ये एक ह्यूमैनिटेरियन क्राइसिस है, हमारा राज्य बिहार। वो बच्चा मर रहा है वहाँ पर, वो औरत मर रही है वहाँ पर, वो युवा बेरोज़गार खड़ा है वहाँ पर; जिस बात का महत्त्व है, वो बात करो ना। आपको बिहार के चुनाव में शिक्षा की बात कितनी दिखाई दे रही है? हमें एक ज़मीनी क्रांति चाहिए, बिहार को नेता से बहुत-बहुत पहले शिक्षक चाहिए। श्रीकृष्ण को नेता बोलोगे क्या? गीता समझा रहे हैं — हज़ार नेता उनके पीछे पैदा हो जाएँगे, और वो सब क़ाबिल निकलेंगे।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम शिखा है और मैं बिहार से हूँ। अभी बिहार में अगले ही महीने इलेक्शन होने वाला है। सरकार तो बदलती है, पर हालात क्यों नहीं बदलते? असल समस्या जो है, वो नेताओं में है या मतदाताओं की चेतना में? तो मेरा सवाल ये है कि एक जागरूक मतदाता को किस आधार पर वोट करना चाहिए? धन्यवाद।
आचार्य प्रशांत: ये मुद्दा इन दिनों बहुत सुर्खियों में है, संस्था के भीतर भी इस पर बात चल रही है। एक लेख भी इस पर लिख रहा हूँ, बिहार के आने वाले चुनाव पर, अभी प्रकाशित होगा अगले ही हफ़्ते शायद। देखिए, सही काम तो हमेशा समझ से ही निकलता है। किसी भी जगह आप खड़े हो, वहाँ सही काम क्या है, ये तो आप जब जानोगे कि वहाँ के हालात क्या हैं तभी तय कर पाओगे न।
जो वर्तमान चुनाव है, उसमें जो मुद्दे आगे छाए हुए हैं, उनको देखकर ऐसा लगता है जैसे बिहार की सबसे बड़ी जो समस्या है, वो ये है कि लोगों को मुफ़्त राशन या बिजली-पानी नहीं मिल रहा है, या ग़रीबों को कुछ मुफ़्त पैसे उनके अकाउंट में नहीं दिए जा रहे हैं, और यही समस्या है और इसी कारण बिहार रुका हुआ है, पिछड़ा हुआ है। या कि समस्या ये है कि कुछ जातियों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है, टिकटों के बँटवारे में, या कि विधानसभा में, या ताक़त की अन्य जगहों पर। क्योंकि यही मुद्दे आप देख रहे हो, सुर्खियों में छाए हुए हैं। या एक और जो मुद्दा छाया हुआ है, वो धर्म का है, कि शायद बिहार की एक बड़ी समस्या ये है कि वहाँ पर धर्म ख़तरे में है। चुनाव तो लगभग इन्हीं चीज़ों पर लड़ा जा रहा है, और इसमें सब प्रकार की बातें हो रही हैं। ज़्यादातर बातें स्तरहीन हैं, गाली-गलौज पर भी उतर आ रहे हैं लोग बीच-बीच में।




