आख़िर जीवन आया कहाँ से?

Acharya Prashant

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आख़िर जीवन आया कहाँ से?
मिट्टी जीना चाहती है, मिट्टी में ही प्राण है। और मिट्टी की ही जो जीने की इच्छा है, वो समझ लीजिए कि वृक्ष बनकर या जीव बनकर, प्राणी बनकर खड़ी हो जाती है। ये सोचना सबसे बड़ा अज्ञान है कि “मैं और मिट्टी अलग-अलग हैं।” तो कोई बोले कि “मरने के बाद हम कहाँ जाएँगे?” कहीं नहीं जाओगे, तुम राख में ज़िंदा हो अभी। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि निकलकर इधर-उधर घूमोगे। शरीर से हटकर कोई “जीवात्मा” जैसी चीज़ है: ये फ़िलोसॉफ़िकल एरर है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

आचार्य प्रशांत: ये इतनी पत्तियाँ गिरी हुई हैं, है न? इधर ये पेड़ गिरा हुआ है। यही पेड़ जो है, ये भी जा रहा है मिट्टी में। और इसी मिट्टी से पेड़ फिर से खड़ा हो जा रहा है। क्योंकि इसको (वृक्ष) देखिए, इसकी जड़ उखड़ गई, ये ऐसे लेट गया। लेकिन उसके बाद भी इसने अपनी ऐसे शाखाएँ ऊपर फेंक रखी हैं और ये खड़ा ही हो गया, पूरा गिर जाने के बाद भी। पूरा गिर जाने के बाद भी, ये ऐसे खड़ा हो गया।

मिट्टी जीना चाहती है, मिट्टी में ही प्राण है। समझ रहे हैं न? मिट्टी माने मैटेरियल जो कुछ भी भौतिक है, उसी में प्राण है। वो जीना चाहती है। कुछ इसके भीतर अलग से नहीं आ गया है। जो मिट्टी में है, वही इसमें है। और मिट्टी की ही जो जीने की इच्छा है, वो समझ लीजिए कि वृक्ष बनकर खड़ी हो जाती है या जीव बनकर, प्राणी बनकर खड़ी हो जाती है।

तो जब हम कहते हैं न नेचर, नेचर माने बस वही नहीं है जो दिख रहा है। नेचर माने वो भी है, प्रकृति माने वो भी है जो उसको देख रहा है। तो उसको देखने वाला और वो जो दिखाई दे रहा है, वो दोनों एक-दूसरे से अलग हैं ही नहीं। वो और ये (अपनी ओर इंगित करते हुए) एक हैं। और मिट्टी के भीतर भी ये, जिसको हम ‘चेतन’ बोलते हैं, और वो जिसको हम ‘जड़’ बोलते हैं, दोनों एक-दूसरे में समाए हुए हैं।

जब तक हमें ऐसे दिखाई देती है कि ये मिट्टी है, तो हम उसको बोल देते हैं कि जड़ है। और जब हमें ऐसे दिखाई देती है कि वृक्ष है या जीव है, तो हम कह देते हैं कि चेतन है। जब तक ऐसे (समतल) दिख रही है, तो हम कह देते हैं कि मिट्टी है। पर ऐसे (ऊपर खड़ा हुआ वृक्ष) देख रहे हैं, तो हम कहेंगे कि चेतन है, और हैं लेकिन दोनों एक ही। एक के बिना दूसरा संभव नहीं है। जब एक के बिना दूसरा संभव न हो, तो दोनों को एक माना जाना चाहिए।

तो जैसे मिट्टी और पेड़ अविभाज्य हैं, अनन्य हैं, इनसेपरेबल हैं, इनडिस्टिंक्ट हैं; वैसे ही द सीअर ऐंड द सीन, दृश्य और दृष्टा भी अविभाज्य हैं, इनसेपरेबल हैं। इनको अलग नहीं किया जा सकता। ये एक हैं दोनों।

तो फिर अहंकार क्या है? वो भी मिट्टी है न। और अहंकार और मिट्टी बिल्कुल अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं।

मिट्टी में से ही वो चेतन निकल रहा है। तो जिसको हम ‘अहंकार’ कहते हैं, ‘मेरा होना,’ वो यही है। ये भ्रांति है, जो सेपरेशन रहता है जड़ और चेतन का, कॉन्शियस और अनकॉन्शियस का, सेंटिएंट और इनसेंटिएंट का। जो हम भेद बनाते हैं न, इन दोनों का जो एकत्व है, वो समझ रहे हैं न? अगर वो समझ गए, तो ज़िंदगी बदल जाती है। क्योंकि यही मूल अविद्या है, यही सबसे बड़ा अज्ञान है, ये सोचना कि “मैं और मिट्टी अलग-अलग हैं। कि मैं और मिट्टी अलग-अलग हैं।”

