क्या हिन्दू धर्म पिछड़ा हुआ है?

Acharya Prashant

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क्या हिन्दू धर्म पिछड़ा हुआ है?
समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।” यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम सीता है और मैं पुणे से ही हूँ। मैं पिछले ढाई सालों से गीता सत्र से जुड़ी हूँ, और बाहरी और भीतरी बहुत बदलाव आए हैं। सच में, मैंने बहुत‑सी व्यर्थ चीज़ों को, व्यर्थ विचारों को खोया है।

तो मेरा आज का प्रश्न है कि जब भी मैं मेरे आसपास के लोगों से गीता की बात करती हूँ, तो वो मुझे थोड़ा पिछड़ा हुआ मानते हैं और स्वयं को रैशनलिस्ट बोलते हैं। और तर्क ये देते हैं कि हिंदू धर्म में जातिवाद है और सदियों से ये स्त्रियों के प्रति शोषण का माध्यम रहा है। तो प्रश्न ये है कि क्या हिंदू धर्म वास्तव में पिछड़ा हुआ धर्म है?

आचार्य प्रशांत: मैं शुरुआत कहाँ से करूँ? जिसको हिंदू धर्म कहते हैं, उससे अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिंदू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है। हिंदू धर्म एकमात्र धर्म है।

क्यों? क्योंकि धर्म है क्या? ये बात आपके सपनों से, कल्पना से, मान्यता से नहीं आ जाएगी। वेदान्त इकलौता है जो शुरुआत करता है परिभाषा से ही, कि ‘धर्म माने क्या?’ और यहाँ पर भी रुक नहीं जाता। ऋषि ठिठक कर कहते हैं, सारे अर्थ, धर्म माने क्या? ‘माने,’ माने अर्थ। सारे अर्थ किसी के लिए होते हैं, वो कौन है? धर्म किसके लिए है?

आपके प्रश्न में एक अंधविश्वास बैठा हुआ है कि कई धर्म होते हैं, जैसे धर्मों की रेस चल रही हो, और उसमें कोई रैशनलिस्ट, तार्किक व्यक्ति आकर के; अक्सर ये तर्कवाद, नास्तिकता, इन सबको एक में समेट करके एक बुत खड़ा करते हैं, जो कहता है, हिंदू धर्म पिछड़ा हुआ है। पिछड़ा हुआ नहीं है, वो धर्म है; और वो बताता है कि धर्म होता किसके लिए है। नहीं तो धर्म के नाम पर तो बस ये कह दिया जाता है कि धर्म वो चीज़ है जो इंसान को सच्चाई सिखाती है। धर्म वो चीज़ है जो इंसान को ऊपर वाले की आज्ञाओं का पालन करना सिखाती है।

पर यदि हिंदू धर्म का अर्थ है वेदान्त, तो वेदान्त वो है जो जीव को जीव से रूबरू करवाता है। जो हमें आईना दिखाता है, अहंकार की सच्चाई बताता है, और वही धर्म है उसके अलावा कुछ नहीं। बाक़ी सब कुछ दुनिया में कहीं हो रहा हो, किसी धर्म में, पंथ में, मज़हब में हो रहा हो; भारत में हो रहा हो, चीन में हो रहा हो, अमेरिका में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है बस। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। नहीं तो किसी धर्म की कोई ज़रूरत कहाँ है? जानवरों को कोई धर्म लगता है क्या? और जानवर को आप बहुत धर्म बताने जाओगे, तो वो कहेगा, भूसा दिखाओ पहले। आप उससे कहेंगे, ‘धर्मचर,’ माने धार्मिक आचरण कर। तो वो बोलेगा, ‘भूसाचर।’

बात आ रही है समझ में?

इसी तरीके से जूतों के लिए और दीवारों के लिए भी कोई धर्म नहीं होता। मनुष्य के लिए ही तो धर्म होता है। मनुष्य के लिए धर्म इसलिए होता है क्योंकि मनुष्य बेचैन होता है। हिंदू धर्म से वो सब प्रदूषण हटा दो, वो मिलावटें हटा दो, विकृतियाँ हटा दो, वो मिथ्या प्रकार के भाष्य हटा दो, जिन्होंने सब नाम‑काम ख़राब कर रखा है।

हिंदू धर्म कहता है, वो है कौन जो दुःखी है? वो है कौन जो बेचैन है? माइक बेचैन नहीं, इसीलिए माइक को धर्म की ज़रूरत नहीं। ये घड़ी बेचैन नहीं, इसे भी धर्म नहीं चाहिए। मुझे ये बेचैनी है क्यों?

दुनिया के ज़्यादातर धर्म बाहर की दिशा निकलते हैं। वो कहते हैं कि प्रकृति है, ये दुनिया है, मैं हूँ, तो मुझे किसी ने रचा होगा। वो शुरुआत ही एक अंधविश्वास से करते हैं, कहते हैं, मैं तो हूँ, तो मेरा कोई क्रिएटर होगा। वेदान्त अपने‑आप में इकलौता है जो कहता है, “नहीं, मुझे इतना भी विश्वास नहीं करना। पहले तो ये बताओ, मैं भी हूँ क्या?”

दूसरी जगहों पर बात ऐसे होगी, और वो हमारी सामान्य वृत्ति होती है, मैं किसी को नीचा नहीं ठहरा रहा यहाँ पर। मनुष्य की ही वृत्ति है वह। किसी धारा के मनुष्य की बात नहीं कर रहा, मनुष्य‑मात्र की बात कर रहा हूँ। सब की वृत्ति है वह। हम कहते हैं, दीवार मुझे दिख रही है, तो होगी न। आप कहते भी हैं, आँखों देखी बात, कानों सुनी बात। तो मुझे दिख रहा है आँख से, तो सच है। मुझे सुनाई दे रहा है कान से, तो सच है। है न? छुआ, माने है। यही हमारा साधारण तर्क होता है न। “मैंने इसको आँखों से देखा, त्वचा से छुआ, और कान से सुना, तो ये है।”

वेदान्त कहता है, अच्छा, माने तुम्हें कुछ दिखाई दे रहा है, सुनाई दे रहा है, तो सच हो गया। इसका मतलब फिर सच की, खोज की कोई ज़रूरत ही नहीं है। तुम ही सच हो। तुम कह रहे हो, ये इसलिए सच है क्योंकि ये मुझे दिखाई दे रहा है। माने, इसकी सत्यता किस पर आधारित हो गई? तुम्हारी इंद्रियों पर। तुम कह रहे हो, “मेरी आँखें इतनी सच हैं कि इन आँखों को जो दिखता है, वो भी सच है।” तो ये दुनिया सच है। तो फिर कहते हैं, “ये दुनिया जिसने बनाई, वो क्रिएटर है।”

वेदान्त कहता है, हटाओ ये बेकार की बात। ये दुनिया है भी? ये दुनिया है भी क्या? है भी? कैसे, पता है? वेदान्त इकलौता है जो इस दुनिया पर ही सवाल उठा देता है, कहता है, कैसे पता? और जैसे ही पूछता है, वो ये इसमें नहीं दौड़ लगा देता, कि “दुनिया तो है ही, आओ अब इस दुनिया के रचयिता के बारे में कहानियाँ बनाते हैं।” वो कहता है, दिख तो रहा है, पर क्या है? फँस गए।

वेदान्त अंतर करता है, तुम धार देखो। और तुम पिछड़ा बोल रहे हो? तुम कितने अनपढ़ हो। तुम धार देखो, कह रहा है, दिख तो रहा है, पर क्या है? और जो लोकधर्म है, वो कहता है, दिख भी नहीं रहा, तब भी है। कौन? भूत और भगवान। वो कहते हैं, दिख भी नहीं रहा, तब भी है। और वेदान्त कहता है, अगर दिख भी रहा है, तो भी क्या है?

