
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं कैंसर पेशेंट हूँ और मैं बहुत दिन से आपसे मिलना चाह रही थी। मैं तीन बार कोशिश कर चुकी हूँ आपसे मिलने के लिए, दिल्ली आने के लिए। पर मेरे पापा एक बार चले गए तो मैं नहीं आ पाई। एक बार ट्रेन कैंसिल हो गया, नहीं आ पाई। उसके बाद अभी 2025, 18 मार्च को कैंसर डिटेक्ट हुआ। मैं यहाँ टाटा आई, वहाँ मेरा इलाज चल रहा है। तो आठ कीमो पड़ चुके हैं। उसमें सर बोले कि 30% में आप आ रही हो, काम नहीं कर रहा है। अभी जो है तीसरे कीमो का पहला चल रहा है, टारगेट थेरेपी विद कीमो।
आचार्य प्रशांत: बैठ जाइए।
प्रश्नकर्ता: ठीक हूँ, सर। और मेरी दिली इच्छा थी कि मैं आपसे मिलूँ, बात करुँ। मुझे लग रहा है मुंबई आप मेरे लिए ही आए हो।
श्रोता: आपको डेढ़ साल से फॉलो कर रही हैं।
प्रश्नकर्ता: तीन साल से।
श्रोता: आपके हर दिन प्रवचन सुनती हैं। आप जब भी लाइव आते हैं तो हर प्रवचन सुनती हैं, सारे टेस्ट देती हैं, आपको बहुत मानती हैं और इनकी जितनी भी हिम्मत है, वो, आई थिंक, आपकी प्रवचन, आपकी लाइव सुनने से है। और यह बहुत खुश हैं आज ये आपसे मिल सकीं। बहुत दिनों से ट्राई कर रही थी आपसे मिलने का, पर मिल नहीं पा रही थी।
प्रश्नकर्ता: ये (श्रोता) मेरी बेटी है छोटी और ये जॉब छोड़ चुकी है मेरे लिए। मेरे लिए यहाँ रह रही है, मेरे साथ। हॉस्पिटल जाने आने के लिए, मेरे साथ सब कुछ करती है। और यह एक बार चार माले से गिर गई, उस रात भी 2:00 बजे मैं एक आँसू नहीं रोई। मैं हॉस्पिटल इसे लेकर एडमिट की। मेरी मम्मी, 75 इयर्स की है मेरे साथ में, वो भी रो रही थी इसको देख के, इसका हालत देख के। लेकिन मैं नहीं रोई क्योंकि मैं रोऊँगी या मैं हिम्मत करके इसे हॉस्पिटल ले जाऊँगी। वो हिम्मत आपसे आती है, सर। और आज मैं बहुत खुश हूँ आपसे बात हो सकी।
आचार्य प्रशांत: क्या कह रहे हैं अभी डॉक्टर?
श्रोता: डॉक्टर कह रहे हैं कि अभी तो कीमो असर नहीं कर रहा है, बट और भी ऑप्शंस हैं।
आचार्य प्रशांत: कहाँ पर है कैंसर?
प्रश्नकर्ता: रेक्टम में है और पेट में भी आ गया अभी।
आचार्य प्रशांत: फैला भी है?
