जीडीपी बढ़ी, क्या जीवन सुधरा?

Acharya Prashant

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जीडीपी बढ़ी, क्या जीवन सुधरा?
टोटल जीडीपी हमारा इसलिए हाई नहीं है कि भारत अमीर हो गया है। वह इसलिए हाई है क्योंकि यहाँ जनसंख्या बहुत है और मुट्ठी भर लोग हैं, जिनके पास अंधाधुंध दौलत है। पॉल्यूशन और पॉपुलेशन, इनका चोली-दामन का साथ है। तुम्हें बहुत कम जगह मिलेंगी जहाँ पॉपुलेशन नहीं है, पर पॉल्यूशन है। इतने लोग हो जाएँगे, कैसे उनको गरिमा की ज़िंदगी मिल सकती है? न हमें वह ग़रीबी चाहिए, जिसमें एक ऐसे 8×8 के क्षेत्र में चार लोग रह रहे हों। न वह अमीरी चाहिए कि एक आदमी कार में चल रहा है और दुनिया भर पर धुआँ छोड़ता हुआ चल रहा है। सस्टेनेबिलिटी चाहिए। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। हाल ही में रिपोर्ट्स के अनुसार, मतलब जापान को पीछे छोड़कर, भारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है दुनिया की। और दूसरी ओर हम देखते हैं इंदौर शहर, जो कि भारत का सबसे स्वच्छ शहर माना जाता है। वहाँ पर हाल ही में एक घटना हुई है, जहाँ दूषित पानी पीकर कई लोगों की मृत्यु हो गई। उसमें पाँच महीने तक के बच्चे भी शामिल थे।

अब यह सुनकर बहुत बुरा लगता है, क्योंकि वह मेरा शहर है। मैं हमेशा से रह रहा हूँ वहाँ पर। यह विरोधाभास हमें क्यों दिखता है कि हमारी गति बढ़ती जा रही है, प्रगति बढ़ रही है, और दूसरी ओर हमारे शहरों की यह हालत है?

आचार्य प्रशांत: देखिए, एक देश के तौर पर हमारा जो कुल उत्पाद है, जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद), वह दुनिया में बढ़ता जाए यह अच्छी बात है आँकड़ों के तौर पर। पर हमें याद रखना होगा कि वह इसलिए है क्योंकि हम 150 करोड़ लोग हैं। अगर भारत का जीडीपी दुनिया में आज चौथे नंबर पर है, तो उसका कारण जनसंख्या है।

जीडीपी क्या होता है? पर कैपिटा इनकम × पॉपुलेशन। दो चीज़ों को गुणा कर दें आप, तो जीडीपी आता है। पर कैपिटा ले लीजिए, प्रति व्यक्ति आय, और उसको आपने किससे गुणा कर दिया? कि कितने लोग हैं, कितने व्यक्ति हैं, जनसंख्या। इन दोनों में जिसका ज़्यादा योगदान है हमारे जीडीपी में, वह जनसंख्या है। हमारी जो प्रति व्यक्ति आय है, वह दुनिया में अभी भी हमको मिडिल इनकम में भी नहीं लाकर रखती, हम मिडिल इनकम से भी अभी ज़रा नीचे हैं, प्रति व्यक्ति आय के संदर्भ में।

और एक बात उसमें और भी है कि जीडीपी माने एक एग्रीगेट, माने एक योग, टोटल, जिसको बहुत बढ़ा देता है उन लोगों का योगदान जो जनसंख्या के शीर्ष 1% में हैं। जो जनसंख्या के शीर्ष 1% में हैं, उनका योगदान कुल जीडीपी को भी बहुत बढ़ा देता है, और जो पर कैपिटा जीडीपी है, उसको भी बढ़ा देता है।

तो भारत में न सिर्फ़ प्रति व्यक्ति आय कम है, बल्कि वह और ज़्यादा कम है, जब आप इनकम इनइक्वैलिटी को भी ले आओ। पहली बात तो आम आदमी की आय कम है, जो कि छुप जाती है टोटल जीडीपी के आँकडे के पीछे। आप टोटल जीडीपी का आँकड़ा ले लेते हैं, जो कि अच्छी बात है, लेकिन उसके पीछे जो प्रति व्यक्ति आय है, वह कितनी ज़्यादा कम है, यह बात छुप जाती है। और उसमें जब आप यह शामिल कर लें कि उतनी भी पर कैपिटा इनकम में भी वो लोग भी शामिल हैं जो बेहद अमीर हैं, उनको अगर आप निकाल दें, तो जो प्रति व्यक्ति आय बचेगी वह तो बहुत ही कम है। आप बात समझ रहे हो?

दो-दो बातें हैं। पहली बात तो पर कैपिटा इनकम कम है। दूसरी बात, वो जितनी है भी, वह उतनी उन लोगों के कारण है जो एक्सेप्शनली रिच हैं। और इनकम इनइक्वैलिटी में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में आता है। यहाँ मुट्ठी भर लोग हैं जो बहुत अमीर हैं, और बाक़ी सब एक लॉन्ग टेल ऑफ़ पॉवर्टी है। ठीक है?