ये पिछड़ेपन की निशानी लग रही है क्या? कौन आ रहा है कहने कि “हिंदू धर्म पिछड़ा हुआ है”? कौन है यह? इतना पिछड़ा हुआ है इंसान जो कह रहा है, “हिंदू धर्म पिछड़ा हुआ है।”

हाँ, मैं उस हिंदू धर्म की बात नहीं कर रहा हूँ, बिल्कुल। जो आपको सड़कों पर दिखाई देता है, जो घर और समाज में दिखाई देता है, उसको तो मैं हिंदू धर्म मानता ही नहीं। क्या बोल रहा हूँ मैं उसको बार-बार? लोकधर्म। हमें उससे क्या लेना देना? उसे तो हम कब का ठुकरा चुके। पर जिसको सनातन धर्म कहते हैं, यदि वो वैदिक है और वेदों का शिखर है, वेदान्त; तो कौन है ये जो वेदान्त को पिछड़ा हुआ कह रहा है? हार देखो वेदान्त की, झेल नहीं पाओगे, तुम ख़ुद नहीं झेल पाओगे। बाक़ी, अंधविश्वास पालना बहुत आसान है। “नहीं दिख रही, पर हैं। यहाँ आत्माएँ, रूहे, सोल्स घूम रही हैं। हिडन स्पिरिट्स, द इनविज़िबल वन्स आर वेंडरिंग।”

वेदान्त, वो कहता है, जो दिख रहा है, वो भी नहीं है। जो नहीं दिख रहा है, वो कहाँ से हो गया? ये मेज़ दिख भी रही है, तो सिद्ध करो कि ये है। ये है, ज्ञान मीमांसा। एपिस्टेमिक ऑनैस्टी। मैं अपने आप को इतना बड़ा नहीं मानता कि मेरी आँखें ही सबूत बन जाएँ। ये है, अहंकार का झुकना, विनम्र होना। मैं अपने आप को इतना बड़ा नहीं मानता कि सिर्फ़ इसलिए कि कुछ मेरे स्पर्श में आ रहा है, तो सत्य हो जाए। मैं इतनी बड़ी चीज़ नहीं हूँ। हाँ, स्पर्श में आ रहा है, पर सत्य है, नहीं कहूँगा।

सत्य की ये परिभाषा, तुम बताओ कहाँ और मिलती है कि जो काला तीत है, मात्र वही सत्य है? जो नित्य है, मात्र वही सत्य है? बोलो।

ये पिछड़ी हुई परिभाषा है? ये पिछड़ी परिभाषा है?

और जो अपने आप को तार्किक वग़ैरह बोलते हैं, वो तो पोस्ट‑ट्रुथ में घुस गए हैं। पोस्ट‑ट्रुथ माने क्या होता है? जिसको जो लग रहा है, वही सच है। ट्रुथ्स, मल्टीपल ट्रुथ्स, माय ट्रुथ, योर ट्रुथ, दिस ट्रुथ, दैट ट्रुथ, एवर‑चेंजिंग ट्रुथ, फ्लूइड ट्रुथ, सब्जेक्टिव ट्रुथ, डायनेमिक ट्रुथ।

वेदान्त कह रहा है, जहाँ सब्जेक्टिविटी आ गई, वहाँ ट्रुथ नहीं है। जहाँ समय ने स्पर्श भी कर लिया, वहाँ सत्य…। जो इतना भी बदल सकता है समय के साथ, वो सत्य नहीं है।

समस्या बस ये है; इसको मैं माया कहूँ, या जो हमारे सेज फ़िलॉसफ़र्स थे, दार्शनिक चिंतक, उनकी मासूमियत समझ में नहीं आता। कभी लगता है, ये माया है बस। इंसान की संरचना में ही कोई कमी है। हम बने ही ऐसे हैं कि हमारे भीतर एक इनबिल्ट एरर होता है, अहंकार नाम का। अभी चर्चा कर रहे थे थोड़ी देर पहले उसकी, कि इंसान पैदा ही होता है एक मैन्युफैक्चरिंग डिफ़ेक्ट के साथ। क्या नाम है उसका? अहंकार। तो कभी लगता है, इसको माया बोल दो और छोड़ो। और कभी लगता है, ये न उन ऋषियों की मासूमियत थी। उनको इतनी बड़ी बात पता चल गई कि उसके आगे उन्हें सब कुछ छोटा लगने लग गया।

सत्य के आगे किसी चीज़ की क्या हस्ती। हो सकती है? वो गुम से हो गए, गुम। गुफाओं में गुम हो गए, कंदराओं में गुम हो गए, वनों में गुम हो गए, पर्वतों में गुम हो गए। गुम हो गए। अध्यात्म का काम ही होता है, गुम कर देना। बड़ा मुश्किल है। बड़ा मुश्किल है अपने आप को बचाए रखना। अनंत सत्य के दर्शन के बाद गुम हो जाते हो, खो जाते हो। ऐसे लापता होते हो, अपना ही पता नहीं चलता। अपने आप को बनाए रखना, अपने आप को जीव समझना, जिसके दैहिक या सामाजिक कर्तव्य हैं, बड़ा मुश्किल हो जाता है। सब कर्तव्यों से आगे निकल जाते हो। संसार ही क्या है? मिथ्या। तो यहाँ कर्तव्य कैसे निभाने की कोई बात? ऐसे हो जाते हो।

वो गुम हो गए अपने ध्यान में, अपने वनों में, अपने आनंद में, अपनी मस्ती में। और गुम होने का नतीजा ये हुआ कि ये बात वो समाज के हर तबके तक नहीं ला पाए। ऐसा नहीं कि उन्होंने इस बात को छुपा कर रखा। छुपा कर नहीं रखा। बहुत निस्वार्थ होकर, बड़ी निष्कामना से उन्होंने अपनी बात को, जो कुछ भी बताया जा सकता है। सत्य तो क्या बताया जाएगा पूरी तरह? पर जितना कुछ भी बताया जा सकता है, उसके लिए उन्होंने दर्शन लिखकर, उपनिषद् लिखकर, मीमांसाएँ लिखकर और कई प्रकरण ग्रंथ लिखकर के, उन्होंने सौंप दिए समाज को। उन्होंने कहा, “इतना है, ये लो।” और वो स्वयं कहाँ रहे?

