा आएगा जब तीस दिन काम करके एक दिन तनख़्वाह मिलेगी। एक दिन ऐसा आएगा जब बीस साल लड़के पे पैसा लगाया है, फिर वो पैसा लौटाएगा। खट-खट करके नौकरी कर रहा हूँ, अपने मकान के लिए जमा कर रहा हूँ। एक दिन ऐसा आएगा जब किराए का मकान छोड़ के अपने मकान में जाऊँगा। एक दिन ऐसा आएगा।” समझ में आ रही है बात? ये तीसरी बात हो गई।
पहली बात क्या थी?
श्रोता: मौज से वंचित रहना।
आचार्य प्रशांत: जो मुक्त केंद्र से काम नहीं करता, मुक्त केंद्र माने आत्मज्ञान का केंद्र, जो आत्मवंत नहीं है, वो मौज से वंचित रह जाता है। आत्मज्ञानी का कर्म स्वतःस्फूर्त होता है। उससे भी तुम पूछोगे कि, “तू ये क्यों कर रहा है?” उसके पास “क्यों” का कोई उत्तर नहीं होगा, क्योंकि “क्यों” का आशय होता है परिणाम। उसको परिणाम चाहिए ही नहीं, तो उसके पास कोई “क्यों” जैसी चीज़ है नहीं। उसके पास तो नृत्य है। जैसे कोई मूर्ख हवाओं से पूछे, “तुम बह क्यों रही हो?” फूल से पूछे, “तुम खिल क्यों रहे हो?” ये कोई सवाल हो गया? सूर्य से पूछे, “तुम तप क्यों रहे हो?” सागर से पूछे, “लहरा क्यों रहे हो?” कोई सवाल हुआ ये?
ये “क्यों” की बात ही मूर्खता की है, “क्यों” की बात लालच की है। “क्यों” का सवाल हमारे मन में इसलिए बैठा है क्योंकि हम लालची लोग हैं। तो कोई कुछ भी कर रहा होता है, तो हम पूछते हैं, “क्यों कर रहा है? ज़रूर उसका कोई मकसद होगा। ज़रूर कोई लालच होगा।” जो आत्मज्ञानी है, जो मुक्ति के केंद्र से संचालित है उसके पास “क्यों” होता ही नहीं है। बात समझ में आ रही?
“क्यों” नहीं होता, बस है, बस है। सत्य क्यों है? अरे, वो है। ठीक उसी तरह सत्य से मेरा कर्म आ रहा है, वो भी बस आ रहा है, किसी लालसा से थोड़ी आ रहा है। कुछ चाहिए होता, तो मैं बता देता कि क्यों कर रहा हूँ जो कर रहा हूँ। कुछ चाह के नहीं कर रहा हूँ। बस मैं ऐसा हूँ, तो ये करूँगा। एक तरह से मेरी विवशता है। मेरी अस्तित्वगत अनिवार्यता है कि मुझे ये करना ही पड़ेगा, जो मैं कर रहा हूँ। मैं इसलिए नहीं कर रहा कि ये जो कर रहा हूँ, इससे कुछ मिलेगा और मैं प्रसन्न हो जाऊँगा। मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि ये करने में ही मैं प्रसन्न से भी ज़्यादा हूँ; मैं उत्कंठित हूँ, मैं उल्लासित हूँ।
“क्यों” का प्रश्न छोटे दिल वालों का है, “क्यों” का प्रश्न क्षुद्र मन वालों का है। “क्या मिलेगा?” ये सवाल व्यापारियों का है, प्रेमियों का नहीं। समझ में आ रही हैं बातें?
