
संसार में तुम जिस भी चीज़ को शांति का,तृप्ति का साधन बनाओगे वो चीज़ बेचारी असफल हो जाएगी। तुम उसे भोगकर के कुछ और कर देते हो। तो फिर कौन है जो तुम्हें सन्तुष्टि दे सकता है? सिर्फ़ वो जो तुम्हारे स्पर्श से कहीं आगे का हो। तुम्हारा स्पर्श उस पर कोई दाग ही न लगा पाये, जो अस्पर्श्य हो। ऐसे किसी को ही सत्य कहा गया है, परमात्मा कहा गया है। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उस पर हावी नहीं हो सकते। वो तुम्हारे काम का है क्योंकि तुम उसे बदल नहीं सकते।

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

प्रश्नकर्ता: एक चीज़ होती है मेंटल एजिलिटी (मानसिक चपलता), जैसे कि मैं कहीं बाइक से जा रहा हूँ और अचानक कोई मोड़ आ गया या एक कुत्ता बीच सड़क पर आ गया, तो मुझे एकदम से ब्रेक लगाने की आवश्यकता पड़ी। तो ये जो स्किल (कौशल) होती है एकदम से …

जीवन में जो भी तुम्हें ऊँचे-से-ऊँचे अनुभव हों, उनको एक सीमा से ज़्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। और जो लोग सच्चाई के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं उनको थोड़े अलग तरह के अनुभव होने शुरू हो जाते हैं, इससे मैं सहमत हूँ। और वो अनुभव आपको तभी नहीं होते…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, हाल ही में मैंने अपने आदर्श स्टीव जॉब्स और विराट कोहली द्वारा सुझाई गयी लोकप्रिय किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पढ़ी, तो जीवन का अलग ही आयाम खुल गया।
उस किताब के लेखक और उनके गुरु ने, न केवल अपने पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से…

प्रश्नकर्ता: स्त्री की सुंदरता से उसकी कोमलता का जो एहसास होता है, क्या वो परमात्मा की कोमलता जैसा होता है?
आचार्य प्रशांत: रोमेंटिक उपन्यास पढ़ रहे हो? हमें तो पता था सत्यम-शिवम्-सुंदरम, स्त्री कब से सुन्दर होने लग गई? सत्य सुन्दर होता है। स्त्री-पुरुष कब से सुन्दर हुए? कोमलता माने…

Acharya Prashant: The spiritual soldier, the religious warrior has to be extremely intelligent. You could go to the extent of saying that he has to be cunning in the service of Truth; I’m choosing this word with all deliberation.
He has to be cunning in the service of the Truth;…

प्रश्नकर्ता: सबको प्रणाम। आज की इस धर्म चर्चा में आपका स्वागत है। आज हमारे बीच में एक ऐसी विभूति या कहें शख्सियत आचार्य प्रशांत जी हैं। आपके बारे में मैं थोड़ा सा बताना चाहूँगा। आप बहुत ही ज्ञानी और पढ़े-लिखे एक आचार्य हैं। इन्होंने आइआइटी से इंजीनियरिंग की, आइआइएम से…

प्रश्नकर्ता: जो अभी जिज्ञासा है मेरी आचार्य जी, यूट्यूब पर एक शॉर्ट्स देखा था, उसके सम्बन्ध में है। तो एक बहुत सुप्रसिद्ध व्यक्ति जो श्रीमद्भगवद्गीता पर बोलते हैं उनका वह शॉर्ट्स देखा था; काफ़ी चल रहा है, बार-बार मेरे फीड पर आया। तो वो निष्काम कर्म पर बोल रहे थे…

प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते। आपसे मैं सर्वप्रथम शास्त्र-कौमुदी नामक कोर्स (पाठ्यक्रम) के जरिए जुड़ा था, तब से मुझे वेदांत और ग्रंथों का मूल्य पता चला। मैंने प्रस्थानत्रयी का पाठ शुरू किया है, तीन महीने हो गए हैं। मुश्किल हो रही है समझने में, पर आनंद आता है। कोरोना के कारण घर…

