
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी आज गाँधी जयंती है, तो गाँधी जयंती के दिन मैं आपसे वो सारी बातें तो नहीं करूँगा जो अक्सर गाँधी जी के विषय में करी जाती हैं — उनका योगदान, वो सब चीज़ें। पर कुछ हटके पूछना चाहूँगा। अक्सर मैंने देखा है, कि गाँधी जी के ऊपर ये आरोप लगता आया है कि उन्होंने अहिंसा की और नॉन वायलेंस की बात करके भारतीयों को बहुत कमज़ोर बना दिया है।
और उसी के ऊपर थोड़ी बात करने के लिए मैंने कुछ कोटेशन अपने पास रखे हैं, मैं वो बोलना चाहूँगा एक बार: “आइ ऑब्जेक्ट टू वॉयलेंस बिकॉज़ व्हेन इट अपीयर्स टू डू गुड, द गुड इज़ ओनली टेम्पररी। द इविल इट डज़ इज़ परमानेंट। आइ एम प्रिपेयर्ड टू डाइ बट देयर इज़ नो कॉज़ फ़ॉर व्हिच आइ एम प्रिपेयर्ड टू किल। माई फ़ेथ इन द सेइंग दैट व्हॉट इज़ गेनड बाय द स्वॉर्ड विल ऑल्सो बी लॉस्ट बाय द स्वॉर्ड इज़ इम्पेरिशेबल।” तो इन सारी बातों में उन्होंने हमेशा अहिंसा की बात करी है।
तो क्या अहिंसा हमेशा कमज़ोरों के लिए है या उसने हमें कमज़ोर बना दिया है? क्या बात है?
आचार्य प्रशांत: अहिंसा का पहला संबंध दूसरे के प्रति तुम्हारे व्यवहार से नहीं होता। अहिंसा का संबंध सबसे पहले इस बात से नहीं है कि तुम दूसरे से भिड़ जा रहे हो या नहीं भिड़ रहे हो, दूसरे को चोट पहुँचाओगे या नहीं पहुँचाओगे, वो बात थोड़ी बाद में आती है। सबसे पहले अहिंसा का संबंध तुमसे है, तुम्हारे मन से है न। हर आदमी चैन से जीना चाहता है, हर आदमी शांति चाहता है। तो अहिंसा का मतलब होता है, इस तरीक़े से जीना कि तुम्हें शांति, चैन नसीब हो सके, गहरे हों और छीने नहीं। ये है अहिंसा। अपनी परवाह कर लो, अपने प्रति ही अच्छे रहो, अपने शुभचिंतक रहो — ये है अहिंसा।
शुरुआत यहाँ से होती है कि मैं अपना भी शुभचिंतक हूँ क्या? ये बात हमको लगेगा कि ये तो ज़ाहिर सी बात है, फूली कॉमन-सेंस की बात है कि हर आदमी अपना शुभचिंतक तो होता ही है। नहीं, ऐसा नहीं होता, अपने शुभचिंतक तो बहुत समझदार लोग ही हो पाते हैं। ज़्यादातर लोग ऐसा सोचते हैं कि वो अपने लिए कुछ अच्छा कर रहे हैं, अपनी भलाई का काम कर रहे हैं, लेकिन वो कर अपने लिए बुरा ही जाते हैं। यही तो नासमझी कहलाती है न। तो हम अपने ही ख़िलाफ़ काम कर जाते हैं, माने हम ऐसे काम कर जाते हैं जिनसे हमें ही दुख है, तकलीफ़ है। ये हिंसा है। तो हिंसा का मतलब हुआ कि तुम अपने ही हितों की रक्षा नहीं कर पा रहे हो, तुम अपनी ही परवाह नहीं कर पा रहे हो। ये हिंसा है।
अब जो भी तुम काम करोगे, वो काम किसी-न-किसी स्तर पर दूसरों से भी संबंधित होगा ही। तो वहाँ पर जाकर फिर दूसरे आ जाते हैं तस्वीर में। पर दूसरे बाद में आते हैं, पहली बात तो ये है कि तुम जो कर रहे हो, वो तुम्हारे लिए भी ठीक है क्या? वो करना जो अपने लिए ठीक हो, वो अहिंसा है। तो अहिंसा आचरण की बात नहीं है। आचरण में तो ऐसा लगता है कि ये दूसरों से संबंधित है। अहिंसा अंतर्जगत की बात है, आचरण में तो चीज़ बाहरी हो जाती है, अहिंसा अंतर्जगत की बात है, माने आंतरिक बात है।
फिर ये देखना होता है कि दूसरे को चोट पहुँचाने से तुम्हें कितना आंतरिक लाभ हो रहा है। जो चीज़ तुम्हें कष्ट देती है भीतर ही भीतर, तुम्हें ही कष्ट देती है, क्या वही चीज़ नहीं है तुम्हारे भीतर जो दूसरे को भी चोट पहुँचाने के लिए बहुत आतुर रहती है? ये बात समझनी बहुत ज़रूरी है, अहिंसा का मतलब है अपने को कष्ट से बचाना। और जिन्होंने ग़ौर किया है उन्होंने पाया है कि तुम्हें जो चीज़ कष्ट देती है तुम्हारे भीतर की, तुम्हारे भीतर की जो चीज़ तुम्हें तकलीफ़ देती है, तुम्हारे भीतर की वही चीज़ तुम्हें दूसरों को कष्ट देने के लिए प्रेरित करती है। तो ये संबंध है फिर दूसरे को कष्ट न देने और अहिंसा में। वो एक अप्रत्यक्ष संबंध है, वो एक इंडायरेक्ट संबंध है।