सत्य आपको निर्दोष कर देता है। निर्दोष माने, मासूम।

शायद देख ही नहीं पाए कि समाज उनके द्वारा दी गई बात का अब कितना दुरुपयोग करने वाला है। पहली बात तो, जो बात उन्होंने दी समाज ने उसको सब तक पहुँचने नहीं दिया। बहुत सारे वर्ग ऐसे बना दिए जिनको कह दिया, कि “तुम्हारे लिए वेद प्रतिबंधित है, निषिद्ध है। तुम वेद का पाठ नहीं करोगे। हमारी वर्ण व्यवस्था चल रही है, जिसमें कुछ लोग वेद पढ़ेंगे, बबाक़ी सब नहीं पढ़ेंगे।” जिन तक पहुँच भी रही, उनसे कह दिया, “वेद माने कर्मकांड। वेद माने दर्शन नहीं, वेद माने कर्मकांड।” फिर, जिन तक दर्शन भी पहुँच रहा है, तो कहा, “अच्छा, ये सब है उपनिषदों में। अब आओ, हम बताते हैं कि उपनिषदों की व्याख्या कैसे करनी है।”

और ऐसी‑ऐसी व्याख्याएँ कर दी उपनिषदों की, कि उसमें से द्वैत निकाल दिया। उपनिषद् में द्वैत निकाल दिया, इससे बड़ी माया क्या हो सकती है कि उपनिषदों का द्वैतात्मक अर्थ कर दिया जाए। बात आ रही है, समझ में?

और जो गुम हो गए थे वो? वो गुम ही रहे। वो गुम हैं, वो समाज से बहुत दूर थे। समाज से दूर थे, तभी उपनिषदों के वो दर्शन भी कर पाए। यही समाज में, साधारण जीवन में, गृहस्ती में फँसे रहते, तो झूठ में ही फँसे रह जाते। सत्य सम्मुख कभी होता भी नहीं। वो जहाँ थे, वो वहीं रह गए। उनकी बात सब तक पहुँची ही नहीं। कुछ तक आधी पहुँची, और बाकियों तक विकृत होकर के पहुँची। यही आधी अधूरी और विकृत बात आज का हिंदू धर्म बन गई है, जिसे आप “पिछड़ा” बोल रहे हैं। समझ में आ रही है बात?

ये लगभग ऐसा है; मुझे बताना है, मैं जो बोल रहा हूँ, इसको लिया जाए। उसमें से एक क्लिप निकाल दी जाए, और उस क्लिप को भी डॉक्टर कर दिया जाए, मॉडिफ़ाई कर दिया जाए। उसमें कुछ हिस्से इधर से जोड़ दिए, कुछ उधर से जोड़ दिए। और फिर कह दिया जाए, कि “ये वक्ता बहुत पिछड़ा हुआ है।”

तो ये बात न्याय की हुई? हुई क्या?

तो हिंदू धर्म के साथ क्यों अन्याय कर रहे हो? पहले बता तो दो, हिंदू धर्म माने क्या? किसकी बात कर रहे हो? तमाम तरह के जो पिछड़े हुए अंधविश्वास हैं, इनको हिंदू धर्म बोल रहे हो, तो हाँ, पिछड़ा हुआ है। सती प्रथा, दहेज प्रथा, इनको हिंदू धर्म बोल रहे हो, तो बिल्कुल पिछड़ा हुआ है। जाति प्रथा, भेदभाव, छुआछूत, इसको हिंदू धर्म बोल रहे हो, तो बिल्कुल पिछड़ा हुआ है। पर मैं पूछ रहा हूँ, ये सब हिंदू धर्म है ही कहाँ? ये कहाँ से हिंदू धर्म है?

तुमने किसी को भी, किसी भी बात को, किसी भी प्रथा को हिंदू धर्म का नाम दे दिया, तो वो हिंदू धर्म हो गया क्या? ये हिंदू है ही नहीं, जो ये सब कुछ कर रहे हैं। तुम दो बातें एक साथ कैसे बोल सकते हो, कि “हिंदू धर्म वैदिक है, लेकिन हम स्त्रियों को हीन मानते हैं।” ये दोनों बातें एक साथ कैसे चलेंगी? कैसे चलेंगी, बताओ? कैसे चलेंगी?

वेद शुरुआत प्रकृति पूजन से करते हैं, उसमें कर्मकांड आता है। कहते हैं, “ऐसे अग्निहोत्र होगा, इस तरीके से इस शक्ति को पुकारा जाएगा, फिर उसकी प्रशंसा की जाएगी, फिर उससे कुछ कामनाएँ पूरी करने के लिए कहा जाएगा।” शुरुआत वेदों की यहाँ से होती है। और ये जो वैदिक यात्रा है ये चलकर पहुँचती है दर्शन पर, और दर्शन कहता है, “तुम प्रकृति से परे हो।” किस अर्थ में? कि अपने आप को प्रकृति का भोक्ता मत बना लेना। भोक्ता बनाना, माने प्रकृति से संबंधित हो गए। संबंध रख के ही तो भोगा जाता है। तो वो संबंध मत रखो, जिसमें प्रकृति को भोगा जाएगा। तुम प्रकृति से पृथक नहीं हो, पृथक रखोगे, तभी तो पराएपन का भी रिश्ता बनाओगे न। वास्तव में पराएपन का रिश्ता बनाना भी अपनापन हो गया। नहीं समझे?

मुझे किसी को भोगना है, तो पहले मैं उसको अपना बनाऊँगा न। बात समझ में आ रही है? तो मैं यही तो कहूँगा, मैं और ये (हाथ में कप उठाते हुए) अलग‑अलग है, तभी तो। अगर मैं और ये एक हो जाएँ, तो मैं उसको भोग सकता हूँ क्या?

वेदान्त वहाँ पहुँचता है, जहाँ वेदों ने आरंभ में जो कुछ कहा है, उससे आयामगत ऊँचाई पा ली। बिल्कुल अलग बात कह दी। क्या कह दिया? जाओ, माण्डूक्य उपनिषद् के पास। वहाँ कहते हैं, “न जन्म है न मृत्यु है, न उत्पत्ति है।” उत्पत्ति शब्द है वहाँ। “न उत्पत्ति है, न नाश है।” और प्रकृति में तो उत्पत्ति, नाश, ये सब चल ही रहा है। वो है हिंदू धर्म, उपनिषद्।

अब समस्या ये है कि जो समसामयिक हिंदू धर्म है, उसमें उपनिषदों के लिए कोई जगह ही नहीं है। वो चल रहा है कुछ कुछ पुराणों पर, कुछ जो तंत्र के रिवाज़ हैं उन पर, बाक़ी जो स्मृति ग्रंथ हैं, उन पर चल रहा है। और इनके अलावा, जो स्थानीय क़िस्म की परंपराएँ हैं, लोक प्रथाएँ हैं, रिवाज़ हैं, उन पर चल रहा है। उसको आप बोल देते हो, हिंदू धर्म। वो हिंदू धर्म है ही नहीं।

पहले परिभाषा ठीक करो। पहली बहस तो परिभाषा पर होनी चाहिए। आप किसी भी चीज़ को हिंदू धर्म बोल देते हो और फिर कहते हो, “ये तो पिछड़ा हुआ है।” भाई, वो पिछड़ा हुआ है, पर वो हिंदू धर्म नहीं है। किसी की दहेज हत्या हो जाती है। आप कहते हो, “देखा, हिंदुओं में ये सब चलता है।” कहीं भ्रूण हत्या हो रही है, कहते, “देखा, हिंदुओं में ये सब चलता है।” बिल्कुल भ्रूण हत्या भयानक पिछड़ापन है, दहेज हत्या घोर हिंसा है। पर वो हिंदू धर्म थोड़ी ही है। वो हिंदू धर्म थोड़ी है।

