गाँधी जी ने वास्तव में अंदर वाले दुश्मन से लोहा लिया था। बहुत साधारण कद-काठी के थे, कोई ऐसा ऐब नहीं जो साधारण आदमी में होता हो और उनमें ना हो, पर ये महात्मा कहलाए, गीता को माँ बोला। एक कमज़ोर मन का व्यक्ति इतना दृढ़ बन गया कि जब वह उपवास करने बैठते थे, तो भारत ही नहीं पूरी दुनिया काँप जाती थी और चर्चिल के पसीने छूट जाते थे। वह उपवास पर बैठ गए तो बैठ गए और लोगों को उनकी बात सुननी पड़ती थी। औसत स्तर से उठकर इतना मजबूत बन जाना, मेरे ख्याल से सबको उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी आज गाँधी जयंती है, तो गाँधी जयंती के दिन मैं आपसे वो सारी बातें तो नहीं करूँगा जो अक्सर गाँधी जी के विषय में करी जाती हैं — उनका योगदान, वो सब चीज़ें। पर कुछ हटके पूछना चाहूँगा। अक्सर मैंने देखा है, कि गाँधी जी के ऊपर ये आरोप लगता आया है कि उन्होंने अहिंसा की और नॉन वायलेंस की बात करके भारतीयों को बहुत कमज़ोर बना दिया है।
और उसी के ऊपर थोड़ी बात करने के लिए मैंने कुछ कोटेशन अपने पास रखे हैं, मैं वो बोलना चाहूँगा एक बार: “आइ ऑब्जेक्ट टू वॉयलेंस बिकॉज़ व्हेन इट अपीयर्स टू डू गुड, द गुड इज़ ओनली टेम्पररी। द इविल इट डज़ इज़ परमानेंट। आइ एम प्रिपेयर्ड टू डाइ बट देयर इज़ नो कॉज़ फ़ॉर व्हिच आइ एम प्रिपेयर्ड टू किल। माई फ़ेथ इन द सेइंग दैट व्हॉट इज़ गेनड बाय द स्वॉर्ड विल ऑल्सो बी लॉस्ट बाय द स्वॉर्ड इज़ इम्पेरिशेबल।” तो इन सारी बातों में उन्होंने हमेशा अहिंसा की बात करी है।
तो क्या अहिंसा हमेशा कमज़ोरों के लिए है या उसने हमें कमज़ोर बना दिया है? क्या बात है?
आचार्य प्रशांत:




![[गाँधी जयंती विशेष] मत मानों उनके आदर्शों को, लेकिन उनको एक बार ठीक से पढ़ लो](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-8e708d2d-a5df-48cf-92ec-50fbf0d40a8a/30/image.jpg)