
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मैं अभी एक न्यूज़ पढ़ रहा था रिसेंटली जो अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट हुआ बैडमिंटन का इंडिया में, उसके रिगार्डिंग। तो बहुत सारे डेनिश खिलाड़ी थे जिन्होंने कुछ हाइजीनिक प्रॉब्लम्स और कोर्ट को रिलेटेड प्रॉब्लम्स दर्ज करीं। और हमारे जो बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया, उसका जवाब ऐसे आया कि हम उस पर काम कर रहे हैं; कुछ-कुछ जगह पर काम हो गया है। और एक तरह से उन्होंने कहा कि ये रेयर इंसिडेंट है। और ये भी इसमें शामिल था कि जब वो इस बात को कह रहे हैं, हमें और भी बहुत सारे केसेस मिले, जहाँ पर केसेस और होते जा रहे हैं, होते जा रहे हैं।
तो एक ऐसा इंस्टीट्यूशन, जहाँ पर एक बैडमिंटन का सबसे बड़ा एक इंटरनेशनल इवेंट होने जा रहा है, वहाँ पर कोई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी आ रहा है, वो इंडिया के बारे में ऐसा कह रहा है, और फिर भी कोई अकाउंटेबिलिटी नहीं ली जा रही है।
आचार्य प्रशांत: अकाउंटेबिलिटी किससे? खिलाड़ी से?
प्रश्नकर्ता: जो हमने एज एन अपने कोर्ट के साथ किया कि हमें एक्चुअली उसको हाइजीन में रखना चाहिए।
आचार्य प्रशांत: दो चीज़ें अभी सुर्खियों में थीं। तुम किसकी बात कर रहे हो? एक तो ये था कि मैच चल रहा था, बीच में कबूतर ने टट्टी कर दी।
प्रश्नकर्ता: जी, जी।
आचार्य प्रशांत: कोर्ट पर ही टट्टी कर दी। इंटरनेशनल मैच चल रहा है। दूसरा ये था कि जो वर्ल्ड नंबर थ्री है।
प्रश्नकर्ता: हाँ, उन्होंने एक्यूआई पर बात करी थी।
आचार्य प्रशांत: इस साल नहीं, हर साल करते हैं; हर साल विड्रॉ करते हैं वो; हर साल 4–5 लाख का फाइन पड़ता है। वो फाइन देने को तैयार है, इंडिया आने को तैयार नहीं हैं। तो इन दोनों में से किस इंसिडेंट की बात कर रहे हो, या दोनों की बात कर रहे हो?
प्रश्नकर्ता: मैं दोनों की ही बात करना चाहता हूँ। और मैं ये भी पूछना चाहता हूँ इस पर कि ये कैसा माइंड है हमारा जो फैक्ट्स को लेकर इतना ज़्यादा अनभिज्ञ है और रिस्पेक्ट ही नहीं करता है फैक्ट्स की, और इग्नोर कर देता है।
आचार्य प्रशांत: ऐसा ही है। बताओ, क्या करना है? और ज़्यादा इस पर बात करोगे तो लोग तुमको राष्ट्रद्रोही भी बोल देंगे। ये देखो, ये खुलेआम अभी ये सेशन हो रहा है, ऑनलाइन है; शायद लोग देख भी रहे हों और ये कह रहा है कि हमने यहाँ टूर्नामेंट आयोजित किया और मैच चल रहा है। डबल्स मैच है, बैडमिंटन का चल रहा है, उसमें बीच में आकर कबूतर ने टट्टी कर दी। और शायद वो भी पहली बार नहीं हुआ; वो भी कई बार हो चुका है कि मैच के बीच में आकर के।
ठीक है, हमें सपनों में, मुगालतों में, गलतफ़हमियों में जीना पसंद है, तो अब मैं क्या बताऊँ? क्या करें? इतना मत करना बस कि बेचारे कबूतर मारने शुरू कर दो। हम बहुत मूर्ख किस्म के लोग हैं, कहीं कुत्ते मार रहे हैं, और अब इस तरह की बात आएगी कि स्टेडियम को कबूतर गंदा करते हैं तो हम कोई टेक्निक लगाकर कोई कबूतर न मारना शुरू कर दें। कुत्ते तो अभी सैकड़ों-हज़ारों में मारे गए हैं।
बताओ, क्या बात करें? मैं क्या करूँ? मेरे हाथ से पोछा दे दो, मैं जाकर पोछ सकता हूँ। मैं यही कर सकता हूँ। मैं भाई, भीतर से मैं आज़ाद हूँ; आत्मबल की कोई कमी नहीं। पर बाहरी दुनिया में मेरे पास क्या बल है? मैं क्या करूँ? बाहर जितने तरीके के बल चाहिए होते हैं, वो तो मेरे पास नहीं हैं, न आपने मुझे दिए हैं। मैं क्या करूँ? चलो, साथ बैठ के रोते हैं। यही कर सकते हैं।