तो इन दोनों मुद्दों को आपस में मिश्रित करने की कोई ज़रूरत नहीं है, कि “यूँ तो हम बहुत अमीर लोग हैं, हम दुनिया में चौथे नंबर पर आते हैं, पर फिर भी मेरा इंदौर इतना प्रदूषित क्यों है?” क्योंकि ये दो मुद्दे अलग-अलग हैं। टोटल जीडीपी हमारा इसलिए नहीं हाई है कि भारत अमीर हो गया है। वह इसलिए हाई है क्योंकि पहली बात, यहाँ जनसंख्या बहुत है। दूसरी बात, मुट्ठी भर लोग हैं जिनके पास अंधाधुंध दौलत है। उनकी वजह से, जीडीपी का जब आप टोटल करते हो, तो लगता है कि काफ़ी ज़्यादा हो गया है।

ग़रीबी और प्रदूषण साथ-साथ चलते हैं। कारण सीधा है, ग़रीब आदमी को अपनी रोज़ी रोटी से आगे कुछ दिखाई नहीं देता। तो वह प्रदूषण करने को भी तैयार होता है और प्रदूषण पीने को भी तैयार होता है। आपको बताया जाए, क्लीन एनर्जी मिल रही है पर थोड़ी महँगी है; और डर्टी एनर्जी मिल रही है पर थोड़ी सस्ती है, और आप अगर ग़रीब हैं, तो आप डर्टी एनर्जी ले लोगे। ग़रीब आदमी प्रदूषण करने को जल्दी तैयार हो जाता है। यद्यपि दुनिया में जो प्रदूषण है, उसकी ज़िम्मेदारी ग़रीबों की नहीं है। कुल मिलाकर के दुनिया का भी जो प्रदूषण है, वह अमीरों का ही फैलाया हुआ है।

लेकिन अमीर फैलाता भले ही है प्रदूषण, लेकिन बर्दाश्त नहीं करता। वह फैला लेगा प्रदूषण, वह हवा गंदी कर देगा, पर वह अपने लिए सबसे एडवांस्ड, कटिंग-एज टेक्नोलॉजी का फ़िल्टर होगा, एयर प्यूरिफ़ायर, वो लगवा लेगा। ग़रीब प्रदूषण फैला भी लेगा और झेले भी लेगा, खा लेगा, पी लेगा, क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है।

एक नाला बह रहा होगा नोएडा जैसे किसी शहर में, और नाले के बगल में वहाँ ठेला लगा होगा जो ₹20 की थाली दे रहा होगा, या ₹20 के छोले-कुलचे दे रहा होगा। और वहाँ जितनी फ़ैक्ट्रियाँ होंगी, उनके बेचारे सब ग़रीब मज़दूर, जो ₹10,000-₹15,000 वहाँ पर कमा रहे हैं, वो आकर वहीं पर खड़े होकर खा रहे होंगे। यह ऑटो-रिक्शा चलाने वाले या ठेला चलाने वाले, ये सब वहीं आकर खा रहे होंगे। वो और क्या करेंगे, उनको पता है कि पीछे नाला बह रहा है, और वो वहीं पर खड़े होकर खाएँगे और रोज़ खाते हैं वहाँ पर। ग़रीब आदमी प्रदूषण झेल जाता है, उसके पास कोई विकल्प नहीं है, वह क्या करे? आई बात समझ में?

तो इन दो मुद्दों को मिलाया मत करो। एक मुद्दे में हमारा अभिमान बढ़ता है कि हम दुनिया की इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं। पर, भाई, देखो राष्ट्र के पास पैसे नहीं होते, क्योंकि राष्ट्र कोई व्यक्ति नहीं है। अमीर या ग़रीब वास्तव में इंसान होता है; तो इंसान के तल पर, व्यक्ति के तल पर आकर बात करनी चाहिए कि प्रति व्यक्ति आय कितनी है।

दुनिया के अमीर देशों में आता है स्विट्ज़रलैंड, बहुत अमीर देशों में है वो, पर उनकी कोई आबादी नहीं है, तो आप उनका अगर टोटल जीडीपी देखेंगे तो बहुत नीचे आएँगे; पर वो बहुत अमीर देश हैं। वैसे ही ये जो स्कैंडिनेवियन देश हैं, नॉर्वे वग़ैरह, इनमें कोई आबादी नहीं है पर ये बहुत अमीर हैं। तो आप इनका टोटल जीडीपी देखोगे, तो आप कहोगे, “अरे, इस पूरे देश का टोटल जीडीपी तो मुंबई से भी कम है।” हमारी मुंबई शहर का जो जीडीपी है, वह इनके टोटल जीडीपी; ऐसे कई आपको यूरोप में अमीर देश मिल जाएँगे, जो बेइंतहा अमीर हैं, पर उनका टोटल जीडीपी मुंबई से कम मिलेगा आपको, क्योंकि वो आबादी में छोटे हैं।

तो टोटल जीडीपी बहुत मिसलीडिंग, बहुत भ्रामक आँकड़ा होता है। पर कैपिटा देखना होता है, वहाँ होती है असली गड़बड़। आ रही है बात समझ में?