तुम ये नहीं कह रहे हो कि अहिंसा का मतलब है, कि मैं दूसरे को चोट नहीं पहुँचाऊँगा। आमतौर पर ऐसे ही समझ लिया जाता है कि भाई दूसरों से लड़ना नहीं है, भिड़ना नहीं है, ये अहिंसा है — नहीं। मेरे भीतर बहुत कुछ ऐसा बैठा है जो मेरा दुश्मन है। मैं चैन और सुकून से रहना चाहता हूँ, मेरे भीतर जो मेरा दुश्मन बैठा है, मुझे उसके आगे घुटने नहीं टेकने, ये अहिंसा है। मेरे भीतर जो दुश्मन बैठा हुआ है, मैंने उसके आगे घुटने टेक दिए — ये हिंसा है।
तो एक तरह से अहिंसा है, भीतरी युद्ध लड़ना। और हिंसा है, भीतरी युद्ध में पीठ दिखा देना, कायर हो जाना, मैदान छोड़ देना, या लड़ाई हार जाना। ये तो बात ही पूरी हमने पलट दी न। हम सोचते थे कि अहिंसा का मतलब है कमज़ोरी और कायरता, नहीं, बात उल्टी है। हमारा असली दुश्मन बाहर नहीं बैठा है, भीतर बैठा है।
देखते नहीं हो कि जब बाहर से तुम्हें कोई नहीं भी परेशान कर रहा हो, तो भी भीतर ही भीतर परेशानी रहती है, हमेशा रहती है। लोग आते हैं, लोग जाते हैं, लेकिन परेशानी हमारी जो आंतरिक है वो हमेशा क़ायम रहती है। माने हमारी परेशानी लोगों पर निर्भर करती ही नहीं। जो हम भीतर-भीतर कष्ट में रहते हैं वो कष्ट ग़ौर से देखा जाए तो बाहरी लोगों पर बहुत ज़्यादा निर्भर नहीं करती, क्योंकि बाहर की परिस्थितियाँ बदली, लोग बदले, लेकिन जो हमारी चेतना का कष्ट है वो तो बना ही रहता है न। कभी वो कष्ट बहुत प्रकट हो जाता है, कभी वो कष्ट सुख के क्षण में थोड़ा दब जाता है, लेकिन बना वो रहता है कष्ट भीतर ही भीतर।
तो माने हमारा दुश्मन हमारे भीतर बैठा है पहले, बाहर वो बाद में होगा। भीतर वाले इस दुश्मन से डर जाना और इसके आगे घुटने टेक देना हिंसा है। भीतर वाले दुश्मन को जीत लेना अहिंसा है। और भीतर जो हमारे दुश्मन बैठा है जो हमें परेशान करता है यही वो दुश्मन है जो चाहता है कि हम बाहर वाले से लड़ें। क्यों? क्योंकि बाहर वाले से लड़ेंगे तो वही भीतर वाले की ओर ध्यान कम जाएगा, हम बाहर वाले से ही लड़ते रह जाएँगे, और भीतर वाला भीतर मौज मारता रहेगा, मनमर्ज़ी करता रहेगा, हम पर शासन करता रहेगा।
तो तुम देखो ये जो भीतर हमारा दुश्मन बैठा है ये क्या कर रहा है? ये भीतर बैठ कर ज़िंदगी हमारी नरक बना रहा है और हमें ये जता रहा है कि दुश्मन हमारा हमसे बाहर है। वो ख़ुद भीतर बैठा है और वहाँ बैठ कर उसने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। और उसने हमको ये भरोसा दिला दिया है कि हमारा असली दुश्मन बाहर कहीं है। तो वो दो तरफ़ा काम कर रहा है, भीतर वो हमें कमज़ोर कर रहा है और बाहर हमें वो लड़ने के लिए उकसा रहा है। वो कह रहा है, दुश्मन तुम्हारा बाहर है जाओ उसको मारो, जाओ उसको मारो। तो अहिंसा का मतलब हुआ, कि बाहर वाले से क्या लड़ रहे हो, दुश्मन तो तुम्हारा भीतर बैठा है। पहले भीतर वाले दुश्मन से लड़ो।
अहिंसा का मतलब ये नहीं कि बाहर वाले से बिल्कुल नहीं लड़ना है, अहिंसा का मतलब है पहले भीतर वाले से लड़ना है। अंतर समझ लो, अहिंसा का मतलब ये नहीं है कि बाहर जो कोई है वो कुछ भी कर रहा हो उसको रोकना नहीं है, और जो ग़लत है, भ्रष्ट है या व्यभिचारी है, विधर्मी है उसका विरोध नहीं करना है। अहिंसा का ये मतलब नहीं है।
अहिंसा का मतलब है बाहर वाले की बात करेंगे, पर बाद में करेंगे, पहले किसकी बात करेंगे? पहले अंदर वाले की बात करेंगे। थोड़ा इस लायक़ हो जाएँ कि बाहर वाले के इरादे, बाहर वाले की शक्ल साफ़-साफ़ पहचान सकें, तो पहले अंदर वाले को ठीक कर लें। अंदर वाले को ठीक करेंगे, फिर ज़रूरत पड़ेगी तो बाहर भी लड़ जाएँगे।
मैं समझता हूँ गाँधी जी ने ये बात साफ़-साफ़ समझाई हुई है कि अगर कायरता और हिंसा में से किसी एक को चुनना हो, तो कहेंगे हिंसा चुन लो। ये उन्हीं के बोल हैं।
प्रश्नकर्ता: ये उन्होंने कहा है?