पिटीशन फ़ाइलिंग वग़ैरह करनी हो तो कर लो, कि “आई बेग टू स्टेट विद ऑल ड्यू रिस्पेक्ट दैट द पिजन इज़ इनोसेंट।” ये करना हो तो बताओ, मैं भी उस पर दस्तख़त कर दूँगा।
प्रश्नकर्ता: सर, इस चीज़ का कोई फ़ंडामेंटल आंसर मिल सकता है? क्योंकि ये हर बार हो रहा है।
आचार्य प्रशांत: देखो, व्यावहारिक तौर पर जो फ़ंडामेंटल बात होती है, मालूम है क्या है? ट्रुथ एंड पावर शुड गो टुगेदर। प्लेटो का फिलॉसफ़र किंग याद है न? “पावर शुड बिलॉन्ग टू ट्रुथ।” बस यही फ़ंडामेंटल बात है।
लेकिन जब इंसान, जनसंख्या, आबादी, वोट ख़ुद ही भीतरी झूठ में जिए जा रहा हो, जिए जा रहा हो, तो वो ट्रुथ को कभी पावर नहीं देगा। बस यही है फ़ंडामेंटल बात।
जैसे हम हैं, वैसी ही हमें अपने चारों ओर स्थितियाँ मिल रही हैं। इसमें कोई भेद नहीं हो सकता। “एज़ अ मैन थिंक्केथ,” हवा गंदी है क्योंकि भीतर से हम गंदे हैं। सड़कों पर गड्ढे हैं क्योंकि हम गड्ढे हैं। बाहर जो कुछ होता है, वो आपके भीतरी जगत का प्रतिबिंब होता है एक अर्थ में। जो कर सकते हैं, वो कर ही रहे हैं।
इंसान जगेगा तो ये नज़ारा बदलेगा, कोशिश कर रहा हूँ इंसान को जगाने की। जितनों को जगा सकता हूँ, जगाऊँगा। फिर सो जाऊँगा।
अब आपको तय करना है कि क्या करना है; बार-बार शिकायतें लेकर मत आ जाया करो कि देश में ये हो रहा है, दुनिया में वो हो रहा है। देश-दुनिया में कुछ नहीं हो रहा, जो हो रहा है वो इंसान के भीतर हो रहा है।
अद्वैत नहीं समझते हो? तुमसे बाहर कुछ नहीं है, द अदर डज़ नॉट एग्ज़िस्ट। “ऐसा है, वैसा है, कबूतर आतंकवादी निकला। अमेरिका हमारे ख़िलाफ़ साज़िश कर रहा है।” कोई तुम्हारा दुश्मन नहीं है, तुम ख़ुद अपने दुश्मन हो। तुम्हें दुश्मनों की ज़रूरत है क्या? पूरी दुनिया से सबको हटा दो, सिर्फ़ भारत देश छोड़ दो। बहुत दुश्मन हैं हमारे देश के भीतर ही, हम सब अपने ही दुश्मन हैं। कोई और बाहरी दुश्मन न भी बचे, हम तो भी अपना सत्यानाश करते ही जाएँगे। क्योंकि हम ऐसे हैं, और हम सुधरना चाहते नहीं।
हम में जातीय गौरव है; हम में ऐतिहासिक गौरव है; हम में राष्ट्रीय गौरव है; हम में सौ तरह के अहंकार भरे हुए हैं। बस एक काम हमें नहीं करना है, कि यूँ दर्पण में देख लें कि हम सचमुच हैं कैसे। अफ़सोस ही कर सकते हैं।
जिनको भी भारत से प्रेम है, वो और क्या करें? क्योंकि भारत कोई ज़मीन का टुकड़ा तो है नहीं न। जैसे भारतवासी आज के हैं, आज का भारत भी वैसा ही होगा। और ये भारतवासी जगना ही नहीं चाह रहे। इनको अपने सपनों से ही बड़ी मोहब्बत है। और जब आप दुर्दशा में होते हैं, तो सपने और प्यारे लगते हैं। क्योंकि पता है आँख खोलोगे तो दुर्दशा दिखेगी, इससे अच्छा आँख बंद करके सपने लेते रहो।
मैं आपको हीन अनुभव करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। मैं आपसे कह रहा हूँ कि जब तक आप वास्तविकता से आँखें चार नहीं करते, आप श्रेष्ठ नहीं हो पाओगे।
मैं आपको श्रेष्ठता का द्वार दिखा रहा हूँ। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि मानो कि तुम इन्फ़ीरियर हो। मैं कह रहा हूँ, जो तुम्हारी वास्तविक हालत है, उसको आँखें खोल करके देखो। उसको देख लोगे, तो फिर उससे आगे निकलने का रास्ता मिल जाएगा।