
नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।

धर्मग्रंथों को जाति-व्यवस्था के चश्मे से देखने के बजाय उनके मूल संदेश को समझना आवश्यक है। श्रुति का केंद्र जाति, लिंग या सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि अहंकार और उससे मुक्ति है। पारंपरिक व्याख्या से अलग समझ को पुनर्व्याख्या मानकर खारिज करना उचित नहीं। वास्तविक अध्यात्म बाहरी पहचान नहीं, अपनी नीयत, भ्रम और कपट को ईमानदारी से देखने तथा आत्मबोध की ओर बढ़ने का आग्रह करता है।







आपका हर assumption आपको भीतरी तौर पर और ज्यादा वह बना देता है जो आप पहले से ही हो। Assumption ऐसे ही नहीं उठते। जब भी कोई बोले ना, 'No but I assumed…हंसने लग जाइए।' यह assumption नहीं है। यह साजिश है। All assumptions are conspiracies.








ग़रीब आदमी को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है वास्तविक धर्म की। और सबसे ज़्यादा ग़रीब ही होता है, जिसको लोक धर्म का चूर्ण चटा दिया जाता है।

वैज्ञानिक के भीतर बोध ना हो, ये बिल्कुल संभव है। वैज्ञानिक के भीतर कई तरह की माया बैठी हो, पूर्वाग्रह बैठे हों, ये संभव है। लेकिन ज्ञानी के भीतर अवैज्ञानिक दृष्टि हो, ये संभव नहीं है। वैज्ञानिक तो वो सब भी होते हैं — रॉकेट छोड़ने से पहले नारियल फोड़ना, ये सब वैज्ञानिकों का ही तो काम है।



प्रश्नकर्ता: सर,आज शाम को चन्द्रयान सफ़लतापूर्वक चाँद पर लैंड (उतरना) कर गया है। हमें भी बहुत खुशी है और पूरा देश भी बहुत खुश है। इस पर आपकी प्रतिक्रिया जानना चाहेंगे?





आपने कोई किताब नहीं पढ़ी, आप बैठकर पॉडकास्ट देख रहे हो। आप जो-जो बोला जा रहा है, पहले तो आपको पता नहीं चलेगा कि वो जो आदमी वहाँ बैठा है, वो यूँही कोई फ्रॉड, फ़र्जी है या कोई असली आदमी है। ज़्यादातर जो लोग आते हैं, वो फ्रॉड ही होते हैं। और दूसरी बात, अगर वो मान लो असली आदमी भी है जो पॉडकास्ट में बैठा है, तो उसकी बात आपको समझ में नहीं आएगी क्योंकि आपकी अपनी तो कोई प्रिपरेशन, कोई ग्राउंडिंग है ही नहीं। आपने आज तक कोई किताब नहीं पढ़ी, तो वो जो बोल रहा है, वो समझ में भी नहीं आएगा।


जो आम आदमी की फिलॉसफी है, वह यही है कि दुनिया की सबसे बड़ी जो ताकत है, जिस पर पूरा भरोसा किया जा सकता है, जो सब कुछ ठीक कर सकती है, जो सब कुछ चलाती है, वह ऊपर कहीं आसमानों में बैठी है। माने, वह इस दुनिया की नहीं है। माने, जो कुछ इस दुनिया का है, उसका भरोसा मत करो, वह ना कुछ जानता, ना समझता, वह तो गड़बड़ी है। माने, अगर आपकी कोई शारीरिक समस्या भी है, तो उसका समाधान वही करेगा, जो आसमानों में बैठा है। यही तो द्वैतवाद दर्शन है ना? हम गीता का दर्शन थोड़ी समझ पाए हैं।

पता किसी को नहीं है, खर्च सबको करना है। ये सुपरस्टिशन है। बात सिर्फ़ भूत-प्रेत, डायन, चुड़ैल की नहीं है, दूल्हा-दुल्हन की भी है। या तो उनको ही बोल लो। पर जो कुछ भी तुम्हारी जिंदगी में चल रहा है और तुम्हें कुछ पता नहीं है कि मामला क्या है, वो सब अंधविश्वासी ही है, और बहुत दूर तक जाता है। सोचो सात साल का बच्चा रहा होगा और किसी अनपढ़ ने नहीं मारा, प्रिंसिपल (प्राचार्य) ने मारा है।