ये पहली चीज़ थी, कि जब आप अमुक्ति के केंद्र से संचालित होते हो तो मुक्ति से जो सहज आनंद मिलता, बेपरवाह, बेमकसद नाचने में जो मौज मिलती, चूक जाते उससे। कभी देखा है कितना हल्कापन होता है जब पता होता है कुछ मिल नहीं रहा होता और बेवकूफ़ बन रहे हो। हम उसको कहते हैं कि “हम भी बेवकूफ़ बनने वाला काम कर रहे हैं।” क्योंकि हमारी दृष्टि में चतुराई तभी है जब कुछ मिल रहा हो।
हमारी ज़िंदगी में कभी गाहे-बगाहे कुछ ऐसा हो भी जाता है, जिसमें हमें कुछ नहीं मिल रहा होता, जिसमें बस यूँ ही, नसीब से, किसी के अनुग्रह से हमें निष्कामता के कुछ पल उपलब्ध हो गए होते हैं। तो हम क्या बोलते हैं? “अरे यार, ऐसी बेवकूफ़ी कर रहे थे।” कहीं पर जाकर यूँ ही दो घंटे बिता दिए। और “यूँ ही” का मतलब मैं बेहोशी की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं ऊँचाई की बात कर रहा हूँ। अपने लिए कुछ नहीं चाहा, किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं हो रही थी, पर कहीं दो घंटे लगा दिए। तो ख़ुद को ही थोड़ा अटपटा-सा लगता है। हम कहते हैं, “ऐसे ही कुछ नहीं।” क्या कर रहे हैं? वो सब चार लोग हैं, वो यूँ ही बिना बात के हँसी-ठट्ठा कर रहे हैं।
एक बार हुआ था, वहाँ बैठी हुई थी एक बुढ़िया बिल्कुल, जाने उसके सब बच्चे उसको छोड़-छाड़ के चले गए होंगे। ऐसी जो ठठरी नहीं हो जाती है बुढ़िया, 70 साल वाली, ऐसी 30 किलो की। वो बैठी हुई है और उसने एक तौलिया-सा बिछा रखा है, गमछा। और गमछे पर उसके पाँच आलू रखे हुए हैं, चार तुरई रख के बैठी हुई है, छह ठो उसके प्याज़ रखे हैं, और इस तरह रख के बैठी हुई है।
अब वो बैठ भी ऐसी जगह पर गई है, जाने उसको दिखाई नहीं देता, जहाँ कोई खरीदने न आए उसका। और माल भी जो लेकर बैठी है इतना कम है, ऐसी छोटी दुकान देखो तो रुकने का किसका मन करेगा? चार जने थे, वहाँ उसको देखा। पहले तो ऐसे आगे निकल गए थे। बोले, “चल, बाइक मोड़, वापस मोड़।” वापस गए, बोले, “करते हैं।” और वहाँ खड़े हो गए हैं, एक ने हाथ में दो आलू उठा लिए हैं, एक ने लौकी उठा ली है, एक ने तुरई उठा ली है। और वहाँ पर खड़े होकर के लोग कह रहे, “ले लो, ले लो, ले लो!” हँस रहे हैं आपस में, इंजीनियरिंग के छात्र हैं अब ये काम करेंगे सड़क किनारे। वो भी एक अटपटी-सी जगह है, तो हँसी आ रही है। एक कोई आलू लेने न आए।
और बुढ़िया भी शुरू में तो नाराज़ ही हो गई। उसको लगा कि ऐसे ही ये लड़के आए हैं, ये मेरा सामान लूटने आए हैं, उसने गाली-वाली भी दी। वो सोच रही है कि इसका सामान लूट लेंगे। हम भी खड़े हो गए, तो भी कोई मदद न कर पाएँ। क्योंकि वो इतनी कम सब्ज़ियाँ थीं, और वो ऐसी बेकार जगह पर बैठ गई थी। वहाँ पे ऐसा मोटरसाइकिल जो मैकेनिक होते हैं न, उनकी दुकानें थीं। और उधर पीछे से एक नाला बह रहा था। ऐसे एक नाला बह रहा है, नाला मतलब जिस पर पटिया रखी होती हैं। तो पटिया भी कुछ हटी हुई थीं। तो नाला है उसके पीछे चार-पाँच लाइन से दुकानें थीं, ये जो मोटरसाइकिल रिपेयर वालों की होती हैं। अब वहाँ पर ये अपने आलू ले बैठ गई थी। वहाँ कौन खरीदेगा?
