आत्मज्ञान ही दीपोत्सव है

Acharya Prashant

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आत्मज्ञान ही दीपोत्सव है
बाहर सौ सूरज भी जगमगा रहे हों, तो उनसे कहीं ज़्यादा कीमत भीतर के एक दीये की होती है। त्योहार का अर्थ ही यही होता है कि भीतर का दीया प्रज्वलित हो जाए। मनुष्य होने के नाते, प्रज्वलन की सामग्री सब में हमेशा से ही उपलब्ध रहती है। दीया भी रहता है, तेल भी रहता है, बाती भी रहती है — लौ नहीं रहती बस; वो भीतर प्रज्वलित हो जाए, यही उत्सव होता है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

आचार्य प्रशांत: सबसे पहले वो प्रार्थना जो आपको सबसे ज़्यादा पसंद है। तैयार हैं?

आत्मज्ञान के प्रकाश में अंधे कर्म सब त्याग दो, निराश हो, निर्मम बनो, ताप रहित बस युद्ध हो।

स्वागत है सबका और आभार, बहुत-बहुत दूर-दूर से आप आ रहे हैं, और मैं आप लोगों की बातें देख रहा था, पढ़ रहा था, सुन रहा था, और बहुत अनुग्रहित अनुभव कर रहा था। भाव-सा उठ रहा था। संस्था ने अपनी ओर से जितना संभव हो सके प्रयास करा है कि आप आए हैं और आपके लिए अधिकतम यहाँ पर आनंद रहे और सीख रहे। देखते हैं, कैसा रहता है। बातचीत शुरू करते हैं। बीच-बीच में वो सब होता रहेगा जो मेरे आने से पहले आधे-पौन घंटे हो रहा था। ठीक है? बताइए, सबसे पहले बात किससे की जाए?

जितना कुछ भी हमने सत्रों में अभी तक सुना है, पढ़ा है, सीखा है, और जो कुछ भी अनसुलझा रह गया है, उससे संबंधित सारी बात करेंगे। समय आज हमारे पास पर्याप्त है, शुरू करते हैं।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न: जैसा कि पिछले चार वर्षों से आपसे मैं जुड़ा हूँ, अभी लगभग महीने के सोलह से अठारह दिन आपके साथ छह से आठ घंटे रहने लगा हूँ। अभी जिस श्लोक से हम लोग शुरुआत करे हैं, “आत्मज्ञान के प्रकाश में अंधे कर्म सब त्याग दो।” तो गीता दीपोत्सव में जैसा हम लोग एकत्रित हुए हैं, तो क्या इस गीता का वही मतलब है जो आत्मज्ञान की आप बात करते हैं? वही मतलब है, आत्मज्ञान ही दीपोत्सव है क्या? ऐसा ही मैं कुछ समझ पा रहा हूँ इसको।

आचार्य प्रशांत: हाँ, और क्या। अभी हाल का ही एक सत्र था जहाँ हमने बात की थी, कि बाहर सौ सूर्य भी जगमग हों, तो उनसे कहीं ज़्यादा मूल्य होता है किसका? भीतर के एक दीये का। बाहर सौ सूरज भी जगमगा रहे हों, तो उनसे कहीं ज़्यादा कीमत भीतर के एक दीये की होती है। तो त्यौहार का, उत्सव का, पर्व का, किसी भी तरह के सेलिब्रेशन का अर्थ ही यही होता है — कि भीतर का दीया प्रज्वलित हो जाए।

प्रज्वलन की सामग्री तो सारी सबमें हमेशा से ही उपलब्ध रहती है मनुष्य होने के नाते। दीया भी रहता है, तेल भी रहता है, बाती भी रहती है, लौ नहीं रहती बस। वो भीतर प्रज्वलित हो जाए यही उत्सव होता है। बाहर जो कुछ भी किया जाता है, वो आदर्श रूप से, सही रूप से, या तो भीतर के प्रज्वलन का प्रतिबिंब होना चाहिए, कि भीतर कुछ हुआ है और वही बाहर प्रतिबिंबित हो रहा है; या फिर बाहर एक साधन की तरह होना चाहिए, कि बाहर हम कुछ ऐसा आलोक करेंगे कि उससे भीतर का आलोक संभव हो पाए।

समझ में आ रही है बात?