इतने लोग हो जाएँगे, कैसे उनको गरिमा की ज़िंदगी मिल सकती है? कैसे? पृथ्वी पर साफ़ पानी इतने लोगों के लिए है ही नहीं। तो जितने लोगों के लिए है, और जो उसे अफ़ोर्ड कर सकते हैं, उनके अलावा बाक़ी सबको नियमानुसार गंदा पानी ही पीना पड़ेगा। यह आपकी बदक़िस्मती नहीं है, यह गणित का नियम है।

भाई, यहाँ पानी रखा हुआ है। मान लीजिए, यहाँ पानी रखा हुआ है। और पानी है, यहाँ पर आप मान लीजिए पाँच सौ जने मौजूद हों। जो पानी रखा है यह है ही सौ जनों के लिए। यह साफ़ पीने का पानी है, सौ जनों के लिए है। तो इस पानी की अब क्या होगी? इसकी बोली लगेगी। ऑक्शनिंग होगी इसकी। जो सौ जने सबसे ऊँची बोली लगा सकते हैं, वे क्या करेंगे? पी लेंगे। बाक़ियों के लिए उधर नाली है, उधर गटर है, उधर कमोड का पानी है। और यही जो गटर, नाली, कमोड का पानी पिएँगे, यही फिर सबसे ज़्यादा जाकर औलादें पैदा करेंगे। तो अब क्या बोले?

पृथ्वी पर इतने संसाधन ही नहीं हैं, सौ ही लोगों के लिए पानी है, खड़े हो गए हैं पाँच सौ पीने के लिए। पानी कहाँ से लाएँ? पानी कहाँ से, मार्स से लाओगे? कहाँ से लाओगे? कहाँ से लाओगे? बताओ न। पानी कहाँ से लाओगे?

जगह भी नहीं है। बड़े शहरों में जाकर देखो, वहाँ लोग कैसे रह रहे हैं। जगह भी नहीं है पृथ्वी पर इतनी। और जगह अगर चाहिए, तो जंगल काटो। और अगर जगह चाहिए, तो एकदम छोटे–छोटे कमरों वाली इमारतें बनाओ, उनमें लोगों को अपार्टमेंट दे दो, कबूतरखानों जैसे। गरिमा थोड़ी बचती है फिर।

खाना भी नहीं है। इतने लोग पैदा करोगे, उनके लिए खाना कहाँ से आएगा? खाना तो ज़मीन ही पैदा करेगी न, और ज़मीन सीमित है। और ज़मीन अगर चाहिए, तो जंगल काटो। तो आप समझ रहे हो कि प्रकृति के विनाश का भी सबसे बड़ा कारण जनसंख्या ही है। और प्रदूषण और प्रकृति का विनाश साथ-साथ चलते हैं।

हम जितने हो गए हैं पृथ्वी पर, होमो सेपियंस, पृथ्वी इतने झेल ही नहीं सकती; बात ख़त्म। एक सीधा-सा तथ्य है। क्यों नहीं स्वीकार कर लेते?

भाई, जिस जगह पर पाँच लोगों को होना चाहिए था, वहाँ पचास बैठे हुए हैं, अब गंदगी फैलेगी कि नहीं फैलेगी? बोलो।

श्रोता: फैलेगी।

आचार्य प्रशांत: ट्रेन में जनरल का डिब्बा है और जितनी उसकी कैपेसिटी है, उससे चार गुना ज़्यादा लोग ठुँसे हुए हैं। कभी कोई चला है ऐसे डिब्बे में? मैं चला हूँ। वह साफ़ रहता है? कैसा रहता है? कितने लोगों ने रोक कर रखी है कि स्टेशन आ जाएगा तब कर लेंगे, इसमें नहीं कर सकते। कितने लोगों ने रोक के रखी? भाई, इसमें तो नहीं जा सकता। यह करती है जनसंख्या, यह जनसंख्या का काम है। कोई भी जगह, जो आप कहते हो न, कितनी सुंदर है, कितनी साफ़ है, ओह माय गॉड! वह सिर्फ़ इसलिए, क्योंकि वहाँ लोग नहीं हैं।

आप गोवा आए हो, यहाँ की आबादी बहुत कम है। जानते हो, कुल कितनी आबादी है? गोवा की आबादी इतनी कम है कि जितनी आबादी है, उतने हर साल यहाँ टूरिस्ट आते हैं। इतनी कम आबादी है। मेरे ख़्याल से 10 लाख के आसपास, बस इतनी, और यह प्रदेश है पूरा। तो इसलिए सुंदर है गोवा। नहीं तो दिल्ली भी प्राकृतिक था कभी। आपको क्या लग रहा है जब इंसान नहीं था, तो दिल्ली कैसा था? या इंदौर कैसा था? बहुत ख़ूबसूरत था।