हम इतने छोटे से रह गए हैं और हमारे सामने आ जाएँ बिलकुल कि जैसे सचमुच थे राम और जो सचमुच रौद्र रूप है दुर्गा का तो बात हमें अपमान की लगती है कि ये तो इतने बड़े, हम इतने छोटे तो क्या करते हैं? हम उनको ही छोटा बना देते हैं ताकि वो हमारे हाथ का खिलवाड़ बन जाएँ, हमारे हाथ का खिलौना बन जाएँ। लोग छोटी-छोटी देवी लेकर घुम रहे हैं इस बार। ये देवी हैं कि पहाड़ से भी बड़ी पहाड़, और हम उनको क्या बना रहे हैं? तो यही है ताकि सबकुछ हमारे खिलौने जैसा हो पाए। क्योंकि धर्म को ही हमने अपना खिलौना बना लिया है, “लोगन राम खिलौना जाना।”



एक बार को ज़िंदगी में चोर आ रहा हो, लुटेरा आ रहा हो, भ्रष्टाचारी आ रहा हो तो मजबूरी में उसको स्वीकार कर लेना, हालत ऐसी बने तो। पर ज़िंदगी में अगर अंधविश्वासी आ रहा हो, पलटकर भागना। आपने कभी सोचा ये डर क्या है? ये अहंकार है, ये अज्ञान है जो मानता ही नहीं कि तुम पूरे तरीके से कंडीशन्ड (संस्कारित) हो।









प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, बचपन से ही एक सवाल है जो काफ़ी अजीब लगता है कि अभी दिवाली आने वाली है और जैसे प्रचलित कहानी है कि दिवाली के दिन राम घर वापस आए थे। पर दिवाली के दिन राम का तो कहीं भी नाम नहीं होता है,

आचार्य प्रशांत: वैदिक धर्म से ज़्यादा साफ़, सुंदर, अंधविश्वास से रहित, तथ्यों और सत्यता से परिपूर्ण कोई धर्म है नहीं। लेकिन उसी हिंदू-धर्म को अंधविश्वासों का, कुरीतियों का, एक गर्हित संस्कृति का गढ़ बना दिया गया है; सत्य, आत्मा और ब्रह्म की तो कोई बात ही नहीं। उसकी जगह हिंदू

आचार्य प्रशांत: ये इन सबको रीयल! (वास्तविक) क्योंकि अनरीयल (अवास्तविक) कैसे बोलोगे! भई, तुम जिसे अनरीयल बोलते हो, किस आधार पर बोलते हो? कुछ भी तुम

