गाँधी: महात्मा, राष्ट्रपिता या शातिर राजनेता

Acharya Prashant

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गाँधी: महात्मा, राष्ट्रपिता या शातिर राजनेता
गाँधी को महात्मा, गाँधी ने स्वयं नहीं बनाया इस देश ने बनाया। लोगों को अच्छा लगता था, एकदम दो हड्डी का आदमी चला आ रहा है, एक गाँव से दूसरे गाँव भाग रहा है, उपदेश-यात्रा करे जा रहा है। दोष देना है तो देशवासियों को दो। एक यदि व्यक्ति थे जिनसे जिन्ना घबराते थे, उसका नाम था गाँधी। अंग्रेज़ों को ज़बरदस्त चोट दी थी गाँधी ने। कौन कह रहा है कि गाँधी को तुम भगवान का दर्जा दे दो, लेकिन इंसान को इंसान की तरह तो देखो। वैसा कोई आदमी आज भी खड़ा हो जाए न, अच्छा लगेगा। आसान नहीं होता गाँधी बनना। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैंने आपका एक गाँधी जयंती पर गाँधी जी का वीडियो देखा था और आप पढ़ने पर हमेशा एम्फ़सिस करते हैं। तो मैंने आपको जब से सुनना चालू किया, तब से बहुत पढ़ने पर भी मेरा ध्यान रहता है।

तो मैंने गाँधी जी की ऑटोबायोग्राफी पढ़ी और उसमें मुझे बहुत सारे पॉज़िटिव एस्पेक्ट्स पता चले, जैसे कि उनकी अफ्रीका की जो यात्रा थी, इंडिया में आने के बाद उनका पहला जो सत्याग्रह था, चंपारण सत्याग्रह उनका। नॉन-कोऑपरेशन मूवमेंट में जैसे लोगों का उनको इतना सपोर्ट था, कि बिना कांग्रेस के उन्होंने इनिशिएट किया था नॉन-कोऑपरेशन मूवमेंट। और उसके बाद, जैसे अभी मैं देखता हूँ, तो उनके ऑनेस्‍टी की काफ़ी मिसालें दी जाती हैं, जो उन्होंने अपनी बुक में काफ़ी अच्छी तरीके से ट्रांसपेरेंसी के साथ बताई भी हैं।

जैसे कि आपने भी बताया था शायद, व्हेन हिज़ फ़ादर वॉज़ ऑन हिज़ डेथबेड, ही वेंट टू हिज़ वाइफ़, द नाइट टाइम। तो ये सारी बातों के साथ मतलब, मेरा जो रिस्पेक्ट था गाँधी जी के लिए, वो बहुत बढ़ गया। और अभी जब मैं देखता हूँ, तो ऐसा लगता है कि उनकी जो इमेज है, उसको डिस्टॉर्ट करने की कोशिश हो रही है या है, मुझे नहीं पता। तो मैं उनके नेगेटिव एस्पेक्ट्स भी पढ़ना चाहता था मैं। मतलब जैसे उनका जो क्रिटिसिज़्म होता है, उनके अगेंस्ट वो ऐसा होता है कि उन्होंने हमेशा मुसलमानों को ज़्यादा सपोर्ट किया है, अगेंस्ट हिंदू। मुसलमानों को अपीज़ करने के लिए उनको ज़्यादा फ़ेवर किया है। भारत के विभाजन में भी उनकी पॉलिसीज़ के वजह से भारत के विभाजन में भी थोड़ा कंट्रीब्यूशन था।

तो मैंने वो नाथूराम गोडसे की बुक पढ़ी, “व्हाई आई असैसिनेटेड गाँधी।” तो उसमें नाथूराम गोडसे ने जो ट्रिगर पॉइंट बताया, वो ये था कि जो 45 करोड़ पाकिस्तान को इंडिया देने वाले थे, वो सरदार बल्लभभाई पटेल ने विदहोल्ड कर लिए, क्योंकि कश्मीर इश्यू उस टाइम पर चल रहा था। तो गाँधी जी अनशन पर बैठकर उस पैसे को रिलीज़ करवाया और उस वजह से आज भी काश्मीर इश्यू आज तक चल रहा है। ऐसा बोलते हैं।

तो फिर जब किसी से बात होती है इस बारे में, तो वो सामने वाला बोलते हैं कि ज़रूरत क्या है, जब मालूम है सामने वाला आदमी अपना ही रिसोर्स यूज़ करके अपने ही अगेंस्ट में यूज़ करने वाला है। हमारे रिसोर्स, जो हमने पैसा दिया। तो मैं बोलता हूँ, कि वो महात्मा थे उन्हें लगा होगा कि जो उस समय पर सत्य है, वो काम करना चाहिए। और वैसे भी 45 करोड़ जो थे, वो पाकिस्तान के ही थे राइटफुली हमारे थे नहीं, तो उन्होंने दे दिया।

तो सामने से ऐसा तर्क आता है, कि महाभारत में भी श्रीकृष्ण भगवान ने कर्ण को छल से मारा था। तो उसके पास मेरा जवाब नहीं रहता। तो जब मैं होलिस्टिकली, कॉम्प्रिहेंसिवली पूरा देखता हूँ तो। अगर मोहनदास करमचंद गाँधी उनको बोलेंगे, जैसे बहुत लोग बोलते हैं कि मैं महात्मा नहीं मानता, उनके पास उनका रीज़न होता है। तो जब मैं पूरी तरीके से देखता हूँ, तो महात्मा बोलूँ या नहीं बोलूँ, वो एक खटक-सी होती है। अगर पॉज़िटिव-नेगेटिव एस्पेक्ट्स को देखेंगे कॉम्प्रिहेंसिवली, समझ नहीं पता हूँ कि कनक्लूड कहाँ करूँ। अगर उनके व्यक्तित्व को मैं डिफ़ाइन करना चाहूँ या जो भी।