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, छठा अध्याय, दूसरा श्लोक।
जिसको संन्यास कहते हैं उसको तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी व्यक्ति योगी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं संकल्पों के त्याग का तात्पर्य समझना चाहता…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार स्थिति ऐसी हो जाती है कि एक ही चीज़ का लम्बे समय तक सॉल्यूशन (हल) नहीं मिल पाता। जैसे मान लीजिए कि कोई मानसिक समस्या है, उसमें काफ़ी समय बीत गया और उस पर मनन-मंथन भी काफ़ी हुआ, लेकिन उससे उबर नहीं पाये हम, उससे…

प्रश्नकर्ता: सत्य और अध्यात्म की बात पर। व्हाट इस द डिफरेंस बिटवीन बींग स्पिरिचुअल एंड हैविंग अ स्पिरिचुअल एक्सपीरिएंस (आध्यात्मिक होने में और आध्यात्मिक अनुभव होने में क्या अंतर है) ?
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिक अनुभव जैसा कुछ नहीं होता। आप अगर आध्यात्मिक हैं तो आपके सब अनुभवों में एक सच्चाई…

Acharya Prashant: A quiver full of the best of arrows but no bow, how do you fight the battle of life? Can you imagine the amusing as well as tragic situation of the person who has a great arrow without a bow? He will be sharpening and sharpening his weapon,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भारतीय दर्शन में वेदों के आधार पर आस्तिक और नास्तिक का विभाजन किया गया। उसमें बौद्ध, जैन और चार्वाक दर्शन को नास्तिक बोल दिया गया; जिसमें से मुख्यत: बौद्ध और जैन धर्म ने वेदों की सत्ता को माना नहीं, इस वजह से उसमें वर्गीकरण किया गया।
तो…

प्रश्नकर्ता: जो अद्वैत बोधस्थल में आप लोग बंधनों की बात करते हैं और उनके सॉल्यूशंस (समाधान) की बात करते हैं…
आचार्य प्रशांत: बंधनों की बेटा, बात नहीं करनी पड़ती। बंधन में तो सब हैं ही न! तो जो यथार्थ है उसकी बात होती है। यथार्थ ऐसा नहीं है कि अलग…

प्रश्नकर्ता: पानीपत से व्यवसायी हैं, उनका प्रश्न है। आचार्य जी, हमारे सारे कर्मों के पीछे मोक्ष की गहरी इच्छा होती है। परन्तु जैसे हम वैसे ही हमारे तरीके इसीलिए हम यूँही भटकते रहते हैं। लेकिन कर्म तो हम करते ही हैं, अब कर्म की गुणवत्ता का पैमाना स्वयं को तो…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैंने देखा पिछले कुछ सालों में, तो मैं थोड़ा सा रिलेशनशिप को लेकर थोड़ा ब्लंटली (दो टूक) अपनी चीज़ें शेयर करना किसी भी टॉपिक को लेकर डिस्कशन हो रहा है। तो रिलेटिव्स भी मुझसे कतराने लगे फिर बात करने से।
आचार्य प्रशांत: नहीं, तो उनसे आप…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जो अनुभव आपको नहीं हैं, वो किसी और को कैसे हो सकते हैं, ये कहीं ऐसा तो नहीं, आपका कोई पूर्वाग्रह है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, क्या है? खोलकर बताओ बात, क्या कह रहे हैं? किसका अनुभव? एनलाइटनमेंट का?
प्र: आचार्य जी, अगर एनलाइटनमेंट नहीं होता है, कोई…

The world is like an open book to the one whose eyes are open; if you cannot read the world, then you have to look at yourself first, then you have to be mindful of your own condition. Read more...