आचार्य प्रशांत: हाँ बिल्कुल। कि अगर कायरता और हिंसा में से किसी एक का चुनाव करना है, तो हिंसा भली। लेकिन साथ ही ये भी कहा है कि हिंसा की अपेक्षा अहिंसा निश्चित रूप से श्रेष्ठ है। जो अभी मैंने उनकी बात उद्धृत, उसको बताने का औचित्य है कि वो भी ये जानते थे कि कायरता अहिंसा का नाम लेकर आ सकती है। तो वो ये समझाना चाह रहे थे, कि कायरता नहीं है अहिंसा, कायर होने से तो अच्छा है हिंसा कर लो। लेकिन हिंसा से भी श्रेष्ठ है अहिंसा।
हिंसा से अहिंसा श्रेष्ठ क्यों है? क्योंकि हिंसा में तुम झूठे दुश्मन से भिड़ रहे हो, बाहर वाले दुश्मन से। अहिंसा में तुम असली दुश्मन से भिड़ रहे हो, वो जो भीतर तुम्हारे तुम्हारा दुश्मन बैठा हुआ है। तो ये तो बहुत सीधी समझ की बात है न, कॉमन सेंस, कि नकली दुश्मन से कोई लड़ रहा है, तो वो पगला ही हुआ। तुम्हें जो परेशान कर रहा है, तुम्हारा असली दुश्मन उससे लड़ो, इसका नाम अहिंसा है। तो अहिंसा कोई कमज़ोरों का काम नहीं है, अहिंसा बहुत ताक़तवर लोगों की चीज़ है।
और कोई ये न समझे कि अहिंसा से अर्थ होता है कि बाहर की ओर जाकर के तो किसी का विरोध करना ही नहीं। नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है।
महात्मा गाँधी ने अहिंसा शब्द को जन्म नहीं दिया है, अहिंसा बहुत पुरानी बात है।
गाँधी जी से पहले बुद्ध हुए और अहिंसा तो बुद्ध से भी पहले की है, उपनिषदों में है अहिंसा। तो निश्चित रूप से अहिंसा इस बारे में तो नहीं हो सकती कि तुम कमज़ोर बन जाओ, डरपोक बन जाओ। अहिंसा का असली अर्थ समझना होगा।
होता क्या है कि जब हम बिल्कुल अंधे हो जाते हैं न भीतरी आवेगों में, और बहुत हम चाह रहे होते हैं कि किसी बाहर वाले से भिड़ जाएँ, खून के प्यासे हो गए हैं। उस वक़्त हम ये सुनना ही नहीं चाहते कि हमारा दुश्मन हमसे बाहर नहीं, भीतर है। मैं इसमें ये नहीं कह रहा हूँ, कि बाहर तुम्हारे सब दोस्त ही घूम रहे हैं। मैं कह रहा हूँ, तुम्हारा पहला दुश्मन तुम्हारे भीतर है। बाहर जो हैं वो नम्बर दो, तीन, चार, पाँच के दुश्मन होंगे। नम्बर एक का दुश्मन तुम्हारा तुम्हारे भीतर बैठा है और वो नम्बर एक का जो तुम्हारा दुश्मन है वो तुम पर राज़ करने लग जाता है, तो वो चाहता नहीं कि तुम ये सोचो भी कि तुम्हारा दुश्मन तुम्हारे अंदर है। वो तुम्हें दो, तीन, चार, पाँच नम्बर के जो बाहर के दुश्मन हैं उनकी ओर धकेलता है बार-बार।
उस वक़्त पर आकर कोई तुम्हें बताएगा कि देखो तुम ग़लत दुश्मनों से लड़ रहे हो, असली वाला दुश्मन तो भीतर बैठा है तुम्हारे। तो तुम्हें बहुत गुस्सा आएगा, वो गुस्सा भी तुम्हें कौन दिला रहा है? वो जो भीतर नम्बर एक का दुश्मन बैठा है वही तुम्हें गुस्सा दिला रहा है। और तुम कहोगे, क्या अहिंसा की बात कर रहे हो? कोई भीतर मेरे दुश्मन नहीं बैठा है। मेरा असली दुश्मन वो है, उसने मेरे साथ अतीत में इतना बुरा किया, और वो समुदाय है वो मुझे चैन से जीने नहीं देना चाहता। और उधर वो लोग हैं वो मुझे मारने की साज़िशें कर रहे हैं। मेरे असली दुश्मन तो सब बाहर-बाहर हैं।
तुम एक बार भी रुक कर नहीं देखोगे कि भीतर से तुम कैसे हो। और ये सब कहने में मैं फिर दोहरा रहा हूँ, मेरा बिल्कुल ये इरादा कहने का नहीं है कि बाहर की सारी दुनिया तुम्हारी शुभचिन्तक ही बैठी हुई है और बाहर तुम्हारे दुश्मन नहीं है। भाई दुनिया अपनी शुभचिन्तक नहीं हो पा रही है तो तुम्हारी शुभचिन्तक कैसे होगी? तो बाहर भी लोग ख़तरनाक हैं, लेकिन उन सब से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक वो है जो भीतर बैठा है।
अहिंसा का मतलब है, पहले असली दुश्मन को पहचान कर के उसको जीतो और वो तुम्हारे भीतर है, उसी को मन, विकार, वृत्तियाँ, माया, सब कहते हैं वो अंदर है। उसको जीत लो फिर बाहर वालों से निपट लेना।
प्रश्नकर्ता: लेकिन मैंने अक्सर देखा है कि गाँधी जी के लिए एक बात बड़ी बार-बार उठाई जाती है, कि जब असहयोग आन्दोलन अपने चरम पर था तो चौरी-चौरा वाला इंसिडेन्ट हुआ। उसकी वजह से उन्होंने सिविल डिसऑबीडियंस मूवमेंट को कॉल ऑफ़ कर लिया। तो आपकी बात सुनने के बाद शायद मैं देख पा रहा हूँ कि उन्होंने किस वजह से वो कॉल ऑफ़ किया होगा।
तो गाँधी जी ने जो भी अपने निर्णय लिए, या वो एक राजनेता के तौर पर लिए थे, एक संत के तौर पर लिए थे?
आचार्य प्रशांत: अलग-अलग बात नहीं होती है न। संत कोई फुल-टाइम संतई थोड़े ही करता रहता है। संत माने क्या? संत कोई धन्धा कोई प्रोफेशन थोड़े ही है। संत तो एक आंतरिक अवस्था होती है, भीतर से तुम संत हो अगर, तो बाहर तुम निश्चित रूप से दुनिया में वो काम करोगे जो समय और परिस्थितियों में ज़रूरी है। संतत्व भीतर की बात होती है, संतत्व माने सुलझा हुआ मन, संतत्व माने सच को समर्पित मन। कोई काम-धन्धा थोड़े ही है कि तुम बोलो कि ये बैंकर हैं, ये इंजीनियर हैं, ये मैनेजर हैं, ये कोब्लर है और ये संत है।
तो उनसे पूछा, अच्छा आपकी संतई दिन में कितने से कितने बजे चलती है? फाइव डे वर्क वीक है? सिक्स डे वर्क वीक है? साल में छुट्टियाँ कितनी मिलती हैं आपको संतई से? संतत्व का मतलब होता है मन अच्छा है, मन साफ़ है। बाहर तो कुछ न कुछ करेगा ही न संत। अगर उस समय की माँग थी कि राजनीति में उतरा जाए, देश का नेतृत्व किया जाए, तो वो भी कर रहे थे।
तो ये मत पूछो कि संत या राजनेता, संत जो कि राजनेता है। संत कुछ और भी हो सकता है, अगर समय की परिस्थितियों की और समाज की माँग हो तो संत कोई दूसरा भी उचित अनुकूल काम कर सकता है। तो वो जो कह रहे थे, कि भाई अहिंसात्मक तरीक़े से चलो। उसकी वजह थी न, उसकी वजह क्या थी? उसकी वजह बिल्कुल वो वजह थी जिसने भारत को ग़ुलाम बनाया।
तुम ये तो कह देते हो कि भाई, भारत को आज़ादी मिलनी चाहिए। मान लीजिए अभी अंग्रेज़ आपके उपर चढ़े हुए हैं, आप एक ग़ुलाम देश में रह रहे हैं और आप जवान आदमी हैं। आपको ये कहने में बहुत जोश आएगा कि हमें अभी आज़ादी चाहिए, अभी आज़ादी चाहिए। ठीक है?
