
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मैं बहुत खुश हूँ कि मैं आपके सामने प्रश्न पूछ पा रही हूँ। आचार्य जी, वैसे मैं आपको तीन सालों से सुन रही हूँ। अभी मैं 20 वर्ष की हूँ। जब 17 वर्ष की थी, तब से सुन रही हूँ। जीवन में बहुत बदलाव आए हैं, और सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अकेलेपन से मुझे अब डर नहीं लगता। मैं बनारस से यहाँ अकेले आई हूँ, और अभी मैं अकेली ही जाऊँगी।
आचार्य जी, उत्कृष्टता आई है काफ़ी अध्ययन में भी, लेखन में भी, पढ़ाई में भी। और मेरा प्रश्न यह था कि मैं साहित्य की विद्यार्थी हूँ, बीएचयू से, और मुझे साहित्य बहुत ज़्यादा पसंद है। लेकिन दर्शन उससे ज़्यादा पसंद है मुझे, बहुत प्रिय रहा है। कक्षा टेंथ से बुद्ध मेरे आदर्श हो गए थे; अभी भी हैं। और मैं आपको सुनने के बाद उनको नए अर्थों में समझी हूँ। नई दिशा मिली है मुझे उनको समझने में।
आचार्य जी, एक तरफ़ मुझे जयशंकर प्रसाद जी, महादेवी वर्मा जी, अज्ञेय, निर्मल वर्मा जी आकर्षित करते हैं; तो दूसरी तरफ़ मुझे सार्त्र, हन्ना आरेंट, सिमोन द बोउवार, अल्बेयर कामू आकर्षित करते हैं। और मेरा अभी कुछ सालों से ऐसा हो गया है कि मुझे वर्ल्ड के लीडिंग फ़िलॉसफ़र्स में नाम चाहिए, मुझे दार्शनिक बनना है।
तो आचार्य जी, मुझे दिशा नहीं मिल पा रही है कि मैं साहित्य की तरफ़ जाऊँ या दर्शन की तरफ़। आचार्य जी, दर्शन मुझे बहुत ज़्यादा प्रिय है। और ये प्रश्न मैं सबसे बड़े दार्शनिक के सामने कर रही हूँ।
आचार्य प्रशांत: तो आप कंपटीशन देने आई हैं। दार्शनिक बना नहीं जाता, कोई करियर थोड़ी होता है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी वो पता है।
आचार्य प्रशांत: ज़िंदगी बना देती है। ज़िंदगी जीनी पड़ती है ऐसी कि इंसान कुछ जान पाए, यही तो दर्शन है। दर्शन और किसका करोगे? सच्चाई का। सच्चाई से अगर रूबरू ही नहीं हुए, तो कैसे दार्शनिक? पहले ज़िंदगी ऐसे जियो न कि उसकी परतें उघड़ें कुछ, उसका नंगापन सामने आए; नहीं तो फिर दर्शन साहित्य ही बन जाएगा।
दर्शन में और साहित्य में मूल अंतर क्या होता है? साहित्य भी दार्शनिक हो सकता है, वह अलग बात है। लेकिन साहित्य में आप जैसे हो, आप अपनी बात कह सकते हो कि ऐसा है, ऐसा है, ऐसा है। फ़िक्शन आप बहुत सारा डाल सकते हो, और कोई आपको रोकेगा नहीं, बहुत ख़ूबसूरत आप फ़िक्शन लिख सकते हो।
पर दर्शन में एक व्यवस्था होती है, एक सिस्टम होता है। दुनिया, ज़िंदगी, इंसान कैसे काम करते हैं, इनकी भीतरी प्रणालियों में जाकर के मशीन के कल-पुर्ज़ों को समझा जाता है। यह दर्शन होता है, और उसके लिए ज़िंदगी के बहुत क़रीब आना पड़ता है। ज़िंदगी के इतने क़रीब आना ख़तरनाक होता है। उतने क़रीब आओ तो झूठ टूटते हैं। झूठ ही हमारी रीढ़ है, लगता है रीढ़ ही टूट जाएगी।
दार्शनिक बनने का मतलब होता है बहुत-बहुत चोट खाना ज़िंदगी से। कोई अच्छा दार्शनिक आपको ऐसा नहीं मिलेगा जो बिल्कुल मौज की ज़िंदगी जीता था। सबने थपेड़े खाए हैं; वहाँ से सीखा है।
फिर उनके पास कोई बात आई है, जो उसने सबको सिखाई है।
अभी आपने एग्ज़िस्टेंशियलिस्ट्स का नाम लिया। किसका नाम लिया आपने? सार्त्र का नाम लिया, सिमोन का नाम लिया। इन सबके बाप पता है कौन थे? सोरेन कीर्केगार्ड, 42 की उम्र में मर गए, बेचारे। और उनका नाम भी नहीं लिया जाता, क्योंकि एग्ज़िस्टेंशियलिस्ट्स ज़्यादा इन हैं, ज़्यादा ट्रेंडी हैं, है न?