सत्य की प्राप्ति के लिए अनिवार्य है कि सदा सत्य में जियो। पूछ रहे हो क्या करना अनिवार्य है। मैं कह रहा हूँ जो कुछ करो सत्य से पूछ कर करो, यही अनिवार्यता है। सत्य की प्राप्ति के लिए दो-चार सीमित काम नहीं करने होते। सत्य की प्राप्ति के लिए पूरा जीवन सत्य को सौंप देना होता है, यही प्राप्ति है।

Questioner (Q): I have been suffering from a type of OCD (Obsessive Compulsive Disorder) called somatic OCD for the last two years. I was in constant fear, every single moment, for around two years. I was on sleeping pills and anti-anxiety pills, but I think what helped me a lot…

बल सत्य से आता है। जब आपको सत्य पता ही नहीं तो आप में बल कहाँ से आएगा? आपको किसी ने बोल दिया 'धर्म हिंसा तथैव च।' आपने कहा, 'हो सकता है लिखा होगा।' आपको किसी ने बोल दिया गाँधी जी बहुत अच्छे आदमी थे, राष्ट्रपिता थे। आपने मान लिया। आज आपको बोला जा रहा गाँधी जी और नेहरू से ज़्यादा बुरा कोई नहीं था, इन्होंने देश बर्बाद करा। आपने वो भी मान लिया। तो थाली के बैंगन हैं, जो जिधर को लुढ़काना चाहे लुढ़का सकता है।

प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी, प्रणाम! गीता का पाठ संभव कर देने के लिए धन्यवाद। अध्याय ७, १३ और १५ में श्रीकृष्ण प्रकृति, दो प्रकार के पुरुष, और पुरुषोत्तम के बारे में बताते हैं और कबीर साहब ने चार रामों की बात कही है-
चार राम हैं जगत में, तीन राम…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जिस प्रकार का जीवन मैंने अब तक जिया है, उसमें आपका आना बिलकुल अनपेक्षित था। कुछ चीज़ों का तो पता था कि ग़लत हैं और इसका परिणाम क्या होगा, पर आपका जीवन में आना क्या था?
आचार्य प्रशांत: यह दुर्घटना हुई।
प्र: क्योंकि मैं इस तरह का…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज़ाद मन को पुन: कैसे प्राप्त करूँ? यदि मेरा आनन्द खो गया है, तो पुनः उस आनन्द को कैसे प्राप्त करूँ?
आचार्य जी: खोता नहीं है। अगर होता है, नहीं खोता है। अगर खोया है तो खोने लायक़ ही था, असली नहीं था। आने-जाने वाली चीज़ थोड़े…

आचार्य प्रशांत: तुम्हारे काम का जो उद्देश्य है और गीताकार का जो उद्देश्य है वो उद्देश्य ही मात्र भिन्न नहीं बल्कि दो अलग-अलग आयामों में है। गीता कही गई है अर्जुन को भ्रम, मोह, लोभ, देहभाव, ममत्व से मुक्त करने के लिए। ये गीताकार का, कृष्ण का उद्देश्य है कि…

प्रश्नकर्ता: “अहिंसा परमो धर्म:।” श्लोक के इस अंश में एक तरफ़ तो भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा परमो धर्म:” और दूसरी तरफ़ वो गीता का ही इस्तेमाल कर रहे हैं, अर्जुन से हिंसा करवाने के लिए। तो ये बात तो सरासर गलत है। कृष्ण हिंसा करवा रहे हैं और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, साक्षीभाव से साधना के विषय में कहा जाता है कि किसी एक विशेष चीज़ पर आपका ध्यान लगा होना चाहिए, जैसे विपश्यना ध्यान जिसमें अपनी आती-जाती साँसों के प्रति होश पूर्ण रहा जाता है, लेकिन आप हमें जिस चीज़ के प्रति सचेत रहने को कहते हैं वो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमन। चेतना के विषय में सन्तों से शास्त्रों में बहुत सुना है, दर्शनशास्त्रियों ने भी इस मुद्दे पर बहुत गहन चर्चाएँ करी हैं, किताबें लिखी हैं। कभी चेतना को न्यूरोसाइंस (तन्त्रिका विज्ञान) से तो कभी फिज़िकल साइंस (भौतिक विज्ञान) से जोड़कर देखा जाता है, और कभी ये…

प्रश्नकर्ता: सब ही भूमि बनारसी, सब नीर गंगा तोय। ज्ञानी आतम राम है, जो निर्मल घट होय।। ~गुरु कबीर साहब
आचार्य जी, मेरी समझ से इस दोहे का ये अर्थ है कि ज्ञानीजन कोई भेदभाव नहीं करते। उनके लिए सिर्फ़ गंगाजल ही पवित्र नहीं होता, बल्कि हर जगह का जल…