उसके अलावा बोलते हैं कि वो जैसे अगर वो संत थे या पॉलिटिशियन थे। सबसे पहले तो ये बताओ। क्योंकि अगर वो संत थे तो पॉलिटिक्स में क्या कर रहे थे, और अगर वो पॉलिटिशियन थे, तो संत बनने का ढोंग क्यों कर रहे थे। तो मैं पढ़ा और मैं एक कंक्लूजन पर कभी आ ही नहीं पाया। तो थोड़ी क्लैरिटी चाहिए थी।

आचार्य प्रशांत: वो पॉलिटिशियन तो थे, ज़रूर थे, पर उन बेचारों के साथ पॉलिटिक्स बहुत की गई, वो भी ख़ासकर उनके मरने के बाद। उन्होंने थोड़ी कहा था, “मुझे महात्मा बोलो।” वो आमरण अनशन पर बैठे थे चर्चिल के ख़िलाफ़, कि भारत में विधेयक लाओ कि मोहनदास करमचंद गाँधी को महात्मा बोला जाए? उन्होंने बोला था? उन्हें महात्मा किसने बोला था? रविंद्रनाथ थे जिन्होंने महात्मा की उपाधि दे दी उनको, ठीक है लोग बोलने लग गए। बापू भी उन्होंने ख़ुद को ही बोल दिया था? “मैं बापू हूँ।” वो बोल रहे थे क्या?

राष्ट्रपिता, उन्होंने स्वयं को घोषित किया था? राष्ट्रपिता, उन्हें किसने बोल दिया था? सुभाषचंद्र बोस ने बोल दिया था। अब आप ऐसे विवाद करते हो जैसे वो चाह रहे हों कि उन्हें महात्मा माना जाए, और हम कह रहे हैं, नई फरेब हुआ है, ये महात्मा नहीं है और महात्मा बनकर बैठ गया है। वो कहाँ कह रहे हैं महात्मा बोलो, उन्हें क्या पड़ी है।

देखो समझो बात को, साधारण एक व्यक्ति, जो पहले दक्षिण अफ्रीका जाता है और वहाँ कुछ बातें समझता है, सिखता है, तमाम उसकी सीमाएँ। कोई बहुत नैसर्गिक प्रतिभा के वो धनी थे नहीं, उसपर लिखा भी एक बार मैंने, एक-आध दफ़े घर से पैसा भी चुराया है, एक-आद दफ़े वेश्यावृत्ति भी कर ली। बाद में बोलने लग गए, कि “गीता मेरी माँ है।” एक समय पर धर्म परिवर्तन करके ईसाई बनने के बहुत करीब पहुँच गए थे। मांस खाया शायद उन्होंने एक-आध बार। वो अभी बोल ही रहे थे, कि पिता आख़िरी साँसें ले रहे थे और वासना खींच ले गई उन्हें पत्नी के पास उसी क्षण में।

बोला नहीं जाता था, खड़े हो जाते थे अधिकारियों के सामने, ख़ुद ही बोलते थे कि आवाज़ नहीं निकलती थी। आत्मविश्वास की इतनी कमी थी। ऐसे थे। वहाँ, लेकिन दक्षिण अफ्रीका गए, वहाँ पर देखा कि कुछ हो रहा है अन्याय उसके ख़िलाफ़ खड़े हुए। फिर पढ़े-लिखे थे, उनकी प्रैक्टिस अच्छी चल गई और उस समय में बहुत कम लोग होते थे जिन्होंने ब्रिटेन जाकर शिक्षा पाई हो और फिर विदेश में ही उनका व्यवसाय अच्छा चला हो और सम्मान भी फिर मिला। स्वयं सरकार ने उनको सम्मानित कर रही थी। उन्हें कुछ पड़ी नहीं थी वहाँ से लौटने की भारत।

एक आम आदमी की दृष्टि से सोचो, और उस समय वो राष्ट्रपिता या महात्मा वग़ैरह तो कुछ थे नहीं। हम 1900, 1905,1915 की बात कर रहे हैं। उस समय वो प्रसिद्ध भी थे क्या बहुत? भारत में तो नहीं, दक्षिण अफ्रीका में उनका कुछ। पर वो भारत आते हैं और एक साधारण आदमी हैं। अपने विषय में उन्होंने कभी न सोचा हो कि एक दिन वो विश्व के ही नक्शे पर ऐसे छा जाएँगे। और कोई बहुत महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति भी नहीं थे।

फिर आते हैं यहाँ देखते हैं क्या चल रहा है। पहले कुछ साल बस चुपचाप समझने की कोशिश करते हैं कि यहाँ हो क्या रहा है। और जब समझते हैं, क्या हो रहा है, तो कहते हैं कि इन लोगों के पास जाऊँ कैसे? मैं अपना ये सूट, ये कोट-पैंट पहनकर के। और वही उन्होंने पहन रखा था, उनकी बैरिस्टरी, वही उन्होंने सब अपना। बोले, कैसे जाऊँ इनके पास, शर्म आती है इनके गाँव में घुसकर ये सब धारण करके, हैट-वैट लगाकर के। बोले, “इनके पास अब जाना ही है तो इन्हीं के जैसा होकर जाऊँगा, दरिद्रनाथ। दरिद्रनाथ की सेवा में अगर लगना है, तो कैसे मैं अंग्रेज़ बनकर खड़ा हो जाऊँ।”

