अगर बीमारी वह चीज़ होती है, जिसके बाद मौत आती है, तो ज़िंदगी ही बीमारी है। तो एक तरह से सभी बीमार हैं। और उस बीमारी का नाम ही क्या है? लाइफ़। सबको ही जाना है। प्रश्न मृत्यु का नहीं है, प्रश्न जीवन का है। बात यह है कि जब तक हम जी रहे हैं, तब तक कैसे जी रहे हैं? मरने से आधे घंटे पहले भी जीवन की बात करो। जब मर जाएँगे, उसके बाद हम मौत की बात करेंगे। अध्यात्म सही जीवन जीने की कला है; इतना सही जीना, इतना सही जीना, कि मौत भूल ही जाए। और कोई मौत याद दिलाए, तो मौत चुटकुले जैसी लगे।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं कैंसर पेशेंट हूँ और मैं बहुत दिन से आपसे मिलना चाह रही थी। मैं तीन बार कोशिश कर चुकी हूँ आपसे मिलने के लिए, दिल्ली आने के लिए। पर मेरे पापा एक बार चले गए तो मैं नहीं आ पाई। एक बार ट्रेन कैंसिल हो गया, नहीं आ पाई। उसके बाद अभी 2025, 18 मार्च को कैंसर डिटेक्ट हुआ। मैं यहाँ टाटा आई, वहाँ मेरा इलाज चल रहा है। तो आठ कीमो पड़ चुके हैं। उसमें सर बोले कि 30% में आप आ रही हो, काम नहीं कर रहा है। अभी जो है तीसरे कीमो का पहला चल रहा है, टारगेट थेरेपी विद कीमो।
आचार्य प्रशांत: बैठ जाइए।
प्रश्नकर्ता: ठीक हूँ, सर। और मेरी दिली इच्छा थी कि मैं आपसे मिलूँ, बात करुँ। मुझे लग रहा है मुंबई आप मेरे लिए ही आए हो।
श्रोता: आपको डेढ़ साल से फॉलो




