
For most of us, work is a random accident. You’re born a girl, so you’ll become a housewife. Born a girl, how will you be an astronaut or a swimmer? Is any self-awareness needed? Do not let your choice of work be dictated by social norms or established channels. When work arises as an expression of your deepest clarity, only then can there be love.

काम ज़रूरी होते हैं, रिज़ल्ट पर हमारा हक़ नहीं होता। जब फ्रस्ट्रेशन में समय बीत रहा हो, तो तुरंत याद आना चाहिए कि यार, इतना भी समय कहाँ है कि मैं उदास हो पाऊँ। और अगर मेरे पास ये समय है, तो मैं ये समय अपने असली काम से चुरा रही हूँ। काम ज़रूरी है, तो जो कुछ तुम्हारे पास है, सब दे दो न उसको। इतना थक जाओ कि फ्रस्ट्रेट होने के लिए भी एनर्जी न बचे।

कितनी बार सोचा कि ये रील आख़िरी होगी, बस यहीं पर रुक जाना है, और रात के 3:00 बज गए, 4:00 बज गए। क्या करोगे आप बहुत स्क्रॉलिंग करके, या टीवी, या एक-एक घंटा नहाकर, या दो-दो घंटा खाकर? कुछ नहीं है, बैठे हुए हैं; ऐसे ही, ऐसे ही, ऐसे ही — ‘हाँ भाई, दो चाय और ले आओ।’ जब पता चल गया है कि क्या सही है, तब अपने आप को उसको सौंपना पड़ेगा, शत-प्रतिशत। ये आर्किमिडीज़ जैसी हालत है कि कपड़े पहनना भूल गए; दिनभर काम में डूबे रहे, वापस गए, बस चित्त पड़ गए। पर चूँकि वो चीज़ एक कीमत माँगती है, तो वो 1% लोगों को ही मिलती है।

The Gita is not made precious by the fact that Arjun won. No, Arjun may win, or Arjun may lose. The real thing lies in having the Truth represented by Shri Krishna at the heart. When you are fighting the right war, then you have won even before the war has begun. That does not mean that you will no longer fight. You will still fight, and you will fight for the sake of external victory. But inwardly, you are victorious even before shooting the first arrow.

We say, “Oh yes, this thing is right, and it must be done, but…” If the thing is right and it must be done, from where has this split arrived? There is no need to split the action from the result of the action. Right action is its own fruit. Now you can rebel. If rebellion is the right thing to do, why bother about the result of rebelling?

रिश्ते फिर से याद रखिए, आपको अपने बंधन दिख रहे हैं तो उससे रिश्ता बनाइए, जो आपको चुनौती देता हो, आपके सामने आईने की तरह खड़ा होता हो, आपको आपकी बेड़ियाँ दिखा देता हो कि देखो अपने गले को, इसमें बेड़ियाँ ही बेड़ियाँ हैं। आपको अपने बंधन दिख रहे हों तो उससे रिश्ता बनाइए जो आपकी आज़ादी में सहायक हो। और आपको अगर दूसरे के बंधन दिख रहे हैं तो उसके सामने आईना बन के खड़े हो जाइए। यही राइट रिलेशनशिप है। इसके अलावा कुछ नहीं होती।

प्रचलित धारणा है कि अध्यात्म में आकर आदमी अकर्मण्य हो जाता है, यह धारणा बिल्कुल ग़लत है। अध्यात्म तो आलसी को भी कर्मनिष्ठ बना देता है। श्रीकृष्ण की पूरी सीख ही यही है — युद्ध सही रखो और परिणाम की परवाह मत करो। आध्यात्मिक समर्पण का अर्थ होता है — संग्राम। यदि संग्राम नहीं है तो जीवन कायरता भरा समर्पण है। आध्यात्मिक आदमी हमेशा चुनौतियों से जूझता हुआ मिलेगा। जो लड़ गया, वह समर्पित है और जो पीठ दिखा रहा है, वह घोर कर्ताभाव रखता है।

The Gita doesn't say, ‘Do not clamour for results and just keep doing whatever you are doing.’ The starting point is not work or action. The starting point is the choice of work. When work has been chosen rightly out of self-awareness, then you will have no desire to worry about what you will get from the work. There is so much love in it that there is no need left to desire anything from the future. One says, "It is sufficient that I'm able to act rightly. It would be ingratitude to ask for more." That is niṣkāma karma.

