
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, मैं रूपम सिन्हा असम से आया हूँ आपसे मिलने। बहुत ज़्यादा एक्साइटेड हूँ, सर, क्योंकि मुश्किल से आरएससी में मैंने टिकट करके सोचा कि आपसे मिलेंगे। मेरा जो क्वेश्चन था, वो 26 चैप्टर, ट्रुथ विदाउट अपॉलजी से है: “द पनिशमेंट कॉल्ड एंटरटेनमेंट।”
मैंने कुछ चैप्टर्स पढ़े, सर, लेकिन बार-बार ये जो चैप्टर्स हैं, ये मुझे बहुत ज़्यादा रिफ्लेक्ट करते हैं। ऐसा लगता है जैसे ये मुझसे बहुत ज़्यादा कनेक्टेड है। इसमें कहा है, “यू आर लुकिंग फॉर एंटरटेनमेंट बिकॉज़ यू आर डीपली बोर्ड। फाइंड आउट व्हाट इज़ वर्थी ऑफ डिवोटिंग योर एंटायर लाइफ़ टू।” और ऐसा कुछ मिलता ही नहीं है जीवन में और।
जब मैं आपको देखता हूँ तो सर, दिखाई देता है कि जीवन में बहुत से काम करना ज़रूरी हैं, नहीं तो जीवन नरक हो जाएगा।
आचार्य प्रशांत: जीवन में करने के लिए कोई काम नहीं चाहिए। काम माने उन सब कामों को हटाना जो काम कभी होने ही नहीं चाहिए थे, पर हो गए हैं। तो काम भी जो करना है, वो वास्तव में नकार में करना है। ‘बेड़ी’ एक काम है जो नहीं होना चाहिए था, पर हो गया है। हमें बेड़ियाँ डल गई हैं, ये एक काम है जो नहीं होना चाहिए था, पर हो गया है। तो काम करना माने ये नहीं होता कि कोई महल बनाना है, कोई साम्राज्य खड़ा करना है, ये करना है, वो करना है, मिशन चलाना है।
वो भी एक नेगेटिव टर्म है। नेगेटिव मैं किस अर्थ में बोल रहा हूँ, समझ रहे हैं न? नेगेटिव उसकी निंदा के अर्थ में नहीं बोल रहा हूँ, नेगेटिव माने 'नकार,' 'हटाना।' तो बेड़ियाँ एक काम हैं जो हो गया बेहोशी में।
तो जब मैं कहता हूँ कि जीवन में सार्थक काम होना चाहिए, तो आप इसमें किसी धोखे में मत रहिएगा। काम यही है, कि उस काम को हटा दो जो नहीं होना चाहिए था, पर हो गया। काम करके कुछ हासिल नहीं करना है। काम करके जो हासिल कर लिया है, उसको हटाना है। द वर्क इज़ टू डिमोलिश, नॉट टू क्रिएट।
क्रिएशन तो अपने आप हो जाता है जब बेड़ियाँ हट जाती हैं, तब तो सिर्फ़ क्रिएटिविटी ही बचती है। पर जब मैं कहता हूँ कि वर्क ज़रूरी है, तो वर्क से आशय ये मत लगा लेना कि जाकर के कोई बहुत, पता नहीं क्या-क्या होता है, वर्क माने, ये-वो हासिल करना है यहाँ जाकर, ऐसा-वैसा, ये काम, वो काम, बड़ा काम।
गंदगी फैला दी है, उसको समेटना है, ये वर्क है।
ये मैं आपसे आज कह रहा था कि अगर इस दरवाज़े के बाहर गंदगी न हो, तो फिर इस मिशन की भी कोई ज़रूरत नहीं है। तो मिशन कुछ खड़ा करने के लिए नहीं है, मिशन कुछ बनाने या निर्मित करने के लिए नहीं है। मिशन बस साफ़ करने के लिए है। हमने बेड़ियाँ पहन ली हैं, हमने गंदगी फैला दी है। बेड़ियाँ काटने के लिए मिशन है, गंदगी साफ़ करने के लिए मिशन है। तो आप जब कहते हो कि “मुझे ऐसा कोई काम मिल ही नहीं रहा, क्या है वो काम जिसको समर्पित हो पाएँ?” तो उस काम को जानने के लिए तो यही जानना पड़ेगा कि गंदगी हमने कहा, कि हमने ऐसा क्या खड़ा कर दिया जो खड़ा…। बस यही है। अपने आसपास देखो, क्या ऐसा है जो नहीं होना चाहिए। उसको हटाना ही काम है, उसको हटाना ही मिशन है, उसी को जीवन समर्पित कर दो।
प्रश्नकर्ता: उसमें लास्ट में एक था, जैसे 30 दिन लोग इसलिए काम करते हैं क्योंकि उसके बदले में उन्हें कुछ सस्ता मिलता है, जिससे वो भी रिस्क-फ्री लाइफ़ जी सकें। रिस्क-फ्री मतलब रिस्क न उठा सकें। 30 दिन घटिया काम करना पड़ा, इसलिए क्योंकि उसके बदले हमें कुछ मिला, जबकि उस काम में कोई सार्थकता है नहीं।
