
“आशा हि परमं दुखम"— आशा से बड़ा दुख दूसरा नहीं। जैसे लॉटरी। मन कहता है, सौ बार नहीं लगी, कोई बात नहीं, एक बार लग गई तो सब वसूल। पहली गलती है गलत काम में लगना, दूसरी है सही अंजाम की उम्मीद। बीच-बीच में थोड़ा सुख मिलता है, ताकि सौ गुना दुख झेलो। अपने दुख से ज्यादा सुख को टटोलो। जब सुख की असलियत समझोगे, तो पूर्ण निराशा आएगी और तब नया जीवन शुरू होगा, जिसमें हल्कापन, आनंद और निर्भयता होगी।



प्रश्नकर्ता: अगले प्रश्नकर्ता आपके साथ गोवा शिविर में भी थे और वहीं से ही वे उद्धृत करते हैं। आपने कहा था, ‘आदमी वास्तव में जान जाए उनके ऊपर कौन है। तो आगे लिखते हैं कि आचार्य जी, इस बात को मैं कैसे समझूँ और जान पाऊँ कि ज़िन्दगी निजी भोग

आचार्य प्रशांत: अभी हम ऋषिकेश में हैं, इससे थोड़ा सा आगे पड़ता है कोड़ियाला। तो कोड़ियाला में शिविर हुआ था आज से आठ-एक साल पहले की बात होगी। तो उसमें ज़्यादातर जो आये थे, वो कॉलेज के ही सब थे छात्र-छात्राएँ थे। बड़ी बढ़िया वो जगह थी जहाँ पर हुआ…

प्रश्नकर्ता नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा सवाल टॉक्सिक पॉजिटिविटी (ज़हरीली सकारात्मकता) को लेकर है। आजकल बहुत सारे मोटीवेशनल स्पीकर्स

जहाँ तुमको कामवासना के पूरे होने की उम्मीद हो और वहाँ वह पूरी ना हो रही हो तो फिर जो फ्रस्ट्रेशन (खींझ) और हताशा उठती है, वो बहुत-बहुत तीव्र होती है। वह इतनी तीव्र होती है कि उसकी लहर में लोग हत्या तक कर जाते हैं। जिसको एक बार यह…

अभी मर जाओ तो तुम्हारी देह को लोग कहेंगे, “वह मिट्टी रखी है, मिट्टी।“ यह हैसियत है हमारी गंभीरता की। यह भी नहीं कहेंगे कि, “वह नवीन रखा है”, क्या कहेंगे? “मिट्टी रखी है; वह मिट्टी।“ और जब तक साँस चल रही है तब तक बड़े गंभीर हो, “अरे! दर्द-ए-दिल,…


अभ्यंतर में जिसकी समस्त आशाएं मलिन हो गयी हैं और जो निश्चय पूर्वक जानता है कि कुछ भी नहीं है,


आगि जो लागि समुद्र में, धुआँ न परगट होय ।

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।

धर्मग्रंथों को जाति-व्यवस्था के चश्मे से देखने के बजाय उनके मूल संदेश को समझना आवश्यक है। श्रुति का केंद्र जाति, लिंग या सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि अहंकार और उससे मुक्ति है। पारंपरिक व्याख्या से अलग समझ को पुनर्व्याख्या मानकर खारिज करना उचित नहीं। वास्तविक अध्यात्म बाहरी पहचान नहीं, अपनी नीयत, भ्रम और कपट को ईमानदारी से देखने तथा आत्मबोध की ओर बढ़ने का आग्रह करता है।















आपका हर assumption आपको भीतरी तौर पर और ज्यादा वह बना देता है जो आप पहले से ही हो। Assumption ऐसे ही नहीं उठते। जब भी कोई बोले ना, 'No but I assumed…हंसने लग जाइए।' यह assumption नहीं है। यह साजिश है। All assumptions are conspiracies.




