
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न दहेज उत्पीड़न को लेकर के है, एक मामले से। हाल ही में दहेज उत्पीड़न, कथित हत्या का मामला सामने आया है। उसमें मुझे जो सबसे चकित करने वाली बात लगी है कि उसके साथ ये जो भी हो रहा था, उसकी माँ को पता था। उसने व्हाट्सऐप चैट में अपनी माँ से शेयर किया था कि उसका पति उस पर कुछ आरोप लगा रहा था कि उसका किसी और के साथ रिश्ता है। कुछ ऐसी बातें सामने आई हैं। तो आचार्य जी, अभी चूँकि वो नहीं रही, तो उसकी माँ काफ़ी दुखी है और अपनी बेटी के इंसाफ़ के लिए जगह-जगह गुहार लगा रही है। तो ये कैसा प्रेम है कि जीते-जी उसकी पीड़ा को समझ नहीं पाता और मरने के बाद चीख-चीख कर न्याय की माँग करता है?
आचार्य प्रशांत: किसी मृतक का नाम लेना उचित नहीं है और किसी विशेष व्यक्ति को उदाहरण बनाना भी उचित नहीं है। ये सब जब जाए, तो ये नाम वग़ैरह हटा भी दिया जाना चाहिए। लेकिन एक सामान्य, जनरल बात आप समझ लीजिए, प्यार नहीं है; बस कुल इतनी-सी बात है। अब बाक़ी आप बोलो तो मैं आधे घंटे और बोल सकता हूँ । प्यार नहीं है। रिश्तों का ताना-बाना है, जिसमें अधिकार बता दिए गए हैं, कर्तव्य बता दिए गए हैं, सबको सबकी कुर्सी बता दी गई है, तुम इस जगह बैठोगे, तुम यहाँ बैठोगे, तुम ये करोगी, तुम वो करोगी। ये सब कर दिया गया है। ये कॉन्ट्रैक्ट है, अनुबंध है, करार है, समझौता है, कॉम्प्रोमाइज़ है, इसमें प्यार नहीं है। बस बात हो गई। इसमें अब मैं और क्या बताऊँ?
और किसी एक मुद्दे की बात नहीं है। कहीं कोई दुखद घटना घट जाती है, ख़ासकर दहेज हत्या हो जाती है या कुछ और ऐसा हो जाता है, तो हमें बुरा लगता है, हम उसकी बात करना चाहते हैं। इंसान हैं बुरा लगेगा, लेकिन उनकी भी बात कर लो, जो वेल-एडजस्टेड दिखाई देते हैं। वो रिश्ते भी देख लो, जहाँ हिंसा प्रकट नहीं है अभी, प्यार वहाँ भी नहीं है। बस कहीं हिंसा दिख जाती है, खून बह जाता है, तो हम थोड़ी आउटरेज कर लेते हैं और कुछ नहीं है।
माँ को क्या पता बेटी क्या होती है? माँ को क्या पता? माँ कितने साल की थी, जब बेटी को जन्म दिया था? पच्चीस-अट्ठाईस रही होगी। कई बार तो भारत में अभी भी, एक-तिहाई, एक-चौथाई शादियाँ होती हैं तो लड़की की उम्र अठारह साल से कम की होती है, अभी भी। तो पता नहीं माँ कितने बरस की थी। बीस की रही होगी, पच्चीस की रही होगी, तीस की रही होगी। माँ को क्या पता है?
वो जो रिश्ता बनता है पत्नी का पति से, वो प्रेम का होता है क्या? माँ को अपना ही कुछ नहीं पता, तो पति से क्या प्रेम करेगी, बेटी से क्या प्रेम करेगी। माँ के लिए बेटी एक ऑब्जेक्ट है, जिसके साथ एक विशिष्ट क़िस्म का बर्ताव करना है, एन ऑब्जेक्ट टू बी रिलेटेड टू इन अ पर्टिक्युलर वे। ये एक ऑब्जेक्ट है, ये अभी एक ऑब्जेक्ट है जो घर में आया है, और इसके साथ इस तरीके का बिहेवियरल पैटर्न डिस्प्ले करना होता है। ये रिश्ता है, इसको हम रिलेशनशिप बोलते हैं। ये हस्बैंड है, ये फादर है, ये मदर-इन-लॉ है, इन लोगों के साथ, हर रिश्ते के साथ एक मैनुअल मिला हुआ है, इसके साथ ऐसे बात करनी, इसके साथ ऐसे करना, इसके साथ ऐसे करना, इसको ऐसे करना है। ये प्यार कहाँ है?