असल में “मैं” कहना बुरा नहीं है। अहंकार में अपने-आप में कोई दिक़्क़त नहीं है। ये जो सेपरेटेड ईगो है न, द सेपरेटेड सेल्फ, जो बोलता है “मैं और मिट्टी अलग-अलग हैं;” वो होता है दोष, वो होता है दुख। अहंकार ठीक है, “मैं हूँ” पर “मैं मिट्टी से अलग नहीं हूँ।” अब ठीक है, अब कोई समस्या नहीं। अगर ऐसा अहंकार है जो कह रहा है कि “मैं और मिट्टी अलग-अलग नहीं हैं,” तो वो ठीक है। उसी को ज्ञान बोलते हैं।

तो ज्ञान क्या है? नकार है, नेति-नेति है। मैं कहता था कि “पहले अलग हैं” अब मैं कहता हूँ “अलग नहीं हैं।” तो ज्ञान माने, कुछ जो मैं सोचा करता था, मान्यता करता था, उसको मैंने हटा दिया।

अहंकार और मिट्टी का देखिए दो तरह से रिश्ता निकल रहा है। माँ और बेटे का भी निकल रहा है। माँ और बेटे का भी रिश्ता है, किस अर्थ में माँ और बेटे का रिश्ता है? कि शरीर और चेतना साथ-साथ चलते हैं। एक अर्थ में शरीर चेतना की माँ है, है न? शरीर बनना शुरू करता है, फिर हम कहते हैं कि वो चैतन्य हुआ। जैसे गर्भ में जब बच्चा रहता है तो हम कहते हैं कि अभी दो-तीन महीने का है, अभी इसमें चेतना नहीं है। कह देते हैं, भले ही वो बात इनऐक्युरेट हो। तो उस अर्थ में शरीर चेतना की माँ है। तो एक ये रिश्ता हो गया मिट्टी और अहंकार के बीच में कि शरीर चेतना की माँ है।

और जो दूसरा रिश्ता होता है वो होता है प्रेमी का, साधारण वाला प्रेमी। जैसा संसारी प्रेमी होता है न, जो भोगने में लगा रहता है, वो दूसरा रिश्ता होता है कि “मुझे इसको भोग लेना है।” जैसे कि बच्चा जब पैदा हो रहा है तो शरीर उसकी माँ है, है न? बच्चा जब पैदा हो रहा है तो अहंकार की माँ है शरीर। पहले शरीर आता है, फिर अहंकार आता है। लेकिन यही बच्चा जब थोड़ा बड़ा हो जाता है तो इसका अहंकार कहता है, “मुझे अन्य शरीरों को भोगना है।” यही अहंकार, जो अभी बेटा बनकर निकला था शरीर का, यही अहंकार अब कहता है कि “मुझे अब दूसरे शरीरों का भोक्ता, प्रेमी होना है।”

तो शुरुआत होती है कि मैं बच्चा हूँ प्रकृति का। प्रकृति माने, अभी मैं जो शरीर है, जड़ पदार्थ है, उसका। तो शुरुआत इससे होती है कि मैं बच्चा हूँ प्रकृति का। तो शरीर आया, मान लीजिए गर्भ में शरीर आया, तो अब शरीर माँ है और अहंकार उसका बच्चा है। शरीर माँ है, अहंकार उसका बच्चा है। शरीर पहले आया, अहंकार हम कहते हैं बाद में आया।

अब यही, जब थोड़ा बड़ा हो जाएगा, बीस साल बाद, तो यही अहंकार कहेगा कि “मुझे शरीर को भोगना है।” तो वही शरीर जो पहले माँ था, वही शरीर जो पहले अहंकार के लिए माँ था, वही शरीर अब अहंकार के लिए क्या बन जाएगा? प्रेमी या प्रेमिका, ऐसी प्रेमिका जिसको वो भोगना चाहता है।