आप बाहर अगर प्रकाश कर रहे हैं, तो वो प्रकाश या तो भीतर के प्रकाश की बाहरी बधाई की तरह होना चाहिए। भीतर रोशनी थी और ऐसे आईना लगा दिया, वो अब बाहर भी दिखाई दे रही है। हो सकता है कि वो कई गुना संवर्धित होकर, मैग्निफ़ाय होकर दिखाई दे रही हो, तो भीतर दीया था, तो बाहर सूरज जैसा बन गया हो। ये तो ठीक है, लेकिन पहले भीतर दीया होना चाहिए, पहले भीतर रोशनी होनी चाहिए, इससे पहले कि हम बाहर रोशनी करें। ये पहली स्थिति मैंने कही।

एक दूसरी स्थिति भी हो सकती है, कि बाहर हम जो प्रकाश कर रहे हैं दीपोत्सव में, प्रकाशोत्सव में, दीपावली में। वो जो बाहर का प्रकाश है, वो एक उपाय की तरह, साधन की तरह काम करे, कि आपने बाहर रोशनी करी, और कुछ इस तरीके से करी, कुछ ऐसा याद करते हुए करी, कुछ ऐसी विधि लगाकर करी, कि बाहर की रोशनी कारण बन गई, साधन बन गई भीतर की रोशनी को जगाने का।

ये दोनों सही कारण होंगे उत्सव मनाने के।

तो गलत कारण फिर क्या होगा उत्सव मनाने का?

वो वही होगा जिससे हम भली-भाँति परिचित हैं। गलत कारण ये होगा कि पहली बात भीतर घुप अँधेरा है, लेकिन बाहर जगमग-जगमग झालर। और उससे भी ज़्यादा एक और ख़ौफ़नाक बात हो सकती है, कि भीतर के अँधेरे को ढकने के लिए ही बाहर उजाला कर दिया जाए। ये दो गलत कारण हो गए।

तो हमने दो सही, उचित, सम्यक कारण कहे और दो गलत कारण। हमारे ऊपर है, चेतना का अर्थ ही होता है?

श्रोता: चुनाव।

आचार्य प्रशांत: चुनाव। अब आपके ऊपर है कि आप कौन-सा कारण चुनते हैं उत्सव मनाने का। दो इधर (एक ओर को इशारा करते हुए) भी हैं कारण, दो इधर (दूसरी ओर को इशारा करते हुए) भी हैं कारण। आप जानिए, आपको चुनना क्या है। लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि ज़्यादातर जो कारण चुना जाता है और व्यवहार में हमें दिखाई देता है, वो कारण गड़बड़ वाला है।

गड़बड़ वाले कौन से दो कारण हैं?

भीतर कुछ नहीं है और बाहर झिलमिल-झिलमिल। और उससे भी ख़तरनाक हमने कहा, कि भीतर कुछ नहीं है, ये ज्ञात है और इसी कारण बाहर झिलमिल-झिलमिल, ताकि अपने आप को हम धोखा दे सकें कि जैसे हमारे पास भी प्रकाश है। है कुछ नहीं, बस बाहर रोशनी कर लेनी है ख़ुद को ही धोखा देने के लिए, दुनिया को धोखा देने के लिए।

हम यहाँ एकत्रित हुए हैं ताकि हम सचमुच उत्सव को जान सकें और फिर उत्सव मना सकें। याद रखिए, उत्सव मनाना तो एक कर्म जैसा हुआ न। उत्सव मनाना कैसा हुआ? एक कर्म। और हम अच्छे से जानते हैं कि गीता में अध्याय तीन से पहले कौन-सा आता है? अध्याय दो। कर्म से पहले क्या आता है?

श्रोता: जानना।

आचार्य प्रशांत: तो उत्सव मनाना यदि कर्म है, तो उत्सव को जानना धर्म है। जानोगे तभी तो मनाओगे न, जाने बिना उत्सव का रंग-रोगन किस काम का है? मैं प्रश्न पूछ रहा हूँ, क्या करना है ऐसा कि पता कुछ नहीं है और हैलोवीन मना रहे हैं। पूछो किसी से, हैलोवीन माने क्या? नहीं पता, पर मना रहे हैं। क्यों? अच्छा लगता है। बढ़िया, ऊपर से कुछ मुखौटा डाल लिया, कुछ जादूगरी कर ली, चेहरा रंग लिया, कूद-फांद कर ली। अच्छा लग सकता है तात्कालिक रूप से। लाभ बताइए, कुछ लाभ मिलेगा?