आपने क्या ये पूछा पहले कि ग़ुलाम क्यों बने? और आपके भीतर जो आपका दुश्मन बैठा है, जिसके कारण आप मुट्ठी भर अंग्रेजों के ग़ुलाम बन गए, उसकी आप बात नहीं करना चाहते। हम ये तो कहने को बहुत आतुर रहते हैं और बहुत जोश में हैं कि अभी हटा देंगे अंग्रेजों को और ये कर देंगे, वो कर देंगे, आग लगा देंगे, चलो मार के भगा देते हैं इनको। ये कहने को तो हम बहुत आतुर हैं।
और हम अपने आपसे ये नहीं पूछना चाहते कि ग़ुलाम क्यों बने? अगर हम इतने ही बहादुर हैं और अंग्रेज़ संख्या में इतने ही कम हैं, तो हम पर छा कैसे गए पहली बात? जिस वजह से वो हम पर छा गए थे वो वजह तो हमारे भीतर आज भी मौजूद है। अगर वो वजह हमारे भीतर आज भी मौजूद है, तो कोई संभावना ही नहीं है कि हम अंग्रेजों को आज भी भगा पाएँगे। बात समझ रहे हो?
मैं मान लो 1921 की बात कर रहा हूँ, 1921 जिस आंदोलन की तुमने बात करी मैं उस समय की बात कर रहा हूँ। तो ये ज़रा समझदारी से, भरी नज़र से ख़ुद को देखने की बात है। जोश तो आ सकता है, जोश बिल्कुल दिमाग़ पर चढ़ सकता है। जोश अलग बात है, लेकिन समझ से भी तो जीवन को देखना पड़ेगा न। जिस वजह से आप ग़ुलाम बने थे, वो वजह तो अभी भी मौजूद है आप में और समाज में। तो आज आप कैसे अंग्रेजों को हरा दोगे?
और अंग्रेज़ों ने जब आपको परास्त किया था, उस समय उनकी जो ताक़त थी, उनकी ताक़त आज उस समय से कहीं ज़्यादा बढ़ गई है। क्या आपने अपनी आंतरिक ताक़त बढ़ाई? आप में आज भी वही कमज़ोरियाँ मौजूद हैं, जिनके कारण आप ग़ुलाम बने थे। तो वो ज़रूरी था। ज़रूर हमारे भीतर अनुशासन की कमी थी, ज़रूर हम मन के कमज़ोर थे, ज़रूर जात-पात और इस तरह की बेवकूफियों में हमारा बहुत यकीन था। इन्हीं वजहों से तो उतनी दूर से आकर अंग्रेज़ एक इतने बड़े देश को परास्त कर पाए और उस पर सफलतापूर्वक दो सौ, ढाई सौ साल शासन कर पाए।
वरना सोचो ये पूरा एक उपमहाद्वीप था, और बात आज के भारत की नहीं थी उस समय उसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, इधर-उधर के कुछ और हिस्से भी जोड़ दो, ये सब कुछ था। और इसपर आकर के वो छोटे से द्वीप हैं कुछ, यूरोप के उत्तर में वहाँ से चलकर आ रहे हैं। और न कोई इलेक्ट्रॉनिकस है तब, न कोई इलेक्ट्रिसिटी है वो भाप और कोयले के जहाज़ों पर बैठकर आ रहे हैं। वहाँ से यहाँ आने में महीना भर लग जाता था, महीने से ज़्यादा। वो पूरा उधर से दक्षिण अफ़्रीका का चक्कर लगा कर उनके जहाज़ आ रहे हैं, और जहाज़ों से आ रहे हैं और देखते-देखते खट से उन्होंने ग़ुलाम बना लिया भारतीयों को। हम इस बात पर ग़ौर क्यों नहीं करते ऐसा कैसे हो गया। ज़रूर जो भारतीय मन है, ज़रूर जो भारतीय व्यक्ति, ज़रूर जो भारतीय चेतना है उसमें घुन लग गया था। उसमें कोई बहुत बड़ी आंतरिक कमज़ोरी थी, तभी तो इतनी आसानी से हार गई।
अहिंसा का मतलब है मैं पहले वो जो मेरे भीतर की कमज़ोरी है, मेरे भीतर का दुश्मन है। मैं पहले उसको हाराऊँगा।
उसको मैंने नहीं हराया और मैं बाहर वाले दुश्मन से लड़ने चल पढ़ा मैं फिर पीटूँगा। और मुझे बाहर मिटने में कौन सा मज़ा आ रहा है, भाई? तो बाहर पीटूँ, इससे पहले भीतरी तैयारी तो कर लूँ। अब एक उन्होंने आंदोलन चला रखा है और साफ़-साफ़ कह रखा है कि भाई, आंदोलन अहिंसात्मक होगा। और लोग जाकर के वो चौरी-चौरा में वहाँ पुलिस अड्डे में आग लगा दिया, पुलिस वालों को मार दिया, ये सब कर रहे हैं। तो साफ़-साफ़ क्या दिख रहा है गाँधी जी को?
प्रश्नकर्ता: कि अभी भी बेसब्री है।
आचार्य प्रशांत: कि अभी भी बेसब्री है, अनुशासन की कमी है। तो कह रहे हैं भीतर का दुश्मन तुम पर अभी भी राज कर रहा है और तुम्हारी मुझे कोई नियत भी नहीं दिख रही भीतर वाले दुश्मन को हराने की।
और जब तुम्हारे भीतर के दुश्मनों को हराने की नियत ही नहीं है तो तुम स्वतन्त्रता के युद्ध में फिर सैनिक नहीं हो सकते, क्योंकि सैनिक कैसा, जो दुश्मन को हराने की नियत न रखता हो। तुम अभी भी बस शोर मचा रहे हो, नारे लगा रहे हो, कि अंग्रेजों को हराएँगे। भूल जा रहे हो कि तुम वही हो जो अंग्रेजों से बुरी तरह हारे हुए हो अतीत में, और तुम इस बात का विश्लेषण, जाँच-पड़ताल भी नहीं करना चाहते कि क्यों हारे थे।
प्रश्नकर्ता: मैं अभी देख पा रहा हूँ कि आपने भारतीय मानसिकता की जो कमज़ोरियों की बात करी, वो शायद आज भी हैं।
आचार्य प्रशांत: वो आज भी हैं और हम उनकी बात बहुत कम करते हैं। हमें अपना दुश्मन हमेशा कहीं और दिखाई देता है, एक जात को दूसरा जात अपना दुश्मन दिखाई दे रहा है, एक समुदाय को दूसरे समुदाय में दुश्मन दिखाई दे रहे हैं। घर में ही भाई को भाई दुश्मन दिखाई देता है; एक सोचता है कि दूसरा मेरे खिलाफ़ षड़यंत्र रच रहा है। कोई ये नहीं पूछना चाहता कि मेरा अपना अंदरूनी हाल क्या है?
