दुनिया ऐसी हो जाए और ज़िंदगी ऐसी हो जाए कि किसी विरोध की ज़रूरत ही न पड़े। पर आज ऐसा नहीं है, आज बहुत कुछ ऐसा है जिसे विरोध की ज़रूरत है। तो मैं वो विरोध कर रहा हूँ ताकि जो कुछ हटाया जाना है, मैं उसको हटा दूँ और मेरे बाद, मेरे अलावा कम ज़रूरत पड़े किसी को उतना जूझने की। लेकिन मान लो, मैं काम नहीं कर पाता पूरा, जिसकी बहुत संभावना है, तो जूझने से डरना मत। याद रखना कि संघर्ष इसीलिए है ताकि एक दिन संघर्ष न करना पड़े।
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, मैं असम से आई हूँ। मैं बुक स्टॉल लगाती हूँ। तो मेरा प्रश्न है कि मैं आपके जैसा कैसे बन सकती हूँ? बेपरवाह।
आचार्य प्रशांत: अरे, मत बनना भाई, मैं ख़ुद परेशान हूँ अपने जैसा होकर।
प्रश्नकर्ता: नहीं सर, मुझे आपके जैसा बनना है, क्योंकि मुझे बेपरवाह, बेफ़िक्र बनना है। बहुत सारी सिचुएशन्स होती हैं जहाँ पर मुझे रूडली ऐक्ट करना चाहिए, पर लोगों को खुश करने के लिए मैं उनकी तरह, मतलब, उनको खुश करने के लिए उनके हिसाब से चलती हूँ। मुझे नहीं करना है वो सब चीज़ें। बहुत सारी चीज़ें मुझे बतानी हैं, क्लाइमेट चेंज के बारे में, पशु क्रूरता के बारे में।
आचार्य प्रशांत: मैं कभी भी नहीं चाहूँगा कि आप में से किसी की भी किस्मत इतनी ख़राब हो कि उसे मेरे जैसा बनना पड़े। मैं कभी भी नहीं चाहूँगा। मैं काम इसलिए कर रहा हूँ ताकि किसी को भी आगे ये काम न करना पड़े।