श्रोता: हाँ, ट्रीटमेंट चालू है तब से थोड़ा फैल चुका है।
प्रश्नकर्ता: सर, अब डर नहीं होता है मरने का, क्योंकि बॉडी छूटेगा, ये आपसे ही मैं समझी हूँ। पर उस समय फिर अपने आप को कैसे; अभी जैसे दिमाग में आता है कि कभी भी कुछ भी हो सकता है। अभी नहीं छह महीना, साल भर, दो साल, जब तक चल सकती हूँ चल सकती हूँ। लेकिन कभी न कभी अगर यह शरीर छूट रहा है उस समय की स्थिति, जो रोज़ आप बोलते हो कि अपने आप हर क्षण को देखो, हमेशा देखो, वही स्थिति उस समय भी काम आएगी न, सर।
आचार्य प्रशांत: शरीर लगातार ही छूट रहा है।
प्रश्नकर्ता: जी, क्योंकि बोलते हैं कि उस समय बहुत ही ज़्यादा पेन होता है, बॉडी छोड़ने से।
आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, कुछ भी नहीं है। पता भी नहीं चलता है। जब मृत्यु होती है, से पहले ही आमतौर पर ब्रेन को ब्लड फ्लो वग़ैरह इतना कम हो चुका होता है कि कुछ पता नहीं चलता। सेंसेशन वग़ैरह कुछ नहीं है। और वो तो एक पल की बात है।
देखिए, बैठ तो जाइए। देखिए, अगर बीमारी वह चीज़ होती है जिसके बाद मौत आती है, है न? तो ज़िंदगी ही बीमारी है न।
प्रश्नकर्ता: जी।
आचार्य प्रशांत: ज़िंदगी के अंत में कोई अमर तो होता नहीं, ज़िंदगी के अंत में मृत्यु ही आती है। तो एक तरह से सभी बीमार हैं। और उस बीमारी का नाम ही क्या है? लाइफ़। यह ऐसी बीमारी है जो चल रही है, चल रही है, फिर आपको मार देगी। वही है न? तो सबको ही जाना है। सबको ही जाना है, प्रश्न मृत्यु का नहीं है, प्रश्न जीवन का है। बात यह है कि जब तक हम जी रहे हैं, तब तक कैसे जी रहे हैं।
मौत तो कोई बड़ी बात है नहीं। मौत तो कुछ पता न हो, तो उसको हम कहें बड़ी बात है। कुछ ऐसा हो जिससे बचा जा सकता हो, तो उस दिशा में प्रयास कर लें।
जिसको वेदान्त में व्यवहारिक तल कहते हैं न, तो उस व्यवहारिक तल का व्यवहारिक सत्य है मृत्यु।
जैसे पारमार्थिक सत्य होता है, मुक्ति। परमार्थिक सत्य मुक्ति है, वैसे ही व्यवहारिक सत्य मृत्यु है। ठीक है? और यह हम जितने यहाँ बैठे हुए हैं, जितने यहाँ बैठे हुए हैं हम सब बीमार लोग ही हैं। सब बीमार हैं। एक कतार है जिसमें सब खड़े हुए हैं, कौन आगे जाता है, कौन पीछे जाता है, कुछ पता नहीं होता। अभी गोवा में हुआ वहाँ जवान लोग ही थे, कोई वहाँ पर क्लब वग़ैरह था। वह जवान लोग थे, 25 थे वह चले गए।
भारत में सबसे ज़्यादा, बीमारियों से भी ज़्यादा जो मौतें हैं वह सड़कों पर होती हैं। और सड़कों पर मौतें उनकी होती हैं जो बाइक चला रहे होते हैं, या इस तरह के हैं। वो सब जवान लोग ही होते हैं, वो चले जाते हैं। तो सब कतार में खड़े हैं। उसमें भी पहले कौन जा रहा है, बाद में कौन जा रहा है कुछ पता नहीं। बिल्कुल हो सकता है, ये हमारी‑आपकी आख़िरी मुलाक़ात हो, इसलिए नहीं कि आपको जाना है, हो सकता है कि आप रही आएँ मैं चला जाऊँ।
प्रश्नकर्ता: नहीं सर ऐसा।
आचार्य प्रशांत: कौन जाने। ठीक है? तो जिस चीज़ का यह तो पता है कि होनी है, और यह भी पता है कि कैसे होनी है, कब होनी है कोई जानता नहीं। उस विषय में बहुत सोचना नहीं चाहिए। सोचना चाहिए जीवन के बारे में। प्रश्न, मैंने कहा, मृत्यु नहीं है, जीवन है।