हिंदू धर्म क्या है? ये हमसे छुपा कर रखा गया। देखो, समझो, जैसे आज आप एक बहुत छोटी संख्या में हो, अल्पमत में हो। हो ना? और बहुमत में कौन है? लोकधर्मी है। इंसान हमेशा से ऐसा ही था। ऋषि और ऋषियों की बात सुनने वाले, समझने वाले लोग हमेशा कम थे, अल्पमत में थे। और बाक़ी पूरा समाज वैसा ही था, जैसा आम इंसान हमेशा रहा है। कैसा था? शोषक था, हिंसक था, अज्ञानी था। उन्होंने कोई आदर नहीं करा ऋषियों का। आप सोचते हो, सब पुराने लोग अच्छे थे? नहीं। आज जितने प्रतिशत लोग अच्छे होते हैं, कभी भी उतने ही प्रतिशत लोग अच्छे थे।

पर आप कहते हो, “नहीं, पहले सतयुग था, अब कलयुग था, अब सब लोग गंदे होते हैं। पहले सब लोग अच्छे थे।” नहीं। पहली बात तो, वेदान्त इस तरह की कोई बात मानता नहीं, कि “इस प्रकार इतने करोड़ साल सतयुग, इतने करोड़ साल त्रेतायुग, ये सब कलयुग चल रहा है।” ये सब वेदान्त में नहीं माना जाता, बेकार। और अगर इन शब्दों का प्रयोग कभी वेदान्त में होता भी है, सतयुग, कलयुग, तो आंतरिक अर्थ में होता है, साइकोलॉजिकल टाइम के अर्थ में होता है। भीतरी समय, भीतरी समय जो आनंद में सिकुड़ जाता है और डर में फैल जाता है। फिजिकल टाइम के अर्थ में नहीं होता है।

बात आ रही है, समझ में?

तो पहले भी, वो मुट्ठी भर ही लोग थे जिन्होंने कहा, कि “सच के अलावा और सच से कम कुछ नहीं चाहिए।” बाक़ी सब लोगों को तो अपने झूठों से ही सरोकार था। वो अपने काम‑धंधों में, अपने साधारण हिंसात्मक संबंधों में, और अपने झूठों में ही व्यस्त थे। इन सब लोगों ने ऋषियों की बातों को लेकर के उसका घोर अनर्थ किया। घोर अनर्थ किया और इतना ही नहीं किया कि उपनिषदों के गलत अर्थ कर दिए। एक से एक उपनिषद् उसमें जोड़ भी दिए।

आपको ताज्जुब होगा ये जानकर के कि जो पहले उपनिषद् लिखे गए थे, वो लिखे गए थे आज से क़रीब, आप समझिए, क़रीब तीन हज़ार साल पहले, या तीन हज़ार साल से भी ज़्यादा। ठीक है? और जो नवीनतम उपनिषद् हैं, वो पता है कब लिखे गए? अभी पाँच सौ साल पहले तक। ऐसा है आम आदमी, उसने अपनी बात को सही साबित करने के लिए नए‑नए उपनिषद् भी लिख डाले। अभी पाँच सौ साल पहले तक भी उपनिषद् लोग लिखे जा रहे थे अपने नाम से। ये किया है हमने वेदान्त के साथ।

तो इस बारे में भी सावधान रहिएगा। कभी कोई आए और कहे, “ये फलाने उपनिषद् में ये बात लिखी है।” तो ये भी जांच लीजिएगा कि वो उपनिषद् कौन सा है। क्योंकि बहुत सारे उपनिषद् हैं जिन्हें कहा जाता है, सांप्रदायिक उपनिषद्। क्या कहा जाता है? सांप्रदायिक उपनिषद्। माने जो ये अलग‑अलग तरह के संप्रदाय निकले थे, इन्होंने अपने आप को वैध, जायज़ साबित करने के लिए अपने‑अपने उपनिषद् लिख डाले। ताकि ये लगे कि ये भी वैदिक परंपरा से ही आ रहे हैं।

क्योंकि जिसको देखो वही बोलता है, कि “भाई, हमारा भी वैदिक आधार है।” वेदों में ताक़त इतनी है कि अगर आप ये साबित नहीं कर पाए कि आपकी बात का वैदिक आधार है, तो आप खोखले प्रमाणित हो जाएँगे। तो तमाम तरह के, जो इधर‑उधर के छिटपुट संप्रदाय निकले, इन्होंने उपनिषद् तक लिख डाले अपने, और उन उपनिषदों में ऐसी व्यर्थ की बातें लिख दी कि जिसका कोई दार्शनिक आधार नहीं। और उन्हीं सब तमाम तरह की विकृतियों और बेकार की बातों के कारण आज आप कहते हो, कि “हिंदू धर्म पिछड़ा हुआ है।”

और अक्सर, जब भी बहस होती है, उनमें जो साबित करना चाहते हैं कि हिंदू धर्म पिछड़ा हुआ है, और उनमें जो कहते हैं कि नहीं, नहीं पिछड़ा हुआ है; वही जीतेगा जो कहता है कि पिछड़ा हुआ है। क्यों? क्योंकि उसने परिभाषा ही अपने पक्ष में कर ली है। वो कह रहा है, कि “अभी जो व्यवृत् है, अभी जो प्रैक्टिस्ड है, अभी जो व्यवहार में आ रहा है, हम इसको हिंदू धर्म मानेंगे।”

मैं इस परिभाषा को मानने से इंकार करता हूँ। आप अभी कुछ भी चलाते रहो, वो हिंदू धर्म कैसे हो गया? आप थोड़े उसके अविष्कारक हो। आप अपना कोई व्यक्तिगत धर्म चला लो, तो उसे अपना नाम दो न। हिंदू धर्म तो वही है जो वैदिक ऋषियों ने दिया। ठीक? या ये कहना बंद कर दो, कि “तुम्हारे सर्वोच्च ग्रंथ वेद हैं।” ये कहना बंद कर दो। तो हिंदू धर्म तो सिर्फ़ वही है जो वेदांत दर्शन पर आधारित है। बाक़ी, तुम कुछ भी करते रहो अपने घर, समाज, मोहल्ले, गाँव, कुटुंब में, वो हिंदू धर्म थोड़ी हो गया।

तुम्हारी बेईमानी ये है कि तुमने अपनी सब व्यक्तिगत विकृतियों को नाम दे दिया हिंदू धर्म का। ये तुमने बेईमानी की है। और तुम्हारी इस बेईमानी के कारण बदनाम कौन हुआ? हिंदू धर्म। तुम्हारी इस बेईमानी के कारण बदनाम हुआ, हिंदू धर्म। और फिर वहाँ से ये सब सवाल आते हैं, कि। जाति कहाँ से आ जाएगी, भाई, पूरा का पूरा उपनिषद् समर्पित है जाति का खंडन करने के लिए। इससे पता क्या चलता है? सोचो। सोचो क्या पता चलता है?

अगर उपनिषद् को जाति का खंडन करना पड़ रहा है, थोड़ा दिमाग लगाओ। तो इससे क्या पता चलता है? कि जाति चल रही थी। आम समाज में जाति चल रही थी और ऋषि कह रहे थे, “जाति गलत है।” पर ऋषि जीते नहीं, क्योंकि ऋषि कम थे। इसलिए तुमसे बोलता हूँ, क्या करो?

