डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ही क्यों चुना?

Acharya Prashant

31 min
1.1k reads
डॉ. अंबेडकर ने बौद्ध धर्म ही क्यों चुना?
डॉक्टर अंबेडकर मृत्यु की रात को भी क्या कर रहे थे? वह धर्म पर ही किताब लिख रहे थे, और उन्हें बड़ी हड़बड़ी थी कि इसको पूरा कर दें। तबीयत बहुत ख़राब थी, दिख रहा था कि जाने वाले हैं। उनकी मृत्यु के बाद वह किताब प्रकाशित हुई, ‘The Buddha and His Dhamma.’ वह कोई पॉलिटिकल या इकोनॉमिक्स की किताब नहीं लिख रहे थे। वह धर्म पर लिख रहे थे। जो भारतीय दर्शन रहा है, उसकी सारी खूबियाँ बौद्ध धर्म में ज़बरदस्त तरीके से मौजूद हैं। बौद्ध धर्म तो पूरा ही जिज्ञासा का धर्म है, रूढ़ियों के लिए वहाँ एकदम ही कोई जगह नहीं है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: हैलो सर, माय नेम इज़ पीयूष फ़्रॉम किरोड़ीमल कॉलेज। सर, ऐज़ यू सेड डॉ. बी.आर.अंबेडकर हैज़ अडॉप्टेड बुद्धिज़्म। सो सर, माय क्वेश्चन इज़ दैट, व्हाई डिडन’ट बी.आर.अंबेडकर चूज़ एथिज़्म ओवर बुद्धिज़्म? एंड सर, ऐज़ वी नो दैट, बुद्धिज़्म इज़ नॉट कनेक्टेड विद ऐनी रिलिजन। सो व्हाट इज़ द रीजन बिहाइंड डॉ. बी.आर.अंबेडकर चूज़िंग अ रिलिजियस पाथ ओवर अ नॉन-रिलिजियस वन? थैंक यू।

आचार्य प्रशांत: हमने इस पर अभी बात करी थी थोड़ी-सी। देखो, कोई भी गहरा व्यक्ति धार्मिक होगा ही होगा। ये बात हमें अटपटी इसलिए लगती है क्योंकि धर्म का मतलब हमने बना लिया है, कूद-फाँद; जो देखते हो मूर्खताएँ तमाम तरीके की, सड़कों में, पंडालों में। ये जो बहुत तरह के दुनिया भर में रस्मो-रिवाज़ चलते हैं और उनके नाम पर जो हिंसा चलती है, मूर्खता चलती है, उन सब चीज़ों ने धर्म का नाम खींच लिया है, लगभग मोनोपोलाइज़ कर लिया है। तो इसलिए हमें अजीब लगता है कि डॉ. अंबेडकर ने धर्म चुना ही क्यों?

सवाल ये है, कि जब उन्होंने हिन्दू-धर्म छोड़ा तो सीधे-सीधे यही क्यों नहीं कह देते अपने सब अनुयायियों से, कि साहब, आप लोगों को किसी को धर्म की कोई ज़रूरत है ही नहीं? उन्होंने क्यों ये कहा, कि “नहीं, अब मैं बौद्ध होने जा रहा हूँ।”

क्यों कहा?

क्योंकि इंसान को धर्म की ज़रूरत है। हाँ, धर्म के नाम पर जो नौटंकी चल रही है, उसकी बिल्कुल कोई ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत तो छोड़ दो, वो चीज़ बोझ है सर का और वो चीज़ ज़िंदगी को नरक बनाती है, वो बिल्कुल ठीक है। लेकिन जो असली धर्म है, नौटंकी वाला धर्म नहीं, असली धर्म; जो असली धर्म है उसकी तो हमें ज़रूरत है ही न।

और जो असली धर्म है न, वो बड़ी प्यारी, बड़ी नाज़ुक होती है और बड़ी सीधी-सादी चीज़ होती है। वो असली धर्म ये नहीं होता कि हम यहाँ पर कुछ श्लोकों की बात करें, या आयतों की बात करें, या बाइबल ले आएँ, या कुछ भी और ले आएँ और क़िस्से-कहानियों में हम एक-दूसरे का मनोरंजन करने लगें, ये नहीं होता असली धर्म। असली धार्मिक आदमी कोई आपको प्रतीक या चिन्ह दिखाएगा नहीं, आपको पकड़ में आएगा नहीं। नकली धार्मिकता के तो बंधे-बँधाए तहशुदा लक्षण होते हैं, तो वो पकड़ में आ जाती है।

अभी यहाँ से एक मौलाना प्रवेश करे, आप तुरंत बोल दोगे: इस्लाम। एक पंडित जी प्रवेश करे, आप तुरंत बोल दोगे: हिन्दू। एक प्रीस्ट/पास्टर प्रवेश करे, आप तुरंत बोल दोगे: क्रिश्चियनिटी। क्योंकि उनके बंधे-बँधाए लक्षण होते हैं।

वास्तविक धार्मिकता इतनी सीधी, इतनी प्यारी चीज़ होती है उसमें ये सब करना ही नहीं होता प्रपंच कि ये लक्षण, वो लक्षण। होश में जीने को धार्मिकता कहते हैं, बस बात ख़त्म। अगर होश में जीने को धार्मिकता है, तो डॉ. अंबेडकर कैसे कह देते कि धार्मिक न रहो? क्योंकि अगर होश माने होता है धर्म, तो धर्म अगर छोड़ोगे तो माने क्या छोड़ दिया? होश छोड़ दिया।

तो इसलिए देखो, धर्म की बुनियाद कोई सपनेबाज़ी नहीं होती कि बैठकर आप कह रहे हो, “मैं सो रहा था, एक सपने में भगवान ने दर्शन दिए, उन्होंने कहा ऐसा-ऐसा करो; तो ये फिर वहाँ से धर्म चल पड़ा।” नहीं ये नहीं होता, धर्म की बुनियाद दर्शन होता है, फ़िलॉसफ़ी। धर्म की बुनियाद दर्शन होता है। बौद्ध-धर्म सशक्त है, क्यों? क्योंकि बौद्ध दर्शन सशक्त है। समझ में आ रही है बात?