हम कॉन्शियस बीइंग्स हैं, कॉन्शियसनेस का काम होता है जानना। कोई सुपरस्टिशस काम कर रहा है और कह रहा है, ‘ऐसे कर रहा हूँ, तुम भी करो।’ तर्क आपको नहीं देना है, तर्क उनके पास होने चाहिए जो ये सब कर रहे हैं। वो तर्क दें, फिर उन तर्कों का परीक्षण करा जा सकता है कि वे कितने फैक्चुअल हैं, उनमें हाइपोथेसिस कितना है, सपोज़िशन कितना है। आपके लिए इतना कहना पर्याप्त है कि आई एम अ कॉन्शियस बीइंग, जो तभी कुछ करती है जब वह पहले समझ लेती है।








प्रश्नकर्ता: प्रणाम, गुरुजी। मैं आपसे दो-तीन बार मिल चुका हूँ। आपको जब से सुन रहा हूँ तब से मेरा जीवन काफ़ी हद तक बदल गया है। लेकिन मैं जब ग्रन्थों को पढ़ता हूँ, तो लगता है कि मुझे प्रतिपल साक्षी बनकर ध्यान में रहना चाहिए। लेकिन आचार्य जी, मैं अभी…
आचार्य प्रशांत: कह रहे हैं— ‘फल आशा अनुसार नहीं मिलता तो निराशा हावी हो जाती है’ और आशा अनुसार मिलता है तो क्या हावी होता है? तब ‘फल’ हावी होता है! जब फल आशा अनुसार नहीं मिलता तो कह रहे हैं निराशा बड़ी हावी लगती है, अपने ऊपर से विश्वास…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शानदार व्यक्तिव का मालिक बनना चाहता हूँ।
आचार्य प्रशांत: मालिक बनो नहीं, मालिक के हो जाओ। जो शानदार मालिक का हो जाता है, उसको फिर बहुत सारी शानदार चीज़ें मिल जाती हैं। जल्दी से बस माँग रख देते हो, हाथ फैला देते हो — ‘ये चाहिए।‘ जो…
कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिए कोय|
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय||
~संत कबीर
वक्ता: इसको समझने के लिए एक दोहा और लिखिए इसके साथ:
माया तो ठगनी भयी, ठगत फिरत सब देश|
जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को आदेश||
मुक्ति सर्व आयामी और…
– अष्टावक्र गीता, अध्याय १७, श्लोक १९
वक्ता: तीन बातें हैं जिन पर अष्टावक्र का जोर…
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय १३ श्लोक २)
वक्ता: (श्लोक का अर्थ समझाते हुए) कभी शरीर से दुःख है, कभी वाणी से दुःख है, कभी मन से दुःख है। इन सब का त्याग कर के मैं पुरुषार्थ में स्थित…
~कबीर
वक्ता: बड़े-बड़े समुद्र हैं, जो हमसे बाहर लहराते हैं। और एक समुद्र हमारे भीतर भी लहराता है – मन का समुद्र। बाहर के समुद्रों में आग लगती हुई आपने शायद…
नाम जप तभी उपयोगी साधना बनता है जब जपे जाने वाला नाम किसी छवि, व्यक्ति, कहानी या सांसारिक विषय की ओर संकेत न करे। सामान्य नाम मन में इच्छाओं और अहंकार से जुड़े विषयों को मजबूत करते हैं, जबकि निर्गुण नाम मन को उन विषयों के बोझ से हल्का कर सकता है। इसलिए नाम जप का उद्देश्य किसी कल्पित रूप की पूजा करना नहीं, बल्कि अपनी सीमित पहचान से आगे जाने की आकांक्षा, यानी मुमुक्षा, को जगाना है।
एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…
मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उनकी अनिवार्यता से जुड़ी मान्यताएँ हैं। हम जिन चीज़ों को अपरिहार्य मानकर पकड़े रहते हैं, वही हमारे दुख का कारण बनती हैं। समाधान समस्याओं से लड़ने में नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं को निष्पक्ष होकर देखने में है। जैसे ही मन कुछ क्षणों के लिए अपने पूर्वाग्रहों को स्थगित करता है, सत्य की झलक मिलती है। वही झलक भीतर प्रेम जगाती है, और वही प्रेम व्यक्ति को अपने बंधनों को छोड़कर स्वतंत्रता, सत्य और वास्तविक जीवन की ओर बढ़ने का साहस देता है।
बार-बार लक्ष्य छोड़ देने का कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि गलत और उधार लिए हुए लक्ष्य हैं। जिन उद्देश्यों का जन्म प्रेम, समझ और आत्मबोध से नहीं होता, वे बोझ बन जाते हैं। सही लक्ष्य भीतर की स्पष्टता से निकलता है और वही व्यक्ति को स्वाभाविक समर्पण देता है। इसलिए प्रेरणा खोजने से पहले स्वयं को जानना, आत्म-अवलोकन करना और यह समझना ज़रूरी है कि वास्तव में हमारे लिए क्या मूल्यवान है।
