बंगाल चुनाव: मार्क्सवाद क्यों टिक नहीं पाया?

Acharya Prashant

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बंगाल चुनाव: मार्क्सवाद क्यों टिक नहीं पाया?
बंगाल चुनाव सिर्फ़ सत्ता का संघर्ष नहीं, एक विचारधारा की थकान का भी संकेत हैं। मार्क्सवाद ने मनुष्य को वर्गों में बाँटकर यह मान लिया कि उसकी चेतना जन्म और परिस्थितियों से तय होती है। लेकिन इतिहास बार-बार दिखाता है कि इंसान कठपुतली नहीं है। अगर चेतना सिर्फ़ वर्ग से तय होती, तो स्वयं मार्क्स, विवेकानंद, कबीर या राजा राममोहन राय जैसे लोग अपने ही वर्ग के विरुद्ध खड़े कैसे होते? यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, बंगाल के इलेक्शन अभी खत्म हुए हैं, तो थोड़ा मैं आपका आर्टिकल पढ़ रहा था, जो आपने कोलकाता ट्रिप के बाद लिखा था, पायनियर में “अद्वैतिक क्रिटिक ऑफ़ मार्क्सिज़्म।” तो थोड़ा-बहुत उसके बाद मैं मार्क्सिज़्म, मार्क्स के बारे में थोड़ा पढ़ने लगा। तो एक बात मुझे थोड़ी-सी इंटरेस्टिंग लगी कि मार्क्स कहते थे, कि व्यक्ति की जो सोच है वो उसकी क्लास डिटरमाइन करती है विदाउट एक्सेप्शन। यदि वो वर्कर है तो उसकी सोच जो है वो वर्कर की तरह होगी, और अगर वो बुर्जुआ है या रूलिंग क्लास है तो उसकी सोच रूलिंग क्लास की तरह होगी। तो मैं ये सोच रहा था कि फिर इस फ्रेमवर्क के हिसाब से मार्क्स ख़ुद क्या थे? वो बुर्जुआ थे, प्रोलेटेरियट थे? उन्होंने पूरी थ्योरी लिखी, आपसे मैं थोड़ा समझना चाह रहा था कि एपी फ्रेमवर्क के अनुसार वो कैसे समझे?

आचार्य प्रशांत: देखो, सबसे पहले जो मार्क्सवाद का बहुत साधारण ढाँचा है, उसको सबके सामने रख देते हैं। जो तुमने क्लास की बात करी अभी, तो मोटे तौर पर दो क्लासेज़ होती हैं। तो एक वो होती है जिसके पास माल होता है, कौन-सा माल? जिससे और माल तैयार हो सकता है; जैसे पैसा, जैसे फ़ैक्ट्री, जैसे जंगल आदि संसाधन। तो ये वो हो गई जो ओनर्स क्लास है। जो फ़ैक्टर्स ऑफ़ प्रोडक्शन को, माने ऐसे संसाधनों को, जिनसे निर्माण हो सकता है, जिनसे वस्तुओं का, साधनों का, चीज़ों का, गुड्स का निर्माण हो सकता है वो उनके क़ब्ज़े में रहते हैं, वो उनको ओन करते हैं। तो उस क्लास को क्या बोलते हैं?

प्रश्नकर्ता: बुर्जुआ।

आचार्य प्रशांत: बुर्जुआ उस क्लास के एक व्यक्ति को बोलते हैं, उस पूरी क्लास को बोलेंगे बुर्जुआज़ी। बुर्जुआज़ी। और उस क्लास का जो भी होगा, उसको हम कहेंगे, ये बुर्जुआ है, ये बुर्जुआ है। ठीक है?

तो बुर्जुआ माने समझ लो, मोटे तौर पर अमीर आदमी; अमीर आदमी जिसके पास फ़ैक्ट्री, कार, पैसा वग़ैरह, वो हो गया बुर्जुआ। ठीक है? और जो दूसरी क्लास होती है, वर्ग; ये जो वर्ग-संघर्ष है ये मार्क्सवाद के बिल्कुल दिल में है; उसी को केंद्र में रखकर पूरी थ्योरी बनी है। जो दूसरी क्लास होती है, वो क्या कहलाती है? प्रोलेटेरियट। ये वो लोग हैं जो उसकी फ़ैक्ट्री में जाकर के काम करते हैं, ये वो लोग हैं जो उसको जाकर के अपना श्रम बेचते हैं। तो वो जो ऊपर वाली क्लास है बुर्जुआ, बुर्जुआज़ी, वो अपना काम कैसे चलाती है? उसके पास पैसा कहाँ से आता है?

प्रश्नकर्ता: इन्हीं को एक्सप्लॉइट करके।

आचार्य प्रशांत: प्रॉफ़िट से। ठीक है? उसके पास फ़ैक्ट्री है, तो फ़ैक्ट्री का जो प्रॉफ़िट है, वो प्रॉफ़िट किसके पास जाता है? उनके पास, बुर्जुआज़ी के पास जाता है। और ये जो नीचे वाले होते हैं प्रोलेटेरियट, ये अपना काम कैसे चलाते हैं? ये जाकर वहाँ काम करेंगे; इनको पगार मिलती है, वेजेज़ मिलती हैं। तो ये दो वर्ग हो गए। और मार्क्स की पूरी थ्योरी ये है कि इतिहास की पूरी कहानी इन दोनों के वर्ग-संघर्ष से लिखी गई है। हिस्ट्री अनफ़ोल्ड्स थ्रू द इनएविटेबल फ़्रिक्शन बिटवीन दीज़ टू क्लासेज़।