काम पैसा कमाने का ज़रिया नहीं होता, काम ज़िंदगी ही होता है। पैसे के लिए काम करके ज़िंदगी बर्बाद मत करना। काम ऐसा हो कि दिल लग जाए — असली प्रेम प्रसंग यही है। अगर तुम्हारे काम से सिर्फ़ पैसा मिल रहा है, तो वह तुम्हारा शोषण कर रहा है। ऐसा काम करो, जो तुम्हारी कमज़ोरियों को चुनौती दे और जिसकी दुनिया को ज़रूरत हो। जहाँ ये दोनों ज़रूरतें पूरी हों, समझ लो, वही तुम्हारे लिए सबसे अच्छा काम है।

दूसरे पर छींटाकशी करने का समय तो उसी के पास है, जिसके पास अपनी ज़िंदगी में कुछ ऊँचा नहीं है। सही ज़िंदगी में डूबने से ये होता है कि फालतू लोगों की फालतू बातें पता ही नहीं चलतीं। जो हिम्मत की राह चल रहे हैं, उन्हें दीन अनुभव करने के लिए ये दुनिया सौ कारण देगी। सही काम एक बार पकड़ लिया, तो फिर पकड़ लिया। डटे रहिए — यही गीता-सार है। यही वो रिश्ता है, जो एक बार बन जाए तो नहीं तोड़ा जाता।

आप ऐसी जगह पर हो जहाँ पेड़ कट रहे हैं, लाशें पड़ी हैं, हिंसा हो रही है, लोग विक्षिप्त हो रहे हैं; और आप पूछते हो कि कौन-सा अच्छा काम करें — देखो कि कौन-से बुरे काम हो रहे हैं। जो लोग मुठभेड़ और टकराव से बचते हैं, अध्यात्म उनके लिए नहीं है। आज हर अच्छा काम किसी बुरे काम का विरोध ही होगा। इसलिए, जो गलत हो रहा है — उसके ख़िलाफ़ खड़े हो जाओ। यही अच्छा काम है।

गीता में पहली बात तो कहीं लिखा नहीं है कि "कर्म कर और फल की चिंता मत कर" — ऐसा कोई श्लोक नहीं है। श्रीकृष्ण बस ये कहते हैं: सही कर्म कर, बस। अगर आपने सही काम उठा लिया, तो फल की चिंता आएगी ही नहीं। आपने सही काम उठाया है या नहीं — ये आप इसी बात से जाँच सकते हो कि आपको भविष्य कितना याद आ रहा है। अगर आपको बार-बार ये सोचना पड़ रहा है कि इस काम से मुझे क्या मिलेगा, तो आपने काम गलत उठाया है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक बेटे या बेटी का माँ-बाप के प्रति क्या ऋण होता है? मेरे पिता भ्रष्ट व्यक्ति हैं, मुझे पसंद नहीं हैं। लेकिन बार-बार यह ऋण चुकाने वाली बात मन पर हावी हो जाती है। कुछ कहें!
आचार्य प्रशांत: संतान का और माँ-बाप का रिश्ता दो तलों पर…

जानवर को मुफ़्त की रोटी मिल जाए, यह उसके लिए ठीक है; पर आदमी को मिल जाए, तो यह गड़बड़ है। क्योंकि जानवर के लिए कोई धर्म नहीं होता, लेकिन मनुष्य का धर्म होता है — अगर रोटी खा रहे हो, तो ईमान की खाओ।

हम सोचते हैं न कई बार कि हम आलसी हैं या सिर्फ़ अनाड़ी हैं इसीलिए हम किसी भी काम में डूबते नहीं हैं, लोग असफल हो जाते हैं। छात्र होते हैं वो असफल हो जाते हैं, वो पढ़ाई नहीं कर पाते ठीक से। लोग नौकरी करते हैं, नौकरी नहीं कर पाते ठीक से। काम में डूब नहीं पाते। जो वजह है, वो कौशल, वग़ैरह का अभाव नहीं है, उसकी ज़्यादा गहरी वजह मनोवैज्ञानिक है। आपको स्वयं से ज़्यादा उस विषय को याद रखना होगा, डूबने के लिए ज़रूरी होता है कि अहंकार को भुलाया जाए।