तो ऐसी क्या मजबूरी आती है, सर, जीवन में जिसके कारण लोग 30 दिन इतना घटिया काम झेल लेते हैं, सिर्फ़ और सिर्फ़ दो पैसों के लिए, थोड़े-से पैसों के लिए।
आचार्य प्रशांत: कुछ भी नहीं। उसके अलावा और कोई समस्या नहीं होती है। आप लोग बार-बार एक ही सवाल पूछोगे और मैं एक ही जवाब दूँगा, पीछे कहीं-न-कहीं आपकी उम्मीद है कि मैंने आपको आज तक जो कहा है, उसके अलावा भी क्या पता कोई उत्तर होता हो। आपकी ये उम्मीद व्यर्थ है, और कोई उत्तर नहीं होता।
हम जितनी मूर्खताएँ करते हैं, वो इसलिए करते हैं क्योंकि हमें पता ही नहीं कि हम क्या कर रहे हैं, न पता क्या कर रहे हैं, न पता हम कौन हैं। तो कर डालते हैं, और करके जो भी करते हैं, वो हमारे लिए बेड़ी बनता है। तो जब जगने लगो तो मैं कहता हूँ, काम करो। और काम क्या है? कि जो रायता फैला दिया है, अब इसको समेटो। बस यही है।
काम माने ये नहीं कि जाकर ताजमहल खड़ा कर रहे हो, वो नहीं करना है। क्या खड़ा कर रहे हो यहाँ पर सब एक बराबर है, ताजमहल भी मिट्टी है। उसको खड़ा करके तुमने कुछ नया नहीं कर दिया। उसमें कुछ ऐसा नहीं है कि तुम विशेष कर दोगे।
फिर कह रहा हूँ, वास्तविक काम हमेशा नकारात्मक होगा। तो इसलिए उसको ढूँढना बहुत आसान है। क्यों आसान है? ऐसे मुंडी घुमाओ और देखो, क्या-क्या हो रहा है जो नहीं होना चाहिए, हाथ में झाड़ू उठाओ, लग जाओ। सूँघो, कहाँ-कहाँ गंदगी फैली हुई है, झाड़ू उठाओ, साफ़ कर दो। यही है काम।
काम माने ये थोड़ी कि पैसे जमा कर लिए बहुत सारे, या कुछ और कर लिया, या मेडल मिल गए। अब मिल जाए मेडल, तो फेंक मत देना, पर मेडल के लिए रुक भी मत जाना। मेडल मिल गया, तो ये नहीं कि मेडल पकड़ लिया और झाड़ू फेंक दिया। कहना, हाँ भाई, डाल दे पीछे से मेडल; झाड़ू तो हम चला ही रहे हैं, डाल ले मेडल भी डाल ले। कोई आ गया तारीफ़ करने, हाँ, तू तारीफ़ करता रह पर तारीफ़ सुनने के लिए हम रुकेंगे नहीं। बाक़ी हम काम कर रहे हैं। तुझे लगता है तेरा यही काम है कि तू तारीफ़ करेगा, तो कर ले।
आसपास अपने देखो, कहाँ कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए। उसी को साफ़ करना, उसी को रोकना वर्क है। और कुछ नहीं होता, काम।
प्रश्नकर्ता: सर, आप जो समेटने की बात कर रहे हो, गंदगी। तो सर माइंड में भी बहुत गंदगी होती है। तो उसकी शुरुआत स्वयं से ही होगी। मतलब शुरुआत हम स्वयं से ही करेंगे, क्योंकि माइंड में भी बहुत गंदगी होती है। तो उसे भी समेटें, तो फिर बाहर हम देखें।
आचार्य प्रशांत: हाँ, तो माइंड में भी जो नहीं होना चाहिए, उसको समेटो, वो भी वर्क है।
प्रश्नकर्ता: मतलब शुरुआत तो, सर, ख़ुद से ही करनी पड़ेगी।
आचार्य प्रशांत: हाँ, शुरुआत ख़ुद से ही करनी पड़ेगी। ख़ुद से नहीं करोगे, तो तुम्हें पता भी कैसे चलेगा कि वो गंदगी है? तुम कहोगे, हीरे-मोती हैं, गंदगी थोड़े ही है।
पिग्गी (सुअर) के लिए कीचड़ क्या है? गंदगी है? पिग्गी के लिए कीचड़ क्या है? लक्ज़री मैट्रेस। है कि नहीं? तो पहले अपना खोपड़ा साफ़ करना पड़ता है, तब समझ में आता है कि ये सब: जिसको हम सफ़ाई, शुद्धि समझ रहे हैं, या रत्न समझ रहे हैं, “वाह-वाह-वाह, हीरे-जवाहरात हैं ये सब।” ये सब तो क्या है? ये तो कचरा है। तो फूल नहीं चढ़ाओ इस पर, झाड़ू उठाओ और साफ़ करो।