फ़िलॉसफ़ी से किसको इंकार हो सकता है भाई, उस दर्शन को जो समझने लग गया, वो धार्मिक हो गया अपने-आप। और दर्शन के बिना जो धर्म चलता है, उसमें पाखंड के अलावा और क्या मिलेगा? अब आम आदमी आपके चारों तरफ़ जिस धर्म का पालन कर रहा है, उसमें आपको कहीं कोई दर्शन दिखाई देता है क्या? अब समझ में आ रहा है कि धर्म की इतनी दुर्गति क्यों है, और धर्म के नाम पर इतना अन्याय स्वार्थ क्यों चलता रहा इतने दिनों तक? समझ में आ रहा है?

जिन्हें नालायकी करनी होती है, जिनके न्यस्त-स्वार्थ होते हैं, वो पहला काम ये करते हैं कि धर्म को दर्शन से काटकर परंपरा से जोड़ देते हैं। ये अच्छे से समझिए। किसी भी धार्मिक क्रिया में, कर्मकांड में, रस्मो-रिवाज़ में भाग लेने से पहले ये अपने-आप से पूछा करिए, “ये जो मुझे करने को कहा जा रहा है या ये जो सदियों से चला आ रहा है, इसके नीचे कोई फ़िलॉसफ़ी है?” फ़िलॉसफ़ी है, चलो ठीक है।

फ़िलॉसफ़ी नहीं है, बस ये कहा जा रहा है, “ऐसा ही होता है, सब करते हैं, तुम भी करो। अरे, हमारे पुरखे पागल थे क्या कि ये सब करते थे? दो हज़ार साल से हो रहा है, तुम ही एक नए-नए होशियार आए हो?” इस तरह की बातें जहाँ हो जा रही हों, तुरंत अस्वीकार कर दो, ये धर्म नहीं है। समझ में आ रही है बात?

तो ये तो सर्वविदित है, एकदम स्पष्ट है कि इंसान को धर्म चाहिए। मैन इज़ अ क्रीचर ऑफ़ इन्क्वायरी। हमारे पास सवाल होते हैं, हमारे पास गहरे सवाल होते हैं। हमें धोखा मिलता है, हमें चोट लगती है, हमें दर्द होता है, अफ़सोस होता है। हम जानना चाहते हैं फिर कि सच्चाई क्या है? जो चीज़ हमें आज सच लग रही थी, उसने हमें धोखा दे दिया न? किस-किस को ज़िंदगी में कहीं-न-कहीं चोट लगी है, धोखा मिला है? (श्रोता हाथ उठाते हैं)। अब समझ में आ रही है बात?

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, निकल कर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान!

मैं तो उपनिषदों पर भी एक बार बात कर रहा था। मैंने कहा था, जितने ऋषि हैं न, ये सब बहुत घायल लोग हैं। ना से उठता है उपनिषद्, जब तक ज़िंदगी में ज़बरदस्त धोखा नहीं मिला हो, चोट न मिली हो; आपके अरमान, आपकी मान्यताएँ, आपके सपने, आशाएँ, ये सब एकदम भरभरा के टूटे न हों, किसी ने लात न मार दी हो, तब तक सच्चाई के लिए चाहत उठती ही नहीं है।

कि “अगर इससे मुझे धोखा मिला, तो ये भ्रम रहा होगा न। अगर ये भ्रम है, तो फिर सत्य क्या है?” उस सत्य को उद्घाटित करने को धर्म कहते हैं, मात्र वही धर्म है।

तो जब मात्र वही धर्म है, तो हर आदमी को सही अर्थ में धार्मिक तो होना पड़ेगा। लेकिन साथ ही साथ धर्म जितनी ऊँची चीज़ है, उतनी ही ज़्यादा गंदी भी चीज़ है। धर्म से ज़्यादा सड़ी हुई चीज़ दूसरी नहीं है, धर्म जब स्वार्थ का नक़ाब बन जाए, धर्म जब शोषक प्रथाओं, परंपराओं को बढ़ाने का ज़रिया बन जाए, तो धर्म से ज़्यादा गिरी हुई चीज़ नहीं है। धर्म जब आदमी के हाथ का खिलौना बन जाए, तो ऐसे धर्म को दुत्कार देना चाहिए। लेकिन यही धर्म, ये धर्म नहीं। धर्म ही है जो इंसान की ज़िंदगी को जीने-लायक भी बनाता है।

हम ऊँची खोज; न्यूटन की हम बात करते हैं बार-बार वो जो सेब है, वो पॉपुलर कल्चर में एकदम घुस चुका है। न्यूटन फ़िलॉसफ़र थे सबसे पहले, न्यूटन एक धार्मिक आदमी थे। फ़िलॉसफ़ी ही तो धर्म बनती है न? फ़िलॉसफ़ी माने क्या होता है? लव फॉर ट्रुथ। और यही जो लव फॉर ट्रुथ है; लव फॉर ट्रुथ, नॉट लव फॉर ट्रेडिशन, यही जो लव फॉर ट्रुथ है इसका नाम धर्म होता है।

तो ये तो सहज-सी बात है कि डॉ. अंबेडकर ने ये नहीं कहा कि “तुम लोग धर्म-वग़ैरह छोड़ ही दो।” उन्होंने कहा, बौद्ध-धर्म की तरफ़ चलेंगे, क्योंकि जो भारतीय दर्शन रहा है, उसकी सारी खूबियाँ बौद्ध-धर्म में ज़बरदस्त तरीके से मौजूद हैं, और जो सब मैल है वो वहाँ मौजूद नहीं है। तो उन्होंने बहुत खोज करके, ऐसे नहीं कि उन्होंने अचानक ही कह दिया था कि बौद्ध बन जाओ। उन्होंने क्रिश्चियनिटी को भी टटोला था, इस्लाम की तरफ़ भी जाकर जाँच-पड़ताल करी थी।