सही काम की पहचान ये है कि वो इतना विराट और अनंत होता है कि कभी ख़त्म ही नहीं होता। सही काम चुन लो, फिर ज़िन्दगी भर ये शिकायत नहीं कर पाओगे कि अभी खाली बैठा हूँ, क्या करूँ, अकेलापन लग रहा है। वो काम तुम्हारी दुर्बलताओं को ठोंक-पीटकर सही कर देगा। इसलिए कोई साधारण औसत काम करके जीवन मत ख़राब करो। वह अनूठा काम चुनो जिसकी दुनिया को ज़रूरत हो, और वैसा काम दिल से, प्रेमी की तरह खोजने पर ही मिलेगा।

The man who lives with his heart—there will be heart in his work as well. Heart will be visible in his every step. And the one who is doing something for money—he will say that he will marry where he’s getting more dowry. "I will take up a job where I get a high CTC. And I will give the contract to the one who’s paying more bribe." And this—who teaches this love? Learning this is wisdom. This is self-knowledge. This is self-observation.

जहां काम का मतलब सिर्फ़ पैसा और कामनाएँ पूरी करना है, वहाँ बिल्कुल ज़रूरी है कि काम के घंटे सीमित रखे जाएँ। अगर मामला loveless है, तो वर्क-लाइफ बैलेंस का कॉन्सेप्ट बिल्कुल एप्लीकेबल है, और दुनिया की ज़्यादातर आबादी अपने काम से नफरत करती है। सवाल यह है कि तुम्हारा काम एक दिली चीज़ क्यों नहीं हो सकता? काम आशिकी होती है। जो आदमी दिल से जिएगा, उसके काम में भी दिल होगा। उसके एक-एक कदम में दिल दिखाई देगा।

Right action brings us peace, relaxation, and reasonless contentment. But we avoid it because it’s incompatible with our entire life structure, built on a wrongly lived past and the great stakes raised in it. Now, even if we accidentally make the right decision, it causes a lot of suffering and shakes up our foundations, making us go back to our dated, pre-existing ways.

बहुत बदहाल और गई-गुज़री होती है वो ज़िंदगी जिसमें आप पैसा कमाने के लिए वो काम कर रहे होते हो जिसमें प्यार नहीं है। मैं बार-बार कहता हूँ — दो काम बिना प्यार के नहीं करने चाहिए; एक, किसी का साथ और दूसरा, नौकरी। और दुनिया के जितने लोग हैं न और खासकर भारत में, इन सबने पहली बात तो बिना प्यार के साथी चुना और दूसरे बिना बना प्यार की नौकरियाँ कर रहे हैं।

Questioner:* I am Darshan, and my question is very simple yet complicated. So why do we not work? So even after knowing that if we work, we will get something that we are looking for. So, to take an example, I had the opportunity to interact with a lot…

आप कहते हो, ‘देखो, मुझे सही राह पर तो जाना है, लेकिन मेरी कुछ शर्तें हैं।’ सही चीज़ से बड़ी ये शर्तें कैसे हो गईं? असल में, आपने अपनी वर्तमान स्थिति के साथ मोह या स्वार्थ बैठा लिए होते हैं, जिन्हें आप बदलने देना नहीं चाहते। जैसे, खर्चे इतने हैं कि सही नौकरी तो चाहिए, लेकिन दो लाख रुपये महीना भी चाहिए। यही खर्चे आपको गुलाम बनाते हैं। वरना, सच तो सरल होता है, पर आपकी ये शर्तें ही आपको बाँधकर रखती हैं।

काम में आपको रोज़ाना आठ घंटे, दस घंटे बिताने हैं; वो काम अगर ऐसा नहीं है जो आपकी ज़िंदगी को सार्थकता की ओर ले जाता हो, जो आपके माध्यम से दुनिया में एक सही बदलाव लाता हो, तो वो काम आपको खा जाएगा। आप सोच रहे हो कि आप उस काम की रोटी खा रहे हो? नहीं, वो काम आपको रोटी नहीं दे रहा खाने के लिए, वो काम आपको ही धीरे-धीरे करके खा रहा है। बस वो आपको जिस तरीके से खा रहा है वो चीज़ आपको पता नहीं लगती, क्योंकि आपके शरीर पर असर नहीं दिखाई देता; वो आपके मन को खा रहा है, आपकी चेतना को।

Acharya Prashant: The Buddha used to quote three types of horses. Coming from his palatial background, it seems he was fond of horses. So, he would say that the worst type of horses are those that move only when spanked. That’s how our energy rises—it rises upon spanking. When there…