तो मनोरंजन करना है तो फिर बहुत तरीके हैं, उसमें राम का नाम क्यों लाए बीच में? राम के नाम के साथ तो ये अभद्रता हो गई न कि मनोरंजन के लिए उनका इस्तेमाल कर लिया जाए। मनोरंजन में हो सकता है कोई बुराई न हो कर लीजिए मनोरंजन, पर धर्म के नाम पर मत करिए। बस यही। और धर्म के नाम पर अगर उत्सव मनाना हो, तो उससे बड़ा उत्सव नहीं होता। वास्तव में धर्म का मतलब ही होता है — उत्सव की कला। धार्मिक आदमी वही है जो लगातार उत्सव में, आनंद में है, जॉयफ़ुल है लगातार। आनंदमग्न होने का अर्थ ही धार्मिकता है।

उत्सव मन नहीं सकता बिना उत्सव को जाने।

और जानना माने क्या जानना? ज्ञान माने क्या ज्ञान? आत्मज्ञान। बाहरी ज्ञान तो वैसे भी हमारे पास अक्सर होता ही है, और बाहरी ज्ञान जब हमें पाना हो तो वो क्षेत्र सीधे-सीधे धर्म का कहलाता भी नहीं है, उसके लिए हमारे पास स्कूल, कॉलेज और बाक़ी सब उपाय बहुत हैं।

जब धर्म में ‘ज्ञान’ शब्द का इस्तेमाल हो, तो उसका एक ही अर्थ होता है — आत्मज्ञान। तो दिवाली भी नहीं मन सकती आत्मज्ञान के बिना।

अब हमने इतनी बार बात करी है, आप सब इतने महीनों से बल्कि बहुत-बहुत सालों से आप में से कई लोग साथ जुड़े हुए हैं परिवार की तरह हैं बिल्कुल। इतनी बार हमने बात की है, हमने क्या कहा है? आत्मज्ञान के लिए जब भी स्वयं को देखोगे तो भीतर क्या पाओगे? सुशोभित देदीप्यमान आत्मा या कुछ और? भीतर जब भी देखोगे, तो क्या पाओगे आँख बंद करके, कि लाल, नीली, रूपहली रोशनी फूट रही है किसी दिव्य प्रकाशपुंज से, या कुछ और पाते हो?

श्रोता: कुछ और मिलता है।

आचार्य प्रशांत: तो दिवाली का अर्थ सबसे पहले हुआ, अँधेरे का साक्षात्कार। दिवाली किस रात को मनाई जाती है?

श्रोता: अमावस्या।

आचार्य प्रशांत: बात प्रतीकात्मक हुई न, कि नहीं हुई? रोशनी तो बाद में जगाओगे, पहले देखो कि कितना?

श्रोता: अंधेरा है।

आचार्य प्रशांत: वो जो गाढ़ा अमावस का अँधेरा है न, वो बाहर नहीं होता, वो यहाँ (अपने भीतर की ओर इंगित करते हुए) होता है। और जो दीया भी इसीलिए जलाना होता है, फिर वो बाहर नहीं जलाना होता, यहाँ (अपने भीतर) जलाना होता है। अमावस भी यहाँ है और प्रकाश भी यहीं पर जलाना पड़ेगा, “तमसो मा ज्योतिर्गमय,” यही दिवाली है।

आत्मज्ञान का अर्थ ही है अपने अँधेरे को देखना। अपने अँधेरे को देखे बिना बाहर की कूद-फांद और नाचने-उछलने से कुछ लाभ नहीं हो जाने वाला।

सबसे पहले देखना पड़ेगा कि भीतर है क्या? और भीतर जो कुछ है, फिर कहना है, इसको ऐसे ही रखना ज़रूरी है क्या? ये जो कुछ भी चल रहा है ज़िंदगी में, इसको ऐसे ही चलने देना अनिवार्य है क्या? और फिर ध्यान आता है राम का, कि उन्होंने जो चल रहा था, वो चलने तो नहीं दिया न, उन्होंने तो बहुत कुछ बदला। वो जो बदलाव है, वही कहलाता है — दीप जलाना।

यथास्थिति, स्टेटस क्वो क्या है अमावस की रात? उसके लिए एक शब्द क्या है? अँधेरा। वो हमारे जीवन की क्या है? यथास्थिति, ऐज़ थिंग्स स्टैंड। जो हमारी प्राकृतिक अवस्था है उसी को क्या बोलते हैं? अंधकार। श्रीकृष्ण ने अभी हाल ही में उसके लिए दो नाम और दिए थे, जो आपने गाए भी खूब थे। क्या?

