दार्शनिक बना नहीं जाता। ये कोई कैरियर थोड़ी होता है। ये तो ज़िंदगी बना देती है। पहले ज़िंदगी ऐसे जियो कि उसकी परतें उघड़ें कुछ, उसका नंगापन सामने आए। और उसके लिए ज़िंदगी के बहुत क़रीब आना पड़ता है। ज़िंदगी के क़रीब जाना माने झूठ अब टूटेगा। और झूठ साँस है, झूठ रीढ़ है, झूठ प्राण बन गया है हमारा। सब टूटेगा। ज़िंदगी को देखो। ज़िंदगी से लात खाओ फिर तुमसे जो कुछ भी अभिव्यक्त होगा, वह दर्शन होगा।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मैं बहुत खुश हूँ कि मैं आपके सामने प्रश्न पूछ पा रही हूँ। आचार्य जी, वैसे मैं आपको तीन सालों से सुन रही हूँ। अभी मैं 20 वर्ष की हूँ। जब 17 वर्ष की थी, तब से सुन रही हूँ। जीवन में बहुत बदलाव आए हैं, और सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अकेलेपन से मुझे अब डर नहीं लगता। मैं बनारस से यहाँ अकेले आई हूँ, और अभी मैं अकेली ही जाऊँगी।
आचार्य जी, उत्कृष्टता आई है काफ़ी अध्ययन में भी, लेखन में भी, पढ़ाई में भी। और मेरा प्रश्न यह था कि मैं साहित्य की विद्यार्थी हूँ, बीएचयू से, और मुझे साहित्य बहुत ज़्यादा पसंद है। लेकिन दर्शन उससे ज़्यादा पसंद है मुझे, बहुत प्रिय रहा है। कक्षा टेंथ से बुद्ध मेरे आदर्श हो गए थे; अभी भी हैं। और मैं आपको सुनने के बाद उनको नए अर्थों में समझी हूँ। नई दिशा मिली है मुझे उनको समझने में।
आचार्य जी, एक तरफ़ मुझे जयशंकर प्रसाद जी, महादेवी वर्मा जी, अज्ञेय, निर्मल वर्मा जी आकर्षित करते हैं; तो दूसरी तरफ़ मुझे सार्त्र, हन्ना आरेंट, सिमोन द बोउवार, अल्बेयर कामू आकर्षित करते हैं। और मेरा अभी कुछ सालों से ऐसा हो गया है कि मुझे वर्ल्ड के लीडिंग फ़िलॉसफ़र्स में नाम चाहिए, मुझे दार्शनिक बनना है।