सबसे बड़ी वीरता है अपने भीतर बैठे दुश्मन को जीतना। उसको हम नहीं जीतना चाहते क्योंकि उसने हमारा नाम ले रखा है, वो हमारे भीतर बैठा है, वो आंतरिक हो गया है, वो हमारे ही जैसा हो गया है, वो मैं बन गया है। तो हम उसको जीतना नहीं चाहते।
अपने असली दुश्मन से ज़बरदस्त लड़ाई करना इसका नाम अहिंसा है, और अहिंसा में ये भी सम्मिलित है कि ज़रूरी हो तो बाहर वाले से भी भिड़ जाओ।
भाई, भगवद्गीता को गाँधी जी कहते थे, कि ये मेरी माँ है। और क्या है पूरी भगवद्गीता? कि अर्जुन जाकर युद्ध कर। लेकिन देखो भगवद्गीता का पूरा माहौल ही समझोगे तो समझ जाओगे कि अहिंसा क्या चीज़ है। और भगवद्गीता गाँधी जी को बहुत प्यारी है; यहीं से तुम उनका मन समझो।
श्रीकृष्ण अर्जुन से कह तो रहे हैं, कि तुम बाहर जाकर भिड़ जाओ, लेकिन अर्जुन बाहर भिड़ नहीं पा रहा क्यों? क्योंकि उसका असली दुश्मन उसके भीतर बैठा है। उसका दुश्मन है कौन है? उसका दुश्मन है मोह, उसका दुश्मन है अतीत की स्मृतियाँ, अज्ञान। श्रीकृष्ण उसे कह भी रहे हैं, कि भिड़ो-भिड़ो। तो वो कह रहा है, नहीं मेरे पाँव काँपते हैं मैं डरता हूँ, और मैं क्या करूँगा, मैं युद्ध से वापस जाना चाहता हूँ। ये तक बोल देता है कि आप तो मुझे भ्रमित कर रही हैं, इल्ज़ाम लगा देता है, अर्जुन।
तो वो बाहर वाले दुश्मन से लड़ सके, इसके लिए श्रीकृष्ण पहले उसको उसके भीतर के दुश्मन से लड़वाते हैं। ये जो पूरा गीता-ज्ञान है, ये क्या है? ये अर्जुन को अर्जुन से लड़वाया जा रहा है। सच्चे अर्जुन को झूठे अर्जुन से लड़वाया जा रहा है। तो अर्जुन से कहा जा रहा है, अर्जुन तु पहले भीतर की लड़ाई जीत। और जब अर्जुन भीतर की लड़ाई जीत लेता है तो वो बाहर के दुर्योधन को भी हरा देता है। तो बाहर के दुर्योधन से लड़ने की मनाही नहीं है अहिंसा में, अहिंसा कह रही है तुम बाहर लड़ोगे कैसे जब तुम भीतर से ही कमज़ोर हो।
और जब तुम भीतर से कमज़ोर हो तो तुम्हें ये भी पता नहीं चलेगा कि वास्तव में बाहर कौन दुश्मन है और कौन दोस्त। क्या पता तुम दोस्त को दुश्मन समझ रहे हो, दुश्मन को दोस्त। तो गीता में यही हो रहा है, कि पहले अर्जुन को कहा गया कि तुम भीतर के अपने दोषों को जीतो। और उसके लिए उसको अठारह अध्यायों में समझाया गया। और फिर अब बाहर लड़ो। श्रीकृष्ण हिंसा तो करा नहीं रहे होंगे तो निश्चित रूप से अर्जुन जो पूरी लड़ाई कर रहा है, कुरुक्षेत्र में, वो भी अहिंसा है। पर वो अहिंसा है।
लेकिन अब कोई घूम-घूमकर अत्याचारी साम्राज्य भर बढ़ाने की ख़ातिर कत्लेआम कर रहा हो, तो उसे आप अहिंसा नहीं कह सकते। तैमूरलंग भी आ रहा है, चंगेज़ ख़ान भी आ रहा है, और ये चढ़े जा रहे हैं भारत पर, दिल्ली पर। और ये कत्लेआम कर रहे हैं ज़बरदस्त तरीक़े से। और उसी दिल्ली के पास महाभारत का युद्ध भी हुआ है और उसमे भी खूब खून बहा है। और अर्जुन ने भी लाशें गिराई हैं लेकिन अर्जुन लाशें गिरा रहा है और तैमूर लाशें गिरा रहा है दिल्ली में, इन दोनों बातों में अंतर है। दिल्ली में ही अर्जुन ने भी लाशें गिराई हैं और दिल्ली में ही तैमूरलंग ने भी लाशें गिराई हैं, और दोनों बातों में अंतर है, बहुत अंतर है, समझना पड़ेगा।
अर्जुन लाशें गिरा रहा है अपने भीतर की नासमझी, अज्ञान और अहंकार को जीतने के बाद। वो इसलिए नहीं लाशें गिरा रहा है ताकि उसके व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति हो पाए। अब वो धर्म की ख़ातिर लड़ रहा है, और धर्म से मेरा अर्थ यहाँ पंथ, समुदाय, मज़हब नहीं है। धर्म से मेरा मतलब है वो जो सही है, दैट व्हिच इज़ राइट, उसको धर्म कहते हैं।
और ये जो बाक़ी सब आक्रान्ता हैं। ये लड़ इसलिए रहे हैं ताकि इनके साम्राज्य का विस्तार हो सके और इनका प्रभुत्व फैल सके। तो इन दोनों बातों में अंतर है। अहिंसा मना नहीं करती, निषेध नहीं करती, फॉरबिड नहीं करती कि आप बाहर नहीं लड़ोगे पर बाहर सही लड़ो। भीतर से सही हो जाओ और फिर बाहर सही लड़ाई लड़ो, ये है अहिंसा।
अर्जुन को अगर लड़वाया है श्रीकृष्ण ने तो हिंसा तो नहीं करवाई है न। महाभारत के युद्धस्थल पर भी जो हो रहा है वो अहिंसा ही है, अर्जुन की ओर से।
प्रश्नकर्ता: पर ये आम आदमी की जो पूरी डेफिनिशन है, हिंसा और अहिंसा की उससे बिल्कुल विपरीत है।
आचार्य प्रशांत: हाँ इसलिए विपरीत है क्योंकि हम बहुत सस्ती परिभाषाओं में चलते हैं न। हम कहते हैं हिंसा माने दूसरे को मारना, अहिंसा माने दूसरे को नहीं मारना, अपनी बात तो हम करना ही नहीं चाहते, अहंकार की यही निशानी होती है। वो अपनी बात नहीं करना चाहता, अपने दोष नहीं देखना चाहता। वो हमेशा सारी बातें करेगा दूसरों के संदर्भ में, कि हिंसा माने उसको थप्पड़ मार दिया, ये हिंसा है। अहिंसा माने उसको थप्पड़ नहीं मारा, ये अहिंसा है। ये बहुत ही कामचलाऊ, बड़ी सस्ती परिभाषा है।
प्रश्नकर्ता: लेकिन आप जैसे ही न भीतर जाने की बात करते हैं तो मुझे अपने आप थोड़ा अंदर से डर लगने लगता है क्योंकि मैं ये सोच नहीं पाता कि आज का जो 16-17-18 साल का युवा है, उस तक ये बात कैसे पहुँचाई जाएगी, कि अहिंसा का अर्थ भीतरी कुछ है?