नाम जप तभी उपयोगी साधना बनता है जब जपे जाने वाला नाम किसी छवि, व्यक्ति, कहानी या सांसारिक विषय की ओर संकेत न करे। सामान्य नाम मन में इच्छाओं और अहंकार से जुड़े विषयों को मजबूत करते हैं, जबकि निर्गुण नाम मन को उन विषयों के बोझ से हल्का कर सकता है। इसलिए नाम जप का उद्देश्य किसी कल्पित रूप की पूजा करना नहीं, बल्कि अपनी सीमित पहचान से आगे जाने की आकांक्षा, यानी मुमुक्षा, को जगाना है।
मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उनकी अनिवार्यता से जुड़ी मान्यताएँ हैं। हम जिन चीज़ों को अपरिहार्य मानकर पकड़े रहते हैं, वही हमारे दुख का कारण बनती हैं। समाधान समस्याओं से लड़ने में नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं को निष्पक्ष होकर देखने में है। जैसे ही मन कुछ क्षणों के लिए अपने पूर्वाग्रहों को स्थगित करता है, सत्य की झलक मिलती है। वही झलक भीतर प्रेम जगाती है, और वही प्रेम व्यक्ति को अपने बंधनों को छोड़कर स्वतंत्रता, सत्य और वास्तविक जीवन की ओर बढ़ने का साहस देता है।
हम जिन भावनाओं, इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और रिश्तों को अपना मानते हैं, उनमें से अधिकांश समाज, परिवार, शिक्षा, मीडिया और वातावरण द्वारा आरोपित होते हैं। व्यक्ति अपनी ही नहीं, उधार ली हुई मान्यताओं के अनुसार जीता है और फिर उसी को अपनी पहचान समझ लेता है। वास्तविक स्वतंत्रता तब शुरू होती है जब हम अपने विचारों, भावनाओं और लक्ष्यों की जाँच करते हैं, झूठे प्रभावों को पहचानते हैं और अपने जीवन को सचेत रूप से जीना शुरू करते हैं।
ये जितने आकाशीय खगोलीय पिंड हैं, ग्रह–नक्षत्र, चाँद–तारे, इनका मनुष्य के जीवन पर कोई प्रभाव पड़ता हो, न इसकी कोई पुष्टि है, न कोई प्रमाण है। इस पूरी चीज़ का मनोवैज्ञानिक कारण बस इतना ही है: अपने ऊपर दायित्व न लेना, बल्कि दायित्व भाग्य पर डाल देना। जब भी कोई देश पूजने लग जाता है अपनी मान्यताओं को, और तर्क की आवाज़ों को सुनने से मना कर देता है, तो फिर कोई बाहरी ताक़त आकर उसको ग़ुलाम बनाती है। भारत ने प्रमाण को ठुकरा दिया, मान्यता पर चलना शुरू कर दिया, वो भारत की ग़ुलामी बन गया।
इतिहास में जो बड़े-से-बड़े नरसंहार हुए हैं, उनमें से न जाने कितने बस इसी बात पर हुए हैं कि तू अपना धर्म परिवर्तन कर, और मान कि मेरा धर्म सच्चा है। नहीं तो मैं तेरे गाँव में आग लगा दूँगा, तुझे मार दूँगा, महिलाओं का बलात्कार कर दूँगा, सारी संपत्ति लूट लूँगा। ये सब करूँगा। ये सब क्यों? क्योंकि तू मेरी बात नहीं मानता, तू काफ़िर है। क्या है ये? मान्यता का मतलब ही है हिंसा। जहाँ मान्यता होगी, वहाँ हिंसा होगी ही होगी। मान्यता है तो हिंसा है।
बच्चे को स्मॉल पॉक्स हुई है। और आपसे कोई कहेगा ये चेचक नहीं है, माता आई है इसको, और पाँच दिन तक इसको फलाने तालाब की मिट्टी का पानी छानकर पिलाओ। ये बात कौन मान सकता है? सिर्फ ऐसा आदमी जो अपनी ज़िंदगी के किसी भी पहलू में तथ्यों के लिए इज़्ज़त नहीं रखता। आप अगर ऐसे आदमी हो जो एक सच्ची ज़िंदगी जीते हो, तो आप सवाल पूछोगे ना? जो लोग तथ्य से जितना घबराते होंगे, वो उतने ज़्यादा अंधविश्वासी होंगे।