तो मार्क्स ने ये बात कही थी उन्नीसवीं शताब्दी में, और फिर लेनिन वग़ैरह ने इस बात को आगे बढ़ाया बीसवीं शताब्दी में, माने पिछली शताब्दी में। तो मार्क्स ने जब यूरोप में, इंग्लैंड में बहुत कैपिटलिस्टिक एक्सप्लॉइटेशन देखा था तब अपनी ये थ्योरी दी थी एंगेल्स के साथ, और कहा था कि ये जो इनका वर्ग-संघर्ष होगा, इन दोनों क्लासेज़ का, उसका परिणाम ये होगा कि कैपिटलिज़्म तबाह हो जाएगा और दुनिया में क्रांति होगी; और उस क्रांति से एक इगैलिटेरियन स्टेट, एक कम्युनिस्ट स्टेट की स्थापना होगी। हालाँकि, मार्क्सिज़्म और कम्युनिज़्म दो अलग-अलग चीज़ें हैं पर लगभग इशारा इस तरफ़ था।

प्रश्नकर्ता: क्लासलेस सोसाइटी।

आचार्य प्रशांत: एक क्लासलेस सोसाइटी की स्थापना होगी। ठीक है? तो ये मार्क्स ने कहा था।

तो कुल मिलाकर मार्क्स ने कहा गया है। अब बिल्कुल साधारण भाषा में समझते हैं, क्योंकि सवाल तुम्हारा ये है कि मार्क्स ख़ुद कौन है? मार्क्स ने ये कहा है कि जो जिस वर्ग में पैदा हो गया तो बस हो गया। आप अगर हम एक बुर्जुआज़ी परिवार में पैदा हुए हो तो अब आपके पास कोई विकल्प जैसी कोई चीज़ नहीं है, अब आपको अपने वर्ग के अनुसार ही व्यवहार करना पड़ेगा। आपके विचार भी आपके वर्ग के अनुसार होंगे; आपके कपड़े-लत्ते भी; और आपका पूरा ध्यान, आपका पूरा श्रम, आपकी पूरी कोशिश ये रहेगी कि आप जो भी कुछ करो, वो आपके वर्ग के काम आए। और आपकी, और जो प्रोलेटेरियट वर्ग है जिसको आप कहोगे कि वो दुखियों का, दीनों का, सर्वहाराओं का वर्ग है, आपके और इनके बीच में सदा एक तरह की वर्ग-शत्रुता रहेगी। वो आपका दुश्मन ही रहेगा। आप उसके भले की नहीं सोच सकते, क्योंकि आप उस वर्ग के हो ही नहीं।

आप उस वर्ग के हो ही नहीं। तो उसको मान लो मज़दूरों का वर्ग है। अब मोटे तौर पर हम ऐसे कहेंगे, एक सेठों का वर्ग है, धनपतियों का वर्ग है, पढ़े-लिखे लोगों का वर्ग है; किसी भी तरह से जिनके पास कुछ प्रिविलेज़ है, उनका वर्ग है। और एक वर्ग है वो जो कमज़ोर है, सर्वहारा है, गया-गुज़रा है, ग़रीब है, मज़दूर है, किसान है और कम शिक्षित है, ये उनका वर्ग है। ठीक है? ये दो वर्ग हो गए, एक मज़दूर का वर्ग, एक सेठ का वर्ग। और ये कह रहे हैं कि सेठ के वर्ग में जो पैदा होगा, वो सेठ जैसा ही सोचेगा और मज़दूरों से शत्रुता रखेगा। माने कि कॉन्शसनेस इज़ क्लास-डिटरमिन्ड। आप जिस क्लास में पैदा हुए हो, उससे तय हो जाता है कि आपकी कॉन्शसनेस कैसी होगी— ये मार्क्स ने कहा।

अब यहाँ पर तुम्हारा सवाल बड़ा मज़ेदार हो जाता है, कि मार्क्स ख़ुद कौन है? मार्क्स ख़ुद बुर्जुआ हैं, क्योंकि वो किसी मज़दूरी घर में नहीं पैदा हुए थे, लॉयर के घर में पैदा हुए थे, पैसा था। उनकी शादी एक एरिस्टोक्रैटिक फ़ैमिली में हुई थी, रशियन एरिस्टोक्रैटिक फ़ैमिली में हुई थी, राजसी परिवार में तो उनका ब्याह हुआ था। खूब पढ़े-लिखे थे; मज़दूरों जैसे नहीं थे कि अशिक्षित हों; और जैसे मज़दूर अपना श्रम बेचता है, वैसे मार्क्स ने कभी अपना श्रम बेचा नहीं। मार्क्स को उनके गुज़ारे के लिए पैसे किससे मिलते थे? एंगेल्स से। और एंगेल्स की ख़ुद मैनचेस्टर में फ़ैक्ट्री थी।

तो मार्क्स हर दृष्टि से ख़ुद बुर्जुआ हैं। लेकिन मार्क्स ने जो बात करी, वो तो प्रोलेटेरियट के भले की करी। तो मार्क्स ख़ुद इस बात का उदाहरण है कि मार्क्सिज़्म में कुछ गड़बड़ तो है और बड़ी तगड़ी गड़बड़ है। कोई पूछे अगर कि मार्क्सिज़्म फ़ेल कहाँ हुआ उदाहरण दो, तो रूस का या चीन का उदाहरण मत देना; मार्क्सिज़्म फ़ेल कहाँ हुआ? मार्क्स में फ़ेल हुआ। मार्क्सिज़्म के फ़ेल होने का सबसे बड़ा उदाहरण ख़ुद मार्क्स हैं। क्योंकि मार्क्स के अनुसार तो मार्क्स को ख़ुद ही एक शोषक होना चाहिए था, ग़रीबों का ख़ून चूसने वाला एक सेठ होना चाहिए था, क्योंकि वो ख़ुद एक बुर्जुआ पृष्ठभूमि से आ रहे हैं। पर मार्क्स ने ऐसा तो कुछ किया नहीं। बात आई समझ में?