आप लोगों को फिर ताज्जुब क्यों होता है, जब आप पाते हैं कि अरे, किसी ने अपनी प्रेमिका को काटकर के फ्रिज में डाल दिया। या कि बेटी अपने ही घर वालों से मदद की अपील कर रही थी और घर वालों ने ही ध्यान नहीं दिया। बोले कि अब तुझे ब्याह दिया है, तू अपना देख, अपना घर का, तेरा घर वो है। इसमें आप लोगों को ताज्जुब होता है, मुझे ये ताज्जुब है। आपकी समस्या ये है कि आप वहाँ प्यार की कल्पना कर लेते हो, जहाँ नहीं है, नहीं है, नहीं है। पैटर्न्स के अलावा हमारी रिलेशनशिप्स क्या हैं? बताओ न। और पैटर्न तोड़ के देखो, रिलेशनशिप टूट जाएगी।
पैटर्न समझते हो न? ढर्रा, ढाँचा, ग्रूव, एक नक्शा, एक एल्गोरिदम, एक आदेश-पत्र। उसको बदल के देखो, उसको तोड़ के देखो, उसको छेड़ के देखो क्या होता है, देखो क्या होता है। जिसका नाम नहीं लेते, उसे नाम से पुकार के देखो। जिसको “जी” नहीं बोलते, उसको “जी” बोल के देखो। और जिसको “जी” बोलते हो, उसको “जी” बोलना बंद करके देखो। देखो क्या होता है रिश्तों का, देखो ऐसे गिरने शुरू।
इसीलिए तो मैं चाहता नहीं कि ये मुद्दे मेरे साथ उठाओ, तुम सुनने भर से गिर जाते हो। ज़िंदगी में चलिए बहुत हिम्मत न भी हो तो भी थोड़ी टेस्टिंग कर लेनी चाहिए। नहीं कह रहे हैं कि कुछ बदल ही डालो, कुछ उखाड़ दो, गिरा दो, न न न, पर थोड़ा प्रयोग, परीक्षण अच्छा रहता है। मनोरंजन के नाते ही करके देख लो न। जो रिश्ता जिस ढर्रे में चल रहा है उस ढर्रे को बस थोड़ा छेड़ के देखो क्या होता है। तो पता चलेगा कि प्यार का अभाव किसको बोलते हैं। प्यार नहीं है, उम्मीदें हैं, डूज़ ऐंड डोंट्स हैं, “तू मेरे लिए ये करेगा, मैं तेरे लिए ये करूँगी। तुझे ऐसे-ऐसे रहना है, मुझे ऐसे-ऐसे रहना है। ये तेरी लक्ष्मण-रेखा है, ये मेरी है। तूने अगर ऐसा करा, तो मैं नाराज़ हो जाऊँगी। मैंने अगर ऐसा करा, तो तुझे नाराज़ होने का हक़ है।”
और ये चलो दो वयस्क लोग अपने साथ करें, स्त्री-पुरुष करें, समझ में आता है। यही काम तो बच्चों के साथ भी होता है न। बच्चा क्या है हमें क्या पता, हमें क्या पता बच्चा क्या होता है। आपको क्या पता बच्चा क्या होता है, क्या पता? बताइए, बच्चा माने क्या होता है?