फिर उन्होंने कहा, कि नहीं, इट हैज़ टू बी वन ऑफ़ द इंडिक रिलीजन्स। तो सिख-मत की ओर कुछ समय के लिए आकृष्ट हुए, जैनों को भी उन्होंने टटोला। अंततः उन्होंने वो जो पूरी लिस्ट थी उसमें से हटाते-हटाते उँगली रखी; बोले, ये है। ठीक है? क्योंकि बौद्ध-धर्म तो पूरा ही जिज्ञासा का धर्म है, एकदम ही जिज्ञासा का धर्म है। मनुष्य की कल्पनाओं के लिए, रूढ़ियों के लिए वहाँ एकदम ही कोई जगह नहीं है। और यही कल्पनाएँ थीं, रूढ़ियाँ थीं, जिन्होंने भारत में इतने बड़े तबके को बर्बाद कर रखा था। इतने बड़े तबके को ही नहीं, पूरे भारत देश को ही।

45-50% शूद्र, जो आज OBC कहलाते हैं, और लगभग 20% अस्पृश्य/अनटचेबल, जिन्हें आज हम SC-ST कहते हैं। तो कितना हो गया ये? सत्तर तो यही हो गया। बाक़ी तीस कोई बच थोड़ी गए हैं। बाक़ी तीस में जिनको आज आप जनरल कैटेगरी बोलते हो, कास्ट हिन्दू, सवर्ण, वो तो कुल मिलाकर 12-14% होंगे। जो बाक़ी हैं, वो भी बच नहीं गए, उनमें आधी तो महिलाएँ हैं। तो ये भी कहना है कि भारत में एक बड़े तबके का शोषण हुआ; बड़े तबके का नहीं शोषण हुआ, पूरे भारतवर्ष का ही शोषण हो गया है।

बचा कौन? 70% वैसे निकल गए। 50% महिलाएँ होती हैं सब वर्गों में, तो उनको और अभी उसमें थोड़ा जोड़ो। तो बचा कौन? ये भी मत कहो कि जो सवर्ण है, वो तो बच गए। उदाहरण के लिए जो ब्राह्मण मेल है, वो बच गया, वो भी नहीं बचे। कारण बताता हूँ, जो दूसरे पर अत्याचार करता है उसने अपने ऊपर भी कर लिया। जो दूसरे का शोषण करता है, उसका हो गया अपना भी उसका शोषण हो गया।

भारत इतने दिनों तक जो पराभव में रहा, इतने तरीके की हारें मिलीं युद्ध के मैदानों में, साइंस, टेक्नॉलॉजी, इनोवेशन हो नहीं पाए, वो क्या वजह थी? क्या वजह थी? यही सब तो था। जब-जब रिलीजन गिरता है, डिक्लाइन होता है, तो पूरा समाज ही बर्बाद हो जाता है। तो मैं ये भी नहीं कहूँगा कि एक बड़े तबके का शोषण हुआ। भारतवर्ष को ही बर्बाद कर दिया, जो धर्म के साथ हमने खिलवाड़ किया है उसने। ठीक है?

साथ ही साथ धर्म की गंदगी छोड़नी है, धर्म नहीं छोड़ देना है। अंग्रेज़ी में इसको कहते हैं, डू नॉट थ्रो द बेबी आउट विद द बाथ वॉटर।

डॉ. अंबेडकर मृत्यु की रात से, मृत्यु की रात को भी क्या कर रहे थे? वो धर्म पर किताब लिख रहे थे। वो धर्म पर ही किताब लिख रहे थे और उन्हें बड़ी हड़बड़ी थी, कि इसको पूरा कर दें। तबीयत बहुत ख़राब थी, दिख रहा था कि जाने वाले हैं, बोले जाने से पहले इसको पूरा कर दें। उनकी मृत्यु के बाद वो किताब प्रकाशित हुई। मैं किस किताब की बात कर रहा हूँ? “द बुद्धा एंड हिज़ धम्मा।

वो कोई पॉलिटिकल किताब नहीं लिख रहे थे, इकॉनॉमिक्स में उनकी डिग्रियाँ थीं, इकॉनॉमिक्स में भी नहीं लिख रहे थे, वो किस पर लिख रहे थे? धर्म पर लिख रहे थे। धर्म इतनी ज़रूरी चीज़ है।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। माय नेम इज़ चंद्र कुमार, एंड आई एम थर्ड-ईयर स्टूडेंट ऑफ़ किरोड़ीमल कॉलेज, पॉलिटिकल साइंस एंड इकॉनॉमिक्स।

आचार्य जी, माय क्वेश्चन इज़: वाज़ डॉ. अंबेडकर राइट इन कॉलिंग मनुस्मृति एंड वेदाज़ ऐज़ रिग्रेसिव टेक्स्ट? एंड कैन स्पिरिचुअल ट्रुथ एग्ज़िस्ट इन स्क्रिप्चर्स व्हिच काइंड ऑफ़ लेजिटिमाइज़ अनटचेबिलिटी, जेंडर इनइक्वैलिटी, एंड वेरीअस अदर थिंग्स विच आर नॉट एक्सेप्टेबल इन टुडे’ज़ सोसाइटी?

आचार्य प्रशांत: हिंदी में बोलूँ? इंग्लिश में?

प्रश्नकर्ता: आप जैसे बोलोगे।

आचार्य प्रशांत: आप लोग बताइए।

श्रोता: हिंदी।

आचार्य प्रशांत: हिंदी, ठीक है। देखिए, ये तो छोड़िए कि कोई धार्मिक ग्रंथ स्वीकार करने योग्य है या नहीं है। ये क्वैश्चन बाद का है, और आपको थोड़ी देर में दिखाई देगा कि ये प्रश्न बहुत ज़रूरी भी नहीं है। ज़रूरी प्रश्न ये है, कि आप जिसको धार्मिक ग्रंथ बोल रहे हो, वो धार्मिक है भी या नहीं है?