ये हो इंसान है, इतनी ही कहानी में कुछ उसके चरित्र में ऐसा मिल रहा है कि नहीं मिल रहा है जिसकी प्रशंसा की जाए। तो बस हो गया, अपने आप को उन्हीं बातों तक सीमित रखो, ना कि जो बातें तथ्यात्मक हैं, बाक़ी बातों को लेकर शोर इतना क्या मचाते हैं। हम बहुत कुछ है जो उनके जीवन से, चरित्र से सीखा जा सकता है और सीखा जाना चाहिए। अब आज हो गया है कि आप बैठ गए हो परमाणु बम बनाकर और तेरह-चौदह लाख आपकी सशस्त्र सेनाएँ हैं, आज हो गया न ये सब, और आम आदमी के पास कपड़े-लत्ते आ गए, खाना-पीना आ गया है, शिक्षा आ गई है।

ज़रा आज से ठीक सौ साल पहले के भारत में जाना, 1922 के भारत में। और सौ साल पहले के ब्रिटेन को सोचना, जहाँ कभी सूरज अस्त नहीं होता था; जिन्होंने जर्मनी को एक नहीं, दो बार परास्त किया था। और क्या चाहते हो कि वो हिंसा करवाते? ये जो भारत के भूखे, नंगे, दुर्बल, दरिद्र लोग थे, इनसे कहते, सड़क पर आ जाओ, अंग्रेज़ों को मारकर भगा दो? स्वयं भारतीय क्या तैयार थे इसके लिए? अंग्रेज़ों की हुकूमत चल कैसे रही थी? अंग्रेज़ों के दम पर? सत्ता के शीर्ष पर भी भारत में अंग्रेज़ कुल कितने थे? कौन चला रहा था फिर ब्रितानवी हुकूमत भारत में? भारतीय ही चला रहे थे न। वो भारतीय जो इतने भूखे‑नंगे थे कि पेट की ख़ातिर कुछ भी करने को तैयार थे।

भगत सिंह को फाँसी दी और फाँसी देकर उनकी लाश के सौ टुकड़े किए। किसने? एक भारतीय ने किए थे। और एक बोरे में भरकर चुपचाप ले जाकर जला दिया। कौन करने वाले थे? ब्रिटिश कर रहे थे ये सब कुछ? भगत सिंह के ख़िलाफ़ मुक़दमा भी जिन्होंने लड़ा, वो कौन थे? अंग्रेज़ थे? वो भारतीय थे।

आप बात करते हो उन क्रांतिकारियों की जिन्होंने हिंसा का मार्ग चुना, उनकी संख्या कितनी थी? और उन क्रांतिकारियों की भी मुखबिरी करके, उनको लगातार पकड़वाता कौन था? भारतीय ही पकड़वाते थे ना। क्या भारतीयों की उस वक़्त ये हालत थी, कि आप कहें कि एक जन‑आंदोलन होगा, वो भी हिंसक? हो सकता था क्या? आज आपको लगता है कि “क्यों नहीं कर दिया, क्यों नहीं कर दिया?” खाने को रोटी नहीं, पढ़े‑लिखे नहीं हैं, सौ तरह के अंधविश्वासों में लिप्त हैं, जात‑पात और गंदगी के नर्क में डूबे हुए हैं। उनसे कैसे आंदोलन करवा लेते, भाई? क्या बातें कर रहे हो।

धीरे‑धीरे करके उनसे कहा, “सविनय अवज्ञा आंदोलन।” लड़ मत जाना, पर उनकी बात मान मत लेना, अवज्ञा करना। सशस्त्र अवज्ञा नहीं है, मात्र अवज्ञा। इतना ही बहुत है, इससे ज़्यादा नहीं कर सकते थे। ये मत कहो, कि एक भगत सिंह थे दस हज़ार भगत सिंह भी तो हो सकते थे। नहीं हो पाते थे न, कहाँ हो पा रहे थे। और हो रहे होते तो गाँधी रोकने गए थे क्या?

जो रास्ता उन्हें उस वक़्त ठीक लगा, वो रास्ता उन्होंने चुना। आप आज बिल्कुल बहस कर सकते हैं इस बात पर कि कोई दूसरा रास्ता भी हो सकता था। कर लीजिए बहस। लेकिन उस व्यक्ति ने जो रास्ता चुना, अपनी दृष्टि से, अपने विवेक से, उसमें उस इंसान पर आप व्यक्तिगत लाँछन लगाएँ, ये कतई ठीक नहीं है।

पैंतालीस करोड़ कितनी बड़ी राशि होती है, आज से अस्सी साल पहले भी कितनी बड़ी राशि थी। तुम पैंतालीस करोड़ नहीं देते पाकिस्तान को, तो पाकिस्तान कहता “नहीं, नहीं, कश्मीर नहीं चाहिए हमको?” पाकिस्तान छोड़ देता क्या अपना दावा? या उसे दावा इसीलिए करा और वो सब घुसपैठिए इसीलिए भेजे, क्योंकि पैंतालीस करोड़ मिल गया? वो आप उसको अगर नहीं भी देते, वो कश्मीर में तो भी उसे जो करना था उसने कर ही दिया था। हाँ, इतना ज़रूर होता कि आपका हाथ नीचे हो जाता। आपके पास कम से कम जो नैतिक श्रेष्ठता की ऊँचाई थी, आप उस ऊँचाई से भी हाथ धो लेते। पैंतालीस करोड़ बचा के कुछ नहीं मिल जाता, वो तो आपको देने ही थे।

बात समझ में आ रही है?