यहाँ कितने लोग बैठे हैं, जो अभी चालीस पार के हैं? हाथ उठाइएगा। अरे बाबा, बहुत सारे हैं। लगभग चालीस प्रतिशत ही हैं चालीस पार के। तो आप अभी बहुत होशियार हो? कितने हैं जो चालीस पार के हैं पर मानते हैं कि बुद्धू हैं? चलो, हाथ उठाओ। तो जब पचीस के थे, तब कितने होशियार थे? चालीस पार कर गए, पैंतालीस के हो गए, पचपन के हो गए, अभी भी बुद्धू हो। तो पचीस के थे, तब कैसे थे? तो इस शरीर से क्या निकाल मारा? और बोल दिया, “संतति को जन्म दिया है, अब हम पिता-परमेश्वर हैं, यकायक मैं माँ से देवी हो गई।” कैसे भाई, कैसे? तुम 45 के होकर भी मूर्ख हो, तो पचीस में तुम कैसे भगवान बन गए, किसी को जन्म देकर? और जन्म दिया क्यों?
जब तुम्हें ज़िंदगी का कुछ पता नहीं, जीवन की कोई तमीज़ नहीं। और मैं थोड़ा क्रोध में बोल रहा हूँ, बोलना चाहिए क्योंकि एक इंसान की ज़िंदगी का सवाल है, वो बच्चा पैदा क्यों किया? जवाब दो। तुम्हें क्या पता है? तुम कुछ नहीं जानते। पर तुम उसको ले आते हो और फिर तुम कुछ जानते नहीं, इसका करना क्या है? तो कुछ शारीरिक काम हैं, तो उसके साथ कर देते हो। चलो, इसको साफ़ कर दो, नहला दो, मालिश कर दो, दूध पिला दो, खाना खिला दो। ये कर देते हो। वो जो तथाकथित पिता है, वो ऐसे देखता रहता है। बोलता है, “इसका क्या करना होता है? अच्छा, स्कूल में डालना होता है।” वो ऐसे उठा के स्कूल में डाल देता है।
मैं बहुत मासूम सवाल पूछ रहा हूँ, आपकी टी-शर्ट से हिंट लग रहा है मुझे। आपको कैसे पता ये क्या कर डाला? और मैं प्रजनन के ख़िलाफ़ वग़ैरह नहीं हूँ, मैं बेहोशी के ख़िलाफ़ हूँ । मैं ज़िम्मेदारी के पक्ष में हूँ, प्रो रिस्पॉन्सिबिलिटी, नॉट ऐंटी रिप्रोडक्शन। आप एक जीव को इस जहान में ला रहे हो। क्यों? कैसे? क्या पता था आपको? कैसे ये फ़ैसला किया? क्या करने वाले हो? फ़ैसला बस ऐसे किया, “वो न, दीदी के तो अब दो हो गए हैं, मेरा एक तो होना चाहिए। दीदी बार-बार दिखाती है मुझे, “ये देख, दो-दो।”
“संजय, सुनिए न, चलिए न प्लान करते हैं।”
हंस क्या रहे हो? ऐसे ही होता है। ठीक है न? कितने लोग मानते हैं कि ऐसे ही होता है? ऐसे ही हुआ है न? उसके बाद संजय और सुनीता ने अपनी प्लानिंग को बाक़ायदा अंजाम दिया। और वो पूछ रहा है छोटू, “पर इसमें मेरी क्या गलती थी? मैं जहाँ था, मुझे वहीं रहने देते। मैं खुश था।”
तुम्हें क्या पता? ये प्रकृति, भाई, जंगल का इतिहास है न हमारा। पचीस तो ज़्यादा होता है, स्त्री-पुरुष तो पंद्रह की उम्र में ही प्रजनन के लायक हो जाते हैं। तो कर लो, पंद्रह में ही पैदा कर लो। और मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक स्तर हमारा पंद्रह और पचीस के बीच में बहुत उन्नत नहीं हो जाता, रहते ऐसे ही हो, पर बच्चा जनने में अव्वल नंबर, फटाफट, कूद-कूद के, “एक और, एक और!” हंस रहे हो। और ये सब कर गुज़रने के बाद अब उम्मीद ये है कि प्यार होगा। हेलो! क्यों हो? क्यों हो?