मनुस्मृति धर्मशास्त्र है; और यहाँ पर धर्म से आशय वो धर्म नहीं जिसकी हम अभी तक बात कर रहे थे। ये धर्मशास्त्र थे, जो समाज में कैसे व्यवस्था चलनी है, नियम-क़ायदा क्या होना है, ये उसके लिए लिखे गए थे। ठीक है? और जितना भी भारतीय साहित्य है पुराना, उसमें ये स्मृति के अंतर्गत आता है। जो धार्मिक साहित्य है पूरा पारंपरिक, उसकी दो श्रेणियाँ होती हैं: एक श्रुति और एक स्मृति।

श्रुति माने, वो जो केंद्रीय है। जहाँ पर आपको वो बातें मिलेंगी जो टाइमलेस हैं। श्रुति में भी ऐसी बातें मिलेंगी जो टाइमलेस नहीं हैं। लेकिन जो इटरनल बात है, जो कि अगर चार हज़ार साल पहले कही गई थी आज भी उपयोगी है, वो बातें कहाँ मिलनी हैं? श्रुति में। और जो दूसरा वर्ग होता है, जिनको आप ग्रंथ बोल देते हो, वो कहलाता है वर्ग स्मृति के नाम से। और स्मृति माने मात्र मनुस्मृति नहीं होता। स्मृति माने उसमें आपके पुराण भी आ गए। आपके जो महाकाव्य हैं, वो भी आ गए। सारे जितने दर्शन हैं, वो भी आ गए। नीति-शास्त्र भी आ गए, धर्मशास्त्र भी आ गए। तो ये सब उधर आ जाते हैं।

स्मृति परिभाषा से ही वो चीज़ है जो इंसान ने लिखी है। किसी एक काल में लिखी है, किसी मनुष्य ने अपनी सीमित सोच से लिखी है। जो कहीं पर लागू होकर के, हो सकता है कोई लाभ दे दे; हो सकता है कोई लाभ न दे, हानि भी दे दे। स्मृति वो चीज़ ही नहीं है जिसको केंद्रीय गंभीरता से लिया जाए। अब किसी समय पर समाज की क्या व्यवस्था थी, उसके लिए किसी ने क्या लिख दिया, वो बात आज प्रासंगिक ही नहीं है। उसको आप एक रिलीजियस टेक्स्ट बोल ही नहीं सकते, उसका क्या लेना-देना।

आपके पास आज संविधान है। मनुस्मृति एक प्रकार का संविधान है। कई स्मृतियाँ हैं, मनुस्मृति अकेली नहीं है। और जितनी स्मृतियाँ हैं न, उनमें मनुस्मृति सबसे प्रचलित स्मृति भी नहीं है, और भी स्मृतियाँ थीं। और मनुस्मृति अगर एक प्रकार का संविधान होता था, तो उस संविधान का इतिहास में हमें ऐसा भी सबूत नहीं मिलता है कि बहुत पालन हुआ है। क्योंकि इतने सारे राजा थे और लगातार सब बदलता रहता था। समय भी बदल रहा है, राजे-रजवाड़े भी बदल रहे हैं, वो अपने-अपने नियम-क़ायदे बनाते थे।

मनुस्मृति अधिक से अधिक एक रेफरेंस टेक्स्ट था, जिसका कभी किसी ने कुछ उदाहरण ले लिया होगा। उससे सलाह ले ली होगी, तो अलग बात है। मनुस्मृति को जैसा का तैसा तो एक नियम के तौर पर, एक संविधान या व्यवस्था के तौर पर कभी लागू भी नहीं किया गया। वो तो जब अंग्रेज आए और अंग्रेजों ने कहा कि अच्छा मुसलमानों के पास तो शरिया है; अब उन्होंने नियम बनाने थे। अंग्रेज जो थे, सिस्टम बिल्डर्स थे। तो उनको जब अपना एक कोडिफाइड लॉ सिस्टम बनाना है, तो उन्होंने कहा यहाँ से तो शरिया है। हिन्दुओं का क्या उठाएँ? तो बहुत सारे विकल्प थे, लेकिन जो विकल्प उनको सूझा, वो ये था कि मनुस्मृति उठा लो। तो वहाँ से मनुस्मृति ज़्यादा फोकस में आ गई, नहीं तो मनुस्मृति अपने आप में एक बहुत पेरिफेरल, बहुत पारिधिक किताब है। समझ में आ रही?

उसको तो आप ये भी नहीं, मनुस्मृति से आप थोड़ी पूछोगे कि मैं कौन हूँ? मैं पैदा किस लिए हूँ? मुझे क्या करना है? और आप ये सवाल अगर पूछोगे, तो मनुस्मृति पता है क्या जवाब दे देगी? मनुस्मृति कहेगी, “इनपुट वर्ण, इनपुट एज एंड इनपुट जेंडर। ये तीन इनपुट लेकर के मनुस्मृति आपको सारे जवाब दे देगी। ये कोई बात है? आपसे आपका वर्ण पूछ लेगी: वर्ण बता दो, उम्र बता दो। उम्र से क्या निर्धारित हो जाता है? आश्रम। और जेंडर बता दो, इन तीन चीज़ों से सब पक्का हो गया कि आपको क्या करना है। ये जवाब आपको उपनिषद् थोड़ी देने वाले हैं।

अगर इतना सस्ता है जीवन के मूलभूत प्रश्नों का जवाब, तब तो हो गया, चल गया काम। कि मैं कहीं जाकर पूछूँ कि मेरी जान जा रही है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है, ज़िंदगी कैसी हो? करियर कैसा हो? मैं क्या बस खाने-पीने और बच्चे पैदा करके मर जाने के लिए हूँ? मेरे घर में सब लोग ये काम करते रहे, क्या मैं वही काम करने के लिए हूँ? और ये बहुत गहरे सवाल हैं, एग्ज़िस्टेंशियल एंगस्ट उठती है इन सवालों से, दर्द होता है इन सवालों से।

आप ये सवाल लेकर गए हो और वो कह रहा है: इनपुट वर्ण, एज, जेंडर। और वहाँ से आपको एक रटा-रटाया जवाब दे दिया है, वो जवाब किसी काम का होगा? बात समझ में आ रही है? इसमें कुछ नहीं है, इरेलेवेंट टेक्स्ट है। समझ रहे हो बात को?

