समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।”
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम सीता है और मैं पुणे से ही हूँ। मैं पिछले ढाई सालों से गीता सत्र से जुड़ी हूँ, और बाहरी और भीतरी बहुत बदलाव आए हैं। सच में, मैंने बहुत‑सी व्यर्थ चीज़ों को, व्यर्थ विचारों को खोया है।
तो मेरा आज का प्रश्न है कि जब भी मैं मेरे आसपास के लोगों से गीता की बात करती हूँ, तो वो मुझे थोड़ा पिछड़ा हुआ मानते हैं और स्वयं को रैशनलिस्ट बोलते हैं। और तर्क ये देते हैं कि हिंदू धर्म में जातिवाद है और सदियों से ये स्त्रियों के प्रति शोषण का माध्यम रहा है। तो प्रश्न ये है कि क्या हिंदू धर्म वास्तव में पिछड़ा हुआ धर्म है?
आचार्य प्रशांत: मैं शुरुआत कहाँ से करूँ? जिसको हिंदू धर्म कहते हैं, उससे अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिंदू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है। हिंदू धर्म एकमात्र धर्म है।
क्यों? क्योंकि धर्म है क्या? ये बात आपके सपनों से, कल्पना से, मान्यता से नहीं आ जाएगी। वेदान्त इकलौता है जो शुरुआत करता है परिभाषा से ही, कि ‘धर्म माने क्या?’ और यहाँ पर भी रुक नहीं जाता। ऋषि ठिठक कर कहते हैं, सारे अर्थ, धर्म माने क्या? ‘माने,’ माने अर्थ। सारे अर्थ किसी के लिए होते हैं, वो कौन है? धर्म किसके लिए है?