कई टीनएजर्स, युवा लोग आते हैं, “मुझे मेरे पेरेंट्स से कभी भी लव ऐंड अंडरस्टैंडिंग नहीं मिले।”
अबे, क्यों मिले, उनमें आपस में ही नहीं है। वो ख़ुद को ही अंडरस्टैंड नहीं करते, वो तुझे क्या अंडरस्टैंड करेंगे। तेरी समस्या ये है कि तू उम्मीद कर रहा है कि वो किसी लायक हैं, कि वो तुझे समझ सकते हैं। उन्होंने ख़ुद को समझा है कभी, कि तुझे ही समझ लेंगे? उन्हें माफ़ कर, आगे बढ़। जा के बोलो उनसे कि “माफ़ किया, हमारा-तुम्हारा गेम सेटल्ड, कोई गिला-शिकवा नहीं।” लेकिन वो नहीं। ऐसे सोचते हो, जैसे कि बाप तो भगवान है न। उसके पास क्षमता थी मुझे समझने की, पर उसने मुझे समझा नहीं। अरे, उसके पास क्षमता ही नहीं है, तुम्हें समझ में क्यों नहीं आ रहा?
अच्छा, आप जिस उम्र के हैं चालीस पार वालों, कभी आपके पिताजी-माताजी भी इसी उम्र के थे। आप पैंतालीस के हैं? कभी आपके माँ-बाप पैंतालीस के थे। जब आपके माँ-बाप पैंतालीस के थे, तब आप कितने के थे? तब आप बीस के थे। तब आप बीस के थे, माँ-बाप पैंतालीस के, तब आप उनकी ओर देखते थे और सोचते थे, “ये देखो, कितने महान हैं, कितने समझदार हैं।” अब आप ख़ुद पैंतालीस के हो, तो पोल खुल गई न। अब आप समझ गए न पैंतालीस में आदमी कितना बुद्धू होता है। पर आप जब बीस के थे, तो सोचते थे कि माँ-बाप समझदार हैं, क्योंकि पैंतालीस के हैं। पैंतालीस का होने से क्या होता है, पैंतालीस के तो आप भी हो। देखो, कैसे हो। पर रहता यही है कि “वो बड़े हैं।” वो बड़े तो हैं, पर बीच में एक ब्लैंक है।
माँ-बाप को नहीं बोल रहा, आपको बोल रहा हूँ, क्योंकि वो जिस उम्र में हैं कल आप भी उसी उम्र में होओगे। और उस उम्र में आप वैसे ही हो, जैसे आप हो। पर जब बच्चे होते हो, तो बड़ी उम्मीद हो जाती है कि माँ-बाप तो बिल्कुल गंभीरता की और गहनता की प्रतिमूर्ति होंगे। उन्हें तो मेरे दिल का हाल पता होना चाहिए न, परमात्मा हैं, परमेश्वर हैं, भगवान हैं, भगवती हैं।
कुछ नहीं है, ऐसे ही हैं वो तुम, ऐसे ही पैदा हो गए हो। कुछ भी हो जाता है ज़िंदगी में, ऐसे ही तुम भी हो गए। सब ऐसे ही हुए हैं। आप क्या किसी डिवाइन प्लैनिंग का नतीजा हो? आप प्लैनिंग क्या, कॉनस्पिरेसी का भी नतीजा नहीं हो। हम सिर्फ दुर्घटनाएँ हैं, षड्यंत्र भी नहीं। अपने आपको इतनी इज़्ज़त मत नवाज़ा करो, कुछ नहीं हैं हम, ये अहंकार है बहुत बड़ा।
“फिर मेरे माता-पिता का मिलन हुआ, और उन्होंने मुझे बड़ी आत्मीयता से, ममत्व से और प्रेम से जन्म दिया।” अपना अहंकार बढ़ा रहे हो, और कुछ नहीं कर रहे हो। बी रियल, और वो रियलिटी जब आती है न, तो सही बोल रहा हूँ जैसे थोड़ी देर पहले कहा था, माँ-बाप को फिर माफ़ कर पाते हो। फिर माँ-बाप के ख़िलाफ़ जो शिकायत होती है, वो कम हो जाती है, क्योंकि साधारण इंसान थे उनसे एक साधारण-सी भूल हो गई, बस। तुम क्या उस बात की तकलीफ़ छाती में बाँध कर घूम रहे हो। “हो गया, कोई बात नहीं मम्मी, हो जाता है। मैं भी सुबह चाय बना रही थी, वो उबल गई।”