हर जगह पृथ्वी पर एक पर्यटन स्थल है, पृथ्वी पर कोई जगह ऐसी नहीं है जो ख़ूबसूरत न हो। हर जगह एक टूरिस्ट स्पॉट है, बशर्ते वहाँ इंसान न हो। आज भी आप जिन जगहों पर शहरों से भाग कर जाते हो, वही जगह होती हैं जहाँ इंसान नहीं होता। और कौन-सा होता है टूरिज़्म? इंसान न हो। आपके पास पैसा बहुत आ जाता है, तो आप जानते हो अपने लिए क्या ख़रीदते हो? स्पेस। स्पेस माने क्या? वहाँ मैं हूँ, और इंसान नहीं है। आप होटल में अपने लिए बड़ा कमरा ले पाते हो, क्योंकि आपके पास पैसा आ गया है। उसका मतलब क्या है? यहाँ मैं हूँ, पर जनसंख्या नहीं है।

आप बड़ी गाड़ी ले पाते हो, उसका मतलब क्या है? आप प्राइवेट ट्रांसपोर्ट में ट्रैवल करते हो पब्लिक में नहीं। इसका मतलब क्या है? यहाँ मैं हूँ, पर जनसंख्या नहीं है। कुल मिलाकर आप पैसा भी इसीलिए कमाते हो ताकि आप रहो, जनसंख्या न रहे। और ग़रीब को सज़ा यह मिलती है कि उसे जनसंख्या झेलनी पड़ती है, स्लम झेलना पड़ेगा। यह ग़रीबी की सज़ा है कि तुम जहाँ रहोगे, वहीं चार और खड़े होंगे। और जो चार खड़े होते हैं, वो सिर्फ़ आपके शरीर के आसपास नहीं होते, वो आपके मन में प्रवेश कर जाते हैं। यह और बड़ी सज़ा है।

दिन-रात इंद्रियाँ जिसको देखेंगी, शरीर जिसको स्पर्श करेगा; इतने पास खड़े होते हैं कि नाक भी उनको सूँघ सकती है, तो वे मन में घुस जाते हैं आपके। कोई आपकी निजता बचती नहीं, आपकी हस्ती ही नहीं बचती।

अमीर होने का मतलब यह नहीं है कि सौ को ग़रीब कर के अमीर बने। अमीर होने का मतलब समझते हो क्या है? कि इंसान होने की जो गरिमा है, मुझे उस पर कॉम्प्रोमाइज़, समझौता न करना पड़े। यह अर्थव्यवस्था का लक्ष्य होना चाहिए, यह आर्थिक उत्थान का भी लक्ष्य होना चाहिए। यह नहीं कि तुम्हारे पास बेइंतहा दौलत है लुटाने के लिए और लग्ज़री के लिए। पर इतना पैसा होना चाहिए कि कोई तुम्हारे कंधे से कंधा मार के न चल रहा हो; कि तुम खड़े हो बस में, या मेट्रो में, या लोकल में, तो तुम्हें दूसरे को सूँघना न पड़े। यही अर्थव्यवस्था का लक्ष्य है।

इससे ज़्यादा भी अगर है, तो वह भी प्रदूषण करेगा; कि एक आदमी अकेला लिमोज़ीन पर बैठ के जा रहा है, और अपने लिए इतनी प्राइवेट स्पेस निकाल ली है, और लिमोज़ीन धुआँ ही धुआँ मार रही है; और उसकी मैन्युफ़ैक्चरिंग में भी खूब प्रदूषण हुआ है।

न हमें वह ग़रीबी चाहिए, जिसमें एक ऐसे 8×8 के क्षेत्र में चार लोग रह रहे हों, न वह ग़रीबी चाहिए। न हमें वह अमीरी चाहिए कि एक आदमी कार में चल रहा है, जो वहाँ से वहाँ तक की है, और दुनिया भर पर धुआँ छोड़ता हुआ चल रहा है। सस्टेनेबिलिटी चाहिए। समझ में आ रही है बात?

अब ग़रीबी कायदे से ख़ुद जनसंख्या पर रोक लगा दे, क्योंकि दिखेगा इंसान को कि पैदा कैसे करूँ यहाँ तो बच्चा ही नहीं, हम ही नहीं रह सकते; बच्चा क्या रहेगा। और तीन बच्चे पहले से यहाँ “चाँय-चाँय” कर रहे हैं, और एक चौथा कहाँ से आ जाएगा? तो गरीबी ख़ुद अपने आप में, एक तरह का समझो कंट्रासेप्टिव बन जाए, यदि मन तार्किक हो तो, यदि बुद्धि भ्रष्ट न हो। क्योंकि यह बहुत सीधी बात हो जाएगी, स्पष्ट दिखाई देगी; न मेरे पास पैसे, न तेरे पास पैसे; हम दोनों मिलकर बच्चे पैदा कर रहे हैं, पलेंगे कैसे? इतनी सीधी बात हो जाएगी, इसमें बहुत बुद्धि चाहिए क्या सोचने के लिए? बहुतर सीधी सी बात है।