दुनिया भर की कामना हमने पहले से पकड़ रखी है। तो जो तरीक़ा होता है आत्मज्ञान का, वो नकार का होता है। जो कुछ पकड़-पकड़ रखा है, उसका अवलोकन करा जाता है। ये कहाँ से आ गया मेरे पास? कैसे मैंने इसको पकड़ लिया? और पकड़ने पश्चात इससे पाया क्या? ये होता है। सत्य की कामना मत करने लग जाइएगा। झूठ से पिंड छुड़ाना होता है, सत्य की कोई कामना नहीं होती।

कभी भी आपके साथ ऐसा हो रहा हो कि कोई चीज़ बाद में समझ में आ रही हो, तो ये याद रख लीजिए, जो चीज़ आपको बाद में समझ में आ रही है, वो आपको हमेशा से ही समझ में आ रही थी। बाद में कुछ नया नहीं समझ में आया। बाद में आपने बस उसको एकनॉलेज करा है। बाद में आपने उसको बस अभिस्वीकृति दी है। पता पहले से था, पर हम उसको एक्सेप्ट नहीं कर रहे थे। हम में यह क्षमता होती है, नोइंग बट नॉट एक्सेप्टिंग। पता पहले से था पर उसको एक्सेप्ट नहीं कर रहे थे, क्योंकि उम्मीद थी कि क्या पता मज़े आ ही जाएँ आगे। अब जब मज़े नहीं आए, उम्मीद टूट गई, तो हम एकनॉलेज कर लेते हैं कि हाँ, गड़बड़ हो गई। गड़बड़ हो रही है, ये शुरू से ही पता था।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बाइबिल में एक दृष्टान्त है, एक कहानी है, उससे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ।
“जीसस ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया कि स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के समान है जिसने अपने खेत में अच्छे उपजाऊ बीज बोया। पर जब सभी लोग सो रहे थे तो उसका…

प्रश्नकर्ता: सर, क्या भक्ति सुमिरन है, क्या इसमें ध्यान लगाना चाहिए, भक्ति कैसे करनी है? कई लोग कहते हैं कि आप ध्यान में बैठोगे, वो भक्ति है; या आप सुमिरन कर लोगे, वाहे गुरु, वाहे गुरु जाप कर लोगे, वो है। आप राम-राम कर लो वो है या आप ओम्-ओम्…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सवाल ये था कि भगवान और भूतों का फिर रिश्ता क्या है?
आचार्य: ये जो बाहर वाले तुम्हारे भगवान हैं, उनका क्या काम है? तुम्हारी कामनाओं की पूर्ति करना। तो उसको तुम बोलते हो पॉज़िटिव एनर्जी। (सकारात्मक ऊर्जा) ठीक है? जो तुम्हारी कामना पूर्ति करे उसको तुम…

प्रश्नकर्ता: ये जो परिस्थितियाँ वर्तमान में चल रही हैं जिसमें असत्य की सत्य के ऊपर जीत देखी जाती है तो ऐसी परिस्थितियों में एक मनुष्य अपने आदर्शों को कैसे कायम रख सकता है? कैसे दृढ़ संकल्प रह सकता है? उसके लिए आप कुछ ज्ञान या दिशानिर्देश दें।
आचार्य प्रशांत: पहली…