आपसे नहीं होता है? सही मौके पर तापमान कम करना भूल गए, मामला छलक गया। फिर आप बोलते हो, “मैं दिव्य विभूति हूँ, मैं अवतरित हुई हूँ ।” आप अवतरित नहीं हुई हैं, आप छलकी हैं। हंस लो अच्छे से, ये जो मज़ाक है, ये चुटकुला है, यही इंसान की जात है। यही हम हैं, समझना अच्छे से। हमारा होना एक ऐब्सर्डिटी है, सचमुच। और जैसे आप अभी हंस रहे हो, ऐसे ही अपनी हस्ती पर हंसा करो। फिर दूसरों से शिकायत कम होगी।
तब तो कहानियाँ चलती हैं, “तुझे पता है, तेरी दादी ने तुझे महादेव से माँगा था?” काहे? बिना बात के। असली बात ही बता दो न। अब असली बात थी कि वो बताओगे, तो सेंसर बोर्ड बैठेगा। लेकिन वो असली बात अच्छी है, अश्लील भले ही हो पर मनोरंजक है। और अश्लीलता में भी क्या बुराई, अगर वो सच्ची हो? सत्य यदि ऑब्सीन भी है, तो है तो सत्य न। बता ही दो अपने बच्चों को कि कैसे पैदा हुए थे। कम से कम उनके भीतर से ये उम्मीद हटेगी कि “हम कोई बड़े हीरे-मोती हैं जिनको जाकर के दुनिया के बाज़ार से संग्राम करके हमारे अभिभावकों ने हासिल किया था।”
कितने तो, मालूम है, बस इसलिए पैदा हो जाते हैं क्योंकि फ़ैसला इक्यावन प्रतिशत का हो गया। बाक़ायदा ज्यूरी बैठी थी ये तय करने के लिए कि “ये पैदा होना भी चाहिए कि नहीं? रखें कि गिरा दें?” और ऐसे-ऐसे-ऐसे पेंडुलम स्विंग करता रहा, करता रहा, और बस इक्यावन-उनचास से ये फ़ैसला हो गया कि “चलो, पैदा होने देते हैं।” नहीं तो लगभग पचास प्रतिशत संभावना थी कि तुम पैदा ही नहीं होते, फ्लश कर दिए जाते। किसी अस्पताल के पीछे इतना-सा फ़ीटस बन करके कचरे के ढेर में पड़े होते।
एक बहुत बड़ी तादाद है औलादों की, जो ऑलमोस्ट अनवॉन्टेड होती हैं, ऐक्सिडेंटल होती हैं। तो फिर पहले बैठकर के विचार होता है, उसमें दो नहीं, पाँच-छह लोग कई बार बैठते हैं कि इसको पैदा होने भी देना है या साफ़ करें। पर जब पैदा हो जाते हो, तो ऐसे हो जाते हो कि “अरे रे रे रे रे रे, मेरे घर आई एक नन्ही परी, चाँदनी के हसीन रथ पे सवार...” वो नन्ही परी बस 51% से पैदा हो गई है। जब ज्यूरी बैठी थी, उसी वक़्त किसी एक का भी मूड बदल गया होता, तो परी का परा हो जाता।
और ये बातें ऐसी नहीं हैं, जो मैं कहीं से ख़ुफ़िया उठाकर के लाया हूँ । ये घर-घर की बात है, बहुत सीधी बात है। तो ये मानते क्यों नहीं हो? और ये मानने से रिश्ते ख़राब नहीं हो जाएँगे। दोहरा रहा हूँ, ये मान लोगे न तो रिश्ते सहज हो जाएंगे। ये मान लोगे, तो माँ-बाप को माफ़ करना आसान हो जाएगा। ये मान लोगे, तो माँ-बाप से फिर दोस्ती कर पाओगे। क्योंकि दिखाई देगा कि हमारी तरह इंसान हैं, जैसे हम कुछ अच्छा, कुछ बुरा करते रहते हैं, वैसे ही उनसे भी कुछ हो गया होगा कुछ ठीक, कुछ ग़लत।