अपने हिसाब से भगवान को आपने चुना, उसके बाद उम्मीद भी आपने ही लगाई कि अब ये मेरी कामना है, ये आप पूरी करो। और हम खुशामद करेंगे, पाँव पड़ेंगे, दूध चढ़ाएँगे, तो वो प्रसन्न हो जाएगा और हमारी डिज़ायर्स पूरी करेगा। भगवान को इन चीज़ों से क्या मतलब है? भगवान माने सत्य; जो पहले ही पूर्ण है, वो आपका पैसा लेकर क्या करेगा? जो आप चढ़ा रहे हो, किसी की जेब में तो जा रहा है न। जिसकी जेब में जा रहा है, उसी का स्वार्थ है और उसी ने सारी गड़बड़ फैलाई है।
हम कॉन्शियस बीइंग्स हैं, कॉन्शियसनेस का काम होता है जानना। कोई सुपरस्टिशस काम कर रहा है और कह रहा है, ‘ऐसे कर रहा हूँ, तुम भी करो।’ तर्क आपको नहीं देना है, तर्क उनके पास होने चाहिए जो ये सब कर रहे हैं। वो तर्क दें, फिर उन तर्कों का परीक्षण करा जा सकता है कि वे कितने फैक्चुअल हैं, उनमें हाइपोथेसिस कितना है, सपोज़िशन कितना है। आपके लिए इतना कहना पर्याप्त है कि आई एम अ कॉन्शियस बीइंग, जो तभी कुछ करती है जब वह पहले समझ लेती है।
देवी इत्यादि किसी के शरीर में नहीं प्रवेश करती, ये निश्चित रूप से एक मानसिक बात है। और इसीलिए ये चीज़ पाई वहीं पर जाती है ज़्यादा, जहाँ पर इस तरह की भ्रांतियाँ प्रचलित होती हैं। जिसके मन में ये बात पहले से होगी कि देवी इत्यादि प्रवेश करती हैं, वहाँ ये चीज़ खूब होगी। पुराने आदिवासी कबीलों में चले जाओ, वहाँ नियमित रूप से ऐसा होता है कि किसी पर कोई आकर के पुरखा सवार हो गया या किसी पर आकर के कुल देवता सवार हो गया।
ये सारी बात अपने लिए होती है, किसी दूसरे की जान लेने के लिए थोड़ी होती है। तीन साल की बच्ची है, उसकी तो अभी चेतना ही विकसित नहीं हुई है। संथारा जानने-समझने योग्य जो लोग हैं, उनके लिए प्रासंगिक हो सकती है, वहाँ प्रासंगिक। छोटी बच्ची के लिए थोड़ी उसकी कोई, वहाँ न उसकी प्रासंगिकता है, न कोई उपादेयता है। ये क्रूरता है, एक प्रकार की।
जानते-बूझते कुछ नहीं, बस किए जा रहे हैं — यही अंधविश्वास है। कोई भी चीज़ इसलिए ठीक नहीं हो जाती, क्योंकि वो पीछे परंपरा से आ रही है। हमेशा पूछा करो — क्यों? जो सवाल नहीं पूछ सकता, वो इंसान ही नहीं है। आपकी जिज्ञासा ही आपको इंसान बनाती है। पीछे से सिर्फ़ वो लेना है जो कभी पीछे नहीं छूट सकता। पीछे से आप वेदांत दर्शन ले सकते हो, क्योंकि वो उस विषय की बात करते हैं, जो समय के साथ बदलता ही नहीं है।
हनुमान चालीसा की शुरुआत ही, "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर" से होती है। पहला ही शब्द 'ज्ञान' है। जब ज्ञान रहता है, तो ये भूत-प्रेत आदि व्यर्थताएँ दिमाग़ में आती ही नहीं। भूत-पिशाच आदि का कोई अस्तित्व नहीं होता, लेकिन जिसका अंधविश्वास है कि भूत-प्रेत तो होते ही हैं, उसको संतों ने कहा कि हनुमान जी का जाप करोगे तो भूत-प्रेत निकट नहीं आएँगे। हनुमान, श्रीराम तक पहुँचने का साधन हैं। एक बार श्रीराम के निकट आ जाओगे, तो अंधविश्वास से स्वयं ही मुक्त हो जाओगे।
नागपंचमी में साँप को पकड़कर दूध पिलाते हैं, इसमें साँपों को बहुत कष्ट दिया जाता है। साँप मैमल नहीं, रेप्टाइल है; वह दूध नहीं पीता। पर ज़बरदस्ती एक छवि बनाई गई है, क्योंकि हमारे दिमाग में साँप का आदिम डर बैठा हुआ है। प्रतीक के तौर पर देखें तो साँप का अर्थ है प्रकृति का वो रूप जिससे आप बहुत डरते हो। शिव का साँप से संबंध प्रतीकात्मक है, उसमें यह सीख दी जाती है कि प्रकृति से सही संबंध रखोगे तो उससे डरोगे नहीं, और प्रकृति से न डरने का अर्थ है 'मृत्यु से न डरना'।