तो हम भी खड़े हो गए, कोई खरीदने वाला नहीं। पहले एक था, उसने कहा, “अब इसका बिकवा ही देते हैं।” मैंने कहा, “बिकवाना है तो पैसे दे दे।” बोले “नहीं, इसका बिकवाएँगे। क्या करेगा?” तो उसने नाचना शुरू कर दिया। वो आते-जातों को कर रहा है, “ले लो, ले लो, ले लो!” तो जब देखा एक नाच रहा है तो हम चारों ही लोग नाचने लगे। एकदम फूहड़, बेवकूफ़ी का काम। आलू, प्याज़, टमाटर हाथ में लेकर चार नाच रहे हैं। एकदम मूर्खता का काम।
जानते हो, तब भी कोई नहीं आया लेने। पंद्रह-बीस मिनट नाचे, तब भी कोई नहीं आया लेने। लेकिन एक काम हुआ, पीछे ये जो मैकेनिक थे जिनकी दुकानें थीं, उन्हीं में से एक-दो आ गए। उन्होंने उनको जितना लगा कि इसका होगा, उतना पैसा बुढ़िया को दे दिया। तो कुछ हो गया। वो नहीं हुआ जो हमें लगा था कि होना चाहिए, पर फिर भी कुछ हो गया।
अब उस वक़्त तो बड़ा मज़ा आया। शुरू में नाचते हुए थोड़ा-सा अटपटा लगे, सकुचाएँ, जिसको कहते हैं एंबैरसमेंट। आप पढ़े-लिखे लोग हो, और ये आप क्या कर रहे हो? वो भी मतलब आईआईटी के स्टूडेंट्स। ये क्या कर रहे हो? पंद्रहवें मिनट तक आते-आते हमें मज़ा ही आने लग गया था। उसने ले जा के पचास सौ रुपए बुढ़िया को दे भी दिए, हम तो भी दो-चार मिनट और नाचते रहे। बोले, “ये बढ़िया है। आलू हाथ में लेकर नाचना, ये तो कभी कैंपस में करने को ही नहीं मिलता।” समझ में आ रही है बात?
लेकिन आज भी जब आपस में बात करते हैं, तो ऐसे बोलते हैं कि, “यार वो क्या बेवकूफ़ी करी थी!” हँसते खूब हैं, लेकिन उसको याद ऐसी करते हैं कि, “क्या बेवकूफ़ी करी थी! क्या मूर्खता करी थी!” क्योंकि हिसाब लालच का है न, वो चीज़ ऐसी थी जिसमें न कुछ मिला, न कुछ मिल सकता था। कुछ हो नहीं सकता था। समझ में आ रही है बात? लेकिन वही वो पल होते हैं जो फिर तुम्हें याद भी रह जाते हैं, उनमें कुछ ऐसा ख़ास होता है। हम भले ही आज ये कह देते हों कि “बेवकूफ़ी करी थी”, लेकिन बात उसी घटना की करते हैं। भले ही ये बोलकर याद करते हैं कि, “यार, क्या था वो!” पर याद करते हैं। समझ में आ रही है बात? जो भी बोलकर याद करते हैं, लेकिन याद तो करते हैं।
आप इससे वंचित रह जाते हो, आपको लगता है आप बहुत होशियार हो, आपने ये गिन लिया, आपने वो गिन लिया। ऐसे नहीं होता, आंतरिक जगत में ये हिसाबी बुद्धि बहुत-बहुत नुकसान देती है। और गीता का पूरा निष्काम कर्मयोग ही यही है कि तुम कामना से जो करते हो, वो तुम्हारे किसी काम आने वाला है नहीं। काम माने, कामना, तुम्हारे काम माने कार्य, नहीं आएगी। समझ में आ रही है बात ये?