तो आप अगर बोलेंगे सार्त्र, तो लोग कहेंगे, “वाओ! बीइंग नथिंगनेस, यह-वो।” पर आप सोरेन बोलेंगे, तो लोग कहेंगे, “ऑ।” वो जीवन-भर दुःख, गिल्ट इन चीज़ों से जूझते रहे, क्योंकि वो पैदा ही हुए थे एक ऐसे घर में। वो बहुत रिलीज़ियस घर में पैदा हुए थे, जहाँ उनके बाप को हर समय लगता रहता था कि किसी पाप, अपराध का साया उनके घर पर है। और घर में लगातार एक ग्लूम का, मनहूसियत का माहौल रहता था।
उस पूरी चीज़ से दो दशक तक गुज़रने के बाद कीर्केगार्ड बोलते हैं कि नहीं, यह जो धर्म बताया जा रहा है, यह ठीक नहीं है। जैसे मैं ‘लोकधर्म’ कहता हूँ न, वैसे ही वो ‘क्रिश्चियनडम’ बोलते थे। वो बोलते थे रियल क्रिश्चियनिटी एक बात है, और यह जो क्रिश्चियनिटी चला रखी है नक़ली है, नक़ली है, नक़ली है।
फिर उन्होंने जो बात कही, वो जाकर आपके एग्ज़िस्टेंशियलिस्ट्स की बात का आधार बनी। हालाँकि कीर्केगार्ड की बात को लेकर इन्होंने उसमें से क्रिश्चियनिटी निकाल दी सारी। उसको बिल्कुल सेक्युलराइज़ कर दिया। उन्होंने कहा, रेडिकल रिस्पॉन्सिबिलिटी। ये उनके शब्द नहीं हैं, पर भाव यही था उनका, रेडिकल रिस्पॉन्सिबिलिटी, टुवर्ड्स गॉड।
अब टुवर्ड्स गॉड वाली बात इन लोगों ने हटा दी, कामू वग़ैरह ने। वो बोले, गॉड-वॉड कुछ नहीं। पर ‘भीड़’ की कोई बात नहीं है, मैं हूँ, और मेरी ज़िम्मेदारी है उसके प्रति। और मेरा उसका एकदम सीधा-सीधा, निजी रिश्ता है, यह बीच में कोई नहीं आएगा।
क्योंकि उन्होंने देखा था कि लोकधर्म जब घर में घुस आता है तो घर की कैसी दुर्दशा होती है। यह उन्होंने ख़ुद अनुभव करा था, जिए थे।
इसी तरह स्पिनोज़ा, वो आदमी भी मर गया जल्दी बहुत, उसको भी चर्च ने ही प्रताड़ना दे-देकर मार डाला। उसको कहीं जाने न दें, बोलने न दें। उसने कहा, हटाओ तुम ये सब, जो इधर-उधर की सब फ़ैंसी कहानियाँ लेकर के आ गए हो। प्रकृति है, प्रकृति एक वास्ट सिस्टम है। इसको तुम्हें गॉड बोलना है तो बोल लो, पर यह सब नहीं जो चर्च में चला रखा है लोकधर्म, यह नहीं मानते।
उस बेचारे की ऐसी ख़राब हालत कि उन्हें लेंस-ग्राइंडर बनना पड़ा। आज से 400 साल पहले, सोचो तब टेक्नोलॉजी कैसी रही होगी लेंस-ग्राइंडिंग की। तो वो जो बारीक चूरा होता था काँच का, वो उनके साँस लें तो अंदर चला जाता, फेफड़ों में चला गया। वो मर गए। तब जाकर के दर्शन पैदा होता है। ऐसे ही नहीं। ज़िंदगी के क़रीब जाना माने झूठ अब टूटेगा, और झूठ साँस है, झूठ रीढ़ है, झूठ प्राण बन गया हमारा। सब टूटेगा।
दार्शनिक बनने के लिए टूटना ज़रूरी होता है।
और इसीलिए दर्शन-शास्त्र एक बहुत बिखरा हुआ क्षेत्र है, जहाँ सब अलग-अलग तरीक़े के होते हैं।