असली धर्म की पहचान ही यही है कि ये आदमी फालतू की प्रथा, परंपरा, झाड़फूंक, टोना-टोटका, रस्मों, रिवाज़, अंधविश्वास, इस पर हँसेगा। वो ठुकराएगा भी नहीं वो हँसेगा, बोलेगा "और दिखाओ, और दिखाओ, अच्छा चुटकुला है मनोरंजन हो रहा है और करो, और करो कैसे होता है।"
कर्मकांड में भी बहुत सारी विधियाँ ऐसी हैं जो प्रतीक के तौर पर उपयोगी हैं, पर बिना अर्थ जाने अगर तुम बस उनका पालन कर रहे हो, तो कोई लाभ नहीं होगा। भौतिक समृद्धि कर्मकांड से नहीं, विज्ञान से आती है। सनातन धर्म का अर्थ वेदान्त के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जो भी कर्म करते हो कर्मकांड के तौर पर, उसमें अपने आप से पूछ लो कि ये क्या सत्य का प्रतीक है? अगर है, तो ज़रूर करो; पर उसका अर्थ स्पष्ट नहीं है, तो फिर वो व्यर्थ जाएगी।
आचार्य प्रशांत: खुशी की बात तो है ही, और बहुत ज़रूरी था कि सुर्खियों में कोई वैज्ञानिक घटना आये,…
बाबा जी गाड़ी चलाते हैं इक्कीसवीं शताब्दी की, महँगी घड़ियाँ पहनते हैं, फ्लाइट से सफ़र करते हैं। टीवी, सोशल मीडिया — सब मॉडर्न टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन कपड़े पहनते हैं पाँचवीं शताब्दी के। ये पाखंड नहीं, खुली धोखाधड़ी है, जो आम भक्तों को समझ नहीं आती, क्योंकि उनके भीतर यह छवि बैठा दी गई है कि ऐसे कपड़े पहनने वाला आदमी धार्मिक होता है। जबकि सच्चा ज्ञानी काल-सापेक्ष कपड़े पहनता है और सामान्य आदमी की तरह सामने आता है। उसके पास उसकी बात होती है — कोई ख़ास प्रतीक या विशेष वस्त्र नहीं।
सही और गलत उधार की बातें हैं। जो बात एक देश में सही है, वो दूसरे में गलत मानी जाती है। जो आज सही है, वो कल गलत था। दो सौ साल पहले भारत में माना जाता था कि पति की मृत्यु पर पत्नी आत्मदाह करें — तब ये सही था। आज कोई इसे स्वीकार नहीं करेगा। तुम भूल जाते हो कि सही-गलत तुम्हें किसी और ने सिखाया है, और उन्हें भी किसी और ने। असली सही यह है कि तुम अपनी समझ और होश से जियो। बेहोशी में किया हर काम गलत है। सही और गलत क्या है, इसके लिए तुम्हारी विवेक-दृष्टि ही काफ़ी है।
आजकल बड़ा फ़ैशन बन गया है। लोग कहते हैं, ‘मैं मंदिर नहीं जाता, ये मूर्ति-पूजा वगैरह हम नहीं जानते।’ ये दंभ है, कोरा अहंकार है। मूर्ति की बड़ी उपयोगिता है। मूर्ति-पूजा बंद कर देने का अधिकार सिर्फ़ उसको है, जिसने अपने-आप को मूर्ति मानना बंद कर दिया हो। आस्तिक भी मूर्ति-पूजक है, नास्तिक भी मूर्ति-पूजक है। आवश्यक यह है कि तुम ऐसी मूर्ति चुनो, जो वास्तव में तुम्हें अमूर्त में प्रविष्ट करवा दे।
वामपंथ या दक्षिणपंथ का ठप्पा क्यों लगवाना है? तुम किसी पंथ के लिए थोड़े ही पैदा हुए हो, तुम मुक्ति के लिए पैदा हुए हो। सच के पारखी बनो, विचारधारा के अनुयायी नहीं। ज्ञान सब विचारधाराओं का होना चाहिए, क्योंकि उससे इतिहास की धारा का पता चलता है। लेकिन किसी भी विचारधारा का अनुयायी नहीं बनना है। विचारधारा आपको खुलकर सोचने, देखने और जीने नहीं देती, जैसे आप खूँटे से बँध गए हों। समद्रष्टा रहो—ज्ञान सबका रहे, पर ठप्पा कोई न रहे।
एक समूह अपने लिए आचरण के अच्छे-बुरे का जो निर्धारण करता है, उसे नैतिकता कहते हैं। उसमें ज्ञानियों द्वारा दी गई सीख नहीं, केवल बहुमत का ज़ोर होता है। इसीलिए अलग-अलग समाजों में नैतिकता-अनैतिकता के अलग-अलग मापदंड होते हैं और वह समय-समय पर बदलती भी रहती है। नैतिकता एक अंधी-सी चीज़ है। उसमें मनुष्य के विवेक के लिए कोई जगह नहीं होती। सही-गलत का फ़ैसला न समाज करेगा न परंपरा; इसका फ़ैसला सिर्फ़ आपकी आंतरिक जागृति ही कर सकती है।
