रिश्तों में प्रेम अक्सर मान लिया जाता है, पर अधिकांश संबंध तय भूमिकाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक ढाँचों पर चलते हैं। माता-पिता, पति-पत्नी या परिवार के रिश्ते भी कई बार समझ, स्वतंत्रता और संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि आदत, अधिकार और “मेरापन” से संचालित होते हैं। सच्चा प्रेम सीमित नहीं होता; वह स्वामित्व नहीं, बल्कि समझ, स्वतंत्रता और विस्तार देता है। प्रेम जन्म से नहीं, जागरूकता से सीखा जाता है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न दहेज उत्पीड़न को लेकर के है, एक मामले से। हाल ही में दहेज उत्पीड़न, कथित हत्या का मामला सामने आया है। उसमें मुझे जो सबसे चकित करने वाली बात लगी है कि उसके साथ ये जो भी हो रहा था, उसकी माँ को पता था। उसने व्हाट्सऐप चैट में अपनी माँ से शेयर किया था कि उसका पति उस पर कुछ आरोप लगा रहा था कि उसका किसी और के साथ रिश्ता है। कुछ ऐसी बातें सामने आई हैं। तो आचार्य जी, अभी चूँकि वो नहीं रही, तो उसकी माँ काफ़ी दुखी है और अपनी बेटी के इंसाफ़ के लिए जगह-जगह गुहार लगा रही है। तो ये कैसा प्रेम है कि जीते-जी उसकी पीड़ा को समझ नहीं पाता और मरने के बाद चीख-चीख कर न्याय की माँग करता है?
आचार्य प्रशांत: किसी मृतक का नाम लेना उचित नहीं है और किसी विशेष व्यक्ति को उदाहरण बनाना भी उचित नहीं है। ये सब जब जाए, तो ये नाम वग़ैरह हटा भी दिया जाना चाहिए। लेकिन एक सामान्य, जनरल बात आप समझ लीजिए, प्यार नहीं है; बस कुल इतनी-सी बात है। अब बाक़ी आप बोलो तो मैं आधे घंटे और बोल सकता हूँ । प्यार नहीं है। रिश्तों का ताना-बाना है, जिसमें अधिकार बता दिए गए हैं, कर्तव्य बता दिए गए हैं, सबको सबकी कुर्सी बता दी गई है, तुम इस जगह बैठोगे, तुम यहाँ बैठोगे, तुम ये करोगी, तुम वो करोगी। ये सब कर दिया गया है। ये कॉन्ट्रैक्ट है, अनुबंध है, करार है, समझौता है, कॉम्प्रोमाइज़ है, इसमें प्यार नहीं है। बस बात हो गई। इसमें अब मैं और क्या बताऊँ?