कोई दार्शनिक ऐसा होता है जो बहुत व्यवस्थित तरीक़े से कमेंट्रीज़ लिखता है। आपके एग्ज़िस्टेंशियलिस्ट्स ऐसे थे जो क़िस्से, कहानियाँ, नाटक ज़्यादा लिखते थे। उनका दर्शन इस तरह से आगे बढ़ता था। जो जिस तरीक़े से ज़िंदगी को देखता है, वो उसी तरीक़े से अपनी बात को रख देता है। वो सब दर्शन में ही आता है। कि भाई, ज़िंदगी को तो हमने ऐसे ही देखा और ऐसे ही पाया। अपनी बात को ऐसे रख दे रहे हैं, वो दर्शन बन जाता है।
उपनिषदों का दर्शन देखो, वो कैसा है? वो एफोरिस्टिक है। मतलब, सूत्रों में वहाँ छोटी-छोटी बातें हो रही हैं। और आप मार्क्स की तरफ़ चले जाओगे तो वहाँ पे क्या है? इतनी मोटी है कैपिटल। मुझसे तो नहीं पढ़ी गई पूरी। मैंने कहा, ऐसे ही देख लेते हैं क्या है। समझ रहे हो बात को?
ऐसे-ऐसे भी दार्शनिक हैं जिन्होंने ज़िंदगी को उलझा हुआ ही पाया है, एक-एक उनका वाक्य दो-दो पन्नों का होता है। लो, थोड़ा ज़्यादा कर दिया मैंने, पर समझो बात को। और दूसरी तरफ़ हमारे ब्रह्मसूत्र हैं, अति-संक्षिप्त। तो यहाँ कुछ ऐसा नहीं है कि ऐसे-ऐसे-ऐसे-ऐसे कर लो तो फ़िलॉसफ़र हो जाओगे।
ज़िंदगी को देखो। ज़िंदगी से लात खाओ। फिर तुमसे जो कुछ भी अभिव्यक्त होगा वह दर्शन होगा।
ठीक है, अभी तो शुरुआत है। 20 साल के हो, लात खाने के लिए बहुत समय है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बस छोटा-सा क्वेश्चन था। आचार्य जी, जैसे मैं महीनों के कुछ दिनों में काफ़ी इमोशनल हो जाती हूँ और काफ़ी गुस्सा करने लगती हूँ, और थोड़ा मेरा मन भटक-सा जाता है। और मैं समझ नहीं पाती कि मैं वही हूँ जो दर्शन के प्रति इतना रुझान रख रही थी, जिसे दार्शनिक बनना था, साहित्यकार बनना था, जो पूरे-पूरे घंटे पढ़ाई कर रही थी, या यह वाली है, जो गुस्सा कर रही है।
तो मैं जानना चाहती थी कि मैं कौन-सी वाली ज्योति हूँ, जो दार्शनिक बनना चाहती थी या जो बहुत गुस्सा कर रही है?
आचार्य प्रशांत: तुम दोनों की दृष्टा हो। जो किसी भी परिस्थिति में होता है तुम्हारे साथ, और तुम्हारी प्रतिक्रिया, वो भी तुम नहीं हो। और जो किसी दूसरी परिस्थिति में, या किसी दूसरे दिन होता है तुम्हारे साथ, और तुम्हारी प्रतिक्रिया, वह भी तुम नहीं हो। तुम वह हो जो इन दोनों ही बातों को जान सकता है। यह हो रहा है, यह प्रतिक्रिया जा रही है। इस तरह से यह पूरा इंटीग्रेटेड सिस्टम काम कर रहा है।
जो इसका साक्षी होकर देख सके, उसने किया दर्शन। दर्शन का मतलब ही होता है दृश्य और दृष्टा को एक साथ देख लेना। जब दोनों को एक साथ देख लिया, तो उसको दर्शन कहते हैं। बाहर सिर्फ़ कुछ देख लिया तो वो दर्शन नहीं है, बाहर कुछ चल रहा है। बाहर माने देह भी बाहरी चीज़ है। बाहर कुछ चल रहा है और उसका मुझपर मेरे सेल्फ पर यह प्रभाव पड़ रहा है। मैं दोनों चीज़ों को एक साथ देख पा रही हूँ। जब यह देखने लग जाते हो तो दर्शन शुरू हो जाता है।