तो वो जो फ़ंडामेंटल असर्शन है मार्क्सिज़्म का, कि कॉन्शसनेस इज़ क्लास-डिटरमिन्ड, वो वहीं पर बिल्कुल एकदम ध्वस्त हो जाता है। अब या तो आप ये मानो कि इसमें मार्क्स अपवाद थे बस। अगर सिर्फ़ मार्क्स अपवाद थे तो हम मार्क्स को क्या भगवान वग़ैरह मान रहे हैं? अगर मार्क्स अपवाद हैं, तो और भी कोई अपवाद हो सकता है। और अगर और भी कोई अपवाद हो सकता है, तो सौ अपवाद हो सकते हैं। सौ अपवाद हो सकते हैं, तो थ्योरी ध्वस्त हो गई, थ्योरी तो ध्वस्त हो गई।

एक ये भी कर सकते हैं कि साहब आप सीधे ही मान लो कि ये जो आपने बोल दिया है कि आदमी की चेतना, आदमी के विचार, आदमी के आग्रह, सब उसकी क्लास से आते हैं, ये आपकी बात ही ग़लत है। हाँ, जो क्लास होती है वो महत्त्वपूर्ण होती है; उसका व्यक्ति पर प्रभाव बहुत पड़ता है, लेकिन वो एकमात्र चीज़ नहीं होती कि जिससे आप व्यक्ति की पूरी कुंडली ही लिख डालें। आपने तो ये बात बिल्कुल डिटरमिनिस्टिक बना दी, कुंडली की तरह फ़ेटलिस्टिक बना दी। आपने कह दिया, जो मज़दूर पैदा हो गया, उसकी मज़दूर की चेतना होगी; और जो सेठ के घर में पैदा हो गया, उसकी सेठ की चेतना होगी। ये तो बात भाग्यवाद की हो गई न, ये तो फ़ेटलिज़्म ही हो गया।

एक और बात हो सकती है, कि अगर हम मार्क्सिज़्म की थ्योरी को सही मानें, तो मार्क्स बुर्जुआ है; तो मार्क्स को जो करना चाहिए वो बुर्जुआ वर्ग के ही स्वार्थ के लिए करना चाहिए, क्योंकि बुर्जुआ से जो भी कोई करेगा वो बुर्जुआ वर्ग के स्वार्थ के लिए ही करेगा। तो फिर मार्क्स ने भी जो थ्योरी दी वो बुर्जुआ वर्ग के स्वार्थों की रक्षा के लिए दी है। ये सब गड़बड़ हो गई, सब गड़बड़ हो गई।

लेकिन इस बात के भी पक्ष में कुछ प्रमाण मिलते हैं, क्योंकि मार्क्स की थ्योरी को भी सबसे ज़्यादा मालूम है अपनाया किसने है? बुर्जुआ ने अपनाया है। मार्क्सिज़्म के सबसे बड़े पैरोकार आपको यूनिवर्सिटीज़ में मिलेंगे, लेखकों में मिलेंगे, कलाकारों में मिलेंगे; किसानों में और मज़दूरों में थोड़ी मिलेंगे। किसान और मज़दूर होते हैं प्रोलेटेरियट, वहाँ आपको मार्क्सवाद का समर्थन बहुत नहीं मिलेगा। वहाँ तो, बल्कि, धर्म के नाम पर आप पाओगे कि लोग चल रहे हैं और देशभक्ति के नाम पर चल रहे हैं; और उनके और बहुत सारे सरोकार होते हैं, उनके और बहुत सारे केंद्र होते हैं, उनके और बहुत सारे मोटिवेटर्स होते हैं।

मार्क्सवाद को बिल्कुल अपना कट्टर दर्शन तो बुर्जुआ वर्ग ने ही बनाया है। तो इससे तो फिर ये साबित होता है कि मार्क्स की भी जो थ्योरी है, वो एक बुर्जुआ थ्योरी है बुर्जुआज़ी के लिए ही।

अब ये तीनों ही बातें अगर हैं, तो इसमें बड़ी गड़बड़ हो जाती है। लेकिन इन तीनों में से कोई भी आप बात लो, कि थ्योरी ग़लत है, या मार्क्स अपवाद है, या मार्क्स ख़ुद बुर्जुआ हैं, इनमें से कोई भी बात लो तो निकल के यही आता है कि साहब, एक फ़ेटलिस्टिक, एक डिटरमिनिस्टिक थ्योरी मत बनाया करो, क्योंकि डिटरमिनिज़्म में बड़े लफ़ड़े हैं।

जब आप कहते हो कि जो-जो बुर्जुआ कॉन्शसनेस है, वो सिर्फ़ बुर्जुआ तरीक़े से ही सोच सकती है, तो फिर तो मार्क्स ख़ुद भी लपेटे में आ गए क्योंकि मार्क्स ही बुर्जुआ है। जो फ़्रायडियन थ्योरी है, वो बोलती है कि साहब, सारे थॉट्स आपकी सबकॉन्शस डिज़ायर्स का रैशनल मैनिफेस्टेशन हैं। और ये जो बोला, ये भी तो एक थॉट है, ये कौन-सी सबकॉन्शस डिज़ायर से आया है।

अगर फ़्रायड बोल गए कि जो तुम्हारे विचार होते हैं, वो तुम्हारे मन के तहख़ाने में जो वासनाएँ छुपी हुई हैं, वही मन के तहख़ाने वाली वासनाएँ विचार बनकर प्रकट हो जाती हैं। तो ये बात भी तो एक विचार है, ये कौन-सी वासना का प्रकटीकरण है, ये भी तो बता दो फिर। तो आप यहाँ भी फँस गए। तो इस तरह की जितनी ये थ्योरीज़ होती हैं न, ये सब फँसा देती हैं।