अंधकार में, अहंकार में, अज्ञान में मति भ्रष्ट हैं, कल उन्हें क्या कष्ट हो, वो आज ही जब नष्ट है।

तो अंधकार यहाँ पर किसका पर्याय है? अहंकार का। एक ही साँस में हमने दो शब्द बोले न शुरू में ही, ‘अहंकार में, अंधकार में।’ तो अंधकार का क्या अर्थ हुआ? अहंकार। तो अमावस, माने अहंकार। दिवाली में अमावस माने अहंकार, और दीया जलाना क्या हुआ फिर? उसी अंधकार को जानना।

अज्ञान की काट कोई कर्म नहीं होता। अज्ञान की काट तो यही होती है कि अज्ञान माने ‘न जानना,’ तो मैं जान गया अज्ञान कट गया। अज्ञान की काट तो ‘जानना’ ही होता है। तो दिवाली मनाने का तरीका क्या हुआ? कृष्णसम्मत तरीका क्या हुआ? रामसम्मत तरीका क्या हुआ? जानो कि भीतर कितना घना है अँधेरा और कहो कि उसको थोड़ा तो कम करूँगा। कुछ इस दिवाली, कुछ अगली दिवाली, दिवाली दर दिवाली। जीवन और मिला किस लिए है? जितनी भी हमें साठ-अस्सी दिवालियाँ मिलनी हैं इसीलिए तो मिली हैं न, नहीं तो एक ही मिलती।

उपनिषद् आग्रह करते हैं, प्रार्थना, कहते हैं, कि “हमें सौ वर्ष की आयु दो।” वो किस लिए माँग रहे हैं सौ वर्ष की आयु? मौज करने के लिए? भोगने के लिए? किस लिए माँग रहे हैं? वो इसीलिए माँग रहे हैं कि अँधेरा इतना घना है कि सौ दिवालियाँ चाहिए होंगी। एक दीप अच्छी शुरुआत है, पर मुझे सौ दीप जलाने पड़ेंगे, अँधेरा बहुत ज़्यादा है। समझ में आ रही है बात?

तो दिवाली का अर्थ हुआ — आत्मचिंतन, आत्ममनन, बैठना शांति से स्वयं को देखना, स्वयं के निर्णयों को देखना, संबंधों को देखना, कर्मों को, विचारों को, भावनाओं को देखना। किन बातों को लेकर के अभी भविष्य का आसरा है? कौन-सी पुरानी आग है जिसमें आज भी जल रहे हो और भविष्य को भी राख कर देना चाहते हो? किससे अभी बदला पूरा नहीं हो पा रहा? कौन-सी कामना है जिसमें पहले भी दस बार गिर चुके हो, हाथ-पाँव तुडाए हैं और अभी आगे और गिरने को आतुर हो? ये है दिवाली मनाने का तरीका।

और जब अँधेरा कटता है न, आप लोगों को लग रहा होगा, बड़ी गंभीर बात हो गई, दिवाली ऐसे मनानी है क्या? फिर रॉकेट, फुलझड़ी वो सब कब होगा? जब अँधेरा कटता है न, बड़ा आनंद उठता है अपने आप भीतर से, ऐसा लगता है जैसे कि जेल में थे और किसी तरह बाहर आ गए। ऐसा लगता है जैसे धुएँ भरे कमरे में थे और किसी तरह दरवाज़ा खुल गया, कि जैसे बहुत बीमार थे और बीमारी किसी तरह कट गई।

और आप में से जो लोग खुशी मनाने में बहुत रुचि रखते हैं, होनी चाहिए, सबको होनी चाहिए, हमारा तो स्वभाव ही आनंद है। स्वभाव ही आनंद है हमारा, दुख क्यों झेलें? सारा अध्यात्म है ही इसीलिए, दुख नहीं झेलना। तो आपको अगर खुशी मनाने में बहुत रुचि हो, तो मैं आपको विशेष रूप से आमंत्रित करता हूँ आत्मज्ञान की तरफ़। उसमें जैसा अह्लाद उठता है, वो किसी भी छोटी-मोटी खुशी से बहुत ऊपर का है। बिल्कुल ज़मीन की भाषा में कहें तो, मज़ा आ जाता है! वाह! वाह!