हम जिन भावनाओं, इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और रिश्तों को अपना मानते हैं, उनमें से अधिकांश समाज, परिवार, शिक्षा, मीडिया और वातावरण द्वारा आरोपित होते हैं। व्यक्ति अपनी ही नहीं, उधार ली हुई मान्यताओं के अनुसार जीता है और फिर उसी को अपनी पहचान समझ लेता है। वास्तविक स्वतंत्रता तब शुरू होती है जब हम अपने विचारों, भावनाओं और लक्ष्यों की जाँच करते हैं, झूठे प्रभावों को पहचानते हैं और अपने जीवन को सचेत रूप से जीना शुरू करते हैं।
ये जितने आकाशीय खगोलीय पिंड हैं, ग्रह–नक्षत्र, चाँद–तारे, इनका मनुष्य के जीवन पर कोई प्रभाव पड़ता हो, न इसकी कोई पुष्टि है, न कोई प्रमाण है। इस पूरी चीज़ का मनोवैज्ञानिक कारण बस इतना ही है: अपने ऊपर दायित्व न लेना, बल्कि दायित्व भाग्य पर डाल देना। जब भी कोई देश पूजने लग जाता है अपनी मान्यताओं को, और तर्क की आवाज़ों को सुनने से मना कर देता है, तो फिर कोई बाहरी ताक़त आकर उसको ग़ुलाम बनाती है। भारत ने प्रमाण को ठुकरा दिया, मान्यता पर चलना शुरू कर दिया, वो भारत की ग़ुलामी बन गया।
शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।
शरीर है, तो उसे रोटी–कपड़ा देना पड़ेगा, वह बंदोबस्त करके अलग रख दो। रुपए–पैसे की बात थोड़ा अलग रखकर देखो कि जीवन जीने का एक सार्थक तरीका क्या है। सही उद्देश्य क्या है, उसको पकड़ो। उसको पकड़ने के बाद फिर विचार करो कि काम तो सही पकड़ लिया, अब इसमें पैसा कैसे बनाया जाए। अध्यात्म और पैसा एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं हैं। अध्यात्म बस यह सिखाता है कि पैसा कहीं तुम्हारा मालिक न बन बैठे। पैसा ज़िंदगी के लिए होना चाहिए, ज़िंदगी पैसे के लिए नहीं; ज़िंदगी सच्चाई के लिए होनी चाहिए।
तुम ट्रेन पकड़ने जा रहे हो और तुम दौड़ रहे हो। बीच-बीच में रुक जाते हो और मोटिवेशनल वीडियो देखते हो? ऐसा होता है क्या? वहाँ तुम्हें मोटिवेशन नहीं चाहिए होता, वहाँ तुम्हें घड़ी चाहिए होती है। तथ्य काफ़ी है। मोटिवेशन उनको चाहिए, जो कोई काम बिल्कुल अंधे होकर कर रहे हैं। भीतर से कोई ललक है ही नहीं, लेकिन डर के मारे वो काम करना भी पड़ रहा है। मोटिवेट होकर भी क्या होगा? तुमने काम ही ग़लत उठा लिया है, क्योंकि काम अगर सही होता है, तो काम ही जान बन जाता है। फिर मोटिवेशन नहीं चाहिए होता।
तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा।
आप लोगों ने छवि बना ली है अध्यात्म की कि अध्यात्म का मतलब होता है, एक बंद कमरा, एक सुनसान जगह, और एक ऐसा आदमी, जिसे दुनियादारी की कोई तमीज़ नहीं है। कमाना भी एक युद्ध होता है। कमाने में एक पुरुषार्थ होता है, कर्मठता होती है। मैं दुनिया की दौड़ में फँस जाने को नहीं कह रहा हूँ। लेकिन मैं कह रहा हूँ कि अगर तुम्हारा बंधन ही आर्थिक है, तो उसकी काट भी तो आर्थिक ही रखनी पड़ेगी न। और आर्थिक काट दो तरह से रखी जाती है, एक तो जो फ़ालतू के ख़र्चे हों, वो बंद कर दो; और दूसरी यह कि आमदनी बढ़ा लो।
इतिहास में जो बड़े-से-बड़े नरसंहार हुए हैं, उनमें से न जाने कितने बस इसी बात पर हुए हैं कि तू अपना धर्म परिवर्तन कर, और मान कि मेरा धर्म सच्चा है। नहीं तो मैं तेरे गाँव में आग लगा दूँगा, तुझे मार दूँगा, महिलाओं का बलात्कार कर दूँगा, सारी संपत्ति लूट लूँगा। ये सब करूँगा। ये सब क्यों? क्योंकि तू मेरी बात नहीं मानता, तू काफ़िर है। क्या है ये? मान्यता का मतलब ही है हिंसा। जहाँ मान्यता होगी, वहाँ हिंसा होगी ही होगी। मान्यता है तो हिंसा है।
आपका कहना है कि “सब ठीक है, कुछ भी बदलने की ज़रूरत क्या है?” और मैं कह रहा हूँ, कुछ भी ठीक नहीं है, सब कुछ बदलने की ज़रूरत है। तुम्हें तुम्हारी मंज़िल मिल गई है, और मैं कहता हूँ कि मैं जिस यात्रा पर हूँ, उसमें मंज़िल अनंत है। मुझे पता है, मुझे मरते दम तक मंज़िल नहीं मिलनी। मेरा काम उनके लिए है, जिनकी असंतुष्टि रुकने का नाम नहीं ले रही, जिनके दिल में आग लगी हुई है। मुझे एक पल का चैन नहीं, और तुम्हें कहीं बेचैनी नहीं। तुम मेरे साथ कैसे हो? बताओ।
बच्चे को स्मॉल पॉक्स हुई है। और आपसे कोई कहेगा ये चेचक नहीं है, माता आई है इसको, और पाँच दिन तक इसको फलाने तालाब की मिट्टी का पानी छानकर पिलाओ। ये बात कौन मान सकता है? सिर्फ ऐसा आदमी जो अपनी ज़िंदगी के किसी भी पहलू में तथ्यों के लिए इज़्ज़त नहीं रखता। आप अगर ऐसे आदमी हो जो एक सच्ची ज़िंदगी जीते हो, तो आप सवाल पूछोगे ना? जो लोग तथ्य से जितना घबराते होंगे, वो उतने ज़्यादा अंधविश्वासी होंगे।
जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है न, जब तक उसके प्रति, उसके विरुद्ध सक्रिय ऊर्जा नहीं उठेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं आता। बहुत सोच-समझ के कहा है — नफ़रत, घृणा होनी चाहिए। जो घृणा की ऊर्जा होगी न वही ऊर्जा काम आएगी। जो संतुष्ट हैं, उनकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता।
वह अध्यात्म भी बड़ा गड़बड़ है, जो कहता है कि पैसा तो पाप है और हाथ का मैल है। हाथ का मैल-वैल नहीं होता है; मेहनत से कमाया जाता है। खाना चाहिए होता है, कपड़ा चाहिए होता है; उसकी अपनी एक जगह है। इतना कमाओ कि कहीं हाथ न फैलाना पड़े। लेकिन तुम यह सोचो कि पैसे से मानसिक पूर्णता मिल जाएगी, तो यह नहीं होने वाला। और जब ये उम्मीद नहीं रहती कि पैसा पूर्णता दे देगा, तो फिर आदमी अंधों की तरह पैसे के पीछे नहीं भागता।
अपने हिसाब से भगवान को आपने चुना, उसके बाद उम्मीद भी आपने ही लगाई कि अब ये मेरी कामना है, ये आप पूरी करो। और हम खुशामद करेंगे, पाँव पड़ेंगे, दूध चढ़ाएँगे, तो वो प्रसन्न हो जाएगा और हमारी डिज़ायर्स पूरी करेगा। भगवान को इन चीज़ों से क्या मतलब है? भगवान माने सत्य; जो पहले ही पूर्ण है, वो आपका पैसा लेकर क्या करेगा? जो आप चढ़ा रहे हो, किसी की जेब में तो जा रहा है न। जिसकी जेब में जा रहा है, उसी का स्वार्थ है और उसी ने सारी गड़बड़ फैलाई है।
तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।
देवी इत्यादि किसी के शरीर में नहीं प्रवेश करती, ये निश्चित रूप से एक मानसिक बात है। और इसीलिए ये चीज़ पाई वहीं पर जाती है ज़्यादा, जहाँ पर इस तरह की भ्रांतियाँ प्रचलित होती हैं। जिसके मन में ये बात पहले से होगी कि देवी इत्यादि प्रवेश करती हैं, वहाँ ये चीज़ खूब होगी। पुराने आदिवासी कबीलों में चले जाओ, वहाँ नियमित रूप से ऐसा होता है कि किसी पर कोई आकर के पुरखा सवार हो गया या किसी पर आकर के कुल देवता सवार हो गया।
ये सारी बात अपने लिए होती है, किसी दूसरे की जान लेने के लिए थोड़ी होती है। तीन साल की बच्ची है, उसकी तो अभी चेतना ही विकसित नहीं हुई है। संथारा जानने-समझने योग्य जो लोग हैं, उनके लिए प्रासंगिक हो सकती है, वहाँ प्रासंगिक। छोटी बच्ची के लिए थोड़ी उसकी कोई, वहाँ न उसकी प्रासंगिकता है, न कोई उपादेयता है। ये क्रूरता है, एक प्रकार की।
गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।
कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।
जानते-बूझते कुछ नहीं, बस किए जा रहे हैं — यही अंधविश्वास है। कोई भी चीज़ इसलिए ठीक नहीं हो जाती, क्योंकि वो पीछे परंपरा से आ रही है। हमेशा पूछा करो — क्यों? जो सवाल नहीं पूछ सकता, वो इंसान ही नहीं है। आपकी जिज्ञासा ही आपको इंसान बनाती है। पीछे से सिर्फ़ वो लेना है जो कभी पीछे नहीं छूट सकता। पीछे से आप वेदांत दर्शन ले सकते हो, क्योंकि वो उस विषय की बात करते हैं, जो समय के साथ बदलता ही नहीं है।
मनुष्य ही है जो बंधन का अनुभव करता है, इसलिए उसे अर्थ चाहिए। ज़िंदगी मिली है भीतरी बंधन तोड़ने के लिए, न कि भीड़ या रेस में दौड़ने के लिए। हमें लगता है रेस में दौड़ने वाले मेहनत कर रहे हैं, पर वो मौज कर रहे हैं। निरर्थक काम करने में तो मेहनत लगती है, लेकिन अकेले चलने और सार्थक काम करने में उससे कहीं ज़्यादा मेहनत लगती है। खोजो वो, जो जीवन को अर्थपूर्ण बना दे। भीड़ में जीवन नहीं लगाना है, क्योंकि भीड़ में निरर्थकता है। उस निरर्थकता से बचना ही सार्थकता है।
हनुमान चालीसा की शुरुआत ही, "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर" से होती है। पहला ही शब्द 'ज्ञान' है। जब ज्ञान रहता है, तो ये भूत-प्रेत आदि व्यर्थताएँ दिमाग़ में आती ही नहीं। भूत-पिशाच आदि का कोई अस्तित्व नहीं होता, लेकिन जिसका अंधविश्वास है कि भूत-प्रेत तो होते ही हैं, उसको संतों ने कहा कि हनुमान जी का जाप करोगे तो भूत-प्रेत निकट नहीं आएँगे। हनुमान, श्रीराम तक पहुँचने का साधन हैं। एक बार श्रीराम के निकट आ जाओगे, तो अंधविश्वास से स्वयं ही मुक्त हो जाओगे।