ईमानदारी की बात ये है कि आप बोलो कि हम पर प्रभाव पड़ता है अपने माहौल का, लेकिन आवश्यक नहीं होता कि हम उस माहौल के अनुसार ही व्यवहार करें। बिल्कुल आवश्यक नहीं होता है।

मालूम है, जब लेनिन ने ये देखा कि ये जितने मज़दूर हैं, ये क्रांति तो कर ही नहीं रहे; इस बात को बोला गया था फ़ॉल्स कॉन्शसनेस। बोला ये गया था कि इन्हें क्रांति करनी चाहिए पर ये क्रांति कर नहीं रहे, क्योंकि इनके दिमाग पर दूसरे नशे चढ़ गए हैं। वो जो था मार्क्स का: “रिलीजन इज़ द ओपियम ऑफ़ द मासेस।” तो क्रांति तो ये कर ही नहीं रहे। तो एक नई धारणा दी गई, इनको एपिसाइकल्स बोलते हैं। ये जो मार्क्सिस्ट थ्योरी है, उसमें लगाए पैचेस हैं ये, कि थ्योरी को एडजस्ट करके, थ्योरी को प्रिज़र्व कर लो, क्योंकि जो एम्पिरिकल एविडेन्स है वो तो थ्योरी के विरुद्ध जा रही है। दिखाई ये दे रहा है कि वो जो मज़दूर वर्ग है, वो क्रांति करने की जगह, वो तो सेठों का यशोगान कर रहा है; वो तो सेठों को अपना आदर्श मान रहा है। तो वो तो कहीं से क्रांति करते दिखाई नहीं दे रहा।

क्रांतियाँ हुई भी जो हैं, वो बहुत ज़्यादा जो इंडस्ट्रियलाइज़्ड देश थे, उनमें नहीं हुईं। जो कम इंडस्ट्रियलाइज़्ड देश थे, वहाँ फिर भी क्रांतियाँ हुईं। अमेरिका में कोई क्रांति नहीं हुई। ठीक है? तो फिर एक कॉन्सेप्ट दिया गया, “द वैनगार्ड इंटेलेक्चुअल” का। कौन? “द वैनगार्ड इंटेलेक्चुअल।” कहा गया कि देखो साहब, ये मज़दूर वग़ैरह इनके तो कुछ है नहीं ज़्यादा बुद्धि-वुद्धि, जो बुर्जुआ है उन्हीं में से कोई निकलेगा, जो अपने वर्ग-हितों की, अपने वर्ग-स्वार्थों की, अपने क्लास-इंटरेस्ट की परवाह छोड़कर के, अपने क्लास को ही छोड़कर के, वो जाएगा इन मज़दूरों के पास, इन प्रोलेटेरियट के पास, और फिर इनकी फ़ॉल्स कॉन्शसनेस हटाकर के इनमें जागृति लाएगा और उन्हें क्रांति के लिए तैयार करेगा।

अब ये तो और ग़ज़ब बात हो गई। अब देखो, आप क्या बोल रहे हो।आप बोल रहे हो, ये दो वर्ग हैं जिनमें क्रांति भी बुर्जुआ वर्ग ही कर सकता है। माने क्रांति करनी प्रोलेटेरियट को है पर वो क्रांति करवाएगा भी कौन? कोई एक अलग वैनगार्ड इंटेलेक्चुअल निकलेगा बुर्जुआ वर्ग से ही और वो जाकर के फिर मज़दूरों में क्रांति कराएगा। और ये वैनगार्ड इंटेलेक्चुअल कौन होगा? जो पढ़ा-लिखा है पर आदर्शवादी है; जो पढ़ा-लिखा है, आदर्शवादी है, पर जिसके मन में स्वार्थ नहीं है बस विद्रोह है और आग है, ये जाएगा और मज़दूरों और किसानों के आगे कहेगा, “चलो, उठो और क्रांति करो।”

और हमें इसके तमाम उदाहरण भी देखने को मिलते हैं। तुम भारतीय जो कम्युनिस्ट पार्टियाँ रही हैं, इनको ही देखोगे, तो इनकी बहुत-सी जो लीडरशिप है वो जो भारतीय समाज का सबसे बड़ा बुर्जुआ वर्ग है ब्राह्मणों का, उसकी रही है। बात समझ में आ रही है? मार्क्स ख़ुद उदाहरण हो गए वैनगार्ड इंटेलेक्चुअल का, लेनिन उदाहरण हो गए। जितने बड़े-बड़े नाम हैं पूरे कम्युनिस्ट इतिहास में, वो सब वैनगार्ड इंटेलेक्चुअल्स के उदाहरण हो गए।

तो ये क्या चल रहा है?

प्रश्नकर्ता: एक तरह से अगर उन्होंने थ्योरी में इंक्लूड कर दी है चीज़, तो एक तरह से वो जस्टिफ़ाई नहीं होगी।

आचार्य प्रशांत: आपने जैसे ही थ्योरी में चीज़ इंक्लूड कर दी, वैसे ही थ्योरी ही ध्वस्त हो गई। वैसे ही थ्योरी ही ध्वस्त हो गई, क्योंकि थ्योरी तो ये बोलती है कि दो वर्ग हैं और दोनों में सतत संघर्ष रहेगा ही रहेगा, और ये जो डायलेक्टिकल फ़्रिक्शन होगा इसी से फिर कोई नई चीज़ निकलती है, जिससे फिर इतिहास समय के साथ आगे बढ़ता रहता है, थ्योरी तो ये बोलती है। पर जब आपने ये बोल दिया कि ये दो वर्ग ऐसे हैं, जिसमें दूसरे वर्ग का नेतृत्व करने के लिए जो विपक्षी, विरोधी, दुश्मन वर्ग है, वहाँ से कोई निकल के आएगा और फिर मज़दूरों का नेतृत्व करेगा, तो ये तो आपने तो थ्योरी के ही परखच्चे उड़ा दिए न।

