बंगाल चुनाव सिर्फ़ सत्ता का संघर्ष नहीं, एक विचारधारा की थकान का भी संकेत हैं। मार्क्सवाद ने मनुष्य को वर्गों में बाँटकर यह मान लिया कि उसकी चेतना जन्म और परिस्थितियों से तय होती है। लेकिन इतिहास बार-बार दिखाता है कि इंसान कठपुतली नहीं है। अगर चेतना सिर्फ़ वर्ग से तय होती, तो स्वयं मार्क्स, विवेकानंद, कबीर या राजा राममोहन राय जैसे लोग अपने ही वर्ग के विरुद्ध खड़े कैसे होते?
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, बंगाल के इलेक्शन अभी खत्म हुए हैं, तो थोड़ा मैं आपका आर्टिकल पढ़ रहा था, जो आपने कोलकाता ट्रिप के बाद लिखा था, पायनियर में “अद्वैतिक क्रिटिक ऑफ़ मार्क्सिज़्म।” तो थोड़ा-बहुत उसके बाद मैं मार्क्सिज़्म, मार्क्स के बारे में थोड़ा पढ़ने लगा। तो एक बात मुझे थोड़ी-सी इंटरेस्टिंग लगी कि मार्क्स कहते थे, कि व्यक्ति की जो सोच है वो उसकी क्लास डिटरमाइन करती है विदाउट एक्सेप्शन। यदि वो वर्कर है तो उसकी सोच जो है वो वर्कर की तरह होगी, और अगर वो बुर्जुआ है या रूलिंग क्लास है तो उसकी सोच रूलिंग क्लास की तरह होगी। तो मैं ये सोच रहा था कि फिर इस फ्रेमवर्क के हिसाब से मार्क्स ख़ुद क्या थे? वो बुर्जुआ थे, प्रोलेटेरियट थे? उन्होंने पूरी थ्योरी लिखी, आपसे मैं थोड़ा समझना चाह रहा था कि एपी फ्रेमवर्क के अनुसार वो कैसे समझे?
आचार्य प्रशांत: देखो, सबसे पहले जो मार्क्सवाद का बहुत साधारण ढाँचा है, उसको सबके सामने रख देते हैं। जो तुमने क्लास की बात करी अभी, तो मोटे तौर पर दो क्लासेज़