श्रोता: संख्या बल बढ़ाओ।

आचार्य प्रशांत: नहीं तो वही होगा जो हिंदू धर्म के साथ हुआ है।

अगर उपनिषदों को घोषित करना पड़ रहा है, साफ़-साफ़, एक्सप्लिसिटली, कि जाति मूर्खता है, तो इसका अर्थ क्या है? कि समाज में जाति चल रही थी। ऋषि जाति का खंडन कर रहे थे, लेकिन समाज ऋषियों की सुन नहीं रहा था। यही बात है न? और समाज ने न सिर्फ़ ऋषियों की सुनी नहीं, जो ऋषियों का धर्म था, उसका नाम लेकर के समाज ने अपने धर्म पर लगा दिया। समाज ने कहना शुरू कर दिया कि लोकधर्म ही हिंदू धर्म है।

अरे! लोकधर्म को कोई और नाम दो न। झुन्नू धर्म। उसको हिंदू धर्म क्यों बोल रहे हो? हिंदू धर्म सिर्फ़ वो है जो वेदान्त के दर्शन द्वारा अनुमोदित हो।

तुम कहते हो, “ये बात फलानी स्मृति में, फलाने पुराण में लिखी है। इसलिए हम मानते हैं।” साहब, स्मृति ख़ुद कहती है, और एक बार नहीं, पाँच बार कहती है, कि स्मृति की बस वही बात मानना जो श्रुति का अनुगमन करती हो। स्मृति की कोई भी बात अगर श्रुति के ख़िलाफ़ जाती है, तो वो ठुकरानी होगी। तो तुम ये कहो, कि “नहीं, हमारी फलानी कहानी में ऐसा चलता है, तो हम भी ऐसा करेंगे।” तुम्हारी कहानी में कुछ चलता होगा, सारी कहानियाँ स्मृति हैं। अगर वो कहानी श्रुति के ख़िलाफ़ जा रही है, तो उस कहानी की सीख को ठुकरा दो।

तुम्हारी परंपरा में कुछ चलता होगा, सारी परंपराएँ स्मृति हैं। तुम्हारी परंपरा अगर वेदान्त दर्शन के ख़िलाफ़ जा रही है तो उसको तुरंत ठुकरा दो। ये ठुकराना ही वास्तविक हिंदू धर्म है।

नेति-नेति संदेश है उपनिषद् का। ठुकराओ, मना करना सीखो। सच के अलावा कितनी भी बड़ी ताक़त सामने खड़ी हो, कहो, “नेति-नेति, ना, तू सत्य नहीं है।”

बात आ रही है, समझ में?

दुनिया भर में अनेक धार्मिक धाराएँ हैं और मैं कहता हूँ, वेदान्त जो समझता है, वही उन धार्मिक धाराओं का भी सही अर्थ कर पाता है। इतने सारे ग्रंथ हैं दुनिया में, और सब ऊँचे हैं, सब अच्छे हैं, क्योंकि केंद्र तो सभी का सत्य ही है। पर उनका भी सही अर्थ तब निकाल पाओगे, जब वेदान्त फ़िलॉसफ़ी समझी होगी। नहीं तो संकेतों के उल्टे‑पुल्टे अर्थ निकाल लोगे।

जो हिंदू नहीं भी हैं, वो भी मेरे पास आते हैं। कहते हैं, “आप जो पढ़ा रहे हो वेदान्त में, उसको पढ़के हम अब अपने धर्म ग्रंथ को बेहतर समझ पा रहे हैं। और अब हम अपने धर्म ग्रंथ की बेहतर इज़ज़्त कर पा रहे हैं, और ज़्यादा उसकी इज़्ज़त कर पा रहे हैं, क्योंकि अब हमने वेदान्त समझ लिया।” ये वेदान्त है।

तो इसीलिए हिंदू धर्म किसी का धर्म परिवर्तन नहीं करता। वेदान्त में कहीं नहीं मिलेगा यह, कि “जाओ और किसी का धर्म परिवर्तन करो।” वेदान्त कहता है, धर्म तो वो जो परिवर्तित हो ही नहीं सकता। तो धर्म परिवर्तन माने क्या? बेवकूफी की बात। वो कहता है, धर्म परिवर्तन नहीं करो। अधार्मिक को धार्मिक बना दो, चाहे अब वो धार्मिक किसी भी नाम से हो जाए। बात आ रही है समझ में?

और कोई भी धार्मिक धारा हो, उसमें सत्यता तो वेदान्त दर्शन ही लाता है। वास्तविक धर्म परिवर्तन है, अधर्मी का धर्मी हो जाना। क्या होता है रैशनलिस्ट माने? कौन हो रहा है रैशनल? तुम्हें पता भी है कौन हो रहा है? ख़ुद को देखे बिना क्रिटिक बनने की कोशिश, कि साहब, यू नो, आई एम क्रिटिकल ऑफ ऑल दिस। बट, हु इज द क्रिटिक? कैन वी शो द मिरर टू द क्रिटिक? क्रिटिक तो घूम रहा है, अपना लेंस ले के। मैं हर चीज़ को क्रिटिसाइज करूँगा।

भाई, तुझे लेंस से पहले मिरर की ज़रूरत है। और अगर मिरर ने दिखा दिया, तेरे पास आँख ही नहीं है, तो तू लेंस में देख क्या रहा था अभी तक? लेंस से भी कुछ दिखाई दे? क्रिटिक का लेंस है, उससे भी कुछ दिखाई दे, उसके लिए क्या चाहिए? देखने वाली आँख। तुम्हारे पास देखने वाली आँख है भी कि नहीं? और अगर है भी, तुम्हारे पास आँख तो तुम्हारी आँख साफ़ है कि नहीं? ये तो पहले तुम्हें आईना दिखाएगा न। तो लेंस से पहले तुम्हें आईना चाहिए। वेदान्त उस दर्पण का नाम है जो तुम्हें तुम्हारा असली चेहरा दिखाता है। कुछ आ रही है, बात समझ में?

एक अच्छे से बात समझ लो, बिलीफ सिस्टम नहीं है वेदान्त। कुछ मानने को नहीं बोलता, थियोलॉजी नहीं है। कहानी नहीं है, फ़िलॉसफ़ी है। फ़िलॉसफ़ी में सबसे पहले क्या वर्जित होता है? कुछ मानना। आपसे जब बात करता हूँ, तो क्या कहता हूँ, कि तर्क की श्रृंखला टूटनी नहीं चाहिए। बीच में कहीं भी विश्वास नहीं आ जाना चाहिए। वेदान्त विश्वास करने को कहता ही नहीं है। कहता है, प्रश्न करो। और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं देगी। प्रश्न का जवाब प्रयोग देगा।

दिखाओ, वेदान्त कहाँ कह रहा है, “फलानी बात मानो।” बताओ? कहाँ? कुछ उद्घोषणाएँ हैं, जैसे, “अहम् ब्रह्मास्मि” पर ये मान्यता थोड़ी है, ये कहानी थोड़ी है, ये एक फिलॉसफिकल डिक्लेरेशन है। और इसके पीछे पूरी एक श्रृंखला है तर्क की। हिंदू धर्म को पिछड़ा घोषित करने से पहले, हिंदू धर्म है क्या? ये जानिए। और अपने आप से ये भी पूछिए। ठीक है?