पाकिस्तान गाँधी ने बनवाया है? एक यदि व्यक्ति थे जिनसे जिन्ना घबराते थे, उसका नाम था गाँधी। माउंटबेटन से बोलते थे, “नेहरू को बुला लो, पटेल को बुला लो, बात कर लेते हैं आपस में, गाँधी अलग रखो, ये जिद्दी है बुड्ढा, अजीब बातें करता है और अड़ जाता और कहता, "मानोगे नहीं तो जान दे दूंगा।”

गाँधी जब मरे, तो जिन्ना बोले, “एक बहुत अच्छा हिंदू मर गया।” लोगों ने जाकर कहा, “ये आप क्या बोल रहे हो?” बोल दो, “एक अच्छा इंसान मर गया।” ये बात आपकी छप रही है अख़बार में। बोले, “नहीं, एक अच्छा हिंदू मर गया।” जिन्ना को वहाँ दिखाई दे रहा है कि ये जो इंसान है, ये हिंदू धर्म का एक बहुत ऊँचा प्रतिनिधि है। ये बात जिन्ना को भी दिखाई दे रही है। और आज हम कह रहे हैं कि “नहीं, नहीं, गाँधी तो हिंदुओं के साथ नहीं थे, वो मुसलमानों का पक्ष ले रहे थे, वग़ैरह वग़ैरह।”

और कौन कह रहा है कि गाँधी को तुम देवता का, भगवान का दर्जा दे दो, लेकिन इंसान को इंसान की तरह तो देखो न। मरने के बाद उनके चरित्र का नाश कर रहे हो, ये नहीं शोभा देता। सौ उनमें खोट थीं, कौन इनकार कर सकता है। लेकिन उनसे कोई बेहतर अगर मिल रहा होता, तो खड़ा हो जाता न। कोई और काहे नहीं खड़ा हुआ? किसी ने बंदिश लगाई थी?

भाई, गाँधी से उच्चतर कोई होता, वहाँ खड़ा हो जाता, देशवासी उसके साथ चल देते। गाँधी को महात्मा गाँधी ने स्वयं नहीं बनाया; इस देश ने बनाया। तो अगर तुम्हें गाँधी की प्रसिद्धि इत्यादि से समस्या हो रही है, तो दोष किसको दो? देशवासियों को दो न। देशवासियों को प्यार हो गया था गाँधी से, तो हो गया था। और गाँधी तो नहीं गए थे मोहब्बत की भीख माँगने। लोगों को अच्छा लगता था, एकदम दो हड्डी का आदमी चला आ रहा है, और तेज़ी से चल रहा है और चलता ही जा रहा है, रुकता ही नहीं; एक गाँव से दूसरे गाँव भाग रहा है, ये कर रहा है, वो कर रहा है। लोगों को बड़ा अच्छा लगा। दोष देना है तो देशवासियों को दो।

एक बात लेकिन बता देता हूँ, वैसा कोई आदमी आज भी खड़ा हो जाए न, अच्छा लगेगा। आसान नहीं होता गाँधी बनना।

और ये बात मैं कोई गाँधीभक्त इत्यादि होने के नाते नहीं बोल रहा हूँ, गाँधी से बहुत समस्या मुझे भी रही है। मैं किशोर था चौदह-पंद्रह साल का, तभी से मुझे गाँधी से कुछ समस्याएँ रहीं हैं गहरी। लेकिन इसके बाद भी मैं इंसान को इंसान की तरह इज़्ज़त करना जानता हूँ।

बिल्कुल सही बात है, राष्ट्र का कोई पिता नहीं हो सकता। एकदम ठीक बात है, क्यों बोल रहे हैं “राष्ट्रपिता”? मैं भी सहमत हूँ।

इस राष्ट्र के यदि कोई पिता हैं, तो वो ऋषि हैं जिन्होंने उपनिषदों की, ऋचाओं की रचना करी। उनको बोलो राष्ट्रपिता, सत्य को बोलो राष्ट्रपिता।

और ये राष्ट्र बहुत पुराना है; उसका पिता अभी सौ-पचास साल पुराना कैसे हो जाएगा? ये देश नया-नया है राजनीतिक रूप से, राष्ट्र तो ये अतिप्राचीन है। तो आज के गाँधी राष्ट्रपिता नहीं हो सकते, मैं भी बिल्कुल सहमत हूँ। और मुझे पहली आपत्ति इसी बात से हुई थी कि इनको राष्ट्रपिता क्यों बोलते हैं, भई?

लेकिन आज जो उनके ऊपर कीचड़ उछाला जा रहा है, वो बहुत दुखदायी है। ऐसा नहीं होना चाहिए, बिल्कुल गलत है। बहुत कम लोगों में ये हिम्मत होती है कि “महात्मा” कहलाए जा रहे हों और फिर भी अपनी ज़िंदगी की बातें ख़ुद ही बताए दे रहे हैं, लो, ऐसा है; लो, ऐसा है; जीवन सार्वजनिक है। कुछ पूछोगे तो बता देंगे, जो जानना चाहते हो बोलो क्या है। नहीं तो दूसरे लोग तो ये दबा छुपी में ही रह जाएँगे।

वो जो भी जी रहे थे, और वो बार-बार यही बोलते थे, “मैं प्रयोग कर रहा हूँ, भाई, मैं जानता नहीं। मैं प्रयोग कर रहा हूँ।” एक पिता के रूप में बहुत सफ़ल नहीं हो पाए, वो भी ख़ुद ही बता दिया उन्होंने। पत्नी के साथ भी उनकी बात बहुत अरसे तक जमी नहीं, क्योंकि वो जिस तरह की पारिवारिक पृष्ठभूमि से आ रहे थे, वो पत्नी पर हक़ चलाते थे, धौंस जमाने की कोशिश करते थे। विवाह के कई दशकों बाद ऐसा हुआ कि वो सामंजस्य की और गहरे प्रेम की स्थिति ला पाए।

और कौन लोग हैं जो गाँधी पर कीचड़ उछाल रहे हैं? उनका अपना क्या स्थान है, उनसे नहीं पूछें? चलो, गाँधी की चर्चा कर लेंगे; कुछ तुम्हारी भी चर्चा करें, तुम किस स्तर के हो?