इससे कहीं बेहतर है कि आप ये बोल दो कि, साहब, मार्क्स ने बिल्कुल सही बोला था, व्यक्ति जिस माहौल में पैदा होता है, परवरिश पाता है, शिक्षा पाता है, मूल्य और संस्कार पाता है उसका उस पर प्रभाव पड़ता है। लेकिन प्रभाव पड़ता है, वो बात कोई आख़िरी नहीं हो जाती। इसीलिए मैं आपसे बोला करता हूँ, आख़िरी चीज़ नियत होती है। कोई भी थ्योरी जो एब्सोल्यूट हो जाएगी, वो फँस जाएगी। कोई भी थ्योरी जो कहेगी कि x से हमेशा y निकलता है, उसको फिर ये भी बताना पड़ेगा कि ये थ्योरी कहाँ से आ गई? वो जो थ्योरी दे रहा है, वो फिर किस वर्ग का है? क्योंकि थ्योरी देने वाला भी तो कोई है न। वो फिर किस वर्ग का है? वो फिर सारी डिटरमिनिस्टिक थ्योरीज़ फ़ेल करेंगी ही करेंगी।

इसीलिए आपको जो फ़्रेमवर्क दिया है, ए.पी. फ़्रेमवर्क वो डिटरमिनिस्टिक नहीं है। वो आकर आपकी नियत पर रुक जाता है। वो आपसे कहता है, कुछ पक्का नहीं है; तुम तय करोगे क्या होगा।

मार्क्स की थ्योरी आपको एक तरह से मजबूर बनाती है। वो कहती है, अगर तुम बुर्जुआ हो, तो तुम बुर्जुआ रहोगे; और तुम अगर प्रोलेटेरियट हो, तो तुम प्रोलेटेरियट रहोगे। ये मजबूरी गड़बड़ बात है। इसमें मनुष्य की चेतना के लिए कोई जगह नहीं है। और इसीलिए मार्क्सिज़्म को विफल होना पड़ा।

प्रश्नकर्ता: और भी हम अगर उदाहरण देखें, राजा राममोहन राय जी का उदाहरण है। वो भी एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे।

आचार्य प्रशांत: ये अकेला उदाहरण नहीं है। तुम ब्राह्मणों की बात, अभी मैंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों की बात करी थी। होना तो ये चाहिए कि अगर कोई ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ है, तो वो सारे काम करे जो-जो ब्राह्मण वर्ग की प्रभुसत्ता को आगे बढ़ाते हैं। राजा राममोहन राय क्या कर रहे हैं? बंगाली ब्राह्मण हैं, कुलीन ब्राह्मण हैं, सती के ख़िलाफ़ खड़े हैं, बाल-विवाह के ख़िलाफ़ खड़े हैं, जाति-प्रथा के ख़िलाफ़ खड़े हैं; यहाँ तक कि मूर्ति-पूजा के ख़िलाफ़ खड़े हुए हैं। ये क्या है? ये तो उन्होंने अपने वर्ग के पूरे ढाँचे को ही ध्वस्त कर दिया। मार्क्स क्या बोलेंगे इस पर? मार्क्स की तो पूरी थ्योरी राजा राममोहन राय के आगे एकदम ख़त्म हो जाती है।

राजा राममोहन राय ब्राह्मण होते हुए भी अपने वर्ग को छोड़ के दूसरे वर्गों के लिए काम कर रहे हैं। और यही बात अगर आप ब्राह्मणों में लोगे तो तिलक पर भी लागू होती है, गोखले पर भी लागू होती है, आगरकर पर भी लागू होती है, रानाडे पर भी लागू होती है। बहुत सारे जो बड़े समाज-सुधारक रहे हैं, जिन्होंने जो ब्राह्मणवादी वर्चस्व था, उसको चुनौती दी है और कुरीतियों को चुनौती दी है, वो सब ब्राह्मण ही थे।

प्रश्नकर्ता: स्वामी विवेकानंद भी।

आचार्य प्रशांत: विवेकानंद की बात कर सकते हो। ब्राह्मणों में स्वामी दयानंद सरस्वती, जिन्होंने जो पूरा कर्मकांड था, उसके ख़िलाफ़ शंखनाद कर दिया। और ब्राह्मणों ने, जो पारंपरिक ब्राह्मण थे उन्होंने इस बात को बिल्कुल पसंद नहीं किया था।

तो अब मार्क्स क्या बोलेंगे इस पर? मार्क्स के अनुसार तो जो जिस वर्ग का है, वो उसी वर्ग के अनुसार व्यवहार करेगा। पर यहाँ तो वर्ग को तोड़ा जा रहा है, बाहर निक ला जा रहा है।

क्योंकि मनुष्य चैतन्य है और अहंकार के पास चुनाव की शक्ति है। बात नियत की है कि तुम क्या चुनते हो, बात नियत की है।

स्वामी विवेकानंद पढ़े-लिखे हैं, तो बुर्जुआ होंगे कि प्रोलेटेरियट होंगे? बुर्जुआ ही तो होंगे। स्वामी विवेकानंद दलित वर्ग से नहीं आ रहे हैं, अछूत वर्ग से नहीं आ रहे हैं; वो तो कायस्थ हैं और पढ़े-लिखे हैं, और वो दिखने में भी सुडौल हैं बढ़िया हैं, अपना अच्छा है। तो वो काहे के लिए फिर जाकर के जाति-प्रथा के विरुद्ध बोल रहे हैं, और तमाम जो सवर्ण लोगों की प्रिविलेज़ थीं, उनके ख़िलाफ़ बोल रहे हैं? क्यों बोल रहे हैं? उन्होंने भी जो मार्क्सिस्ट थ्योरी है, उसका उल्लंघन कर दिया। वो ख़ुद जीते-जागते साक्षात प्रमाण हैं कि मार्क्सिस्ट थ्योरी गड़बड़ है।