अब वेदों पर आते हैं। वेद और उपनिषद् ये श्रुति कहलाते हैं, उसमें वेदों में भी हिस्से हैं। वेदों में वैसे तो चार हिस्से आप कहोगे, पर उनको मैं दो करे देता हूँ: संहिता आती है, फिर ब्राह्मण वाला हिस्सा आता है। ब्राह्मण माने जहाँ पर बताया जाता है कि अलग-अलग, सब जो देवता हैं और जो यज्ञ के विधि-विधान हैं, वो कैसे हैं। अरण्यक में उनका आपको विस्तार और एक्सप्लेनेशन मिल जाता है। थोड़ा फ़िलॉसॉफ़िकल टच शुरू हो जाता है, और फिर आते हैं उपनिषद्। तो इसके हम दो हिस्से कर देते हैं, एक हिस्सा मान लो कर्मकांड का और दूसरा हिस्सा मान लो दर्शन का। ज्ञान और दर्शन, दर्शन का हिस्सा आ जाता है।

अब श्रुति की परिभाषा ही यही है कि जो टाइमलेस है, कि समय बदलता जाएगा, पर यहाँ कोई ऐसी बात कही है जो हर समय आपके काम आनी है, यूज़फुल है। तो उसमें ये जो दो हिस्से करे, बताओ कौन सी चीज़ है जो काम आनी है?

श्रोता: ज्ञान।

आचार्य प्रशांत: ज्ञानकांड। तो सिर्फ़ वही है हिन्दू धर्म वास्तव में, बाक़ी सब सर्कम्स्टैंशियल है, पेरिफेरल है और टाइम-बाउंड है। जिसका जब समय बीत गया हो, तो उसको भी बीत जाना चाहिए था, पर हमने उसको बीतने नहीं दिया। बात समझ में आ रही है?

और उपनिषदों का विरोध किसी ने नहीं करा है। डॉ. अंबेडकर भी, बल्कि आप रिडल्स इन हिन्दुइज़्म पढ़ोगे तो वहाँ वो चकित है। वो कह रहे हैं कि उपनिषद् तो मुझे ऐसा दिखाई दे रहा है, कि बाक़ी जो सब कुछ चलता रहा है हिन्दू धर्म में, यहाँ तक कि वेदों में भी कहीं-कहीं असमता की बातें हैं, उपनिषद् तो उनका भी विरोध कर रहे हैं।

तो उन्होंने एक चैप्टर लिखा है, जिसका बाद में शीर्षक कराया गया: “हाउ द उपनिषद्स वेज्ड वार अगेंस्ट द वेद्स,” और ये जो उपनिषद् हैं न, वेदान्त। वेदान्त मतलब द हाइएस्ट पॉइंट, दैट रियलाइज़ेशन कैन रीच। विद माने? जानना। और अंत माने? एकदम निष्कर्ष, शिखर, चोटी, कलमिनेशन। वेदान्त; मात्र वही हिन्दू धर्म है। बाक़ी सब इंसानी खोपड़े की उपज है, और इंसानी खोपड़े का क्या है, तुम कुछ भी कल्पना कर लो। हर गाँव में प्रथा परंपरा बदलती रहती है, लोगों ने बनाई है, उसमें कोई इटरनिटी थोड़ी है। उसमें कुछ ट्रांसेंडेंटल थोड़ी है।

आप सब अलग-अलग जगहों से आते होंगे या सब दिल्ली के ही हो? आप लोगों के इधर के सब रस्मो-रिवाज़ एक जैसे हैं? तो शुड वी कॉल देम एज़ इटरनल, ट्रांसेंडेंटल? कुछ नहीं है उसमें। आप उसको अगर बचाना भी चाहो तो हर पचास साल में वो सब बदल जाता है। हर पचास साल में सब बदल जाता है। आज की आप उदाहरण के लिए झांकियाँ वग़ैरह देख लो और पचास साल पहले ही कैसे निकलती थीं वो देख लो। सब बदल रहा है लगातार। उसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो आज आपके काम आएगा, क्योंकि वो चीज़ पुरानी है और टाइम-बाउंड है। उसकी एक्सपायरी डेट होती है, वो बीत गई तो बीत गई।

धर्म का अर्थ होता है, एक शब्द है, नित्य। नित्य माने जो कालातीत हो, जो टाइम-बाउंड न हो। जो हमेशा काम आए और जो आपको भी ऐसी दिशा में ले जाए जो टाइम-बाउंड न हो। इसी को सिखों ने कहा, अकाल तत्त्व (काल से आगे का तत्त्व)। क्योंकि काल में तो दो चीज़ें हैं। काल माने दुनिया, जो कि प्रोडक्ट ऑफ़ टाइम है; कि पैदा हुई है, अभी आई है कल बीत जाएगी। ये जो प्रोडक्ट्स ऑफ़ टाइम एंड स्पेस हैं, जिन्होंने खोज करी, जिन्होंने एक्सपेरिमेंट्स किए, उन्होंने देखा कि ये जो प्रोडक्ट्स हैं, ये हमें संतुष्ट नहीं कर पाते। तो उन्होंने कहा कि हमें कुछ ऐसा दो, विच इज़ बियॉन्ड ह्यूमन माइंड।

क्योंकि ह्यूमन माइंड डील्स इन टाइम। तो हमें कुछ चाहिए विच इज़ बियॉन्ड ह्यूमन माइंड। जो उसकी बात करे, सिर्फ़ उसको धर्म बोलते हैं।

पायजामा में नाड़ा लाल रंग का डालना है, हरे रंग का डालना है, ये थोड़ी धर्म होता है। सुबह उठते वक़्त, पहले बाएँ पैर में चप्पल पहननी है कि दाएँ पैर में पहननी है, ये थोड़ी धर्म होता है। उस तरफ़ को मुँह करके बांग देनी है या उधर को मुँह करके प्रेयर, पूजा, क्या करना है। ये थोड़ी धर्म होती है, इसका क्या लेना-देना है धर्म से। रियल रिलीजन हैज़ अ सॉलिड फ़िलॉसॉफ़िकल फाउंडेशन। समझ में आ रही है बात ये?