ये जीने का एक नया तरीक़ा है, क्योंकि हम तो हासिलियत की ही भाषा और ज़िंदगी जानते हैं न। हम कहते हैं, कहीं गए हैं, तो वहाँ से कुछ प्राप्ति हो जाए। यहाँ खेल प्राप्ति का है ही नहीं। यहाँ से भी उठ के जाओ तो ये मत कहना, कि ये प्राप्ति हो गई, ये जान लिया, ये समझ लिया। तुम थे, वो ज़रूरी है, तुम्हारा होना क़ीमती है, वही निष्कर्ष है।

श्रीकृष्ण अर्जुन को उच्चतम ज्ञान बता रहे हैं — आत्मज्ञान। उसके बाद व्यवहार की चीज़ें बहुत सरल हो जाती हैं। जो आख़िरी बात जान गया, उसको बाक़ी बातें समझाना बहुत आसान हो जाता है। जिसने ब्रह्मविद्या साध ली, उसको अब और कुछ भी साधना मुश्किल नहीं पड़ेगा। ब्रह्मविद्या माने स्वयं को हरा देना। जो गीता का हो गया, वह जान जाता है भली-भाँति कि सांसारिक परीक्षाएँ भी कैसे पार करनी हैं। उसको हराना असंभव हो जाएगा।