तो ये दो तरह के रिश्ते होते हैं, और ये दोनों ही जो रिश्ते होते हैं ये अज्ञान के रिश्ते हैं। क्योंकि दोनों में ही इनके सही रिश्ते को समझा नहीं जा रहा। इनका सही रिश्ता ये है कि ये दोनों एक हैं। जब अहंकार कहता है कि “मैं शरीर-रूपी माँ का बेटा हूँ,” तो भी वो गलत समझ रहा है। तुम बेटे नहीं हो। द्वैत में डुअलिटी में, कोई किसी का बेटा-वेटा नहीं होता।

बेटा होने का मतलब होता है कि एक पहले आया, एक बाद में। बाप पहले आया, बेटा बाद में आया। डुअलिटी के दोनों छोर एक साथ आते हैं, तो कोई बेटा-वग़ैरह नहीं हो सकता। कॉज़ैलिटी नहीं है। डुअलिटी कॉज़ैलिटी नहीं होती न। कॉज़ैलिटी में हमेशा टाइम होता है, एक पहले आता है, एक बाद में आता है। डुअलिटी में दोनों एक साथ आते हैं, और एक का होना ठीक उसी समय दूसरे के होने पर आश्रित है।

तो जो पहली भ्रांति होती है, वो ये है कि शरीर अहंकार की माँ है, ये भी गलत ही है रिश्ता। और जो दूसरा अज्ञान होता है, वो ये होता है कि अहंकार शरीर का भोगता है। तो माँ से जो रिश्ता है अहंकार का, वो भी गलत है; और प्रेमिका से जो उसका रिश्ता है, वो भी गलत है। क्योंकि दोनों में ही एक सेपरेशन प्रिज़्यूम किया जा रहा है। दोनों में ही माना जा रहा है कि “हैं तो हम अलग-अलग। माँ पहले आई, फिर मैं आया तो हम दोनों अलग-अलग हैं।” और “वो मेरी प्रेमिका है, वो मुझसे अलग है, तभी तो मैं उसको भोगूँगा तो मुझे कुछ पूर्णता मिलेगी। वो एक अलग चीज़ है, मैं उसको भोगूँगा तो मुझे कुछ पूर्णता मिल जाएगी।” तो ये दोनों ही गलत रिश्ते हैं।

तो सही रिश्ता क्या है? सही रिश्ता ये है कि देख लिया जाए कि मिट्टी और चेतना एक हैं।

कि शरीर और अहंकार एक हैं, अलग-अलग हैं ही नहीं। और शरीर और अहंकार को एक देखने का अर्थ होता है कि अब मैं अहंकार बनकर नहीं देख रहा। मैं शरीर और अहंकार दोनों को देख रहा हूँ, तो मैं अहंकार का भी दृष्टा हो गया।

आमतौर पर दृष्टा कौन होता है? अहंकार। पर मैं अहंकार को भी देख रहा हूँ, तो मैं अहंकार का भी दृष्टा हो गया। इसको साक्षीत्व कहते हैं। साक्षीत्व का मतलब होता है, “मैं वो दृष्टा नहीं हूँ जो दृश्य देख रहा है; मैं वो दृष्टा हूँ जो दृश्य और दृष्टा दोनों को एक साथ देख रहा है।” ऐसे दृष्टा को साक्षी कहते हैं। तो वो हम हैं। वो हमारा स्वभाव है। स्वभाव है, सिर्फ़ उसको नहीं देखना, उसको देखने वाले को भी साथ में देख लेना।

और अगर हम स्वभाव में नहीं जिएँगे तो भारी समस्या आती है, जिसका नाम दुख है। क्या समस्या आती है? समस्या ये आती है कि हम इन दोनों को अलग समझते रहेंगे, लगातार अलग समझते रहेंगे। हमको लगेगा कि शरीर से भिन्न कोई चीज़ है अहंकार। और उसी अज्ञान का ज़बरदस्त रूप इस लोक-धार्मिक भ्रांति में देखने को मिलता है, कि शरीर से हटकर कोई “जीवात्मा” जैसी चीज़ है। ये फ़िलोसॉफ़िकल एरर है। ये न-समझने का परिणाम है, कि शरीर अलग है, जीवात्मा अलग है। फिर बाबाजी लोग बातें करते हैं, डिस-एम्बॉडीड बीइंग्स और इस तरह की जो बातें करते हैं।

डिस-एम्बॉडीड बीइंग का क्या मतलब है?