अब डिफ़ेंसिव बहुत हो गया, थोड़ा ऑफ़ेंसिव। अपने आप से ये भी पूछिए कि आप क्यों इतने आतुर हैं हिंदू धर्म को पिछड़ा घोषित करने में? आपका क्या स्वार्थ है? मुझे लेफ़्ट और राइट, दोनों तरफ़ से प्रबल विरोध मिलता है। अब आजकल तो राइट से ज़्यादा लेफ़्ट से मिलने लगा है। क्यों? क्योंकि उनका बड़ा स्वार्थ है गीता को पिछड़ा ग्रंथ घोषित करने में।

जैसे-जैसे आप लोग फैल रहे हैं, जैसे-जैसे आपकी संख्या और ताक़त बढ़ रही है, वैसे-वैसे ये जो तथाकथित रैशनल, लेफ़्ट-लिबरल, ये सब अलग-अलग हैं, इनकी बहुत अलग परिभाषाएँ हैं, लेकिन भारत में और कम पढ़े-लिखे लोगों में ये सब एक साथ ही हो जाता है। जैसे मार्क्सिज़्म और कम्युनिज़्म को एक समझ लेना, इनका ऐसे ही चलता है। तो इनको बड़ा ख़तरा हो जाता है।

ये कहते हैं कि हम; ऐसे कहते थे, “ये गीता, रामायण वग़ैरह मत पढ़ो।” इनको गीता और रामायण में भी अंतर समझ में नहीं आता। इनको लगता है, जैसे रामायण कथा है वैसे ही गीता भी कथा है। ऐसे ये बोल देंगे, ये वेद, पुराण सब बेकार। इन्हें वेद और पुराण में अंतर नहीं समझ में आता कि एक श्रुति है, एक स्मृति है। ये सब एक साँस में बोल देते हैं।

तो इनको बड़ा ख़तरा हो गया है कि अगर दिख गया कि गीता तो बिल्कुल ठोस दर्शन है, तो आज तक ये जिस आधार पर दर्शन को ही ठुकराते आए थे, वो आधार कहाँ बचेगा? और इनके लिए बहुत ज़रूरी था ठुकराना, क्योंकि नहीं ठुकराएँगे गीता को तो गीता इनके सिर चढ़कर बोलेगी, इनका अहंकार चूर कर देगी। अहंकार बना रहे, इसके लिए ज़रूरी है कि गीता को ठुकराते चलो। तो ये जो तार्किक जमात है, ये बिल्कुल, कि ये देखो, मुझे बोलेंगे ऐसे, “ये न अपनी पर्सनल फ़िलॉसफ़ी, जिसमें अच्छी-अच्छी बातें हैं कई; हम मानते हैं, इनकी पर्सनल फ़िलॉसफ़ी में काफ़ी अच्छी-अच्छी बातें हैं, ये अपनी पर्सनल फ़िलॉसफ़ी को गीता का नाम लेकर फैला रहे हैं।”

भाई, अगर वो मेरी पर्सनल होती तो मेरे लिए तो और अच्छा था न। मैं बोलता, मैं एक नई चीज़ लेकर आया हूँ। हेलो, मुझे क्रेडिट दो, मैं एक नई चीज़ लेकर आया हूँ। पर मैं इतना टुच्चा तो नहीं हूँ कि जो चीज़ वस्तुतः मेरी नहीं है, उसको मैं बोलूँ, मेरी है।

ये चाहते हैं, ये इतना मानने को तैयार हैं कि ये बंदा प्रशांत जो बोल रहा है, वो बात जनसाधारण के हित की है, इतना तो ये मान लेते हैं। लेकिन कहते हैं, कि ये इंटेलेक्चुअल डिसऑनेस्टी कर रहा है। ये बात अच्छी बोल रहा है, पर ये वो अच्छी बात गीता के नाम पर क्यों बोल रहा है? क्योंकि वो अच्छी बात गीता में तो कहीं लिखी नहीं है।

तुमने पढ़ी है? तुमने पढ़ी है, तुमने समझी है? ये कहते हैं, ये अपनी अच्छी-अच्छी बातें, या कि ये दुनिया भर में जो अच्छी बातें कहीं भी कही गई हैं, उन बातों को लेकर के आते हैं और कहते हैं, ये बात गीता में लिखी है।

भाई, मैं एक श्लोक पर दो-दो घंटे बोल रहा हूँ, और सब उपलब्ध है सार्वजनिक रूप से। दिखा दो न, कहाँ पर? एक भी जगह दिखा दो न। पर तुम्हारी औक़ात नहीं है इंटेलेक्चुअल एंगेजमेंट करने की। ज़्यादातर वो लोग हैं जिनसे नाम तक नहीं सही उच्चारित नहीं होते। ये अथर्ववेद को अर्थवेद बोलते हैं। ये केन उपनिषद् को केना उपनिषद बोलते हैं। ये कठ उपनिषद् को कथा उपनिषद् बोलते हैं। और ये मुझे बताने आते हैं कि आई ऐम बीइंग इंटेलेक्चुअली डिसऑनेस्ट।

क्यों? क्योंकि मैं गीता को उसके सही स्थान पर प्रतिष्ठित कर रहा हूँ, तो इनको बहुत बुरा लग रहा है। ये चाहते हैं कि गीता को माना जाए कि ये अंधविश्वास और जातिवाद फैलाने वाली चीज़ है।

अब आओ इस आइडियोलॉजिकल स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर। मैंने इनके लिए लिखा था, अभी पायनियर में लेख छपा था, कि “आइडियोलॉजिकल एनमीज़, साइकोलॉजिकल ट्विन्स: लेफ़्ट ऐंड राइट।” साइकोलॉजिकल ट्विन्स हैं ये, और आइडियोलॉजिकली एनिमीज़ बनते हैं एक-दूसरे के। तो ये जो राइट वाले हैं, इन्होंने गीता का सबसे गड़बड़ अर्थ कर रखा है। इन्हें मुझसे चिढ़ ये, कि गीता का ऊँचा अर्थ क्यों कर रहे हो? क्योंकि ये चाहते हैं कि गीता का वो अर्थ चले जो जातिवाद का समर्थन करता है, जो कर्मकांड का समर्थन करता है, अंधविश्वास का समर्थन करता है, द्वैतवाद का और जीवात्मा का समर्थन करता है। ये चाहते हैं। तो इन्हें जो बात मैं कह रहा हूँ, बहुत बुरी लगती है।

और ये (लेफ़्ट) जो हैं, ये इनकी बात पर यक़ीन करना चाहते हैं। तो ये दोनों एक साथ हैं। ये भी कह रहे हैं कि हाँ, जीवात्मा तो है और जीवात्मा ही पुनर्जन्म लेती है। और लेफ़्ट भी यही मानना चाहता है कि गीता में यही लिखा है, क्योंकि अगर लेफ़्ट ये मानेगा नहीं, तो गीता को बुरा कैसे बोलेगा? तो लेफ़्ट कहेगा, हाँ, जो पाखंड वाली परिभाषा है गीता की, वही गीता की वास्तविक परिभाषा है, और वो गीता की वास्तविक परिभाषा है जिसमें अंधविश्वास भरा है, इसलिए हम गीता को ठुकरा रहे हैं। ये देख रहे हो क्या चल रहा है? ये स्ट्रॉ-मैनिंग है। जो वहाँ लिखा ही नहीं है, वो तुम उस पर आरोपित कर रहे हो, और फिर तुम कह रहे हो हिंदू धर्म पिछड़ा हुआ है।

तुम देख रहे हो दोनों साथ-साथ कैसे हैं? इसका (राइट) स्वार्थ है ये कहने में कि गीता में अंधविश्वास है। ये उसको अंधविश्वास नहीं बोलेगा, उसको कहेगा, भगवान की आज्ञा है। ये, लेकिन, गीता में अंधविश्वास को बचा के रखे। क्यों बचा के रखेगा? क्योंकि उससे इसका घर चलता है, दुकान चलती है, रोटी चलती है, इज़्ज़त चलती है। ठीक है?