पर बुद्धि तार्किक नहीं रह जाती लोकधर्म के प्रभाव में। अब हो जाता है कि मैं भी नाकारा, तू भी ग़रीब, पर बच्चा पैदा कर लें; ऊपर वाले ने भेजा है, ऊपर वाला ही पालेगा। लोकधर्म, जो ग़रीबी का प्रकट तथ्य है, उसको भी दबा देता है।

प्रकट तथ्य है कि हम इतने ग़रीब हैं कि हमें बच्चा नहीं पैदा करना चाहिए। पर लोकधर्म की आड़ में, संस्कृति की आड़ में, “नहीं-नहीं बेटा, आप पैदा कर दो; हम पाल देंगे।” पर आप तो बुड्ढे हो, और आपको दो हार्ट-अटैक आ चुके हैं, और आपको हाइपरटेंशन, डायबिटीज़ सब कुछ है। आप डेढ़ साल में मर जाओगे। आप कैसे पालोगे? झूठ क्यों बोला? पहले तो माफ़ी माँगो; या गारंटी करो, लिख के दो कि तुम कम से कम अभी 20 साल जिओगे। बुढ़ऊ मरने को तैयार हैं, पर कह रहे हैं, “नहीं बेटा, आप पैदा कर दो। पाल हम देंगे।”

तुम न तो हमें पाल पाए, न ख़ुद को पाल पाए। अब तुम इस तीसरी पीढ़ी को पालोगे? यही चीज़ें बुद्धि को भ्रष्ट कर देती हैं। नहीं तो ग़रीबी ख़ुद ही जनसंख्या पर रोक लगा दे।

फिर उल्टा क्या चलता है? ग़रीबी रोक इसलिए नहीं लगाती, क्योंकि जो जितना ग़रीब होता है, वह आमतौर पर उतना अशिक्षित भी होता है। और जो जितना अशिक्षित होता है, वह लोकधर्म के चंगुल में उतनी जल्दी फँसता है। जहाँ अशिक्षा जितनी ज़्यादा होती है, वहाँ लोकधर्म की जड़ें उतनी गहरी होती हैं। ये दोनों बिल्कुल साथ-साथ चलते हैं।

तो ग़रीब इसलिए पैदा करा जाता है, क्योंकि उसको लग रहा है कि ये तो परंपरा और संस्कार की बात है। और अमीर इसलिए पैदा कर लेता है, कहता है, बिकॉज़ आई कैन अफ़ोर्ड इट। तो अमीरों के लिए टॉयज़ होते हैं बच्चे। बहुत सारे हैं, जो कि चार-चार, छह-छह, दस-दस पैदा कर रहे हैं। क्यों? जस्ट बिकॉज़ वी कैन अफ़ोर्ड इट।

दुनिया भर में आबादी जहाँ कम हो रही है, वो किसकी हो रही है? शिक्षित मध्यम वर्ग की कम हो रही है। जो अशिक्षित लोग हैं, उनकी भी बढ़ती जा रही है। और जो अमीर लोग हैं, ये उनका भी पसंदीदा शगल है, “और पैदा करेंगे।” सेलिब्रिटीज़, पॉलिटिशियंस, इंडस्ट्रियलिस्ट्स, ऐक्टर्स, प्लेयर्स इनके खूब बच्चे होते हैं। और कई-कई बीवियाँ होती हैं, क्योंकि वी कैन अफ़ोर्ड इट। वो उनके लिए एक परफ़ॉर्मेंस की बात होती है, डेमॉन्स्ट्रेशन की बात होती है, ये देखो, ये मेरा कुनबा है। बात आ रही है समझ में?

अमीरों को, जो वो वाले अमीर हैं उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता, पृथ्वी बर्बाद हो जाए तो। ग़रीबों को पता ही नहीं चल रहा कि पृथ्वी बर्बाद हो रही है। बस एक मध्यम वर्ग है, जिसको कुछ-कुछ बात समझ में आ रही है। तो दुनिया भर में फ़र्टिलिटी रेट्स जहाँ भी गिर रहे हैं, वो मिडिल क्लास के ही गिर रहे हैं।

मिडिल क्लास बनती कैसे है? मिडिल क्लास बनती है ग़रीबों में शिक्षा के आने से। चीन ने खड़ी करी है एक ज़बरदस्त मिडिल क्लास। 1980 के आसपास भारत और चीन की मिडिल क्लास, मध्यम वर्ग, लगभग एक आकार की थी। आज चीन की जो मिडिल क्लास है, वह भारत से कई गुना बड़ी है संख्या में। क्यों? क्योंकि वहाँ दौलत कुछ लोगों के पास इकट्ठी नहीं हुई। पहली बात तो वहाँ जो वैल्यू क्रिएशन हुआ, वो भारत से कहीं ज़्यादा हुआ, और जो हुआ, उसका डिस्ट्रीब्यूशन भारत की अपेक्षा ज़्यादा यूनिफ़ॉर्म था।

