डॉक्टर अंबेडकर मृत्यु की रात को भी क्या कर रहे थे? वह धर्म पर ही किताब लिख रहे थे, और उन्हें बड़ी हड़बड़ी थी कि इसको पूरा कर दें। तबीयत बहुत ख़राब थी, दिख रहा था कि जाने वाले हैं। उनकी मृत्यु के बाद वह किताब प्रकाशित हुई, ‘The Buddha and His Dhamma.’ वह कोई पॉलिटिकल या इकोनॉमिक्स की किताब नहीं लिख रहे थे। वह धर्म पर लिख रहे थे। जो भारतीय दर्शन रहा है, उसकी सारी खूबियाँ बौद्ध धर्म में ज़बरदस्त तरीके से मौजूद हैं। बौद्ध धर्म तो पूरा ही जिज्ञासा का धर्म है, रूढ़ियों के लिए वहाँ एकदम ही कोई जगह नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: हैलो सर, माय नेम इज़ पीयूष फ़्रॉम किरोड़ीमल कॉलेज। सर, ऐज़ यू सेड डॉ. बी.आर.अंबेडकर हैज़ अडॉप्टेड बुद्धिज़्म। सो सर, माय क्वेश्चन इज़ दैट, व्हाई डिडन’ट बी.आर.अंबेडकर चूज़ एथिज़्म ओवर बुद्धिज़्म? एंड सर, ऐज़ वी नो दैट, बुद्धिज़्म इज़ नॉट कनेक्टेड विद ऐनी रिलिजन। सो व्हाट इज़ द रीजन बिहाइंड डॉ. बी.आर.अंबेडकर चूज़िंग अ रिलिजियस पाथ ओवर अ नॉन-रिलिजियस वन? थैंक यू।
आचार्य प्रशांत: हमने इस पर अभी बात करी थी थोड़ी-सी। देखो, कोई भी गहरा व्यक्ति धार्मिक होगा ही होगा। ये बात हमें अटपटी इसलिए लगती है क्योंकि धर्म का मतलब हमने बना लिया है, कूद-फाँद; जो देखते हो मूर्खताएँ तमाम तरीके की, सड़कों में, पंडालों में। ये जो बहुत तरह के दुनिया भर में रस्मो-रिवाज़ चलते हैं और उनके नाम पर जो हिंसा चलती है, मूर्खता चलती है, उन सब चीज़ों ने धर्म का नाम खींच लिया है, लगभग मोनोपोलाइज़ कर लिया है। तो इसलिए हमें अजीब लगता है कि डॉ. अंबेडकर ने धर्म चुना ही क्यों?
सवाल ये है, कि जब उन्होंने हिन्दू-धर्म छोड़ा तो सीधे-सीधे यही क्यों नहीं कह देते अपने सब अनुयायियों से, कि साहब, आप लोगों को किसी को धर्म की कोई ज़रूरत है ही नहीं? उन्होंने क्यों ये कहा, कि “नहीं, अब मैं बौद्ध होने जा रहा हूँ।”