सवाल किनका था? तो आपने पूछा न कि क्या को-एग्ज़िस्ट कर सकते हैं एक ही टेक्स्ट में? तो वो को-एग्ज़िस्टेन्स भी नहीं है। उसी टेक्स्ट में बहुत क्लियरली डिमार्केटेड है, कि कर्मकांड किधर है और ज्ञान मीमांसा किधर है, बहुत क्लियर है।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू सर।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम शिवानी है। जैसा कि आपने कहा कि मनुस्मृति या फिर यहाँ पर जो प्रश्न हो रहे हैं उसके हिसाब से, अगर मैं कहूँ कि मनुस्मृति को जलाए बिना भी हम आलोचना के थ्रू उसे हम उस पर आलोचना कर सकते हैं; जिससे कि जो भेदभाव है वो हमारे सामने आ सके। लोग आजकल कहते हैं कि सांत्वना जैसी, सांत्वना या दया-करुणा इन सब की बातें करते हैं दलितों के लिए, इन सब व्यवहारों की बातें करते हैं। लेकिन अगर हम उनके शक्ति, उनकी हिम्मत, इन सब बातों की बातें करें तो ज़्यादा बेहतर होगा।

आचार्य प्रशांत: ये दो अलग-अलग, एक तो मनुस्मृति दहन के बारे में, और दूसरा दलितों के प्रति लोगों का जो रवैया रहता है, इसके बारे में ये दो अलग-अलग बातें हैं। दोनों में आपने कोई रिश्ता आपने देखा है?

प्रश्नकर्ता: जी।

आचार्य प्रशांत: क्या?

प्रश्नकर्ता: जैसे हम देखते हैं कि मनुस्मृति को जला दिया जाता है। क्यों जला दिया जाता है? आप उस पर आलोचना कीजिए। अब जहाँ आपको लगे कि जातिगत भेदभाव है, वहाँ आप लिखिए कि हाँ, ये भेदभाव हमारे साथ हुआ है और उस पर लिखिए।

आचार्य प्रशांत: नहीं, कोई भी ऑर्गेनिक मैटर जलाना तो आज के समय में वैसे भी ठीक नहीं है, क्लाइमेट चेंज के हिसाब से। और ऐसा भी नहीं है कि बहुत लोग जला रहे हैं। जहाँ कहीं भी जलाया जाता है या जलाया गया था, वो एक सिंबॉलिक एक्ट ऑफ़ प्रोटेस्ट था। बस, सिंबॉलिज़्म था उसमें। ठीक है?

बाक़ी ये तो पागलपन ही है कि आप किताबें लेकर उनको जला रहे हो। आप बुक स्टोर में जाते हो, वहाँ हर तरह की किताबें होती हैं। आपने चार किताबें ख़रीदी, बाक़ी आपको पसंद नहीं थी; तो आप चार किताबें ख़रीद के बाहर निकलते-निकलते बुक स्टोर जला देते हो क्या? अरे भाई, जो किताब नहीं पढ़नी नहीं पढ़नी। बहुत सारी किताबें हैं, उनकी एक हिस्टोरिकल सिग्निफिकेंस है कि ऐसे कभी चली थी दुनिया और ऐसे कभी कोई बात कही गई थी। ठीक है? तो मुझे नहीं लगता कि जलाने वग़ैरह में किसी की भी रुचि है।

जब कभी ये करा गया, वो लगभग वैसा ही था जैसे गाँधी जी ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई। अब इसका मतलब ये थोड़ी था कि गाँधी जी राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के लिए लंदन गए हैं, तो वहाँ पकड़-पकड़ के लोगों के कपड़े उतारेंगे और जिसका-जिसका मिलेगा, वहाँ जला देंगे। इट वाज़ एन एक्ट सिग्निफाइंग समथिंग, प्रतीकात्मक था। ठीक है?

तो किताबें जलाना तो वैसे भी अच्छा नहीं होता, भले ही उस किताब में कुछ भी लिखा हो। किताब जलाना कोई अच्छी बात नहीं है। हमको तक्षशिला, नालंदा याद है न? हम आज भी रोते हैं, क्योंकि वहाँ क्या हुआ था? वहाँ किताबें ही जलाई गई थीं। कैसी भी किताब हो, कुछ भी लिखा हो, प्रिय हो, अप्रिय हो, पड़ा रहने दीजिए। किसी की बात है। बिल्कुल, आपने ठीक कहा कि आप उस पर टीका-टिप्पणी, आलोचना जो भी करना है, वो कर लीजिए। जलाना में तो क्या रखा है।

दूसरी बात, आपने क्या कहा कि दलितों के प्रति लोगों का जो रुख है वो?

प्रश्नकर्ता: लोग कहते हैं, कि उनके लिए दया-करुणा जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। लेकिन अगर हम उसके अलग, हम उसके हिम्मत की, उसकी ताक़त की…।

आचार्य प्रशांत: समझ गया, ठीक है। देखो, किसी पर दया करना बड़ा आसान होता है और बड़ी नैतिक बात होती है। उसमें आप बन जाते हो और श्रेष्ठ। “ये बेचारा बुरी हालत में था और मैंने इस पर दया कर दी।” तो इसकी बुरी हालत का सारा इल्ज़ाम भी इसके ऊपर रहा, पहली बात। और दूसरी, मैं अभी यहाँ पर हूँ (थोड़ा-सा ऊपर), तो दया करके मैं यहाँ और हो गया (और ऊपर), अपनी नज़र में कम से कम; और ज़माने की नज़र में भी दया अक्सर दिखा-दिखाकर करी जाती है। है न?