आचार्य प्रशांत: देखो, भीतर कुछ है, ये बात कैसे पहुँचाई जाएगी, ये तो हमेशा से सिद्ध है और इसके बहुत तरीक़े भी रहे हैं ठीक है। ये यहाँ किताबें रखी हुई हैं, ये उन्हीं के तरीक़े हैं, आदमी को भीतर ले जाने के, आदमी को स्वयं से परिचित कराने के, आदमी अपने असली दुश्मन को जान सके और उसको जीत सके। तो उसके तरीक़े तो हमेशा से उपलब्ध रहे हैं। तो बड़ा सवाल ये नहीं है कि आदमी भीतर कैसे जाएँ। उपनिषद् मौजूद हैं, पढ़ लीजिए, बहुत आसान है भीतर चले आना। भगवद्गीता मौजूद है, उस पर ध्यान, मन लगाइए, श्रम करिए, आसान है भीतर पहुँच जाना।
सवाल ये है कि आपको बाहर आज कौन खींचे ले रहा है। भीतर जाने के तरीक़े तो आज भी मौजूद हैं, कल भी मौजूद थे। सवाल ये है कि आज आपको बाहर कौन खींचे ले रहा है, उनकी बात करिए। वो सारी ताक़तें हैं जो आपको बाहर ही बाहर को खींचती हैं। और बाहर क्या? बाहर तमाम तरीक़े से आकर्षण दिखा दिए, या बाहर तमाम तरीक़े के दुश्मन दिखा दिए।
ये वो लोग हैं जो आपको भीतर जाने से रोकते हैं। बाहर आपकी नज़रें कब बिल्कुल चिपक जाती हैं? यहाँ तुम्हें दिखाई दे जाए कि नोटों से भरा वो बोरा रखा है, तुम्हारी आँखें निकल कर बोरे पर चिपक जाएँगी बिल्कुल। या तुमको दिख जाए कि यहाँ पर एक ज़बरदस्त काला कोबरा खड़ा हुआ है, तो भी तुम्हारी आँखें निकल कर कोबरे से चिपक जाएँगी। तो बाहर अगर तुम्हें आकर्षण दिखा दिया जाए तो भी तुम भीतर जाने से इंकार कर दोगे। और बाहर अगर तुम्हें षड्यंत्र और डर दिखा दिया जाए तो भी तुम भीतर नहीं जाओगे न।
समाज में आज यही चल रहा है, या तो तुमको आकर्षित किया जा रहा है तमाम तरीक़े के मनोरंजन से, तुम भीतर नहीं जाओगे फिर, क्योंकि बाहर मनोरंजन दिखा दिया, नग्नता दिखा दी, फूहड़पन दिखा दिया, कॉमेडी शो दिखा दिया। ये जो पूरा अभी कार्यक्रम चलता है, इसको रोस्टिंग बोल देते हो, वो करवा दी। बाहर की आकर्षित चीज़ें तमाम तरीक़े की।
तुम भीतर क्यों जाओ, जब बाहर ही इतना कुछ तुमको खींच रहा है, लुभा रहा है। या फिर बाहर तुमको दिखा दिया कि देखो सनसनी, ये गड़बड़ है यहाँ, ये गड़बड़ है वहाँ, फलाना साँप तुम्हें डसने के लिए तैयार बैठा है। तो फिर तुम्हारी आँखें निकल कर बाहर चिपक जाएँगी, तुम फिर भीतर को नहीं मुड़ोगे आँखे भीतर को देखेंगी ही नहीं। तो ये पूछना ज़रूरी है कि ये जो पूरा खेल चल रहा है मीडिया का, राजनीति का, जिसमें तुमको तुमसे दूर करने वाली ताक़तें बहुत प्रबल हो गई हैं, इसको कैसे रोकें?