और इससे (लेफ़्ट) पूछो कि गीता का अर्थ बताओ। तो ये वही अर्थ बताएगा जो ये (राइट) बताता है। बोलेगा, वही अर्थ असली है। बताओ, ये उस अर्थ को असली क्यों मानना चाहता है? नक़ली अर्थ को ये जो लेफ़्ट वाला बंदा है, ये राइट वाले बंदे के अर्थ को ही असली क्यों मानना चाहता है? ताकि कह सके कि देखो, कितना गंदा अर्थ है। तो गीता को ठुकरा दो। समझ में आ रहा है?

ये दोनों को-कोस्पिरेटर्स हैं। ये तुम्हें लेफ़्ट और राइट दिख रहे हैं, ये दो लेफ़्ट और राइट नहीं हैं। ये दोनों चोर साझेदार हैं, गीता से उसका असली अर्थ और उसका असली सम्मान चुराने में। और दोनों में से कोई नहीं मानना चाहता कि गीता एक दर्शन की युद्ध-क्षेत्र पर व्यावहारिक अभिव्यक्ति है। कोई नहीं मानना चाहता।

इनसे (राइट) कहो, गीता दर्शन है। कहेंगे, दर्शन-वर्शन नहीं है, भगवान की आज्ञा है। इनसे (लेफ़्ट) कहो, दर्शन है, तो कहेंगे, दर्शन-वर्शन नहीं है, एक बिलीफ़ सिस्टम है, फुल ऑफ़ सुपरस्टिशन एंड ऑल काइंड्स ऑफ़ नैरोनेस। अब आप देख लीजिए आपको क्या करना है, आघात दोनों ओर से है। गीता को निचली जगह पर ही रखने में लेफ़्ट और राइट दोनों का स्वार्थ है। और उसको वो बोलते हैं, गीता की पारंपरिक जगह।

अरे, गीता का अर्थ परंपरा बताएगी या गीताकार बताएगा? मैं गीता का अर्थ परंपरा से पूछूँ या सीधे श्रीकृष्ण से पूछूँ? तो ये परंपरा बीच में कहाँ से आ गई? अगर परंपरा से ही पूछना होता, तो फिर गीता ही नहीं होती सिर्फ़ परंपरा होती। श्रीकृष्ण हमें क्या सौंप कर गए हैं? श्रीमद्भगवद्गीता; जिसे आपकी आँखें पढ़ सकती हैं। संस्कृत लिखी है, जो मानवकृत भाषा है, और मानव उसे समझ सकता है। और आपके पास अंतःकरण है, बुद्धि है, स्मृति है, तेज है, तर्क है और संभव है कि विवेक भी है आपके पास, तो आप समझ सकते हैं न गीता को। परंपरा की क्या ज़रूरत है?

पर ये लेफ़्ट-राइट दोनों का स्वार्थ है ये कहने में कि गीता का तो वही अर्थ चलेगा जो परंपरा से चलता आया है। परंपरा की सुनूँ या उपनिषदों की सुनूँ? बोलो?

इससे संबंधित आप लोगों के पास भी बहुत आपत्तियाँ आती होंगी। आती हैं? “कि ये बात थोड़ी है। ऐसा थोड़ी इसका मतलब है, ये है, वो है।” पचास बातें, आती हैं? किस-किस के पास आती हैं? हाथ खड़े करो।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मतलब, मैं ख़ुद उनमें से एक थी, जो आपने अभी बोला कि मतलब, मैंने जब भी कोशिश की गीता पढ़ने के लिए, तो नॉर्मल जो भी गीता के ट्रांसलेशन मिलते हैं, गीता के अर्थ मिलते हैं, वो पढ़कर ऐसा लगा कि अरे, श्रीकृष्ण भगवान ऐसे बोल रहे हैं कि अरे, तुम अगर गलत कर्म करोगे तो तुम स्त्री, शूद्र, वैश्य, ऐसी योनि में जन्म लोगे और ये करोगे। वो देखकर तो मैंने गीता बंद कर दी, कि अरे, ये तो कभी भी नहीं पढ़ना चाहिए अगर भगवान भी ऐसा बोल रहे हैं तो।

तो मतलब, शायद गीता के हर एक श्लोक का जो गलत, लोकधार्मिक अर्थ बनाया गया है, ऐसा तो किसी भी ग्रंथ के साथ नहीं हुआ होगा, जितना गीता के साथ हुआ है। तो आपसे जुड़कर जो समझ में आता है, हर एक श्लोक बिल्कुल अलग कह रहा है।

आचार्य प्रशांत: हिंदुओं ने हिंदू धर्म के साथ बहुत नाइंसाफ़ी करी है। समझ में आ रही है बात? वैदिक दर्शन के साथ बहुत अन्याय करा है। गीता मैं आपके सामने इसलिए लाता हूँ, क्योंकि वो वैदिक दर्शन से संबंधित है। क्या आप जानते हैं, गीता भी श्रुति नहीं है, स्मृति है। क्योंकि महाभारत का हिस्सा है। तो गीता भी श्रुति में नहीं है, पर स्मृति है।

तो मैं कहता हूँ कि श्रुति को ही नित्य मानना है, तो गीता क्यों पढ़ रहे हैं? क्योंकि गीता उपनिषदों को प्रतिबिंबित करती है। है स्मृति, पर श्रुति की अनुगूँज है उसमें।

इसलिए बात करता हूँ। उपनिषदे है गीता, इसलिए आपके पास लेकर आता हूँ। सरोकार मुझे वास्तविक उपनिषद् से है, वेदान्त दर्शन वहाँ है। पढ़ने का एक तरीका होता है। गीता समझनी है तो पहले उपनिषद् पढ़ने पड़ेंगे। उपनिषद् समझे बिना गीता पढ़ोगे, तो कुछ भी उल-जुलूल अर्थ करोगे उसका। उपनिषद् ही आम आदमी तक पहुँच सके, इसके लिए गीता आपके सामने उस संवाद के रूप में आती है, जो आप पढ़ते हैं, कृष्ण-अर्जुन संवाद। और सुंदर, मधुर, बहुत रोचक संवाद है वह, क्योंकि उसका नाता आम आदमी की ज़िंदगी से है।

अच्छा, आप ज़्यादा आइडेंटिफ़ाई किससे करोगे? यहाँ पर ऋषि बैठे हैं, और उनके सामने बिल्कुल इच्छुक, तत्पर, मुमुक्षु शिष्य बैठे हैं, और उनकी बातचीत चल रही है। या यहाँ लड़ाई-झगड़ा चल रहा है, भाई-भाई का मुक़दमा चल रहा है। मारपीट होने वाली है। हथियार, बंदूकें निकले हुए हैं। उसमें महिलाएँ भी शामिल हैं। भाई, भौजाई, भाँजी, पूरा कुल-कुटुंब की लंबी कहानी चल रही है। आप ज़्यादा रुचि किसमें दिखाते हो? जल्दी बोलो।

श्रोता: मार-पिटाई।

आचार्य प्रशांत: तो एक काम किया गया है कि आपकी रुचि जहाँ जा रही है न, यहाँ ऋषियों की बात को बीच में रख दिया गया है। महाभारत के बीच में गीता रख दी गई है। क्योंकि उनको पता है कि मज़ा तो आपको इसी में आता है, भाई-भाई की लड़ाई हो गई, भाई-भाई। उसको फलानी पसंद थी, पर उसको कोई और ले गया। अब वो बदले की आग में जल रहा है, वहाँ चीर-हरण करा रहा है भाई। उनको पता है यहाँ पर जो बात चल रही है।