प्रश्नकर्ता के प्रश्न में मान्यता छुपी थी कि “माँ है, तो बेटी का तो ख़याल रखेगी न”, जैसे कि रिश्ते की परिभाषा में ये निहित हो। ऐसा कुछ भी नहीं है। कि बेटी संकट में माँ को बोल रही है कि “माँ, यहाँ ससुराल में मेरे साथ ग़लत हो रहा है। अत्याचार हो रहा है। माँ, बचाओ। क्या करूँ? माँ, रक्षा करो।” तो माँ कहेगी, “कोई बात नहीं, मैं आ रही हूँ”, या “तू मेरे पास आ जा”, या “मैं कोई उपाय सुझाती हूँ ।” तुम ये क्यों मान रहे हो कि माँ ऐसा कुछ करेगी? क्यों मान रहे हो? क्योंकि तुम्हें लोक-संस्कृति ने सिखा रखा है कि माँ-बच्चे का रिश्ता तो अनिवार्यतः प्यार का होता है।
और मैंने अपना पूरा उत्तर शुरू के ही तीन लफ़्ज़ों में ख़त्म कर दिया था, प्यार नहीं है। क्योंकि प्यार कोई शारीरिक चीज़ नहीं होती कि आप बच्चा जन्म दोगे, तो प्यार हो जाएगा। प्यार बड़ी गहरी बात होती है। क्या कहते हैं हम? प्यार सीखना पड़ता है।
एक उम्र के हो गए, तुम संभोग कर लिया, गर्भ हो गया, प्रजनन हो गया, तो उससे प्यार थोड़ी हो जाएगा। प्रजनन से प्यार हो जाएगा क्या? ये कैसी बात है? नहीं तो फिर प्रजनन ही प्रेम का मार्ग कहा जाता। प्रजनन तो पागल भी कर लेता है, प्रजनन सारे पशु करते हैं। कोई क़ातिल हो, अपराधी हो, प्रजनन तो बलात्कार से भी हो सकता है। तो प्रजनन और प्रेम का क्या अनिवार्य रिश्ता है, भाई?
प्यार सीखना पड़ता है। और जिन्होंने प्यार सीखा होता है न, वो फिर ये नहीं करते कि प्यार उसी से करेंगे, जो हमारे जिस्म की औलाद हो। उनका प्यार बस होता है। उनका प्यार पूरी दुनिया के बच्चों के लिए होता है। पूरी दुनिया को ही अपना बच्चा मानते हैं।
कहीं प्यार नहीं है। इसकी एक अच्छी, विश्वसनीय सूचना इसी बात से मिल जाती है कि कोई कहे कि “मैं तो बस अपने बच्चों से प्यार करती हूँ ।” जैसे ही किसी ने ये कहा कि “मैं तो बस अपने परिवार से, अपने बच्चों से, अपने पति से, अपने पिता से, अपने इन्हीं से प्यार करती हूँ ”, ये इस बात की बड़ी सशक्त सूचना है कि वो प्यार करता ही नहीं, या करती ही नहीं।
जिनको होता है, वो अपने प्यार को सीमा नहीं दे सकते। ऐसे एक किसी संकीर्ण दायरे में क़ैद नहीं कर सकते कि “मुझे प्यार तो अपने बच्चे से है।” जिसे प्यार होगा, उसे प्यार होगा। उसे किसी एक विषय से प्यार नहीं होगा। उसे प्यार होगा। प्यार उसकी आंतरिक स्थिति होगी, उसकी ये स्थिति विषय-सापेक्ष नहीं होगी कि “ये फलाना चेहरा सामने आया, तब तो मुझे प्यार है। और कोई और चेहरा सामने आया, तो मुझे प्यार नहीं है।” प्यार ऐसा नहीं होता। पर हमारा प्यार ऐसा ही होता है, इसीलिए प्यार नहीं है। होना चाहिए, है नहीं।