अभी आप हैं न। अभी आपके पास आज का दिन है न, और अभी आपके पास एक क्षण है न, तो आपने उसका एक अच्छा इस्तेमाल कर लिया। क्या करा आपने? आपने माइक लिया, आपने बात करी। इस बात से देखिए सबको फ़ायदा हो रहा है। बस, हो गया। ऐसे ही जीते जाना है, जीते जाना है, जब ज़िंदगी ही नहीं तो फिर कोई समस्या, कोई तनाव भी नहीं।
सारे जो प्रश्न होते हैं; आप कह रही हैं, आप इतने दिनों से सुनती हैं, तो सारे जो प्रश्न होते हैं या उलझनें या समस्याएँ होती हैं, वो अहंकार के लिए होती हैं न। और अहंकार इसी, इसी मिट्टी की निर्मित होता है। यह शरीर है तो अहंकार है। शरीर तो जब गया, तो अहंकार भी उसी के साथ जल गया। कुछ बचता तो है नहीं शरीर के बाद।
तो जब तक यह शरीर है, तब तक प्रश्न है, तब तक चुनौती है। और हमें शरीर रहते, माने जीवित रहते जीवन के सवालों के सही जवाब देने हैं। और जीवन का कोई सही सवाल यह नहीं होता कि मौत का क्या करना है, या मौत में क्या करें‑न करें। मौत का मतलब है, जीवन ही नहीं है। जीवन ही नहीं है तो कोई सवाल भी नहीं है। सारे सवाल जीवन के भीतर के हैं। क्योंकि सारे सवाल किसके लिए हैं? ‘मैं’ के लिए, अहंकार के लिए। और वो जब तक शरीर है, तभी तक है।
कभी देखा है कि कोई मर गया, उसके बाद भी कोई ‘मैं‑मैं’ कर रहा है, कह रहा है, “अभी मेरी समस्या है?” अभी हुआ है क्या? ऐसा तो कुछ होता नहीं। तो जब तक आप जीवित हैं, आप में, और इन लोगों में, और मुझ में कोई अंतर नहीं। क्योंकि हम सभी जीवित हैं। हम सभी जीवित हैं। और जब आप नहीं, या मैं नहीं, या कोई नहीं, तो फिर कोई सवाल भी नहीं। है न?
और जब तक जीवित हैं, तब तक प्रश्न मृत्यु नहीं होना चाहिए। तब तक प्रश्न मुक्ति होना चाहिए।”
और मुक्ति का मतलब होता है, जीते‑जी ऐसे फ़ैसले करूँ, ऐसी ईमानदारी रहे कि आज़ाद रहें।
समझाने वालों ने इसको ऐसे बोला है कि जीवन होता ही इसीलिए है कि मृत्यु से पहले मुक्ति हो जाए। मृत्यु से ठीक पहले नहीं। मृत्यु तो जब होगी तब होगी, हमें क्या पता। जितनी जल्दी हो सके और जितना ज़्यादा हो सके मुक्ति में जियो, मुक्ति में जियो। तभी हम कहते हैं कि ज़िंदगी है। ठीक है न?
तो बिल्कुल हो सकता है कि आप एकदम ठीक हो जाएँ। यह भी हो सकता है। बिल्कुल हो सकता है कि वही हो जो हर इंसान के साथ होना ही है। कोई उसमें बड़ी बात नहीं। मौत आएगी तो आएगी। आएगी, ठीक है। बहुत अगर ज़िंदगी परेशान कर रही हो, और शरीर ही ऐसा हो जाए कि मुक्त न जी पाओ, तो कई बार तो यह भी है, कि “यार, ठीक है, चलो आती है तो आने दो। कौन‑सी इतनी बड़ी चीज़ हो गई।”
मृत्यु बड़ी चीज़ नहीं है, पर ज़िंदगी अगर बंधन में बितानी पड़े, घुट‑घुट के बितानी पड़े, तो वो बड़ी गड़बड़ चीज़ है। वो नहीं होना चाहिए। तो वह ख़्याल बिल्कुल हटाइए, उसका कोई मूल्य नहीं है कि बचेंगे कि नहीं बचेंगे। ट्रीटमेंट कहाँ तक जाएगा, क्या होगा; बिल्कुल नहीं है कि मृत्यु के पल में पीड़ा होती है कि नहीं होती है, इन सवालों में कुछ नहीं रखा है। सवाल यह है कि आज मैं ज़िंदा हूँ, तो आज मैं कैसे जी रही हूँ। कल मर जाऊँगी तो मर जाऊँगी न, कल का क्या पता?