आज जितने बिलेनियर मुंबई में हैं, उतने चीन के किसी शहर में नहीं हैं। जबकि चीन का जीडीपी भारत से चार-पाँच गुना हो गया। चीन का जीडीपी हमसे कई गुना है। लेकिन जितने बिलेनियर हमारे एक मुंबई में हैं, उतने चीनी किसी शहर में नहीं हैं। हमने पहली बात तो वैल्यू क्रिएशन कम करा, और जो करा भी वो किसके हाथ चला गया? कुछ लोगों के हाथ चला गया। तो हमारे यहाँ मिडिल क्लास पैदा ही नहीं होने पाई। हमारी मिडिल क्लास बहुत छोटी रह गई, क्योंकि मिडिल क्लास तब आती है, जब जो वैल्यू है, वो सिर्फ़ क्रिएट ही नहीं हो, डिस्ट्रीब्यूट भी हो।

और जनसंख्या रोकने का काम कौन करता है? मिडिल क्लास। और भारत में मिडिल क्लास छोटी, चीन की मिडिल क्लास बड़ी; तो इसीलिए भारत की जनसंख्या चीन से आगे निकल गई। बात आ रही है समझ में कुछ?

पॉल्यूशन और पॉपुलेशन, इनका चोली-दामन का साथ है। तुम्हें बहुत कम जगह मिलेंगी जहाँ पॉपुलेशन नहीं है, पर पॉल्यूशन है, खोजनी पड़ेंगी। और वहाँ भी पॉल्यूशन इसलिए होगा क्योंकि कहीं दूर की पॉपुलेशन ने अपना पॉल्यूशन वहाँ किसी तरीके से डंप कर दिया है। इंसान को हटा दो, तो प्रकृति गंदी हो ही नहीं सकती। प्रकृति में गंदगी जैसी कोई चीज़ नहीं होती।

कोई गंदा जंगल बताओ? बताओ। वहाँ इतने सारे पशु रहते हैं, पक्षी रहते हैं, वो मल-मूत्र नहीं करते क्या? करते हैं न? पर गंदा जंगल बताओ। प्रकृति को पता है हर चीज़ कि कैसे रिसाइकलिंग करनी है, कैसे एब्ज़ॉर्प्शन करना है, रीयूज़ करना है। जो चीज़ें हमारे लिए इनोवेटिव टेक्नोलॉजी होती हैं, वो प्रकृति में पहले से ही मौजूद है। वो प्रकृति की व्यवस्था का हिस्सा है।

कोई गंदा जंगल देखा है आज तक? आपको जब किसी बहुत निर्मल, सुरम्य स्थान की तस्वीर पेश करनी होती है तो आप कहते हो, “लुक एट द वर्जिन वर्ल्ड एंड प्रिस्टीन जंगल्स।” पर वहाँ भी तो वो सब जानवर लोग हैं, जो हग रहे हैं। तो गंदा क्यों नहीं हुआ? उसको क्यों दिखा रहे हो, कि “ये देखो, ये कितना प्यारा, अनछुआ जंगल है?” क्योंकि प्रकृति को सफ़ाई रखनी आती है, इंसान को नहीं आती। क्योंकि इंसान इकलौता है, जिसके पास क्या है? अहंकार। और अहंकार माने गंदगी।

वो जो भीतर की गंदगी होती है न, वो बाहर प्रदूषण के रूप में दिखाई देती है।

मनुष्य के भीतर की ही गंदगी बाहर प्रदूषण के रूप में दिखाई देती है। भगवद्गीता में कृष्ण जिस धुएँ की बात करते हैं न, कि भीतर तो बोध-रूपी प्रकाश है ही, पर उस पर अहंकार-रूपी धुआँ छाया रहता है; वही भीतरी धुआँ बाहर स्मॉग के रूप में दिखाई देता है। वह भीतर जो कामना की, द्वेष की, ईर्ष्या की, वासना की आग जल रही है न, वही बाहर ग्लोबल वॉर्मिंग के रूप में दिखाई देती है। बात आ रही है समझ में? और भीतर जो कामनाओं का प्रवाह है न, अब ये-वो, बह रही हैं, अभी ये चाहिए, वो चाहिए, लगातार। वही बाहर नदियों की गंदगी के रूप में दिखाई देता है।

प्रकृति में गंदगी नहीं होती। इंसान की मौजूदगी ही गंदगी है। और जितने ज़्यादा इंसान, फिर उतनी ज़्यादा गंदगी।

आ रही है बात समझ में?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। वी आर इन द मैन्युफ़ैक्चरिंग ऑफ़ सीमेंट। तो अभी आपने जैसा बताया बॉटम लाइन के बारे में, आई वाज़ एबल टू रिलेट अ लॉट। तो हम लोग भी जिस तरीके से सीमेंट कंसम्प्शन अगर 10%-15% बढ़ रहा है, साल-दर-साल, तो हम भी चाहते हैं कि बॉटम लाइन अगर हमारा 15% अगर बढ़ रहा है, तो 20% से बढ़े। और जब से मुझे क्लाइमेट चेंज के बारे में समझ आया है, तो हमने कुछ चीज़ें ऐसी की हैं कि हम लोग जो हमारा रिसोर्स एलोकेशन है, वो टुवर्ड्स ग्रीन सीमेंट के आर एंड डी में लगाना चालू किया है, कि और कैसे ग्रीन तरीके से हम चीज़ें कर पाएँ।

पर अभी जब आप बोल रहे हैं, तो मुझे उस चीज़ पे भी सवाल आ रहा है कि हम क्या इस इंडस्ट्री में भी रहना चाहिए या नहीं रहना चाहिए, कि इसके अलावा कुछ और करना चाहिए, कि जो हम लोग का बॉटम लाइन है, रिसोर्स है, उसको कहाँ एलोकेट करना चाहिए। तो इसमें स्पष्ट डायरेक्शन नहीं मिल पा रहा है सोचने के लिए।

आचार्य प्रशांत: देखो, तुम बहुत लोकल लेवल पर कोई ट्रीटमेंट चाह रहे हो। जो प्रॉब्लम यूनिवर्सल सेट की है, उसको किसी सबसेट के अंदर ट्रीट नहीं करा जा सकता ना। अगर यूनिवर्सल सेट की डेफ़िनेशन में ही नॉनसेंस शामिल है, तो उस यूनिवर्सल सेट का कोई भी सबसेट होगा, उसमें क्या होगी? नॉनसेंस होगी। अब आप चाह रहे हो कि मेरा जो सबसेट है, छोटा-सा, सीमेंट इंडस्ट्री या जो मेरी पर्टिकुलर सीमेंट प्रोड्यूसिंग यूनिट है, उसमें मैं क्या करूँ? कुछ नहीं हो सकता।

यह लगभग वैसे ही सवाल है कि मैं दिल्ली में रहते हुए अपने घर की हवा साफ़ कैसे रखूँ? इसका क्या जवाब है? मैं दिल्ली में रहते हुए अपने घर भी नहीं, अपने बाथरूम की हवा कैसे साफ़ रखूँ? क्या जवाब है? कोई जवाब नहीं है। एक ही जवाब है, संख्या-बल बढ़ाओ।

क्या हमारे पास टेक्नोलॉजी नहीं है किसी भी प्रोडक्ट को इकोलॉजिकली सस्टेनेबल वे में बनाने की? बिल्कुल है। बट आर वी प्रिपेयर टू पे द प्राइस? नो। बहुत हद तक इसलिए, क्योंकि इनिशियल अडॉप्शन में इकोनॉमिक्स ऑफ़ स्केल नहीं मिलती। और अगर जो कैपिटलिस्ट है, वो शर्त रख देगा कि “मैं तो शुरू ही तब करूँगा, जब स्केल मिल जाएगी,” तो तेरे शुरू किए बिना स्केल कैसे मिल जाएगी? शुरुआत में तो वो चीज़ महँगी ही पड़ेगी। संख्या-बल बढ़ाए बिना काम नहीं बनेगा।

जब लोग ऐसे हो जाएँगे न कि सीमेंट की बोरी पर पूछेंगे, कि इस बोरी का कार्बन फ़ुटप्रिंट बताओ पहले, लिखा होगा जब उस पर; वैसे मैंने जूते देखे हैं, जिन जूतों पे अब लिखा होता है कि इस जूते को बनाने में कितने किलो CO₂ एमिट हुआ। वैसे ही सीमेंट की बोरी पर जब लिखा होगा, और वह एक कॉम्पिटिटिव एडवांटेज बन जाएगा कि “साहब, इस सीमेंट की बोरी का सबसे कम है कार्बन फ़ुटप्रिंट,” तो ये ज़्यादा बिक रही है, उस दिन ये सब इंडस्ट्री वाले ठीक हो जाएँगे। लेकिन उसके लिए आपको संख्या-बल चाहिए।

और जब संख्या-बल होगा, तो आप सरकार भी ऐसी बना लोगे कि जिस बोरी का सबसे कम कार्बन फ़ुटप्रिंट है, वो सब्सिडाइज़ भी हो जाएगी। वो सब्सिडाइज़ भले न हो, जो दूसरी वाली होगी, उस पर ग्रीन टैक्स लगेगा। उस दिन हो जाएगा। आप नहीं समझ रहे हो, आप बस अपने लोकलाइज़्ड एनवायरमेंट में सॉल्यूशन लेने आ जाते हो, “दुनिया ऐसी चल रही है, वैसी चले; बताइए, मैं क्या करूँ?” कुछ नहीं हो सकता। तुम्हें संख्या-बल ही बढ़ाना पड़ेगा। यह लोकतंत्र है, यहाँ हर सर के पास एक वोट होता है। जब तक यह सरों की संख्या नहीं बढ़ाओगे, कुछ नहीं होगा।

पर्सनल गिल्ट हटाने के फेर में मत रहो, कि बस दुनिया ऐसी चल रही है, चले; मेरी पर्सनल गिल्ट हट जाए कि मैं ऐसी इंडस्ट्री में काम कर रहा हूँ, जहाँ पर इतना ज़्यादा इकोलॉजिकल फ़ुटप्रिंट है, ये-वो है। तुम्हें अपनी पर्सनल गिल्ट; पर्सनल का खेल नहीं है, भाई। पर्सनल गया भाड़ में, यहाँ पूरी पृथ्वी की बात है। यहाँ हम यह कोशिश नहीं कर रहे हैं कि आपको व्यक्तिगत तौर पर, आपको निजी ग्लानि से मुक्ति मिल जाए। आपकी निजी ज़िंदगी में जो चल रहा है, चले। हम यहाँ बात कर रहे हैं पृथ्वी की करोड़ों प्रजातियों की, और पूरी जनसंख्या की, और आने वाली पीढ़ियों की।

लेकिन आप बहुत लोकलाइज़्ड सवाल पूछते हो हमेशा, “मुझे मेरे कॉन्टेक्स्ट में बता दो कि मैं क्या करूँ, ताकि मुझे गिल्ट न रहे।” “आचार्य जी, क्या क्लीन कुकिंग यूटेंसिल्स आते हैं, मैं अपने किचन में यूज़ करूँगी?” किचन बंद कर दो, यार। ग्रीन यूटेंसिल माँगने की जगह किचन से बाहर निकलो। लोगों तक बात पहुँचाओ।

तुम कह रहे हो, “नहीं, मेरे घर की वैसे ऐसी चलती है, वैसे ही चलती रहे; बस मेरे किचन में अब ग्रीन बर्तन आ गया, सी हाउ इकोलॉजिकली कॉन्शस आई एम।” क्या? “लेट अस ऑल डू आवर बेस्ट एट आवर लिटिल-लिटिल पेटी-पेटी लेवल्स।”* नहीं, ऐसे नहीं होगा। रिमेनिंग विदिन योर नैरो डोमेन यू कैन नॉट डू एनीथिंग। फिर बोल रहा हूँ कि “हम सबको अपने-अपने घर का AQI कम करना चाहिए।” क्या है? कैसी बातें कर रहे हो?

अरे, उसे सीमेंट बेचना है, भाई। जैसे ही वो देखेगा कि इतने हाई एमिशन पर टैक्स लग जाता है, और उसकी बोरी अब कॉम्पिटिटिव नहीं रह गई, वो अपने-आप टेक्नोलॉजी बदल लेगा। टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, कोई अडॉप्शन नहीं कर रहा, क्योंकि टेक्नोलॉजी थोड़ी महँगी पड़ती है। तो मुनाफ़े की ख़ातिर उसको लगाना ही नहीं है उस टेक्नोलॉजी को।

बॉटल-नेक टेक्नोलॉजी नहीं है, बॉटल-नेक मास कॉन्शियसनेस है। ये बात समझो। कार्बन डाइऑक्साइड का एमिशन कम हो, कुल इतना-सा खेल है। ये कोई बहुत बड़ा साइंटिफ़िक या टेक चैलेंज है ही नहीं। कार्बन डाइऑक्साइड बहुत साधारण-सी गैस, उसको आप एमिट.कर रहे हो; उसको रोकना है। बस इतना है, इतना है। ये कोई बहुत बड़ा टेक चैलेंज है? न। चैलेंज टेक्नोलॉजी नहीं है, चैलेंज मास अनकॉन्शियसनेस है। आम आदमी बेहोश है।

आम आदमी ने कह दिया, “ये वाला सीमेंट नहीं लेंगे, भाई। तुम फ़ालतू नदी ख़राब कर रहे हो। तुम पानी गंदा कर रहे हो। तुम्हारा वाला नहीं लिया जाएगा।” और यह सब हम चाहते हैं कि रेगुलेशन बने, ये सब लिखा होना चाहिए तुम्हारे प्रोडक्ट पर कि तुम्हारा एनवायरनमेंटल फ़ुटप्रिंट कितना है। सब लिखा होना चाहिए, ये सब होगा। आम आदमी ये है बोल दे, सब शंट हो जाएगा मामला।

वो सब थोड़ी कि अपने घर में एक पेड़ लगाओ। उससे नहीं होता, बाबा; पाखंड है वो। बहुत आते हैं, “आचार्य जी, आप इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हो। आपने कितने पेड़ लगाए हैं?” मैंने पेड़ तो नहीं लगाए, पर मूर्ख उखाड़े हैं बहुत सारे। सामने आ तुझे उखड़ने की ज़रूरत है। और बड़े वो मोरल अथॉरिटी के साथ पूछता है, “तो आपने कितने पेड़ लगाए हैं?” तो ये आप जिस हॉल में बोल रहे हैं, वहाँ ए.सी. चल रहा है कि नहीं चल रहा है? एनवायरनमेंटल क्राइसिस इन मूर्खों का नतीजा है।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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