हम सब बेचैन हैं। भीतर जाना तो हमारी मौलिक ज़रूरत है, और उसी मौलिक ज़रूरत को पूरा करने के लिए वेदान्त है, गीता है। जानने वालों के वचन हैं, वो सब मौजूद हैं, लेकिन वो सब हारे जा रहे हैं। भ्रष्ट करने वाले मीडिया से, सस्ती राजनीति से, और उथली विचारधाराओं से।
प्रश्नकर्ता: तो यहाँ पर जो हमें पता है कि उथली विचारधाराएँ हैं या फिर उन लोगों को बस आकर्षित करने के लिए वो सब कर रहे हैं, उन पर रोक लगानी चाहिए या फिर बात हमारे ऊपर आ गई है कि हमें अपने आप को और आकर्षक बनाना पड़ेगा या कुछ ऐसा करना पड़ेगा।
आचार्य प्रशांत: अब जो जैसे कर सकता हो, करे। अगर आप शुभेक्षु हैं अपने और संसार के तो जो फिर आपको रूप धारण करना हो। जो काम आपको सही दिखाई देता है, वो करें। जो भी तरीक़ा आपको लगता हो कि अभी कारगर हो पाएगा, उसको आज़माएँ। थोड़ी देर पहले कहा था कि संतई थोड़ी कोई काम होता है, कि फुलटाइम ऑक्यूपेशन है।
वो तो समाज की ज़रूरत देखनी पड़ती है और उस हिसाब से काम करना पड़ता है, भले ही भीतर संतत्व हो। तो अब वही देखना पड़ेगा कि ये सब जो मूर्खता भरी ताक़तें चारों ओर फैली हुई हैं, इनसे मुकाबला करने के लिए कौन-सा रास्ता लेना उचित रहेगा। सही रास्ते का ही नाम अहिंसा है। मैंने ये नहीं कहा कि अहिंसा सही रास्ता है। मैंने कहा कि पहले सही रास्ता खोजो और अगर रास्ता तुमने वाक़ई सही खोजा है, सही मन से जो रास्ता खोजा जाए वो सही रास्ता है। सही होकर जो रास्ता खोजा जाए, वो सही रास्ता है। तो सही रास्ते को ही फिर अहिंसा कह सकते हैं, भले ही उस रास्ते में ये भी शामिल हो कि दुर्योधन की जाँघ तोड़ देनी है, वो भी अहिंसा है।
लेकिन पहले सही होना ज़रूरी है। पहले श्रीकृष्ण की बात सुनना ज़रूरी है। श्रीकृष्ण की बात सुने बिना तुम दुर्योधन की जाँघ तोड़ने पहुँच गए, तो हिंसा हो जाएगी। ये अंतर स्पष्ट हो पा रहा है? श्रीकृष्ण की बात अच्छे से समझ ली, उसके बाद तुमने कौरवों का संहार किया, तो ये अहिंसा है। अगर श्रीकृष्ण की बात समझे नहीं, भीतर तुम अभी नशे से ही भरे हुए हो, भीतर कमज़ोरियों से भरे हुए हो, भीतर अहंकार से भरे हुए हो और भिड़ गए और मान लो तुमने हरा भी दिया दुर्योधन को, तो भी वो हिंसा है। एक ही काम हिंसा भी हो सकता है और अहिंसा भी। बिल्कुल एक ही काम। अर्जुन ने अहंकारवश मार दिया दुर्योधन को, ये क्या हो गई?
प्रश्नकर्ता: हिंसा।
आचार्य प्रशांत: और अर्जुन ने ज्ञान के बाद कौरवों को मारा, ये हो गई अहिंसा। वो ज्ञान ज़रूरी है, वो आंतरिक चीज़ ज़रूरी है। अहिंसा का संबंध तुम्हारे भीतर की किसी चीज़ से है, बाहर की चीज़ बाद में आती है।
प्रश्नकर्ता: हिस्ट्री के डिस्कशनस में अक्सर गाँधी जी और भगत सिंह को बहुत अलग-अलग करके दिखाया जाता है। तो वे वास्तव में इतने अलग-अलग हैं या फिर?
आचार्य प्रशांत: उम्र का, परिस्तिथियों का, बहुत चीज़ों का फ़र्क़ है। बहुत ख़ूबसूरत होता अगर भगत सिंह और जीवित रह पाते। तो फिर हमें और जानने को मिलता कि वे क्या नीतियाँ अपनाते, किन रास्तों पर चलते, क्या बातें देश को बताते। अभी तो 23 साल में ही उन्होंने विदाई ले ली। तो वास्तव में पर्याप्त सामग्री नहीं है कि ठीक से जान पाने की कि आगे क्या होता।
ये बिल्कुल हो सकता था कि अगर किसी सुखद संयोग के चलते भगतसिंह जीवित रह पाते, तो आप पाते कि 1935-1940 तक आते-आते महात्मा गाँधी और भगत सिंह बड़े मित्रता है। ये तक हो सकता था कि आज़ाद भारत का पहला प्रधानमंत्री बनाने के लिए महात्मा गाँधी, भगत सिंह को मनोनीत कर रहे हैं। मैं नहीं कह रहा कि ऐसा होता ही पर संभावना। तो कुछ भी हो सकता था। इसलिए बोल रहा हूँ कि ऐसा हो सकता था क्योंकि सच पर चलने वाले दो लोग बहुत देर तक अलग-अलग नहीं चल सकते, उन्हें मिलना होगा। अगर वाक़ई दोनों सच के रास्ते पर चल रहे हैं तो उनकी शुरुआत दूर-दूर अलग-अलग हो सकती हैं, पर कहीं-न-कहीं आकर उनके रास्ते एक हो ही जाएँगे।
प्रश्नकर्ता: अब आपके साथ ये पूरी बातचीत के बाद मुझे एक चीज़ जो और ज़्यादा स्पष्टता दिख रही है वो ये है कि ये पूरा समाज भारतीय होने के बाद भी, गाँधी जी के बहुत सारे पुतले खड़े करने के बाद भी, "इंटरनेशनल डे ऑफ़ नॉनवायलेंस" घोषित करने के बाद भी, शायद उन्हें समझ नहीं पाए।
आचार्य प्रशांत: गाँधी जी को समझने की बात नहीं है। वो जिन सिद्धांतों पर चल रहे थे, वो तो बहुत पुराने हैं न, हम उनमें से कोई बात नहीं समझते। तो आज भी हम किसी भी ऐसे आदमी को क्या समझेंगे जो उन पुरानी बातों की बात करेगा। हमने आज तक कहाँ समझ लिया कि अहंकार क्या है? अहम् क्या है? जीवन क्या है? मन क्या है? अहिंसा क्या है? अस्तेय क्या है? हमने कहाँ समझ लिया है? तो आज भी कोई आएगा और वो बातें करेगा तो उसको हम नहीं समझेंगे। क्यों नहीं समझेंगें?