ये सब अपनी जगह ठीक है, नए कपड़े ख़रीद लिए, और मिठाइयाँ और डब्बे इधर से उधर देना-करना, ये जो भी होता है, ठीक है। ये आपको करना है करिए, मुझे इसका कोई विरोध नहीं। लेकिन अगर असली मौज चाहिए, तो वो दीया जलाइए, वो दीया जलाइए। और दीया जलाना अपने आप में कोई विधायक (अफ़र्मेटिव) काम नहीं है।

दीया जलाने का मतलब यही है कि ज़रा इंसान बनकर, ज़रा दिलेर बनकर, हौसले के साथ अपने अँधेरे से आँखें चार करो।

अपने ही जिस चेहरे को देखने से, अपने ही जिस रूप को देखने से, अपने ही बारे में वो जो सब बातें हैं जिनको स्वीकार करने से कतराते रहे हो, कहो कि बहुत हो गया। जैसे अंग्रेज़ी में मुहावरा चलता है न, स्केलेटन इन द कपबोर्ड। कहो, बहुत हो गया। ये मेरे कमरे में अलमारी है, बहुत बड़ी अलमारी है, अलमारी छुप तो सकती नहीं। मेरे कमरे में अलमारी है अच्छी-ख़ासी बड़ी अलमारी है छुप तो सकती नहीं, छह-साढ़े छह फ़ीट की अलमारी, जैसी होती है। और इस अलमारी में कुछ बहुत पुराना है जो सड़ रहा है, जो बदबू दे रहा है।

इस बार प्रेरणा राम जी की, अलमारी को क्या? खोल ही देते हैं। दिवाली पर घर साफ़ करने का ये अर्थ हुआ। दिवाली पर घर साफ़ करने का मतलब ये नहीं है कि हम पुताई करवाया करते हैं हर साल, बाहर के पुतए बुलवा-बुलवा के और वो आकर सीढ़ी लगाकर सफ़ाई करें, वो बहुत बाहरी बात है। असली बात क्या है? हम सबके अस्तित्व में एक अलमारी है जिसमें अतीत सड़ रहा है, दुर्गंध दे रहा है। उसको खोलना है और खोलना ही सफ़ाई है। उसके आगे कुछ नहीं चाहिए, झाड़ू-वग़ैरह अपना हटाइए, उसकी ज़रूरत नहीं है।

तो अभी मैंने उनकी बात करी जिन्हें खुशी मनाने में बड़ा रस रहता है। अब मैं उनसे बात करना चाहता हूँ जिन्हें सफ़ाई करने में बहुत रस रहता है। बहुत लोगों के लिए दिवाली का मतलब ही होता है कि पूरे घर के बदल डालूँगा, पूरे घर के बदलने हैं पर घर यहाँ (अपने भीतर) है। घर कहाँ है?

प्रश्नकर्ता: अंदर।

आचार्य प्रशांत: यहाँ (अपने भीतर) है, और इस घर में बहुत कूड़ा-कचरा पड़ा हुआ है। हमने उसको बहुत हिफ़ाज़त के साथ अलमारियों में नहीं, तिजोरियों में बंद कर दिया है।

तिजोरी में क्या?

कचरा।

तो मोरा हीरा हेराय गयो?

प्रश्नकर्ता: कचरे में।

आचार्य प्रशांत: हर चीज़ जुड़ जाती है दूसरी चीज़ से। हर चीज़ दूसरी चीज़ से जुड़ी हुई है क्या करें, एक जगह से शुरू करो, पता चलता है सब एक हैं।

एकं सत्य विप्रा बहुधा वदन्ति, क्या करें?