यही न कि शरीर से हटकर भी कुछ होता है। फिर उसमें सब आ जाता है। उसमें अच्छी शक्तियाँ आ जाती हैं, जो शरीर से हटकर हैं। उसमें बुरी शक्तियाँ, भूत–प्रेत आ जाते हैं, जो शरीर से हटकर हैं। और ये सारी बातें एक फ़िलोसॉफ़िकल मिसअंडरस्टैंडिंग का, या मिस इंटरप्रिटेशन का, या इग्नोरेंस का, अज्ञान का नतीजा है। आप समझ ही नहीं रहे हो। आप जड़ और चेतन का संबंध ही नहीं समझ पाए। आप समझ ही नहीं पाए कि चेतन और जड़ जहाँ भी होंगे, इकट्ठे एक साथ होंगे; और अगर दोनों एक साथ होंगे, तो दृश्य और दृष्टा भी एक हैं।

और ये समझते ही आप इस भ्रम से आज़ाद हो जाते हो कि ये जो दृश्यमान प्रकृति है, इसको भोगकर मुझे किसी भी तरह की संतुष्टि मिल सकती है। क्योंकि वो जो है, वो आप ही हो, वो और आप एक हो। वो शरीर और शरीर के भीतर से “मैं” बोलने वाला, दो अलग–अलग नहीं हैं।

तो इसीलिए जब शरीर जलता है, तो शरीर जो “मैं” वग़ैरह बोल रहा होता है, वो चीज़ भी समाप्त हो जाती है।

न शरीर के भीतर कोई ख़ास बैठा हुआ “मैं” बोलने वाला है, और न ही शरीर के जल जाने के बाद वो “मैं” बोलने वाला कोई ख़ास बचता है। हाँ, वो जो राख है न, जो शरीर जलने के बाद बचती है, वो राख अभी भी जीवित है।

अगर आप कहो, “तो क्या मरने के बाद जीवन समाप्त हो जाता है?” तो उसका एक बड़ा मज़ेदार उत्तर दिया जा सकता है, जो कि बिल्कुल सही होगा, गहरा उत्तर होगा। शरीर मरने के बाद भी जीवन बचा रहता है। कैसे बचा रहता है? वो राख अभी ज़िंदा है। क्योंकि मिट्टी में प्राण होते हैं, क्योंकि जड़ और चेतन एक हैं।

तो कोई बोले कि “मरने के बाद हम कहाँ जाएँगे?” कहीं नहीं जाओगे, तुम राख में ज़िंदा हो अभी। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि निकलकर इधर–उधर घूमोगे।

देखिए, क्लाइमेट चेंज और जीवात्मा का सिद्धांत, ये दोनों बिल्कुल एक बात है। क्लाइमेट चेंज भी यही कहता है कि “मैं दुनिया को भोग लूँगा तो तृप्ति मिल जाएगी।” माने मैं दुनिया से अलग हूँ। क्लाइमेट चेंज भी एक तरह से जीवात्मा के सिद्धांत का ही सबसे बुरा नतीजा है, “मैं अलग हूँ न दुनिया से, तो मैं भोगूँगा। मैं भोगूँगा। मैं चेतन हूँ, दुनिया जड़ है, मैं दुनिया को भोगूँगा।” और ये क्लाइमेट चेंज है, और यही बात जीवात्मा की है कि जीव अलग है और जीव के भीतर एक अलग–सी कोई आत्मा वग़ैरह बैठी हुई है।

तो दुनिया की सारी जो बुराइयाँ हैं, दुनिया में जो सारे दुख हैं, वो इस एक मिस इंटरप्रिटेशन से आते हैं कि बॉडी और ईगो अलग–अलग चीज़ हैं, कि बॉडी में सोल जैसा कुछ होता है।

ये जो सोल है, यही मैनकाइंड की सफ़रिंग है। यही क्लाइमेट चेंज है, यही कंज़्यूमरिज़्म है, यही वायलेंस है, यही टेररिज़्म है। यही सोल ही सारी मुसीबतों की जड़ है। और वास्तविक धर्म वही है जो इस सोल नाम की चीज़ को हटा दे, जो आपको प्रकृति समझा दे कि प्रकृति क्या चीज़ है। दृश्य और दृष्टा को एक साथ प्रकृति जानना है। दृश्य नहीं है प्रकृति, दृश्य और दृष्टा मिलकर जो हैं उसे प्रकृति बोलते हैं।

ये बात अगर लोगों को समझ में आ जाए कि जो हमने सोल और स्पिरिट और जीवात्मा बनाई है, इसी ने दुनिया की बर्बादी कर दी। तो फिर तो मतलब मज़े ही आ जाएँगे। मुक्ति!

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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