मुक्त कर्म वही है जिसमें आनंद किसी भविष्य के परिणाम में नहीं, बल्कि कर्म करने में ही होता है। बच्चा खेलते समय किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता; खेल ही उसका सुख है। इसके विपरीत, बंधन और लालच से किए गए कर्म हमेशा हिसाब, मुआवज़े और भविष्य की आशा से भरे होते हैं। निष्काम कर्म वही है जहाँ कर्म स्वयं ही अपना पुरस्कार बन जाता है, और जीवन गणना नहीं बल्कि सहज उल्लास में बदल जाता है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: अभी यहाँ पर दो-चार बच्चे छोड़ दो, स्वस्थ हों, उनका पेट भरा हो, दो साल, चार साल, पाँच साल वाले, तो देखो अभी वो क्या करते हैं। और फिर बताना, वो जो कर रहे हैं उससे उनको मिला क्या।
पंद्रह मिनट के लिए यहाँ दो-चार बच्चे छोड़ दो। बीमार नहीं होने चाहिए, खाए-पिए होने चाहिए। और फिर बताओ, पंद्रह मिनट तक उन्होंने क्या करा? क्या करा? बताओ, क्या करा? यहाँ उछले, “हा, हेया-हा…।” एक खंभा पकड़ के घूम रहा है, एक ज़मीन पर लोट गया, एक मेज़ पर चढ़ गया, एक ने छलाँग मार दी, एक ने दूसरे की टाँग खींच दी। ये सब चल रहा है, पंद्रह मिनट तक यही चल रहा है।
पंद्रह मिनट के बाद का मेरा सवाल है, बताओ, उन्हें इससे मिला क्या? क्या मिला? कुछ नहीं मिला। जब कुछ नहीं मिला, तो बेचारे बड़े निराश होंगे, जैसे ठग लिए गए हों। पंद्रह मिनट तक उन्होंने बड़ी मेहनत करी। उन्हें मिला क्या? और मेहनत करे बिना वो रहेंगे नहीं। तुम यहाँ चार बच्चे छोड़ दो, और ग़ज़ब मेहनत करके दिखाएँगे वो। एक फ़्रिज के अंदर घुस जाएगा। बहुत तरह की मेहनत होगी। यहाँ ये सोफ़े पड़े हैं, इन पर गद्दे पड़े हैं, कोई उछाल के फेंक रहा है। मेहनत लगती है भाई, इन सब कामों में। एक क्षण को नहीं रुकेंगे वो, तुम मुझे दिखा दो कि कोई एक बैठ गया थोड़ी देर को, हो ही नहीं सकता।