प्रश्न: आचार्य जी, हम पूर्णता के भाव तक कैसे पहुँचे?
आचार्य प्रशांत: पूर्णता के भाव तक पहुँचे कैसे, शुरुआत यहाँ से करते हैं। पूर्णता कोई भाव है ही नहीं, तो उस तक पहुँचने का भी कोई प्रश्न नहीं है।
आप (प्रश्नकर्ता) कहते हैं कि आपने मेरा लिखा पढ़ा है, थोड़ा…

Acharya Prashant: You must never be afraid of questioning others. More importantly, you must never be afraid of questioning yourself. The second part is tougher. It is easy to question others, relatively easy at least. Questioning oneself hurts the ego, but that’s what one must practice.
Question yourself: “What am…

Put your heart fully into your work, and your mind will no longer be in the audience. When there is no heart in your work, then your mind wanders in the world. Love your work, and you will forget the world. Your problem is not that you are too concerned with people’s opinions. Your problem is that there is no heart in your work.

Spirituality is about belonging to existence. Not belonging to a narrow household, or caste or ideology. All these are boundaries. So, wherever there are boundaries, there is violence. Wherever there are boundaries, there is also the fear of being small, powerless, limited. The really non-violent one is at home, everywhere and in every situation. Non-violence is not about following duties. Non-violence is an action in clarity and love. That alone is non-violence.

Questioner: Good Evening Sir. My name is Tarun Singh from IIM Nagpur. Sir my question is this, actually we understand this thing that in life everything is temporary. Be it my existence on this earth, or any relationship, or my friendship, or any environment around me, everything is temporary. So,…

Acharya Prashant: Arjuna's hell was in his day-to-day activities, your hell too lies in your day-to-day activities. Arjuna could sense the evil in what appeared normal to the others, you must also be able to sense that there is something extremely fishy in what appears normal to others.
Do not…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम गवाक्ष जोशी है। मैं आइआइटी कानपुर में पीएचडी का छात्र हूँ। और विद्युत अभियान्त्रिकी विभाग से। मेरा प्रश्न धर्म को लेकर है। मैं हितोपदेश मित्रलाभ पढ़ रहा था! तो एक श्लोक आया था मेरे सामने, जिसका अर्थ ये था — भोजन, निद्रा, भय और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं आपके द्वारा लोगों को लाभ पाता देखता हूँ। इस शिविर में भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो लाभान्वित हुए हैं, और अपनी कृतज्ञता भी व्यक्त करते हैं और साथ में संस्था के जो स्वयं सेवक हैं उनके कार्य को भी देखता हूँ, तो मेरा…

Questioner 1 (Q1): Sir, in the process of spirituality we do have some responsibilities regarding our family in terms of financial and physical availability. So how do we tackle that?
Acharya Prashant (AP): Who are you?
Q2: Atṛpt chetanā1.
AP: So what is your responsibility?
Q2: To get…

प्रश्नकर्ता: सबसे पहले आपको और इस संस्था से जुड़े सभी वॉलन्टियर्स (स्वयंसेवकों) को कोटि-कोटि नमन, हम सभी के जीवन में एक अलग अलख जगाने के लिए। मैं पिछले दो वर्षों से आपको सुन रहा हूँ, जिसकी वजह से अन्दर से एक अलग आवाज़ आती है।
आचार्य जी, मेरा प्रश्न…

प्रश्नकर्ता: वायरस की आपने बात कही तो ये ऑमिक्रॉन (कोरोना वायरस का एक वेरिएंट) और एक के बाद एक आते जा रहे हैं। मैं जानती हूँ आप बहुत बार इस पर भी बात कर चुके हैं, पर यह क्या एक ब्लैक होल है जो खुल चुका है और अब ऑमिक्रॉन…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! जब डेढ़ साल पहले किताबें पढ़नी शुरू की थी तो पढ़ने में बहुत मज़ा आता था, लगता था रोज़ कुछ नया जानने को मिल रहा है। लेकिन अब न पढ़ने का मन करता है, न ही यूट्यूब पर सुनने का। मन को लगता है कि शब्द के…

आचार्य प्रशांत: दानं व्रतं ब्रह्मचर्यं यथोक्तम ब्रह्मधारणम्। दमः प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकम्पनम्॥॥
दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीति से वेदाध्ययन, इन्द्रियग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियों पर दया।
संयमश्चानृशंस्यं च परस्वादान्वर्जनम्। व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा भुवि॥॥
चित्त का संयम, कोमलता, दूसरों के धन लेने की इच्छा का त्याग, संसार के प्राणियों का मन से…