और यही वजह है कि अभी जब बंगाल में अभी चुनाव-परिणाम आएँगे तो कौन हारेगा, कौन जीतेगा राम जाने; लेकिन ये पक्का है कि मार्क्सवादियों को कुछ नहीं मिलने वाला। जी, क्योंकि आपकी थ्योरी में ही कुछ गड़बड़ है। और आप उस गड़बड़ को स्वीकारने की ईमानदारी भी नहीं दिखा रहे हो; बल्कि आप उस पर पैबंद लगा रहे हो, आप उस पर पैचेस लगा रहे हो, आप उसके एपिसाइक्लिक जस्टिफ़िकेशन एक के बाद एक तैयार कर रहे हो, उसमें कुछ फ़ायदा नहीं होता। वो डिसऑनेस्टी है।

प्रश्नकर्ता: या तो मार्क्सिज़्म के नाम पर कुछ और, जैसे आजकल के सो-कॉल्ड मार्क्सिस्ट कंट्रीज़ हैं, रशिया हो गई, चाइना हो गई, नॉर्थ कोरिया; नॉर्थ कोरिया का तो एग्ज़ाम्पल थोड़ा अलग….

आचार्य प्रशांत: देखो, समझो एक बात को। एनी थ्योरी दैट डज़ नॉट लुक एट द थ्योराइज़र इज़ बाउंड टू बी होलो। जैसे रैशनलिज़्म है, रैशनलिज़्म क्या बोलता है? मैं हर चीज़ के प्रति इन्क्वायरी रखूँगा ख़ुद को छोड़ के। मैं हर चीज़ को इन्क्वायर करूँगा कि क्या चल रहा है; बस मैं ख़ुद को नहीं देखूँगा कि मेरी नियत क्या है, उसको नहीं देखूँगा।

कोई भी थ्योरी जो थ्योरी देने वाले को अपने एंबिट से बाहर कर देती है, वो थ्योरी देने वाले को भगवान बना देती है; वो थ्योरी देने वाले को अपवाद बना देती है ग्लोरियस एक्सेप्शन बना देती है, और हो गई गड़बड़।

बात आ रही है ना समझ में?

प्रश्नकर्ता: तो ये सिर्फ़ लॉजिकल फ़ैलसी ही है या?

आचार्य प्रशांत: नहीं-नहीं, साइकोलॉजिकल है, नॉट लॉजिकल, साइकोलॉजिकल। आप अहंकार को समझने से इंकार कर रहे हो। आप मनुष्य की चेतना में चुनाव का जो अधिकार और ज़िम्मेदारी निहित है, आप उससे ही इंकार कर दे रहे हो। हमारे पास सबसे बड़ा अधिकार है कि हम चुन सकते हैं, मैं अपनी चेतना चुन सकता हूँ। मेरी चेतना मेरी क्लास से नहीं तय होगी। हाँ, क्लास मुझ पर प्रभाव डालती है मैं बिल्कुल स्वीकार करता हूँ। क्लास का मुझ पर बड़ा प्रभाव पड़ता है, लेकिन फिर भी मेरे पास चुनने की ताक़त है। मैं चुन सकता हूँ।

तो ये बात एक साइकोलॉजिकल एरर है कि जैसे मनुष्य कठपुतली हो कि जहाँ पैदा हो गया उसी अनुसार व्यवहार करेगा। मनुष्य कठपुतली नहीं है। सब वर्ग अपने-अपने वर्गों के हितों के, स्वार्थों के विरुद्ध भी व्यवहार करते आए हैं। अब आप जिनको प्रोलिटेरियट वर्ग बोलते हो, कबीर साहब, रैदास साहब, ये लोग सब कहाँ से आएँगे? ये क्या बुर्ज़ुआ वर्ग से थे? लोअर क्लासेस से, लेकिन इन्होंने जिस साहित्य की रचना की वो यूनिवर्सिटीज़ में पढ़ाया जाता है। तो ये तो फिर मामला बुर्ज़ुआ हो गया। मार्क्स फिर यहाँ पर ध्वस्त हो गए।

कि एक वहाँ पर अशिक्षित कोई चर्मकार है, कोई वहाँ पर जुलाहा है, कोई साधारण दुकानदार है, ये सब जो भक्तिधारा थे ये उसके संत-कवि थे ये लोग; और इन्होंने जो साहित्य रचा, आगे चलकर यूनिवर्सिटीज़ में लोग उस पर पीएचडी कर रहे हैं। तो ये तो फिर से धोबी-पाट हो गया।

प्रश्नकर्ता: तो कोई परफेक्ट थ्योरी फिर एक तरह से हो ही नहीं सकती है।

आचार्य प्रशांत: परफेक्ट थ्योरी ये बोलेगी, कि “बेटा, सब तुम्हारे ऊपर है, बात नियत की है।” परफेक्ट थ्योरी कभी नहीं बोलेगी कि “इफ़ X, देन Y,” डिटरमिनिस्टिक नहीं होगी, कभी डिटरमिनिस्टिक नहीं होगी। वो तुम्हारे हाथ में ताक़त छोड़ देगी। कोई थ्योरी जो तुम्हारे हाथ में ताक़त ही नहीं छोड़ रही, उसने क्या किया? उसने थ्योरी देने वाले को भगवान बना दिया। उसने कह दिया, “साहब, ये अनुपम चटर्जी है, ये ब्राह्मण है, तो अब ये बिल्कुल ब्राह्मणवाद ही करेगा पूरी ज़िंदगी, और ये सब बाक़ी वर्णों का और जातियों का और शूद्रों का शोषण ही करेगा।”