जब भी कोई ऐतिहासिक व्यक्तित्व हो और उस पर कोई खड़ा हो जाए तोहमत लगाने को, तो उससे भी तो पूछा जाना चाहिए कि चलो, उन्हें हमने मान लिया कि वो ठीक नहीं थे, उस पर चर्चा कर लेंगे। अब कुछ चर्चा तुम्हारी करें, तुम कौन हो? या वो बात नहीं करनी चाहिए। तुम्हारा स्तर क्या है? तुम्हारा स्थान क्या है?

उन्होंने तो अपनी सारी बातें किताबें लिखकर, या कभी किसी ने पूछ लिया तो, उन्होंने सब स्पष्ट कर दी हैं। और उन्होंने जो स्वयं ही बता दिया, उसको लेकर आज तुम शोर मचाते हो। तुम्हारे जीवन के कितने राज़ तुमने आज तक प्रकट किए हैं? और जैसे उनका तुम बताते हो, “अरे, वो दो लड़कियों को ऐसे लेकर चलते थे देखो,” आता है ये सब लिखा होता है; व्हाट्सऐप में, ट्विटर पर चलता है। ऐसे लिख देंगे, “हवसी बुड्ढा।” जब वृद्ध थे ऐसे अपना, “देखो, कितना हवसी है बुड्ढा!” वो तो अपना चल रहे हैं जनसामान्य के बीच, उनकी तस्वीरें खिंच रही हैं, उनके सामने उनकी तस्वीरें खिंच रही हैं। उन्होंने कहा, “खिंचे अच्छी बात है उसमे क्या छुपाना।” तुम अपनी ज़िंदगी का भी तो कुछ बताओ, क्या-क्या छुपा हुआ है? वो कब प्रकट होगा? कोई आवश्यकता नहीं है कि आप गाँधी की विचारधारा पर चलें, बिल्कुल नहीं।

उनकी बहुत-सी बातें, विशेषकर जो उनके आर्थिक क्षेत्र के सिद्धांत थे, अगर वो लागू कर दिया जाए तो उनके परिणाम भयानक भी हो जाएँगे। तो एक निष्पक्ष चिंतन होना चाहिए। जो बातें ठीक नहीं हैं, उनको अस्वीकार कर दो, बोल दो, नहीं मानते। लेकिन वहाँ बहुत कुछ ऐसा है जो काफ़ी उत्कृष्ट है, सीखने लायक है। आप उसको ठुकराकर गाँधी का कुछ नहीं बिगाड़ रहे हो, उनका क्या बिगड़ सकता है अब? लेकिन गाँधी से जो कुछ सीखने और मानने लायक है, आप उसको भी ठुकरा दोगे, तो आप अपना ही नुकसान कर रहे हो।

उदाहरण के लिए, आईआईटी में थे, तो वहाँ पर कई बार चर्चा होती थी, कि भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री है, वो पिछड़ कैसे गई इतनी? और धीरे-धीरे कैसे ऐसा हुआ कि; क्योंकि भारत टेक्सटाइल के लिए जाना जाता था, अंग्रेज़ों के आने से पहले भी, और अंग्रेज़ों के समय में भी कम से कम रॉ-मैटेरियल का यहाँ उत्पादन होता था, और एक हद तक यहाँ पर विकसित थी टेक्सटाइल इंडस्ट्री। क्या हुआ?

तो उसमें बात निकलकर आती थी कि भारत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री अटकी, उसमें गाँधी जी के सिद्धांतों का बड़ा योगदान था। और ये बात साफ़ है, तथ्यात्मक है, ये दिख रही है। भई, हैंडलूम पावरलूम से कभी जीत सकता है क्या? चरखा चलाकर तुम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कॉम्पिटिटिव हो सकते हो क्या? लेकिन आप ये थोड़ी बोलोगे कि वो खलनायक थे, या भारत का नुकसान करना चाहते थे; इसलिए उन्होंने कहा कि खादी पहनो और चरखा कातो, इसलिए तो नहीं कहा।

भई, कुछ उन्होंने सोचा, जितनी उनकी बुद्धि थी उन्होंने सोचा। तुम्हारी बुद्धि उससे आगे चलती है तो तुम उससे बेहतर कुछ कर लो, लेकिन उस आदमी को इतना श्रेय तो दो कि उसे जो कुछ भी सही लगता था, उसने हिम्मत के साथ सामने रखा और उस पर देशवासियों का नेतृत्व करके अमल भी करवाया।

अंग्रेज़ों को ज़बरदस्त चोट दी थी गाँधी ने। ये जो विदेशी महीन कपड़ों की होली जलवाते थे, ये कोई हल्की चीज़ नहीं थी। मैनचेस्टर से जाकर पूछो, कि गाँधी का वहाँ क्या नाम था और क्या छवि थी। और भारत से जो कच्चा माल निर्यात होता था, उसमें तो बहुत ज़्यादा यही था सब, ब्रिटेन की टेक्सटाइल इंडस्ट्री के लिए। और उसकी जो एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन थी, वो भारत था।