प्रश्नकर्ता: अब मेरा रोज़ का देखना होता है कि मेरे पीछे कोई बल है, कोई फोर्स है जो मुझे संचालित करता है। जैसे मैं सुबह उठा और मैं ऑफ़िस की तरफ़ चल दिया। बैग लिया और चल दिया। तो एक डर है पीछे जो मुझे उधर जाने के लिए विवश…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आपने अतीत से मुक्त होने की बात करी थी, जब मैं देखता हूँ तो लगता है कि अतीत कोई एंटिटी (इकाई) नहीं है – मतलब कि पूरा-का-पूरा ही मैं अतीत हूँ। जैसे जिद्दू कृष्णमूर्ति कहते हैं, यू आर द मेमोरी (आप आपकी याद्दाश्त हैं) समझ आती…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, चाँद या सूरज?
आचार्य: चाँद।
प्र: क्यों?
आचार्य: अकेले चमकता है न। अंधेरा होता है और उसके बीच में ये अपने अकेलेपन में भी मुस्कराता रहता है। जैसे चारों तरफ़ इसके अंधेरा हो और उस अंधेरे के बीच में यह बैठा है अपने दिल में सूरज को…

एवं जना हितेच्छाभिः कर्तव्यविषमूर्च्छिताः। अहो विनाशं यान्त्युच्चैर्मोहेनान्धीकृताः खलु।।
~ त्रिपुरा रहस्य, अध्याय 2, श्लोक 50
प्रसंग:
कर्तव्य विनाश की ओर क्यों ले जाता है? कर्तव्य करके हम अपना अहीत क्यों कर लेते है? त्रिपुरा रहस्य में ऐसा क्यों बताया गया है? कर्तव्य माने क्या? हमें कर्तव्य क्यों बताया जाता है?…

True God is the Truth right now in your heart. That is true godliness, true bhagavatta. The problem is that people want to avoid the real living Truth in their heart. Therefore, they come up with stories that place an imaginary God somewhere up in the skies. God is wonderful, but the stories and the imaginations about God are all very disrespectful towards God. When there is love for God, God is held very close to the chest, and that God is called Truth. That God is the very purpose of philosophy and the very origin.

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

Struggling to choose between a secure job and the path you actually feel drawn to? This isn't really a question about careers. It's about why other people's opinions have so much power over you in the first place. Real clarity doesn't come from finding the 'right' choice. It comes from honestly looking at your own fear, again and again, until it stops running the decision for you.

एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।

Climate change is more than an environmental crisis—it is a crisis of human choices. Our patterns of consumption, consumerism and endless pursuit of more are putting increasing pressure on the planet. But meaningful change does not necessarily begin with new technology or stricter policies. It begins with a deeper question: what are we willing to change within ourselves?

धर्मग्रंथों को जाति-व्यवस्था के चश्मे से देखने के बजाय उनके मूल संदेश को समझना आवश्यक है। श्रुति का केंद्र जाति, लिंग या सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि अहंकार और उससे मुक्ति है। पारंपरिक व्याख्या से अलग समझ को पुनर्व्याख्या मानकर खारिज करना उचित नहीं। वास्तविक अध्यात्म बाहरी पहचान नहीं, अपनी नीयत, भ्रम और कपट को ईमानदारी से देखने तथा आत्मबोध की ओर बढ़ने का आग्रह करता है।

वेदांत को केवल इसलिए सही या श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता कि वह किसी विशेष परंपरा से आता है। विज्ञान जहाँ भौतिक जगत की वस्तुनिष्ठ जाँच करता है, वहीं अद्वैत वेदांत सीधे मनुष्य के ‘मैं’, उसके दुख, बंधन और मुक्ति की पड़ताल करता है। इसकी कसौटी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं, बल्कि अपने जीवन में इसकी सच्चाई को देख पाना है। किसी दर्शन को मान लेना नहीं, बल्कि उससे स्वयं को मुक्त करना ही उसका वास्तविक उद्देश्य है।

Science can examine material claims, but Advaita Vedanta deals with the subjective self, ego, suffering, bondage, and liberation—areas outside science’s objective framework. Vedanta need not be accepted because of one’s religion or tradition; its value lies in whether its insights can be personally verified and help free one from suffering. The ultimate responsibility is not toward any philosophy, but toward oneself: to live a truly free life.