तो दया बड़ी सस्ती चीज़ होती है और दया बड़ी कुटिल चीज़ भी हो सकती है। क्योंकि दया में पहली बात तो इसकी जो हालत है, वो हालत ऐसी क्यों है, इसका ईमानदारी से न कोई विश्लेषण है, न मैं उसको कोई इस स्थिति से उबरने का स्थायी समाधान दे रहा हूँ। ये ऐसा है जैसे जाड़े में ग़रीबों को कंबल बाँट दिए या कहीं पर जाकर भंडारा लगा दिया। इससे उसको रोज़ की रोटी थोड़ी मिल जानी है। समझ में आ रही है बात ये? मैं श्रेष्ठ हो जाता हूँ दया करके।

दूसरी ओर ज़िम्मेदारी है शब्द, दया से हटकर ज़िम्मेदारी। ज़िम्मेदारी शब्द में मुझे ये मानना पड़ेगा कि उसकी जो दुर्दशा है और मेरी अभी जो दशा है, इसमें आपस में कुछ रिश्ता है। कि अगर वो नीचे बैठा है और मैं ऊपर बैठा हूँ, तो ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मैं ऊपर शायद इसीलिए बैठा हूँ क्योंकि वो नीचे बैठा है। मैं आईटी गया था, तो वहाँ सब आए हुए थे, सब फर्स्ट सेमेस्टर, नए-नए, सब स्टूडेंट्स, सब बहुत खुश और उस खुशी में कहीं न कहीं गर्व भी था कि हमने जेई क्रैक कर लिया। मुश्किल होता था, टॉप वन पर्सेंटाइल से भी कम को एडमिशन मिलता था।

तो सब खुश हैं। तो एक दिन ऐसी बात हो रही थी। मैंने कहा, एक बात बताओ यार, जेई कितने लोगों ने लिखा इस साल? तो कुछ आँकड़ा निकल के आया कुछ लाख का, मतलब पता नहीं कितना था, दो लाख कुछ, तीन लाख, चार लाख, ऐसा ही था। और उसमें से करीब दो हज़ार लोग चयनित हुए थे; एक प्रतिशत या एक प्रतिशत से कम।

मैंने कहा, अच्छा, और भारत में ऐसे कितने युवा होंगे जिन्होंने इस साल बारहवीं दी है, और वो भी मैथ्स और साइंस के साथ? तो एस्टीमेट करा, तो वो आँकड़ा आया पाँच-सात गुना ज़्यादा।

हमने कहा, और भारत में ऐसे कितने युवा होंगे जो उम्र के आधार पर, जिन्हें अभी बारहवीं में होना चाहिए था, पर वो एजुकेशनल प्रोसेस में ही नहीं हैं। वो ड्रॉप आउट्स हैं। वो कितने होंगे? तो आँकड़ा और बढ़ गया, कहीं तक पहुँच गया पचास लाख तक।

मैंने कहा, बात समझो, दो लाख लोगों ने जेई दिया, इसलिए हम दो हज़ार लोग अंदर हैं; और सीटें इतनी ही रहती दो हज़ार, और देने वाले अगर पचास लाख होते, तो क्या हम सब अंदर होते? तो माने हमारा जो एडमिशन हुआ है, उसका श्रेय उन अड़तालीस लाख लोगों को देना चाहिए जिन्होंने जेई लिखा ही नहीं। हम अंदर हैं उनकी वजह से, जिनमें इतनी भी ताक़त नहीं थी, इतनी भी जिनको शिक्षा नहीं थी कि वो बारहवीं भी लिख पाएँ या जेई का फॉर्म भर पाएँ। समझ में आ रही है बात ये?

ये बिल्कुल एक दूसरा तरीका है उसको देखने का। अब मैं दया नहीं करूँगा, अब मैं उसे उसका हक़ दूँगा। समझ में आ रही है बात?

लेकिन अगर मुझे मानना ही नहीं है कि शोषण हुआ है, तो मैं कहूँगा, नहीं, शोषण वग़ैरह कुछ नहीं हुआ है। इस बेचारे को कुछ बुरी आदतें लगी हुई हैं, इसलिए ये ऐसा अभी धराशाही है। इसकी अपनी कुछ कमियाँ हैं, गलतियाँ हैं, जिस वजह से इसकी हालत बहुत ख़राब है तो मैं दया करके ऐसे, हाँ भाई, ले भाई ₹100 ले ले। और ₹100 लेकर मेरे कर्तव्य की इति-श्री हो गई और इतना ही नहीं हुआ, और मैं अपनी नज़र में ऊँचा भी हो गया।

और दूसरी चीज़ है, ये स्वीकार करना कि उसको नीचा करने में मेरा भी योगदान है। कि मुझे इस कुर्सी पर बैठना शायद संभव नहीं हो पाता उन सब लोगों के बिना जो यहाँ नीचे बैठे हुए हैं। और ज़रूरी नहीं है कि इस कुर्सी पर बैठने की काबिलियत मेरी ही हो। बिल्कुल हो सकता है कि ये सब जो नीचे बैठे हुए हैं, उनको सही मौके मिले होते, सही परवरिश, सही शिक्षा, तो इनमें से कोई इस कुर्सी पर बैठा होता। ये बिल्कुल दूसरा तरीका है।

तो हमने कहा, दया से आगे है अधिकार। अधिकार से भी आगे एक और चीज़ होती है। वो तभी बताऊँगा जब आप सुनने को तैयार हो। बताऊँ?