तो पूछा, बोले कि “अरे, गीता दीपोत्सव हो रहा है, तो आचार्य जी बस गीता वालों को ही बुलाएँ?” मैंने कहा, बाक़ी सब जो पढ़ रहे हैं, वो भी गीता ही है। तुम्हें क्या लग रहा है, वहाँ नागार्जुन गीता के अलावा कोई बात कर रहे हैं? या बुद्ध? या लाओत्ज़ू? या संतवाणी में गीता के अतिरिक्त कुछ है? वो सब गीता ही है, बुलाओ सबको बुलाओ, आने दो।

तो बाहर रोशनी करने का क्या मतलब? भीतर के अँधेरे का साक्षात्कार। बाहर सफ़ाई करने का क्या मतलब? भीतर के कचरे से आँखें चार। बाहर की मिठाई का क्या मतलब? बाहर की मिठाई का क्या अर्थ हुआ? उल्टा ही चलेगा सब, ख़ुद ही लगा लीजिए। तो बाहर की मिठाई का क्या अर्थ हुआ? भीतर की कड़वाहट, कटु वचन…

प्रश्नकर्ता: मत बोल रे।

आचार्य प्रशांत: सब जुड़ जाता है क्या करें, सब जुड़ जाता है। भीतर जो कड़वाहट होती है, वो कड़वाहट कभी अपने प्रति नहीं होती। वो कड़वाहट सदा किसके प्रति होती है?

प्रश्नकर्ता: बाहर।

आचार्य प्रशांत: और ये क्या है?

प्रश्नकर्ता: प्रकृति।

आचार्य प्रशांत: इसको तो हमने बोला माँ। इसको क्या बोला?

श्रोता: माँ।

आचार्य प्रशांत: और वो कोई उद्देश्य लेकर चलती है क्या आपको दुख देने का?

श्रोता: नहीं।

आचार्य प्रशांत: लेकिन सारी कड़वाहट हमारी यही होती है “किसी दूसरे ने मेरा कुछ बुरा कर दिया। किसी संयोग से मेरा बुरा हो गया। मैं गलत घर में पैदा हो गया। मैं गलत लिंग में पैदा हो गया, गलत जाति में पैदा हुआ। परीक्षा देने जा रहा था हाथ टूट गया। गलत देश में पैदा हो गया। नौकरी पर गलत बॉस मिल गया। शादी गलत हो गई।”

बाहर की मिठाई का मतलब है, भीतर जो भी कड़वाहट दुनिया के प्रति रखी है, जान लो कि वो कड़वाहट तुम्हें मुक्त नहीं होने दे रही। क्योंकि दुनिया के प्रति कड़वाहट का अर्थ है, अपनी ओर नहीं देखूँगा, नहीं देखूँगा, नहीं देखूँगा। अगर मुझे दुख है तो उसका कारण किसे बताऊँगा?

श्रोता: बाहरी।

आचार्य प्रशांत: ये (बाहर की ओर इंगित करते हुए) सब कारण हैं। प्रकृति में सिर्फ़ संयोग होते हैं, और संयोगों का समानार्थी होता है ‘अकारणता।’ रैन्डमनेस और कॉज़ेशन एक साथ तो नहीं चल सकते न, तो वहाँ तो बस संयोग थे। प्रकृति आपको पीड़ा दे सकती है, वो भी बस संयोगवश। तय करके नहीं देती है पीड़ा, संयोग से देती है। भूकंप आया था अभी कल ही, कितने बेचारे चले गए। प्रकृति ने तय थोड़ी करा था कि उनको मार ही देना है। न प्रकृति ने कहीं पर नाम लिखा था कि इसको मारना है, इसको नहीं मारना है। प्रकृति में तो बस संयोग होते हैं।

संयोगों से पीड़ा मिल सकती है, पर दुख, ये जो हमारा अस्तित्वगत दुख है इसका कारण प्रकृति नहीं होती। इसका कारण भीतर वो जो बैठा है। पुराना बकरा कौन-सा? मैं।

मिठाई बाहर देने का अर्थ होता है, भीतर ये जो कड़वाहट है, दुनिया भर के प्रति, वो कड़वाहट जो कभी आपको स्वयं को नहीं देखने देती, उस कड़वाहट को कहना, “अच्छा, ठीक है, बहुत हो गया, बहुत हो गया।” तो बाहर आपको मिठाइयाँ बाँटनी हैं, आप बेशक बाँटिए, लेकिन भीतर कड़वाहट रख के बाहर मिठाइयाँ बाँटने से कुछ होगा नहीं। एक दिवाली बस और व्यर्थ बीत जाएगी। समझ में आ रही है बात?

आप जितने काम करते हैं, उन सब कामों के वास्तविक अर्थों को समझिए, तभी जीवन सार्थक हो पाएगा।

धन्यवाद।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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