केन उपनिषद् में भी इसीलिए कथा आती है, कठ में। अब इसका मतलब ये थोड़ी है कि यमराज कोई व्यक्ति हैं, जो सचमुच नचिकेता से बात कर रहे हैं। कठ उपनिषद् में भी तो कहानी आ रही है। क्यों आ रही है? ताकि रोचकता बनी रहे। क्योंकि आपको डेली सोप्स ज़्यादा पसंद हैं। पर प्रयास है आप तक दर्शन लेकर के आने का। तो गीता अगर समझनी है, तो उसे विश्वास के नहीं, दर्शन के माध्यम से समझना पड़ेगा। गीता के माध्यम से मैं आप तक क्या लेकर आ रहा हूँ? दर्शन, उपनिषद्।

लोग सोचते हैं, गीता तो भगवान जी की कथा है। भाई, वो उपनिषदों की फ़िलॉसफ़ी है, और वही हिंदू धर्म है। सनातन धर्म विशेष इसीलिए है, क्योंकि उसके नीचे फ़िलॉसफ़ी है। बाक़ी ज़्यादातर जो धार्मिक धाराएँ हुईं, उनके नीचे विश्वास है, बिलीफ़ है। मानो, “ऐसा; तुम्हें ऐसा मानना पड़ेगा। मानो, तुम्हें मानना पड़ेगा।”

हिंदू धर्म पिछड़ा हुआ बोल रहे थे। वो कह रहा है, हम कुछ मानने को तैयार नहीं हैं। हिंदू धर्म में कोई मान्यता नहीं चलती, वहाँ नीचे क्या है? धर्म के नीचे क्या है? दर्शन है। पर दर्शन को हमने हटा दिया। अब तो धर्म की भी कोई बात नहीं करता। तो दर्शन तो छोड़ो, दर्शन तो हटा ही दिया; हमने धर्म भी हटा दिया। अब हम कल्चर की बात करते हैं, द हिंदू कल्चर। ये क्या है? ये क्या है? माने, जो मास हिस्टीरिया है आप उसको हिंदू धर्म का नाम दे रहे हो। कल्चर माने, जो हमारा आम व्यवहार है न: हम ऐसे खाते हैं, ऐसे पीते हैं, ऐसे बोलते हैं, ऐसी आदतें हैं, ऐसी मान्यताएँ हैं, ऐसा चलने का तरीका है, ऐसे कपड़े पहनने का तरीका है, इसको ही तो कल्चर कहा जाता है।

तो दर्शन तो गया ही, धर्म भी गया। बचा क्या है बस? कल्चरल प्राइड। बात करें, “हमारी सांस्कृतिक विरासत।” पूछो, तुम्हारी सांस्कृतिक विरासत में धर्म कहाँ है? और जिसको तुम धर्म कहते हो, उसमें दर्शन कहाँ है? होना ये चाहिए कि पहला नंबर किसका हो? दर्शन का। दर्शन से क्या निकले? और फिर धर्म से क्या निकले? तो कल्चर सबसे नीचे की बात है, आख़िरी बात है।

दर्शन मूल है, धर्म तना है, शाखाएँ हैं, और कल्चर आख़िरी चीज़ है वो पत्तियों जैसा है। पर हमने पत्तियों को ही जड़ बना दिया, और जड़ गायब कर दी। और बिना जड़ की पत्ती कितनी देर तक चलेगी? तो हमारे पास बचा क्या है? काग़ज़ के फूल, और उन्हीं की हम पूजा कर रहे हैं। आ रही है बात समझ में?

यदि आप वास्तव में धार्मिक होंगे, तो धर्म में जहाँ कहीं आप कुछ ऐसा पाएँगे जिसका आधार बस अतीत है, परंपरा है, विश्वास है, लोक-मान्यता है, जनश्रुति है, आप तत्काल उसके सामने प्रश्न-चिह्न लगा देंगे। और वास्तव में धार्मिक आप तभी हो सकते हैं, जब दर्शन से आपका परिचय हो। जो दर्शन नहीं जानता, उसका धर्म अंधविश्वास के अलावा कुछ और नहीं होगा।

पटाखे फोड़ने से आप धार्मिक नहीं हो जाएँगे, गुलाल खेलने से आप धार्मिक नहीं हो जाएँगे। राखी बाँधने से आप धार्मिक नहीं हो जाएँगे। तिलक, टीका, चंदन, माला करने से आप धार्मिक नहीं हो जाएँगे, राम-नाम जपने से भी आप धार्मिक नहीं हो जाएँगे। धार्मिक होने के लिए पहले दर्शन से परिचय आवश्यक है। कौन-सा दर्शन? वो दर्शन जो आत्म-दर्शन करा दे। वो दर्शन जो आँखों को देखने वाले की तरफ मोड़ दे। इसलिए आपसे कहता हूँ, आत्म-अवलोकन ही एकमात्र धर्म है। वही वेदान्त का आधार है।

प्रश्नकर्ता: हेलो, सर, संतों ने या फिर श्रीकृष्ण ने गीता में, इतनी सरल भाषा में बात की है। फिर भी जो आम इंसान है, उसको सरल भाषा की बात क्यों समझ में नहीं आ रही?

आचार्य प्रशांत: वहाँ बात जो है, वो सरल भाषा में नहीं है, वहाँ बात तत्कालीन भाषा में है। उस भाषा में है, जो सामने किरदार है, अर्जुन, जो भाषा उसके लिए उपयोगी है। सरल करके मैं आपको बता रहा हूँ, समकालीन करके। गीता में भाषा तत्कालीन है। लोग चाहिए जो तत्कालीन को समकालीन कर सकें। मत कहो, गीता में भाषा सरल है। न सरल है, न असरल है। न सरल है, न जटिल है, तत्कालीन है।

प्रश्नकर्ता: सर, संतों ने जितने भी संत हुए, जैसे महाराष्ट्र में भी संत हुए, या संत कबीर हुए, तो उन्होंने जो भाषा यूज़ करी है, वो पूरी मतलब जन-मानस को समझ में आए।

आचार्य प्रशांत: “अवधू अंधाधुंध अंधियारा।” संतों की भाषा है, समझाओ।

“कबीर दास की उल्टी बानी, बरसे कंबल भीगे पानी।” संतों की भाषा है। कितनी सरल है, समझाओ न। कंबल बरस रहे हैं, पानी भीग रहा है। समझाओ।

काहे को ज़बरदस्ती सवाल पूछ रहे हो, बिना ये देखे कि सवाल में दम है भी कि नहीं।

हमेशा चाहिए होगी वो चेतना, वो आप में होनी चाहिए, मुझ में नहीं, जो कालातीत को काल-सापेक्ष संदर्भों से आज़ाद कर सके। भाषा हमेशा काल-सापेक्ष होती है, टाइम-डिपेंडेंट, कॉन्टेक्स्ट-डिपेंडेंट होती है। भाषा से ट्रुथ को लिबरेट कराने के लिए आपकी अपनी, रीडर की, सीकर की चेतना चाहिए होती है। नहीं तो आप ट्रुथ को भी कॉन्टेक्स्ट-डिपेंडेंट बना दोगे।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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