गाँधी ने कहा, मैं इनको वहाँ मारूँगा जहाँ इन्हें चोट लगेगी। गोली न मेरे देशवासियों के पास है, न चलवाऊँगा। चलवाऊँगा तो यही सब मरेंगे और लाखों-करोड़ों में मरेंगे; ब्रिटेन की बात कर रहे हैं हम। जैसे आज का अमेरिका है, उससे लगालो दस गुना ज़्यादा ताक़तवर तब का ब्रिटेन था। बोल रहे हैं, ये जो दुनिया का सबसे ग़रीब देश है, इससे मैं कैसे कह दूँ कि जाकर ब्रिटेन से सड़कों पर भिड़ जाओ, ऐसे ही सड़कों पर? बोले, ये नहीं। मैं ब्रिटेन को वहाँ चोट मारूँगा जहाँ उन्हें चोट लगती है। ये व्यापारी हैं सब और ये पैसे के भूखे हैं। इन्हें भारत से जो पैसा मिल रहा है, भारत को लूट-लूटकर लंदन मोटा हो रहा है, मैं भारत की लूट रुकवाता हूँ। और उस लूट को रुकवाने के लिए उन्होंने ये सब करा, चाहे खादी की बात हो, चाहे नमक सत्याग्रह हो।

हम बिल्कुल मानेंगे कि उन्होंने जो कुछ भी किया, ये अपर्याप्त था। हम बिल्कुल मानेंगे कि इस तरह नहीं कहना चाहिए कि “दे दी हमें आज़ादी बिना खड़्ग, बिना ढाल।” इससे ऐसा लगता है जैसे भारत की आज़ादी सिर्फ़ एक आदमी के बूते हमको मिल गई। “दे दी हमें आज़ादी,” गाँधी जी आज़ादी लेकर आए और भारत की झोली में डाल दी, बिल्कुल ऐसी बात नहीं है। द्वितीय विश्वयुद्ध न हुआ होता, तो आज़ादी को और बहुत समय लग जाता। 1946 की नेवल म्यूटिनी न हुई होती, तो आज़ादी को और समय लग जाता। और जो क्रांतिकारी हुए थे, जिन्होंने हिंसा का मार्ग अपनाया था वो न हुए होते, तो भी आज़ादी को बहुत और समय लग जाता। ये सब बातें हम मानते हैं।

सुभाष चंद्र बोस ने भी जो किया, उसने भी आज़ादी की तिथि को और निकट लाने में सहायता की। लेकिन ये बता दो, गाँधी न होते तो क्या आज़ादी उसी दिन मिल जाती जिस दिन मिली? क्या गाँधी ने आज़ादी को लाने में कोई मदद नहीं की? सबने किया और गाँधी ने भी किया। ये कहना भी गलत है कि गाँधी ने लाकर आज़ादी दे दी; और ये कहना भी बहुत गलत है, कि आज़ादी वग़ैरह में गाँधी का क्या योगदान था।

रही बात इसकी कि वो संत थे कि नहीं थे? कांग्रेस से उन्होंने बहुत पहले इस्तीफ़ा दे दिया था। मेरे ख़्याल से 1931 में; देखना कब करा था? 1931 में या 1925 में। आज़ादी से बीस साल पहले, पंद्रह साल पहले, वो कांग्रेस छोड़ चुके थे। उसके बाद कांग्रेस पर उनका अधिक से अधिक एक नैतिक प्रभाव था। कि कांग्रेस के नेता वग़ैरह आकर गाँधी जी से सलाह लेते थे। कांग्रेस का अध्यक्ष कौन होगा, ये भी गाँधी के आशीर्वाद से तय होता था। तभी वो सुभाष चंद्र बोस और पट्टाभि सीतारमैया वाला।

वो क्या करते थे कांग्रेस छोड़ने के बाद? उनका कार्यक्रम क्या बचा था? कहते थे, “मैं समाज-सुधार का काम कर रहा हूँ। मुझे भारत से अस्पृश्यता हटानी है। ये जो गाँवों में जो इतनी गंदगी है, वो गंदगी साफ़ करनी है।

इधर देखा नहीं सब कूड़ा-कचरा फैला हुआ है; तो मन की गंदगी भी, शरीर की गंदगी, सब हटाना है।” वो इन कामों में लग गए थे। 1934 में उन्होंने छोड़ी थी, आज़ादी से तेरह साल पहले कांग्रेस छोड़ चुके थे। तो उसके आधार पर आपको उन्हें संत मानना है, नहीं मानना है, ये आप तय कर लीजिए, कोई बड़ी बात नहीं है।

मत कहिए कि वो संत थे, लेकिन इतना तो मानोगे कि वो समाज-सुधारक थे। हरिजन कहा उन्होंने दलितों को। “कुएँ खोलो इनके लिए और मंदिर खोलो इनके लिए। और शिक्षा खोलो, स्कूल खोलो इनके लिए।” कुछ गलत कर रहे थे? हाँ, आप बिल्कुल कह सकते हैं कि और करना चाहिए था, हम सहमत हैं, और करना चाहिए था। तो आप करिए न और, आज आपको किसने रोका है? पर उन्होंने जितना किया, उनको तो डिस्क्रेडिट मत करिए न। आज आपको और ज़्यादा करने से कोई नहीं रोक रहा, पर एक इंसान जो कर गया है उसका ज़बरदस्ती अपमान करो, ये ठीक नहीं है।

आज आप जितनी भी चीज़ों को बहुत ऊँची चीज़ें कहते हैं, लिबरल वैल्यूज़ वग़ैरह, उनमें से कई ऐसी थीं जिनको गाँधी ने बहुत आगे बढ़ाया। आप फ़ेमिनिज़्म की बात करते हैं, गाँधी का महिलाओं की शिक्षा को लेकर और महिलाओं की बेहतरी को लेकर क्या विचार था, पढ़ने योग्य है; अच्छा लगेगा आपको।

और कुछ नहीं तो बाक़ी छोड़ो, उनकी ढिठाई की ही क़द्र कर लो, जिद्दी। और ये जो बार-बार बोलते हो न, कि “वो मुसलमानों की ओर झुके हुए थे, मुसलमानों की ओर झुके हुए थे।” कुछ पढ़-लिख लिया करो, फिर बोला करो। नोआखाली में दंगे हुए थे; उसमें मुसलमानों ने हिंदुओं को काट दिया, हिंदू सब भाग-वाग गए। बहुत बड़ा क़त्लेआम हुआ था। वही जो मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन का नारा दिया था, उसी के बाद हुआ था ये सब।

तो गाँधी वहाँ गए, खड़े हो गए, बोले, नहीं होने देंगे। वो किसके पक्ष में खड़े थे?