उसने तुमको कठपुतली बना दिया, उसने तुम्हारी ताक़त छीन ली। तो फिर जो थ्योरी देने वाला है, ये ख़ुद शोषक बन गया। सबसे बड़ा बुर्ज़ुआ वो हो गया जो थ्योरी दे रहा है, क्योंकि बुर्ज़ुआ अगर वो है जो एक्सप्लॉइट करता है, तो सबसे बड़ा एक्सप्लॉइटेशन तो थ्योरी देने वाले ने कर दिया। इस थ्योरी देने वाले ने बुर्ज़ुआ और प्रोलिटेरियट दोनों का एक्सप्लॉइटेशन कर दिया, क्योंकि उसने दोनों को ही रोल्स में कन्फ़ाइन कर दिया।

इससे बड़ा एक्सप्लॉइटेशन किसी का क्या हो सकता है, कि मैं बुर्ज़ुआ से कहूँ कि अब तू बुर्ज़ुआ रोल में ही सीमित रहेगा, लिमिटेड रहेगा, कन्फ़ाइन्ड रहेगा; और तू प्रोलिटेरियट है, तो तू प्रोलिटेरियट रोल में ही सीमित रहेगा, कन्फ़ाइन्ड रहेगा। ये तो मैंने एक साथ दोनों का ही एक्सप्लॉइटेशन कर दिया। तो ये जो थ्योरी देने वाला हुआ, ये तो मास्टर एक्सप्लॉइटर हो गया। कोई भी ऐसी थ्योरी जो इंसान को डिटरमिनिज़्म में क़ैद कर देती हो, बड़ी ख़तरनाक है, उसे नहीं मानना चाहिए। आख़िरी बात हमारी आज़ादी है, जिसने तुम्हें एक डिटरमिनिज़्म दे दिया, उसने तुम्हारी आज़ादी छीन ली। उसने तुम्हारा बनने और बिगड़ने का हक़ छीन लिया।

अब तुम क्या क्रांति करोगे? तुम जो क्रांति करोगे, वो तुम्हारे अपने सीमित दायरे के भीतर की क्रांति होगी, फिर तुम क्रांति कर ही नहीं सकते। और जो दूसरा वर्ग होगा, उससे कहा जाएगा “क्रांति तो तुम्हें करनी पड़ेगी, क्योंकि दैट इज़ योर क्लास परफ़ॉर्मेंस, दैट इज़ योर क्लास रिस्पॉन्सिबिलिटी।” तो वो क्रांति भी अगर होती है, तो क्रांति नहीं है वो तो ड्यूटी हो गई। क्योंकि, साहब, मैं कौन हूँ? मैं मज़दूर वर्ग से हूँ, और मार्क्स के अनुसार क्रांति करना तो मेरी ज़िम्मेदारी है। तो अब मैं क्रांति थोड़ी कर रहा हूँ, मैं तो ज़िम्मेदारी निभा रहा हूँ। वो क्रांति भी नहीं है, वो डिटरमिनिस्टिक क्रांति है, तो वो कोई क्रांति भी नहीं हुई।

तो कोई भी ऐसी थ्योरी जो बोले कि “इफ़ X, देन Y” उसे अस्वीकार कर देनी चाहिए, क्योंकि वो इंसान की आज़ादी छीन रही है, वो इंसान की चेतना छीन रही है, वो इंसान का चुनने का हक़ छीन रही है। सही थ्योरी वो होगी जो कहेगी, “बेटा, सब कुछ तुम्हारे ऊपर है।” सब कुछ तुम्हारे बाहर की दुनिया तुम्हारे हाथ में नहीं है। बिल्कुल मार्क्स ने ठीक कहा था, बाहर की दुनिया विविध कारणों से चलती है, और हमें नहीं पता। बाहर की दुनिया से तुम पर हर तरह के प्रभाव पड़ सकते हैं तुम्हारे हाथ में नहीं होते। बिल्कुल ठीक कहा था मार्क्स ने। लेकिन मार्क्स ने भीतर की दुनिया को तो देखा ही नहीं, मार्क्स ने भीतर की दुनिया को तो मान्यता ही नहीं दी।

मैं तुमसे कह रहा हूँ, भीतर की दुनिया तुम्हारे हाथ में होती है। वहाँ तुम चुनोगे। बाहर से तुम हो सकता है ब्राह्मण पैदा हुए हो, कि मज़दूर पैदा हुए हो, कि कुछ पैदा हुए हो, धन्ना सेठ पैदा हुए हो, वो तुम्हारे हाथ में नहीं था। काले-गोरे पैदा हुए, स्त्री-पुरुष पैदा हुए, तुम्हारे हाथ में नहीं था। लेकिन तुम्हारे भीतर क्या होता है वो डिटरमिनिस्टिक नहीं है। वो मार्क्स नहीं तय करेंगे, वो कोई थ्योरी नहीं तय करेगी, वो ज्योतिष नहीं तय करेगा, वो जाति नहीं तय करेगी, वो कुंडली नहीं तय करेगी, वो पैसा नहीं तय करेगा, वो तुम तय करोगे। वो तुम तय करोगे, सब तुम्हारे ऊपर है, तुम्हारी नियत का खेल है।ये बात मैं तुमसे कहा करता हूँ। यही बात तुम फ्रेमवर्क में पाते हो।

आचार्य प्रशांत: *थ्योरीज़ में एक चीज़ और मैं देखता हूँ कि जब इस तरह की त्रुटियाँ या कोई पॉलिसी आती है, तो थ्योरी को लोग डिस्मेंटल नहीं करना चाहते इमीडिएटली। इन फ़ैक्ट, इतना कुछ होने के बाद भी, मार्क्सिज़्म के इंटरनल एग्ज़ाम्पल्स, एक्सटर्नल एग्ज़ाम्पल्स फ़ेलियर के होने के बाद भी कंटिन्यू कर रही है किसी तरह से। तो ये क्यों है? क्योंकि तुमने उस थ्योरी के साथ अपना स्वार्थ जोड़ लिया है।