अध्यात्म इसीलिए है, ताकि हम प्रेम सीख पाएँ। आग्रह है मेरा, प्रेम सीखो। और प्रजनन से प्रेम नहीं आ जाएगा।
ये जो संस्कृति में चलता है न कि “माँ का बच्चे के प्रति प्यार तो उच्चतम होता है, अनकंडीशनल होता है। सबसे गहरा प्यार कौन-सा होता है? माँ-बच्चे का।” झूठ है ये, बहुत बड़ा झूठ है ये, ऐसा कुछ नहीं है। जिसको प्रेम पता ही नहीं, वो किसी से भी प्यार कैसे कर लेगा? अपनी औलाद से भी प्यार कैसे कर लेगा? न, नहीं होता। और जिसको प्रेम पता है, उसके प्रेम को तुम रोक के दिखाओ, रुकेगा नहीं। वो सारी सीमाएँ लाँघ जाएगा, धर्म की, जात की, अपनेपन की, पराएपन की। उसके प्रेम को रोक नहीं पाओगे।
वहाँ फिर ये थोड़ी होगा कि “अपने बच्चे को मैंने मुर्गे के बच्चे का सूप पिलाया।” ये क्या कर रहे हो? तुम्हारा बच्चा-बच्चा, और मुर्गे का बच्चा सूप? मैं इल्ज़ाम नहीं लगा रहा हूँ, मैं आपको आहत नहीं करना चाहता कि मैं कहूँ कि “देखो, तुम दोषी हो, तुम गिल्टी हो, तुम में प्यार नहीं है।” मैं चाहता हूँ कि प्यार हो। लेकिन जब तक आप नकली प्यार को ही प्यार समझते रहोगे, प्यार कहाँ से होगा? नकली प्यार को हटाना ज़रूरी है, ताकि असली वाला अंकुरित हो सके। तो बुरा मत मान जाइएगा कि “इन्होंने तो हमारे रिश्तों को ही नकली क़रार दिया। हम प्यार मतलब जानते ही नहीं हैं। तो फिर हम और क्या कर रहे हैं रिश्तों में।”
बहुत आसान है मेरी बात को अन्यथा ले लेना। ये दुनिया जैसी है, और जैसी और ज़्यादा होती जा रही है, जिस गर्त में गिर रही है, आपको सचमुच लगता है इस दुनिया के लोग प्यार जानते हैं? तो मेरी बात से आपको झटका क्यों लग रहा है? बुरा क्यों मान रहे हो? प्यार सीखो। प्यार सीखो और प्यार को सीमाएँ मत दो। मत कहो कि “मेरा परिवार है, तो इसलिए प्यार है।” ये सब, “मेरा दोस्त, मेरा यार, मेरी पत्नी, मेरी बच्ची” ये जो मेरापन है न, ये प्यार का दुश्मन है।
प्यार मेरेपन में बाँधने को नहीं कहते, प्यार पंख देने का, उड़ान देने का नाम है। और ये मेरेपन का, ममत्व का, ममता का भाव बहुत बड़ी ज़ंजीर होता है।
ऐसी घटना अभी हुई है, आगे भी होती रहेगी। जो आप व्यर्थ से व्यर्थ प्रतिक्रिया दे सकते हैं, वो ये है कि आप आश्चर्य जाहिर करें। आप चौकें, आप भौचक्के हो जाएँ कि “अरे, क्या पति ने पत्नी का गला घोंट दिया?” “अरे, क्या प्रेमिका ने प्रेमी को काट दिया?” “अरे, क्या माँ ने बेटी पर ध्यान नहीं दिया?” ये जो आप चौंक रहे हैं न, यहाँ असली गड़बड़ हो रही है। आप चौंकना बंद करिए, आईना देखना शुरू करिए, स्वीकारना शुरू करिए। क्या पता, इसी से प्यार जगे कुछ, नकली हटे कुछ और असली की कुछ आहटें आएँ।