कोई एस्टेरॉइड आए, ये 800 करोड़ दुनिया में लोग हैं सब मर जाएँ इकट्ठे। कुछ भरोसा नहीं। कोविड जैसे दो‑चार होनहार और तैयार हो रहे होंगे किसी जंगल में। अभी उसकी मोर्टैलिटी एक‑दो प्रतिशत की थी; अब नया वाला आ जाए 70% मोर्टैलिटी वाला, तो दुनिया की पूरी आबादी ऐसे झटके में साफ़ हो जाएगी महीनों के अंदर, कोई नहीं बचेगा। वो कोई बात ही नहीं है। क्यों बैठकर के वो सोचें।
हमारे सामने क्या प्रश्न है? मैं हूँ, और अभी हूँ, और जीवित हूँ। तो अभी मुझे क्या करना है? अभी मुझे कैसे जीना है? ठीक है? मैं हूँ, अभी हूँ, और जीवित हूँ, तो अभी मुझे कैसे जीना है? मृत्यु तो भविष्य है, ख़्याल है, कल्पना है।
प्रश्नकर्ता: उसका कोई अस्तित्व नहीं है।
आचार्य प्रशांत: जीवित के लिए क्या अस्तित्व है। जो अभी ज़िंदा है, वह बात ही इसीलिए कर रहा है क्योंकि अभी मरा नहीं न। तो वो अपने जीवन की बात करें न, मृत्यु की बात क्यों करें? जीवन की बात करो। मरने से आधे घंटे पहले भी जीवन की बात करो। जब मर जाएँगे, उसके बाद हम मौत की बात करेंगे।
जो जी रहे हैं, वो ज़िंदगी की बात करें। मौत की बात किनके लिए छोड़ दें? जो मर गए हैं। क्योंकि अब उन्हें, भाई, मृत्यु से ज़्यादा मतलब है, वो तो मर चुके हैं। तो उनको आकर के सवाल पूछने दो कि हम क्या करें? मौत का क्या हिसाब‑किताब है?
वैसे कोई आया नहीं आज तक। बाबा लोगों के पास आते हैं कि भटक रहे हैं, हमारा ये‑वो, इस लोक में, उस लोक में, पाप, ये‑वो, पचास बातें। अध्यात्म सही जीवन जीने की कला है; इतना सही जीना, इतना सही जीना कि मौत भूल ही जाएँ। और कोई मौत याद दिलाए तो मौत चुटकुले जैसी लगे।
जैसे आप कहते हो न, कि मरने की फुर्सत नहीं है। ज़िंदगी ऐसी हो कि मरने की भी फुर्सत न रहे। मौत आए भी तो बोलो, “अब रुक जाओ। अभी कठोपनिषद् निपटा लूँ पूरा, नचिकेता अभी भी सवाल पूछ रहा है।”
हो सकता है हम स्क्रीन पर मिलते रहें; हो सकता है कभी आमने‑सामने भी मिलें; हो सकता है हम कभी न मिलें, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है। आपने ये जो सवाल पूछा है ये ज़िंदगी है, मौत का क्या करना।
प्रश्नकर्ता: कुछ नहीं।
आचार्य प्रशांत: ठीक है?
प्रश्नकर्ता: ठीक। थैंक यू, सर।