अब तुम उस थ्योरी पर जो पैचेस लगा रहे हो, पैबंद लगा रहे हो, जो उसको एपिसाइक्लिक डिफ़ेन्सेस दे रहे हो वो उस थ्योरी को और एब्सर्ड बनाते जा रहे हैं। लेकिन फिर भी तुम लगे हुए हो सिद्ध करने में कि “थ्योरी तो सही है, साहब। थ्योरी तो सही है, साहब।”

इससे बस यही पता चलता है कि अहंकार की जब नियत ख़राब हो, तो सच सामने भी खड़ा हो, तो उसे नज़र नहीं आता है। “जब काम-भाव भरा हो आँख में, तो सच नज़र नहीं आता।” इसको आप ये बोलो, जब थ्योरी भरी हो आँख में, तो सच नज़र नहीं आता है। जिसकी भी आँख में एक बार थ्योरी भर गई, उसके सामने तुम कितनी भी इम्पिरिकल एविडेन्स खड़ी कर दो, वो कहेगा “ये एविडेन्स नहीं है ये एबर्रेशन है। ये प्रमाण नहीं है ये अपवाद है।” वो मानेगा नहीं, कहेगा, “अच्छा, ये कभी-कभी हो जाता है, यू नो। टू एक्सप्लेन दीज़ थिंग्स, वी कैन हैव सेपरेट ब्रांचेस ऑफ द थ्योरी। टू एक्सप्लेन दीज़ थिंग्स, वी कैन रेफ़र टू द अपेंडिक्स नाउ।”

प्रश्नकर्ता: कोई अगर ये कहे कि एक तरह से एपी फ़्रेमवर्क सारा जो बर्डन है वो नियत पर ही छोड़ देती है, तो बाहरी कंडीशन्स को बिल्कुल भी कन्सिडर नहीं करती।

आचार्य प्रशांत: नहीं, ऐसा नहीं है, बिल्कुल करती है। बाहरी कंडीशन नहीं होती, तो तुम-मैं कहाँ से आते? ये तुम्हारी शर्ट भी बाहरी कंडीशन से बनी है। तुम्हारी नाक भी बाहरी कंडीशन से बनी है। मेरी ये मांस की आँख भी बाहरी कंडीशन से बनी है। ये शरीर ही बाहरी कंडीशन से बना है। इतना ही नहीं, वो जो ईगो है जो एपी फ़्रेमवर्क के केंद्र में बैठी हुई है, वो ईगो भी शरीर द्वारा निर्मित है। उसकी बर्थ तो बायोलॉजिकल ही है न। तो उसकी बर्थ भी बाहरी कंडीशन से है, द ईगो इज़ नॉट बॉर्न फ़्रॉम इटसेल्फ। द ईगो इज़ बॉर्न फ़्रॉम समथिंग आउटसाइड ऑफ इटसेल्फ, कॉल्ड द बॉडी।

तो बाहरी कंडीशन्स तो निस्संदेह प्रभाव रखती हैं, लेकिन हम कह रहे हैं वो सबसे बड़ा प्रभाव रखेंगी कि नहीं, ये तुम जानो। बाहरी

कंडीशन्स बड़ी बात होती है, पर उससे बड़ी बात होता है तुम्हारा संकल्प, तुम्हारा प्रेम। प्रेम किसी भी प्रभाव पर, किसी भी प्रक्रिया पर भारी पड़ेगा, मैं ये कह रहा हूँ। तुम तय कर लो, तो तुम्हारे भीतर तो वही होगा जो तुमने चाहा है।

हाँ, बाहर की चीज़ें तुम नहीं बदल सकते या बदल सकते हो, वो अनिश्चित है।

प्रश्नकर्ता: किसी भी तरह की पॉलिटिकल आइडियोलॉजी इस पर आप, और भी दूसरी आइडियोलॉजी इस पर भी आप बोल चुके हैं। तो जो भी आजकल चल रहा है चुनाव, ये आइडियोलॉजी फ़ाइट।

आचार्य प्रशांत: जहाँ कहीं भी उदाहरण के लिए कहा गया, “अब तुम मुसलमान के घर में पैदा हुए हो, तो तुम्हें ऐसा करना ही पड़ेगा।” ठुकरा दो इस थ्योरी को, इस आइडियोलॉजी को। “तुम हिंदू के घर में पैदा हुए हो, तो तुम्हें ऐसा करना ही पड़ेगा” ठुकरा दो। ये सब तुमसे क्या छीन रहे हैं, तुम सोचो। मार्क्सवाद की तरह ये सारी मान्यताएँ, ये सारी आइडियोलॉजी, विचारधाराएँ तुमसे क्या छीन रही हैं? तुम्हारी स्वतंत्रता छीन रही हैं। तुमसे तुम्हारे चुनाव का हक़ छीन रही हैं। वो तुमसे कह रहे हैं, “तुम हिंदू हो, तुम सिख हो, तुम मुस्लिम हो, तो तुम्हें अब ऐसे ही जीना है और ऐसे ही व्यवहार करना है।” क्यों करना है? “तुम स्त्री हो, तो तुम्हें अब इन्हीं तरह, इन्हीं आदर्शों पर चलना पड़ेगा।” क्यों चलना पड़ेगा?

इस तरह की जो भी मान्यताएँ तुम्हारे सामने आएँ, ठुकरा दो। देखो कि मान्यताओं के नाम पर बंधन लादे जा रहे हैं तुम्हारे ऊपर।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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