“यज्ञ” का अर्थ है — जो कुछ भी किसी निचले स्तर पर है, उसे उठाकर ऊँचे स्तर पर रख देना। जो भी संसाधन आपके पास है — समय, ध्यान, चिंतन, धन, श्रम — उसे उच्चतम को समर्पित कर देना, यज्ञ है। एक बार जान जाओ कि कोई चीज़ ऊँची है, सर्वस्व समर्पित कर दो। अपने लिए कुछ बचाकर मत रखो। “आरोहण है गीता” — नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते चलो, यही यज्ञ है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से जो लोगों ने सिखा दिया है, उसकी वजह से मैं भुगत रहा हूँ। अब क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: देखो, व्यवहारिक होकर देखा करो। किसी की भी गलती हो, भुगत कौन रहा है? जल्दी बताओ। तुम बिलकुल सही जा रहे हो अपनी सड़क पर। और सड़क…

नागपंचमी में साँप को पकड़कर दूध पिलाते हैं, इसमें साँपों को बहुत कष्ट दिया जाता है। साँप मैमल नहीं, रेप्टाइल है; वह दूध नहीं पीता। पर ज़बरदस्ती एक छवि बनाई गई है, क्योंकि हमारे दिमाग में साँप का आदिम डर बैठा हुआ है। प्रतीक के तौर पर देखें तो साँप का अर्थ है प्रकृति का वो रूप जिससे आप बहुत डरते हो। शिव का साँप से संबंध प्रतीकात्मक है, उसमें यह सीख दी जाती है कि प्रकृति से सही संबंध रखोगे तो उससे डरोगे नहीं, और प्रकृति से न डरने का अर्थ है 'मृत्यु से न डरना'।

शरीर का तो भविष्य है, तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है। शरीर के भविष्य के लिए, शरीर को जो करना है, करने दो। तुम क्यों परेशान हो? दुनिया का हर प्राणी थोड़ा बहुत बचा के रखता है — ठीक है? ये शरीर का काम है। वो शरीर के लिए बचा रहा है, तो बचाए। तुम अपने लिए कुछ मत बचाना, तुम सारी बचावट से मुक्त रहो।

बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं। ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।