मिट्टी जीना चाहती है, मिट्टी में ही प्राण है। और मिट्टी की ही जो जीने की इच्छा है, वो समझ लीजिए कि वृक्ष बनकर या जीव बनकर, प्राणी बनकर खड़ी हो जाती है। ये सोचना सबसे बड़ा अज्ञान है कि “मैं और मिट्टी अलग-अलग हैं।” तो कोई बोले कि “मरने के बाद हम कहाँ जाएँगे?” कहीं नहीं जाओगे, तुम राख में ज़िंदा हो अभी। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि निकलकर इधर-उधर घूमोगे। शरीर से हटकर कोई “जीवात्मा” जैसी चीज़ है: ये फ़िलोसॉफ़िकल एरर है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: ये इतनी पत्तियाँ गिरी हुई हैं, है न? इधर ये पेड़ गिरा हुआ है। यही पेड़ जो है, ये भी जा रहा है मिट्टी में। और इसी मिट्टी से पेड़ फिर से खड़ा हो जा रहा है। क्योंकि इसको (वृक्ष) देखिए, इसकी जड़ उखड़ गई, ये ऐसे लेट गया। लेकिन उसके बाद भी इसने अपनी ऐसे शाखाएँ ऊपर फेंक रखी हैं और ये खड़ा ही हो गया, पूरा गिर जाने के बाद भी। पूरा गिर जाने के बाद भी, ये ऐसे खड़ा हो गया।
मिट्टी जीना चाहती है, मिट्टी में ही प्राण है। समझ रहे हैं न? मिट्टी माने मैटेरियल जो कुछ भी भौतिक है, उसी में प्राण है। वो जीना चाहती है। कुछ इसके भीतर अलग से नहीं आ गया है। जो मिट्टी में है, वही इसमें है। और मिट्टी की ही जो जीने की इच्छा है, वो समझ लीजिए कि वृक्ष बनकर खड़ी हो जाती है या जीव बनकर, प्राणी बनकर खड़ी हो जाती है।
तो जब हम कहते हैं न नेचर, नेचर माने बस वही नहीं है जो दिख रहा है। नेचर माने वो भी है, प्रकृति माने वो भी है जो उसको देख रहा है। तो उसको देखने वाला और वो जो दिखाई दे रहा है, वो दोनों एक-दूसरे से अलग हैं ही नहीं। वो और ये (अपनी ओर इंगित करते हुए) एक हैं। और मिट्टी के भीतर भी ये, जिसको हम ‘चेतन’ बोलते हैं, और वो जिसको हम ‘जड़’ बोलते हैं, दोनों एक-दूसरे में समाए हुए हैं।