उसको करुणा बोलते हैं। आपने दया-करुणा को एक में बोल दिया था, वो गलत कर दिया था। करुणा बिल्कुल दूसरी चीज़ होती है। करुणा मालूम है क्या कहती है? करुणा कहती है, मैं तो इसकी जो अपनी ज़िम्मेदारी अब मैं समझ रहा हूँ, कि अगर वो नीचे है तो इसमें किसी न किसी तरीके से मेरा भी योगदान है। मैं अपनी ज़िम्मेदारी समझ रहा हूँ, मैं यथासंभव करूँगा। ये तो हुआ अधिकार देना।

और करुणा कहती है, कि उसके भीतर जो कमज़ोरी बैठ गई है, उसको हटाना है। वो आर्थिक नहीं है कमज़ोरी, वो शैक्षणिक नहीं है कमज़ोरी, वो मानसिक है कमज़ोरी। वो हटाना है। उसने अपनी अवनति का बीज अपनी छाती में गाड़ लिया है। उसको ही बाहर निकालना पड़ेगा, और उसको बाहर निकाले बिना, अगर बाहर से उसको तरक्की मिल भी गई, तो उसको चैन नहीं मिलेगा। उसके भीतरी कोई तरक्की नहीं हो पाएगी। ये करुणा है।

दया बाहर-बाहर से कुछ दे देती है, थोड़ा-बहुत। अधिकार में आप उसको वो देते हो, जो उसको मिलना चाहिए। लेकिन चीज़ बाहरी ही देते हो। करुणा उसको भीतर से बदल देती है। करुणा कहती है, मैं भी इंसान हूँ, तुम भी इंसान हो, तुम्हें मेरी ज़रूरत पड़नी ही क्यों चाहिए? हम दोनों इसी मिट्टी से उठे हैं, इसी हवा में साँस लेते हैं, दोनों एक ही प्रजाति के हैं। तुम्हारी ये जो दुर्दशा है, ये दुर्दशा रहे ही क्यों? क्यों न तुम ही ऐसे हो जाओ, कि तुमको आगे कभी किसी की मदद की ज़रूरत न पड़े। यही करुणा है।

क्यों न तुम ऐसे हो जाओ कि तुम्हें आगे अब किसी की मदद की ज़रूरत न पड़े। तुम देख लो कि तुम्हारे ही भीतर कितना सामर्थ्य है; ताकि तुम न तो व्यवस्था से जाओ किसी प्रकार का सहारा माँगने, न दूसरों के आगे जाओ हाथ फैलाने, न तुम अपने आप को कहो कि मैं तो शोषित हूँ, विक्टिम हूँ। तुम इन सब बातों से आगे निकल जाओ। तुम कहो, हुआ होगा अत्याचार, हम परवाह नहीं करते। पीछे क्या था, छोड़ो। हम पीछे से आगे निकल के दिखा देंगे, और उसका मज़ा कुछ और होता है।समझ में आ रही है बात? उसकी ताक़त समझो।

जैसे आप किसी बच्चे के साथ जब रेस लगाते हो, कई बार करते हो न कि यहाँ से वहाँ तक जाना है। मैं यहाँ से शुरू करूँगा, तू यहाँ से शुरू कर। मैं पीछे हूँ तुझसे; लेकिन फिर भी वहाँ तक तुझसे पहले पहुँच के दिखा सकता हूँ। पहुँच पाओ न पहुँच पाओ, ये जो बात है, ये बात जलवे की है, कि हैं पीछे पर भिखारी थोड़े ही हैं। हमें नहीं चाहिए किसी का दान-पात्र, ठीक है? हम अपनी ताक़त जगाएँगे, हम अपना वजूद जगाएँगे, आत्मबल।

और ये जो आंतरिक जागृति होती है, इसी को जानते हो क्या बोलते हैं? धर्म। धर्म ही वो चीज़ है, जो आपको पूरी दुनिया से लड़ने की ताक़त दे देता है। धर्म ही वो चीज़ है, जो कहता है, सच्चाई के सामने झुकूँगा, और कहीं ये सर झुकेगा नहीं मेरा। एक चीज़ है बस, जिसके आगे मैं उदंडता, अधिष्ठता नहीं करता, बस एक चीज़ है, जिसके आगे मौन हो जाता हूँ, सर झुका देता हूँ, वो क्या है? सत्य।

सच के आगे फिर मैं झूठ को नहीं खड़ा करता कि नहीं है। बहाने; न न न, सच जब सामने आता है, तो चुप हो जाते हैं। बाक़ी ये दुनिया के लोग, और इनकी व्यवस्थाएँ और इनकी परंपराएँ, और इनकी ताक़त, मेरी जूती से।

प्रश्नकर्ता: भाड़े में जाए।

आचार्य प्रशांत: आ रही बात समझ में? तो ये जो आंतरिक सशक्तिकरण है, आंतरिक सशक्तिकरण, ठीक है? ठीक है, मैं जानता हूँ मेरे साथ हुआ, पीछे जो भी हुआ पर भीतर से मैं दीन-हीन नहीं हो गया। भीतर से मैं किसी पर आश्रित नहीं हूँ, मैं अपने आप को कमज़ोर नहीं समझता। मेरे भीतर कोई हीन-भावना नहीं आ गई है। मैं दूसरों को यूँ ललायित होकर नहीं देखता, कि अरे, वो कितने अच्छे हैं, श्रेष्ठ हैं, ऐसे हैं, वैसे हैं। अजी हाँ।

और ये कोई झूठा घमंड नहीं है, ये सिर्फ़ एक स्वीकार है कि मैं आज भले ही ज़मीन पर हूँ, पर आसमान की संभावना मुझमें है। अपने पोटेन्शियल का स्वीकार है ये, ये खोखला घमंड नहीं है। और जब आप अपने पोटेन्शियल को स्वीकार करते हो, तो फिर उस पोटेन्शियल को मटीरियलाइज़ करने की ज़िम्मेदारी भी स्वीकार कर लेते हो। एक बार आपने कह दिया कि आसमान तक जाने की मुझमें संभावना है, तो फिर आप पाते हो कि आप अपने पर भी खोलने लग गए हो। ज़िम्मेदारी आ गई है, भाई; आसमान की इतनी बात करी है, तो अब परों में भी जान दिखाओ, कुछ उड़ के जाओ।

ये काम करुणा करके दिखाती है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
Comments
LIVE Sessions
Experience Transformation Everyday from the Convenience of your Home
Live Bhagavad Gita Sessions with Acharya Prashant
Categories