श्रोता: हिंदू।

आचार्य प्रशांत: और उसके बाद मालूम है क्या बोलते हैं? बोलते हैं, हिंदू होने के नाते मुझे शर्म आती है कि हिंदू इतने कायर क्यों हैं कि जब मुसलमान मारते हैं तो भाग जाते हैं। ये शब्द हैं उनके, गूगल कर लीजिएगा। बोलते हैं, और बताता हूँ साफ़-साफ़, कभी भी दंगे वग़ैरह होते हैं, मैं देख रहा हूँ, “द हिंदूज़ कम सेकंड बेस्ट;” सेकंड बेस्ट माने, यही पिटते हैं। और आगे बोलते हैं, “मैंने ये देखा है कि आम मुसलमान एक बुली है और आम हिंदू एक कावर्ड है।”

जो बात देख रहे हैं, साफ़-साफ़ कह रहे हैं कोई लाग-लपेट नहीं। हिंदू–मुसलमान को लेकर आज गाँधी जी पर इतना आक्षेप करते हो न, तो उन्होंने बोल दिया था, आम मुसलमान एक गुंडा है और आम हिंदू एक कायर है। और ये बोलते हुए उन्होंने ये नहीं सोचा कि मुसलमानों की भावनाएँ आहत हो जाएँगी या हिंदुओं की भावनाएँ आहत हो जाएँगी। फिर आगे बोलते हैं, “और इस बात पर हिंदू और मुसलमान, दोनों को शर्म आनी चाहिए। मुसलमान को शर्म आनी चाहिए कि वो गुंडा क्यों है, और हिंदू को शर्म आनी चाहिए कि वो कायर क्यों है।”

मुझे तो नहीं लग रहा कि ये आदमी किसी का पक्ष ले रहा है। मुझे तो लग रहा है, इसको जो बात सीधी-साफ़ दिखाई दे रही है, उसको सपाट बोल रहा है। आपको लग रहा है पक्ष वग़ैरह? पता नहीं।

बल्कि गाँधी ने जो बोला है, वो बात तो राइट विंग के बड़े काम की है। जो हमारे ये सब दक्षिणपंथी लोग हैं, जो सबसे ज़्यादा गाँधी की निंदा करते हैं, उनको गाँधी के वचनों को उद्धृत करना चाहिए, क्या? कि, “एक हिंदू होने के नाते मुझे शर्म आती है कि हिंदू इतना कायर क्यों है कि जब भी लड़ाई की नौबत आती है, वो पीछे हट जाता है।”

हम कहते हैं, गाँधी ने हिंदुओं को कायर बना दिया अपनी अहिंसा बताकर। हम कह रहे हैं, गाँधी ने अहिंसा बता-बताकर हिंदू को कायर और नपुंसक कर दिया। और गाँधी तो वहाँ बैठकर इसी बात पर आश्चर्य और शोक प्रकट कर रहे हैं कि आम हिंदू कायर क्यों हैं। वो तो कह रहे हैं, कि जब भी आमने-सामने द्वंद्व की नौबत आती है, हिंदू क्यों पीछे हट जाता है? मत हटो पीछे।

अब बताओ, उन्होंने हिंदुओं को कायर बनाया, या हिंदुओं की कायरता पर आघात किया? जल्दी बोलो।

श्रोता: आघात किया।

आचार्य प्रशांत: इसी तरीके से साफ़ कहा था, कि अगर देश की सुरक्षा पर ख़तरा आ रहा है और सीमा पर लड़ाई की नौबत आ रही है, तो मैं नहीं कह रहा हूँ कि गोली मत चलाना। वो जिस अहिंसा की बात कर रहे थे, उसको समझो। वो अहिंसा आपको कायर या नपुंसक बनाने के लिए नहीं थी। वो ख़ुद ही बोलते थे कि मेरी अहिंसा बड़े साहस की चीज़ है।

क्या महात्मा थे, क्या ऋषि थे? नहीं, मैं भी नहीं मानता कि महात्मा या ऋषि थे। आपको प्यार आ गया, जनता ने उन्हें महात्मा कह दिया, अच्छी बात है। गीता के विषय पर उन्होंने जो कुछ बोला है, उसमें बहुत गहराई नहीं है। अनासक्ति आश्रम है उनका उत्तराखंड में, मैं वहाँ गया वहाँ उनकी बातें लिखी हुई थीं, मैंने पढ़ीं। बहुत उनमें दम नहीं था। बहुत अच्छे से वो गीता के श्लोक और वेदान्त का दर्शन नहीं समझते थे।

लेकिन जो भी है, अनासक्ति अच्छी चीज़ होती है, इतना तो वो जानते थे। क्या इस बात का भी श्रेय नहीं दोगे उनको? और इसका श्रेय कौन नहीं दे रहे उनको? जो ख़ुद आसक्ति के कीचड़ में गले बराबर डूबे हुए हैं।

गाँधी पर मैं अधिक से अधिक इतना कह सकता हूँ, कि अनासक्ति का वास्तविक अर्थ वो नहीं जानते थे। ठीक है। तो अनासक्ति का वास्तविक अर्थ दुनिया के पूरे इतिहास में कुल जाना भी कितने लोगों ने है? सौ-पचास लोगों ने? गाँधी नहीं जानते थे, ये बहुत बड़ा इल्ज़ाम नहीं हो गया?

