बाहर सौ सूरज भी जगमगा रहे हों, तो उनसे कहीं ज़्यादा कीमत भीतर के एक दीये की होती है। त्योहार का अर्थ ही यही होता है कि भीतर का दीया प्रज्वलित हो जाए। मनुष्य होने के नाते, प्रज्वलन की सामग्री सब में हमेशा से ही उपलब्ध रहती है। दीया भी रहता है, तेल भी रहता है, बाती भी रहती है — लौ नहीं रहती बस; वो भीतर प्रज्वलित हो जाए, यही उत्सव होता है।
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आचार्य प्रशांत: सबसे पहले वो प्रार्थना जो आपको सबसे ज़्यादा पसंद है। तैयार हैं?
आत्मज्ञान के प्रकाश में अंधे कर्म सब त्याग दो, निराश हो, निर्मम बनो, ताप रहित बस युद्ध हो।
स्वागत है सबका और आभार, बहुत-बहुत दूर-दूर से आप आ रहे हैं, और मैं आप लोगों की बातें देख रहा था, पढ़ रहा था, सुन रहा था, और बहुत अनुग्रहित अनुभव कर रहा था। भाव-सा उठ रहा था। संस्था ने अपनी ओर से जितना संभव हो सके प्रयास करा है कि आप आए हैं और आपके लिए अधिकतम यहाँ पर आनंद रहे और सीख रहे। देखते हैं, कैसा रहता है। बातचीत शुरू करते हैं। बीच-बीच में वो सब होता रहेगा जो मेरे आने से पहले आधे-पौन घंटे हो रहा था। ठीक है? बताइए, सबसे पहले बात किससे की जाए?
जितना कुछ भी हमने सत्रों में अभी तक सुना है, पढ़ा है, सीखा है, और जो कुछ भी अनसुलझा रह गया है, उससे संबंधित सारी बात करेंगे। समय आज हमारे पास पर्याप्त है, शुरू करते हैं।
प्रश्नकर्ता:




