
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न ये है। मेरे पिताजी को न डिमेंशिया है, तो कभी-कभी अजीब-सी हरकतें करते हैं और वो भूल जाते हैं बातें, तो बार-बार पूछते हैं। तो मेरा अक्सर जो उनको रिएक्शन होता है वो फ्रस्ट्रेशन का होता है और मैं लड़ने बैठ जाती हूँ उनसे, बहस करने बैठ जाती हूँ।
तो मेरा प्रश्न ये है कि जब मैं जानती हूँ कि उनको डिमेंशिया है, फिर भी मैं ऐसा रिएक्शन देती हूँ, तो जिस जानने की आप बात करते हो वो कैसे होता है? वो क्या होता है? मैं क्यों नहीं समझ पाती हूँ? वो समझना है।
आचार्य प्रशांत: बेटा, एक आदर्श रहता है मन में कि ज़िंदगी ऐसी-ऐसी-ऐसी-ऐसी होनी चाहिए। और वो आदर्श लेकर आप पैदा नहीं हुए थे, वो आदर्श इधर-से-उधर-से, सौ तरह के चोर दरवाज़ों से आपके मन में आ गया। अब आपको ज़िंदगी नहीं चाहिए, अपने आदर्श जैसी ज़िंदगी चाहिए। उसमें ये भी शामिल है कि पिता ऐसे हों, दोस्त ऐसे हों, भाई ऐसे हों, पति ऐसा हो, दुनिया ऐसी हो, समाज ऐसा हो, जीवन ऐसा हो, मृत्यु ऐसी हो, पृथ्वी ऐसी हो, आकाश ऐसा हो, देवता ऐसा हो। ये सब जो वर्ल्ड-व्यू है, ये उसका हिस्सा है।
तो इसके कारण जीवन जैसा सामने खड़ा होता है वो हमें कभी-कभी दिखाई ही नहीं देता। हमारी ज़िंदगी बस एक तुलना बनकर रह जाती है। और तुलना भी उसकी आप किससे कर रहे हो? एक उधार की चीज़ से। ये मेरा दोस्त है। ये मेरा दोस्त है, इसको कैसा होना चाहिए? वो पिक्चर वाले दोस्त जैसा, जय-वीरू जैसा होना चाहिए। अब जय-वीरू जैसा नहीं है तो मुझे लगातार क्या रहेगा?
तो ये जो अब पिताजी को डिमेंशिया है, भूल जाएँ। ये जो आपके भीतर उसकी वजह से एक गुस्सा या उदासी या चिढ़ रहती है, वो एक बड़ी शिकायत का छोटा हिस्सा भर है। बड़ी शिकायत ये है कि हमारी ज़िंदगी ही वैसी क्यों नहीं है जैसी हमको आदर्श ज़िंदगी किताबों ने, दुनिया ने, समाज ने, फिल्मों ने बता दी है।
आपको तो फिर भी ये है कि पिताजी को बीमारी है। बहुत-सी बेटियों को होगा, मेरे पिताजी के बड़ी तोंद है, दोस्तों के सामने उनको ले जाने में शर्म आती है मुझको। और होने लगा है। जब ये जेन-ज़ी फ़िगर-कॉन्शियस है, तो अपनी फ़िगर को ले, थोड़ी बाप के फ़िगर को ले भी। घर में पार्टी है, तो बाप को छुपा देंगे। बोले, “आप आते हो, आपसे पहले आपकी तोंद आती है। उसके दो सेकंड बाद आप आते हो।” इतनी देर में समझ में आया।
वो हैं ऐसे, तो हैं। अब हैं, वो कोई नाटक नहीं कर रहे। वो ऐसे ही हैं। क्या आपके बाल काले हैं? आपको इससे समस्या क्यों नहीं है? क्योंकि किसी ने आज तक कहा नहीं था कि बाल लाल होने चाहिए। खुदा न खास्ता आपके मन में ये बात भी डाल दी गई होती कि लाल बाल आदर्श होते हैं, तो आप बाल छुपा के घूम रही होतीं, और जितनी बार आईना देखतीं काले बालों पर कोफ्त होती। काले बाल भी इसलिए नहीं स्वीकार हैं कि काले रंग में कुछ ख़ास है। काले बाल भी बस इसलिए स्वीकार हैं क्योंकि काला बाल समाज को स्वीकार है। और हमारे सारे आदर्श सामाजिक होते हैं।
सचमुच आपको अगर अभी किसी तरह से ये पाठ पढ़ा दिया जाए कि बाल होने चाहिए लाल; लाल-लाल बाल। फिल्मी गाने ऐसे ही बन जाएँ, कि “तेरे ख़ून से बाल।” है न? तो अपने आप काले बाल देखोगे और लगेगा कि जीना नहीं है बिल्कुल इनके साथ; चलो उस्तरा लेकर आओ। हमारा कुछ भी अपना नहीं है। बाप कैसा होना चाहिए, ये भी किसने बताया?
श्रोता: समाज ने।
आचार्य प्रशांत: और बाल कैसा होना चाहिए, ये भी किसने बताया?
श्रोता: समाज ने।
आचार्य प्रशांत: आपने बाल पीछे से बाँधे हुए हैं। लंबे तो होंगे, थोड़े तो लंबे होंगे ही। हैं कि नहीं हैं? जब पैदा हुई थीं, तो उसी क्षण पड़ोस के घर में एक लड़का भी पैदा हुआ था। उसने काहे नहीं लंबे बाल रखे? आप जब पैदा हुई थीं, उसी क्षण में इतने सारे लड़के ही पैदा हुए होंगे। उनके बाल लंबे क्यों नहीं हैं? उनको किसी ने बोला नहीं कि लंबे बाल रखो, तो उन्होंने नहीं रखे।
और कुछ ऐसा सामाजिक संयोग बैठ जाए कि लड़कियाँ हॉट एंड सेक्सी लगती हैं, चिकनी मुंडी। और लड़के हैंडसम लगते हैं जब बिल्कुल कम से कम पीठ के नीचे तक बाल आते हों, तो देखना तुम। तुम्हें क्या लग रहा है, तुम्हारे लंबे बाल तुम्हारे हैं, नहीं तुम्हारे नहीं हैं समाज के हैं।
हमारा प्यार भी प्यार नहीं है, वो समाज का फ़रमान है। संस्कारों का आदेश है।
अब क्या करोगे आप? है तो है, इसमें क्या हो सकता है? पिताजी भूल जाते हैं तो भूल जाते हैं। ये उन्होंने तय तो नहीं करा है। प्राकृतिक एक, शारीरिक उनकी ऐसी अवस्था हो गई है। वो भूलने लगे हैं, तो भूल जाते हैं। फ़ैक्ट है न? फ़ैक्ट से कोई लड़ नहीं सकता।
अगर वो नाटक कर रहे होते आपको परेशान करने के लिए, तो कुछ विधि भी करते। इसमें क्या उपाय है? कोई उपाय नहीं है। कम से कम चिड़चिड़ाना तो उपाय नहीं हो सकता कि “डैडी, तुम फिर भूल गए।” वो ये भी भूल जाएँगे, कि वो भूल गए। और नई-नई अगर बीमारी अभी डायग्नोस हुई हो और हमें झटका-सा लग जाए, तो फिर भी समझ में आता है। अगर ये हालत अब लंबे समय से चल रही है, तो अब तक तो आपकी उम्मीदें पूरी तरह से टूट जानी चाहिए थीं न।
शुरू-शुरू में आप किसी से उम्मीद रखो कि वो याद रखेगा और सामान्य आचरण करेगा, और वो न करे, तो बुरा लग सकता है। पर वो शुरुआती दौर बीत गया। अब आप भली-भाँति जानते हो कि वो ऐसा ही आचरण करेगा जैसा वो कर रहा है, और इसमें अब मामला उसके हाथ में नहीं है। तो अब किस बात का रंज है? वो ऐसा ही है।
बूढ़े आदमी से उम्मीद करो कि झुक के न चले, ये कैसी उम्मीद है? ये लगभग वैसी ही उम्मीद है कि चिड़िया उड़े नहीं या मछली ज़रूर उड़े। ये कैसी उम्मीद है? पर आदर्श, सामाजिक आदर्श, “दिस इज़ द गुड लाइफ़। दिस इज़ दिस, दिस इज़ दिस, दिस इज़ दिस। ऐसा तो होना ही चाहिए। ऐसा होना चाहिए। ज़िंदगी ऐसी होनी चाहिए। ऐसा है तो ठीक है, ऐसा है तो ठीक नहीं है।”
देखने वाले देख रहे होंगे कि इस मुद्दे में और क्लाइमेट चेंज में क्या संबंध है। सबको एक ख़ास तरह की ज़िंदगी चाहिए। है न? और जो ख़ास तरह की ज़िंदगी है, वही क्या है? कार्बन एमिशन। और वो जो ख़ास तरह की ज़िंदगी तुम्हें चाहिए, वो तुम्हें तो चाहिए भी नहीं है। वो तुम्हें बता दिया गया है कि चाहनी चाहिए। तुम्हें बता दिया गया है कि चाहनी चाहिए। जैसे तुम्हें कोई व्यक्ति दिखा दिया जाए और कहा जाए, कि इससे तो तुम्हें प्रेम करना ही चाहिए न। ये क्या है? या इसके प्रति तुम्हें वफ़ादार होना ही चाहिए न। ये क्या है? इसको चाहना चाहिए, यू मस्ट लव हिम एंड हर। ये क्या है?
ऐसा ही कोई आदर्श माँ-बाप बना लें, कि बच्चा छोटा होगा तो वो पहले ही दिन से अपनी पॉटी ख़ुद ही ठीक कर लेगा। तो बच्चों का क्या होगा? भला है कि अभी तक इस तरह का कोई आदर्श निकल के नहीं आ रहा, पर वक़्त का भरोसा नहीं। मम्मी आकर के शिकायत कर रही हैं कि वो पैदा हुआ है। अरे, अभी आया तो था सवाल! “मेरा तीन महीने का बच्चा मेरी बात नहीं सुनता।” तो वैसे ही आने लग जाए। “मेरा तीन दिन का बच्चा बिस्तर गीला कर रहा है। नो मैनर्स, नो एटिकेट।” क्या करना है, आचार्य जी उसका, तीन दिन का बच्चा है, वो बिस्तर गीला कर रहा है। उसका क्या करें? वो क्या कर सकता है इसमें?
और आपके साथ भी ये सब हुआ था और पिताजी ने बर्दाश्त किया होगा। वो बर्दाश्त करने की भी बात नहीं है, आदर्श नहीं थे बस उनके पास। उनको भी कोई आदर्श बता देता, कि “लड़कियाँ न बड़ी बचपन से ही समझदार होती हैं, बिस्तर नहीं ख़राब करतीं। ये बेहूदे काम तो लड़के करते हैं।” तो फिर वो भी आप पर झल्लाते कि “ये देखो, ये इतनी बड़ी हो गई। आज चौथा दिन है इसका और अभी सब गंदा कर रही है।”
इतना बड़ा कॉस्मेटिक्स उद्योग किस लिए है? “मेरा चेहरा ऐसा होना चाहिए।” आठ बजे से पार्टी है। वो सात बजे कोने में घुस के कुकू रो रही है। क्यों? पिंपल। अब यहाँ पिंपल बैठ गया है। वो रो रही है, पट-पट; उसको बता दिया गया है कि पिंपल नहीं होना चाहिए। वो रोए पड़ी है।
भाई, तू जवान हो रही है। तो पिंपल तो आएगा। तूने बुलाया नहीं, उसका काम है आना, वो आएगा। पर तुझे एक आदर्श दे दिया गया है कि चेहरा बिल्कुल ऐसा होना चाहिए, जैसे एकदम। तो बर्दाश्त ही नहीं हो रहा कि ये उबड़-खाबड़ क्यों हो गया यहाँ पर। जो शारीरिक रूप से जैसा हो न, पर नहीं बहुत गुस्सा करना चाहिए। चेतना को ही डाँट भी लगाई जा सकती है, शरीर को थोड़ी। घुटने में दर्द है, घुटने को डाँटोगे क्या? चुनाव का हक़ सिर्फ़ किसके पास होता है?
श्रोता: चेतना के पास।
आचार्य प्रशांत: और दोष सिर्फ़ तब होता है जब तुमने गलत चुनाव करा हो। जिसके पास चुनाव का हक़ है ही नहीं, उस पर ग़ुस्सा क्यों हो रहे हो? बोलो। इसीलिए छोटे बच्चों पर ग़ुस्सा नहीं किया जाता, उनके पास अभी चुनाव का अधिकार है ही नहीं। उन्हें नहीं समझ में आ रहा। इसी तरीके से जो बूढ़े-बुज़ुर्ग हो जाएँ, उनको नहीं याद रह रहा, वो डग-डग-डग कर रहे हैं या उल्टा-पुल्टा बोल गए, उन पर ग़ुस्सा नहीं करते। वो बच्चे जैसे हो गए हैं, उन पर क्या ग़ुस्सा करना है?
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, वो मैं पहले उनके साथ ही रहती थी। मतलब मम्मी-पापा दोनों की थोड़ी मेंटल कंडीशन ऐसी-सी है, तो मुझे ऐसा फ़ील होता था कि मैं मदद तो नहीं कर रही ज़्यादा उनके साथ रह के, और मैं और मेंटली डिस्टर्ब होती जा रही हूँ। तो मैं थोड़ा अब दूर रहने लगी उनसे, इतना दूर रहती हूँ कि इमरजेंसी में पास पहुँच जाऊँ।
आचार्य प्रशांत: वो ठीक है, वो आपका फ़ैसला है। अब मैं नहीं जान सकता कि आप कितना पास रहती हैं और सचमुच इमरजेंसी में कितनी जल्दी आ जाएँगी। लेकिन एक बात और समझिए कि आप कहें कि मैं उनके साथ मेंटली डिस्टर्ब लोगों के साथ रह के ख़ुद डिस्टर्ब हो रही थी, तो उसमें भी आपकी उम्मीदें ही शामिल होंगी।
नहीं तो अगर आप जानते हो कि अब सचमुच उनके ब्रेन के साथ ही कुछ ऐसा हो गया है कि उनका व्यवहार सामान्य नहीं रहेगा, तो अब डिस्टर्ब्ड भी होने की क्या वजह बची? डिस्टर्ब तो उम्मीदें होती हैं न, जब किसी से ये उम्मीद अभी बाक़ी हो कि वो सामान्य व्यवहार करेगा। जिसका पता है कि वो सामान्य व्यवहार अब कर ही नहीं सकता, उसके व्यवहार को देख के कोई डिस्टर्ब क्यों होगा?
वो तो अब बालवत हो गया, पशुवत हो गया न। उसका तो ब्रेन ही अब दूसरे तरह का हो गया। हाँ, इतना ज़रूर है कि अब वो बहुत कुटिलताएँ भी नहीं कर पाएगा। हो सकता है इधर-उधर की बातें करें, बातें आपको बहकी-बहकी लगें। लेकिन फिर भी उन बातों में एक निर्मलता रहेगी। और बहुत सारे लोग जो बहुत साफ़-सुथरी बात करते हैं, उनकी साफ़-सुथरी बातों के पीछे बड़ी कुटिलता, गंदगी हो सकती है। और कोई व्यक्ति है, उसकी चेतना सोती जा रही है धीरे-धीरे।
आप कहोगे, विक्षिप्त होता जा रहा है। ठीक है? विक्षिप्त होता जा रहा है, शायद होता जा रहा है। लेकिन साथ ही-साथ वो बालवत होता जा रहा है। एक तरह से वो चालाकियों से, दुष्टताओं से भी आज़ाद होता जा रहा है। उसको वैसे देखिए जैसा वो है। अपनी उम्मीदों के लेंस से उसको मत देखिए कि “व्हाई इज़ ही नॉट बिहेविंग सेनली?” येस, नॉट सेन, मे बी येट मोर इनोसेंट नाउ। एंड इनोसेंस इज़ प्रोबेब्ली मोर प्रेशियस देन सेनिटी।
मैं किसी नियम के तौर पर नहीं बता रहा हूँ आपको, बस आपका ध्यान इस ओर खींच रहा हूँ कि जो चीज़ जहाँ संभव नहीं, उसकी वहाँ उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए।
प्रश्नकर्ता: तो इसी कारण, मैं जैसे बहुत चाहती हूँ कि संस्था में जुड़कर काम करूँ, संस्था से जुड़ जाऊँ। तो फिर उसमें यही एक तरह से वो हर्डल आता है कि।
आचार्य प्रशांत: अभी उनके केयरटेकर कौन है?
प्रश्नकर्ता: मैं ही जाती हूँ।
आचार्य प्रशांत: अभी भी कुछ काम तो करते होंगे न?
प्रश्नकर्ता: हाँ, मैं जॉब करती हूँ।
आचार्य प्रशांत: तो जैसे एक जगह जॉब करके आप उनकी देखभाल कर सकते हो, वैसे ही दूसरी जगह भी कर सकते हो।
प्रश्नकर्ता: सर, वो ज़्यादा दूर हो जाएँगे न फिर।
आचार्य प्रशांत: तो ले आओ। बिल्कुल मैंने आर्किमिडीज़ का “यूरेका” वाला आइडिया दिया। इतनी गुप्त विधि तो और कोई बता ही नहीं सकता था। सारी उम्मीदें, सारा ज़ोर, सारी दंड-व्यवस्था, ये चेतना के लिए हैं। समझ में आ रही है बात? हम इसका मज़ाक उड़ा सकते हैं पर इसके प्रति क्रूर नहीं हो सकते।
भाई, हम ठीक है, बार-बार बोल देते हैं कि ये (हाथ में पिग का खिलौना उठाते हैं) जाकर के वहाँ कीचड़ में लोटता रहता है। तो गलती थोड़ी कर रहा है, ये ऐसा ही है। अब इसके कारण इसको पत्थर थोड़ी ही मारोगे। वो ऐसा ही है।
यही बात बच्चों पर और बुज़ुर्गों पर भी लागू होती है। वे ऐसे ही हैं। उनका आप क्या करोगे? सब नहीं करना चाहिए कि इनको देखो, ये फलानी चीज़ उठाते हैं, गिरा देते हैं। घर का सामान तोड़ दिया; रात भर खाँसते रहते हैं, हमें नींद नहीं आती। कुछ भी कहीं रखकर भूल जाते हैं, उसके बाद फिर परेशानियाँ होती हैं।
जानबूझ के कर रहे हैं? जो नियम बच्चे पर लागू होता है, वही उन पर भी लागू होता है।
दोष उसका निकाला जाता है जिसके पास चुनाव का अधिकार हो। जो अब चुनाव नहीं कर सकता, उसका दोष मत निकालो।
शेर को हम कभी दोष देते हैं कि मांस क्यों खाता है? कभी नहीं देते। पर इंसान मांस खाएगा तो दोष ज़रूर देंगे, शेर के पास चुनाव नहीं है इंसान के पास है।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू, आचार्य जी।