प्रश्नकर्ता: परिवार में, नौकरी में, आदतों में, हर जगह मैं अर्जुन की तरह अपनेआप को दुविधाग्रस्त पाता हूँ। सत्य कई बार दिख भी रहा होता है लेकिन किसी मूर्खतावश उस पर चलने का साहस नहीं कर पाता हूँ। मेरी अपने भीतर बैठे कृष्ण तक पहुँच नहीं है, और आपकी कही…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम सर, मैं करीब पन्द्रह साल की थी, जब मेरे मम्मी-पापा ने एस्ट्रोलॉजर (ज्योतिषी) से मेरी कुंडली बनवायी थी। जिसमें मुझे पता चला था कि मुझे कालसर्प दोष है। तो उसको लेकर फिर काफ़ी रुद्राभिषेक भी हुए, मासिक शिवरात्रि को भी मन्दिर गये थे, मेरे मम्मी-पापा। उस वक्त तो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। जीवन में आनन्द की परिभाषा हर रोज़ बदलती रहती है, हर पल भी बदलती रहती है। कई गुरु आये और चले गये, ऐसा क्यों कि किसी को भी मृत्यु से पहले परमानन्द नहीं मिल पाता? क्या परमात्मा ऐसा नहीं चाहता? या हमारे भ्रम हैं? बहुत ही…

अशान्ति के साथ तुम सौ जन्म बिता लो, अशान्ति के साथ तुम चाहे कितनी कसमें खा लो, तुम्हारे मन के एक बहुत गहरे और पुराने कोने को शान्ति तब भी प्यारी रहेगी। सौ जन्म रहो तुम अशान्ति के साथ, सौ जन्मों बाद भी तुम यही पाओगे कि अशान्ति से पूरी तुम्हारी वफ़ादारी, निष्ठा हो नहीं पायी है, तुम अभी भी शान्ति की ओर आकृष्ट हो रहे हो, थोड़ा-थोड़ा हो रहे हो, लेकिन हो रहे हो। क्यों? क्योंकि शान्ति स्वभाव है तुम्हारा। अशान्ति नहीं स्वभाव है।

आचार्य प्रशांत: जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न राजा जनक से सम्बन्धित है। वो एक शान्त, सरल और स्पष्ट जिज्ञासा करते हैं कि ज्ञान कैसे प्राप्त हो, मुक्ति कैसे हो और वैराग्य की प्राप्ति कैसे हो। मैं जब राजा जनक की स्थिति की तुलना महाभारत के अर्जुन की स्थिति से करता हूँ…

‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।
![Truth Without Apology [Book Launch]](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-1ba7c449-c792-4b5e-b7c3-714d51940a57/30/image.jpg)
This evening in Delhi, a new book steps into the world—Truth Without Apology by Acharya Prashant. The launch takes place amidst seekers, readers, and companions of his work. In times when words are often polished to please and truths are dressed in comforting disguises, Truth Without Apology arrives like an uninvited storm—direct, raw, and uncompromising.

Life comes to us in an unending number of ways and you never know what's going to happen next. We are starved of something that really penetrates the surface. So, it is the intensity that this book brings — arrow-like depth, striking like lightning, immediately, so you don't have a chance to escape away from it. Like a Zen koan: very brief, very effective, and does its work in a snap. You could open just any chapter from anywhere and find it as if it was written just for you.

आचार्य प्रशांत: प्रश्नकर्ता कह रहे हैं कि आपको अपनी बातों का, अपने सन्देश का प्रचार क्यों करना पड़ता है, अगर ये बातें सही हैं तो लोग खुद-ब-खुद आएँगे सुनने के लिएI ऐसा तुम्हारे अनुभव में है? दुनिया ऐसी है? ये पट्टी तुम्हें किसने पढ़ा दी? ये आदर्श तुम्हें किसने सिखा…

प्रश्नकर्ता: आजकल ये शायद उपयोगी आध्यात्मिकता है कि सन्तुलन बनाएँ। काफ़ी प्रसिद्ध लोग भी ये बोल रहे कि डोंट गो इन एक्सट्रीम (अति में मत जाओ), सामंजस्य बना कर रखो। संतुलन बनाओ हर चीज़ में। मेरा ख़ुद का भी पिछला उदाहरण है कि मैं एक्सट्रीम में चला गया था जैसे…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं आपको पिछले एक साल से सुन रहा हूँ। मैंने एक अपनी मित्र के जन्मदिवस पर आपकि एक पुस्तक उसको भेंट करी थी, महिला सशक्तिकरण के बारे में। तो मैंने उससे कुछ दिन बाद पूछा कि तुमने क्या सीखा, क्या तुम्हें सही लगा। तो उसने उत्तर…