वही पुरानी बात, बाहर की किसी चीज़ पर ध्यान देना हमें ज़्यादा सुहाता है क्योंकि भीतर हमारे जो हमारा दुश्मन है वो हम पर बिल्कुल चढ़ बैठा है। वो हमें अनुमति ही नहीं देता कि हम भीतर की ओर मुड़ें क्योंकि भीतर की ओर मुंड़ेंगे तो हम उस दुश्मन को जान जाएँगे, उसको जान गए तो हम उसको हरा देंगे। तो हमारे भीतर जो दुश्मनी बैठा है वो हमें भीतर की ओर मुड़कर ख़ुद को देखने ही नहीं देता। भीतरी दुश्मन के ग़ुलाम हैं, हम अपने ही ग़ुलाम हैं।
प्रश्नकर्ता: ये सब जानकर बहुत अच्छा लगा। और अभी मुझे एक चीज़ याद आ रही थी, आपके साथ जब अहमदाबाद शिविर के लिए गए थे। तो एक दिन जब थोड़ा समय मिला, कि शायद कहीं बाहर जा सकते हैं, तो आपसे पूछा था हमने कि आचार्य जी अहमदाबाद में, साबरमती आश्रम के बारे में तो आपने बताया है, और क्या देख सकते हैं? तो आपका जवाब बड़ा अच्छा था, मुझे अभी भी याद है। आपने एकदम बोला था कि "पता नहीं, मैं तो साबरमती आश्रम में जाता था।"
तो वो जो आकर्षण था उनकी ओर, वहाँ जाकर भी मैं थोड़ा देख पाया, और शायद आज भी...।
आचार्य प्रशांत: ख़ास बात समझो तो उनमें क्या है, देखो किसी की सीधे-सीधे निंदा कर देना बहुत आसान होता है। और किसी को देवता बनाकर उसकी पूजा करने लगना ये भी आसान ही होता है। पर इंसान को इंसान की तरह देखना और उसका सही मूल्यांकन करना, वो ज़रूरी है।
अब उनमें मुझे जो बहुत ख़ास बात दिखती है, वो यह है कि वास्तव में उन्होंने अंदर वाले दुश्मन से लोहा लिया था। उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं था जो बचपन से या जवानी से ही बहुत दिव्य रहा हो। बहुत साधारण कद-काठी के थे, कोई आकर्षक व्यक्तित्व उनका नहीं था बहुत। लेकिन उसके बाद भी वो एक बड़े जननेता के रूप में उभरे। लोगों के सामने बोलने से उन्हें डर लगता था। ब्रिटेन में शिक्षा ली और उसके बाद भी कोर्ट में जिरह करने से डर लगे तो उन्होंने अर्जियाँ लिखने का काम शुरू कर दिया, कि यहाँ भरे कोर्ट में बोलेगा कौन।
अब ऐसा आदमी जो कोर्ट में नहीं बोल पा रहा है, उसके बाद वो हज़ारों लोगों की हज़ारों जनसभाएँ संबोधित करता रहा जीवन भर। ये बात बहुत अच्छी है। इस व्यक्ति ने अपनी कमज़ोरियों को जीता था। कामवासना इनकी कभी किसी भी आम आदमी की तरह इतनी प्रबल थी कि पिता की अंतिम घड़ी में भी वो पिता के साथ नहीं हो पाए, पत्नी की ओर खिंचे चले गए थे। फिर इस व्यक्ति ने 38 की उम्र में ही समझा कि ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ क्या है। पूरा, परंपरागत अर्थ नहीं, पूरा अर्थ क्या है, और ब्रह्मचर्य में प्रवेश किया।
जो आदमी अंग्रेजों का इतना क़ायल था कि जब ये गए पढ़ाई करने के लिए ब्रिटेन, तो इन्होंने अपने बहुत सारे पैसे सिर्फ़ अंग्रेज़ी तौर-तरीक़े सीखने, अंग्रेज़ी कपड़े वग़ैरह हासिल करने में लगा दिए। वो फिर आदमी अंग्रेज़ों पर चढ बैठा और अंग्रेज़ उससे थर्राते थे। तो इन्होंने अपनी कमज़ोरियों को खूब जीता है। एक समय पर ये धर्म के प्रति, सनातन धर्म के प्रति इतने शंकालु हो गए थे कि ये सोच रहे थे कि मैं धर्म परिवर्तन ही कर लूँ, ईसाई बन जाना चाहते थे। और फिर वो जगह आई जहाँ पर ये "महात्मा" कहलाए, गीता को "माँ" बोला। बहुत लोगों को धर्म की राह पर लगाया, आख़िरी शब्द भी इनके "हे राम" थे।
कोई ऐसा ऐब नहीं था जो साधारण आदमी में होता हो और इनमें न हो। इनकी बचपन में, इनकी जवानी में सारे जो सामान्य दोष होते हैं किसी बच्चे में या जवान आदमी में, इनमें थे। पर उन्होंने उन सब दोषों पर विजय हासिल करी। घर से पैसे चुराकर, एक समय पर इन्होंने मांस भी खा लिया, वेश्याओं के पास भी चले गए, झूठ भी बोला। और फिर ये सारी बातें स्वीकारी भी और अपने इन सब दोषों पर इन्होंने विजय भी पाई।
ये बात मुझे इनमें बहुत प्रभावित करती है कि एक आदमी, जो बहुत साधारण था, बिल्कुल मिट्टी का आदमी, वो कैसे अपनी कमज़ोरियाँ जीतता चला गया, जीतता चला गया और आगे बढ़ता चला गया। और यही बात हमें उनसे सीखनी होगी। बाक़ी राजनीतिक विचारधारा वग़ैरह के चलते किसी की निंदा करना, अपशब्द बोलना, गाली-गलौच करना, ये सब बहुत सस्ता काम है ये नहीं करना चाहिए। इंसान को इंसान की तरह देखना चाहिए।
हर इंसान में कुछ कमज़ोरियाँ होती हैं और बहुत कुछ ऐसा भी हो सकता है जो सीखा जा सकता है। जो सीखा जा सकता है वो सीखा जाना चाहिए।
उनकी दृढ़ता देखिए, उनकी जिद्द देखिए कि एक व्यक्ति जो कमज़ोर मन का था शुरुआत में, वो इतने दृढ़ मन का हो गया, जब वो उपवास करने बैठते थे, तो भारत ही नहीं, पूरी दुनिया काँप जाती थी। चर्चिल के पसीने छुट जाते थे, बोलता था, नंंगा फ़क़ीर बड़ा जिद्दी है। चर्चिल के शब्द हैं, कि “ये नंंगा फ़क़ीर बड़ा जिद्दी है, वो बैठ गए हैं अब उपवास पर तो बैठ गए हैं। लोगों को उनकी बात सुननी पड़ती थी। और आसान नहीं है, एक वृद्ध और कमज़ोर आदमी के लिए कहना कि "नहीं खाऊँगा खाना तो नहीं खाऊँगा, मेरी बात सुनो।"
और वो इस स्थिति पर आए कि इस स्तिथि से उठकर के, कि बहुत ही लचर से और औसत से मन के आदमी थे वो, बहुत ही औसत मन के आदमी। उस औसत स्तर से उठकर के इतना मजबूत बन जाना, मेरे ख्याल से सबको उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।
प्रश्नकर्ता: बहुत अच्छा लगा मुझे ये बात करके आपसे। मुझे और प्रेरणा मिली कि और पढ़ूँ, और बेहतर जानूँ।