लेकिन गाँधी पर जो इल्ज़ाम लगा रहे हैं, वो ख़ुद कितनी आसक्ति में डूबे हुए हैं, वो तो बताएँ। और फिर पुरानी सीख है ज्ञानीयों की, “सार-सार को गहि रहे, थोथा दे उड़ाए।” उनसे जो बात सीखने लायक है, उसको सीखो न; और बाक़ी बातों की उपेक्षा करो, आगे बढ़ जाओ। बाक़ी बातों से क्या मतलब? यूँ ही बैठकर निंदा किए जा रहे हो, किए जा रहे हो। क्या मिलेगा?

हमारे भी होते हैं घर-परिवार में बुज़ुर्ग लोग। गाँधी साठ पार कर गए, सत्तर पार कर गए, पिचहत्तर पार कर गए, अस्सी के हो रहे हैं। और वही दो हड्डी का कंकाल-नुमा आदमी उपदेश-यात्रा करे जा रहा है, करे जा रहा है। इतना ही करके दिखा दो ना। ऐसा करो, पदयात्रा करते हुए उनकी निंदा करो। तुम भी उतना चलकर दिखा दो, जितना वो चलते थे उस उम्र में। अब चलते-चलते उनकी निंदा कर दो। हम नहीं कह रहे हैं, कि कोई अगर पदयात्रा कर रहा है, तो इसी नाते वो महान हो गया। पदयात्रा करने भर से कोई महान नहीं हो जाता, बिल्कुल ठीक बात है।

लेकिन कुछ तो उसको सम्मान दे दो। या उनकी प्रतिमाओं को खंडित करोगे? उस पर जाकर जूते चढ़ाओगे? अभी गाँधी जयंती बीती, देश में बहुत जगहों पर हुआ। वो जाकर मल-टट्टी फेंक कर आ रहे हैं गाँधी जी के चेहरों पर। ये क्या है? ये कहाँ की मर्यादा है, कहाँ के संस्कार हैं?

आपको इतना मैं बता देता हूँ, वो जीवित हों और आज यहाँ आ जाएँ, इसी मंच पर आ जाएँ, इसी कुर्सी पर बैठ जाएँ, आज भी आप उन्हें मंत्रमुग्ध होकर सुनेंगे। दम था बंदे में; हल्का आदमी नहीं था वो। हाँ, सुनने के बाद आप कह सकते हैं कि उनकी बहुत-सी बातें गलत हैं या व्यावहारिक नहीं हैं? लेकिन आप ये नहीं कह पाएँगे कि बंदा हल्का है। जो उनके धुर-विरोधी थे, वो भी कभी ये नहीं कह पाए कि बंदा हल्का है।

चर्चिल को कोफ़्त थी गाँधी से, अरे बाप रे! गूगल करिएगा राउंड टेबल कॉन्फ़्रेंस, लंदन की। देखिएगा, वहाँ वो सारे बैठे हुए हैं, सूट ही नहीं, गर्म सूट पहनकर। और उनके बीच में एक ही आकर बैठ गया। एक नंगे आदमी ने बाक़ी सबमें हीन भावना भर दी है। कह रहे, “ठंड नहीं लग रही?” और ये एक मोरल वेपन है, जिसका उन्होंने इस्तेमाल कर दिया है। कह रहे हैं, “मैं भारत हूँ, मैं अकेला हूँ; मेरे पास संख्या नहीं है, मेरे पास बल नहीं है, मेरे पास पैसा भी नहीं है लेकिन देखो, मेरे सामने तुम सब लज्जित हो।”

मत चलो उनके सिद्धांतों पर, मत मानो उनके आदर्शों को, लेकिन उनको एक बार ठीक से पढ़ लो, जान लो।

उनकी बहुत-सी बातें वैसे भी अब बहुत आउटडेटेड हो गई हैं, उसमें रखा नहीं है कुछ। लेकिन फिर भी, इंसान के तौर पर उन्हें जानोगे, तो तुम्हारे लिए ही अच्छा होगा। आ रही बात समझ में?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
C
CHANDINI DASH
7mon ago
thank you Acharya ji 🙏🏼 ❤️
Y
Yogesh Mishra
7mon ago
गांधी जी को भला या बुरा कहने वाले तुम कौन होते , अपनी कायर्ता को गांधी जी नाम की आर में छुपाओ मत | आत्म अवलोकन करो |
Y
Yogesh Mishra
7mon ago
चलो गांधी जी बुरे थे या भले थे, ये सब बात छोड़ो तुम्हारे पूर्वज क्या कर रहे थे, उस समय | मैं बताता हूं , तुम्हारे पूर्वज तुम्हारे मम्मी दादी की घर में काइड करते थे, लोकधर्मिक थे , आकाश में बैठे हुए ईश्वरीय शक्ति का इंतज़ार कर रहे थे...
R
Ritu Sharma
7mon ago
धन्यवाद आचार्य जी, लेख पढ़ कर स्पष्टता मिली। गांधी जी को मैने हमेशा विशिष्ट माना और महान भी। किताबो और फिल्मों से ही मैं उनसे परिचित हुई और प्रभावित भी। आज कल उनको लेकर जो गलत बातें, उनकी चारित्रिक छवि को धूमिल करने का जो प्रयास किया जा रहा है उसमें मैं सही गलत का निर्णय नहीं कर पा रही थी आज यह लेख पढ़ कर बहुत सारी बातें स्पष्ट हुई।
N
Nitin Kesari
7mon ago
आज तक जितने भी महापुरुषों श्रृंखला है उनके बायोग्राफी में अच्छाई और बुराई पड़ने को मिलेगी। हमे क्या लेना है यह केंद्र आचार्य जी से समझने को मिला। धन्यवाद आचार्य जी
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