कह रहे हैं कि ये तुमने जो तमाम तरह की कहानियाँ गढ़ ली हैं, ये कहानियाँ तुम्हारे अंजन का ही विस्तार हैं, निरंजन की कोई कथा नहीं हो सकती। सारी समस्या तब होती है जब धर्म में कथाएँ घुस जाती हैं। जितनी तुमने किस्से बाज़ियाँ और कहानियाँ ये खड़ी की हैं, इन्होंने ही तुम्हारे धर्म को चौपट कर दिया है। श्रीराम को निरंजन ही रहने दो, श्रीकृष्ण को भी निरंजन ही रहने दो। जैसे ही तुमने गोपी संग गोविंद बना दिया, वैसे ही मामला अंजन का हो गया। गोविंद को गोविंद रहने दो, गोपियाँ मत लेकर के आओ।
भारत में इतनी सदियाँ, शताब्दियाँ बीती हैं, पुराना राष्ट्र है हमारा। ज्ञान-विज्ञान में निश्चित रूप से कुछ बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करी हैं। उनके बारे में बताना एक बात है। आप आर्यभट्ट के बारे में बता रहे हैं, आप वराहमिहिर के बारे में बता रहे हैं, या कि आप महर्षि पाणिनी के बारे में बता रहे हैं, ये एक बात होती है। और आप भारत में क्या-क्या प्रथाएँ परंपराएँ रही हैं और भारतीयों ने क्या-क्या बातें मान्यता के तौर पर मानी हैं, अंधविश्वास के तौर पर मानी हैं, उनको आप बता रहे हैं छात्रों को; ये दो बहुत अलग-अलग बातें हैं।
यदि तुम पूर्व-निर्धारित ढ़र्रे पर ही जीते हो तो किसी ज्योतिषी की भी ज़रूरत नहीं है। कोई राह चलता भी तुम्हारी शक्ल देखकर बता देगा कि बाईस तक पढ़ाई, पच्चीस में सगाई, फिर विदाई, फिर दनादन पिटाई। क्योंकि जो ढ़र्रे पर चल रहा है उसका सबकुछ तय है, इसलिए उसका भविष्य निर्धारित किया जा सकता है। परंतु यदि तुम्हारा जीवन आज़ादी में, मुक्ति में, होश में बीत रहा है, तो कोई भी ज्योतिषी नहीं बता सकता, कि तुम्हारा कल कैसा होगा।
जाप भर करने से क्या होगा अगर बोध नहीं हुआ? समझ जागने के बजाय, वह रुक जाती है जब आप रटने में विश्वास करने लगते हैं, और चेतना जड़ हो जाती है। मंत्र अथवा श्लोकों को रटकर समझ नहीं पाएंगे। साफ़ उच्चारण एक प्रशंसनीय बात है, पर उच्चारण भर से काम नहीं चलेगा। वेद का अर्थ ही होता है ‘जानना’, ‘बोध’; अतः उनके मंत्रों को रटकर दोहराना बहुत अपर्याप्त है।
असल में नकली ग्रंथ को, या नकली साधक को, या नकली आध्यात्मिक गुरु को पहचानने का ये एकदम रामबाण तरीका है। ये देखो कि उसका साइंस, विज्ञान के प्रति रुख क्या है। जिस स्पिरिचुअल (आध्यात्मिक) ग्रंथ में, या टीचर में साइंस के लिए इज़्ज़त न हो, वो आदमी साइंस को ही नहीं स्पिरिचुअलिटी को भी इज़्ज़त नहीं देता। अगर आपको कोई स्पिरिचुअल लीडर मिला जो साइंस का मज़ाक उड़ाता है, या साइंस के महत्व पर ज़ोर नहीं देता, तो वो आदमी साइंस ही नहीं स्पिरिचुअलिटी से भी अनभिज्ञ है। उसको पूरी तरह हटाओ।
अवतार वो होता है जो बहुत कुछ आपके जैसा है, लेकिन आपके जैसा होते हुए भी वो संकल्प और साहस करता है आत्मा जैसा होने का — उसको अवतार बोलते हैं, उसमें दोनों चीज़ें एक साथ पाई जाती हैं। अवतार आदर्श नहीं हो सकता। आदर्श का मतलब होता है कि एक विचार है, एक कल्पना है और उसी कल्पना के तल पर उसका निर्माण कर दिया गया है। नहीं, अवतार कोई तभी हो सकता है, जब उसमें आपको कुछ मानव सुलभ गुण और दुर्बलताएँ भी देखने को मिलें।
यह सोच कि सुबह तीन बजे या चार बजे उठ गए तो ब्रह्म मुहूर्त हो गया, बिल्कुल निराधार है। ऋषि-मुनि प्राचीन काल में सुबह प्रार्थना, सत्संग, और ब्रह्म चर्चा करते थे, इसलिए उस समय को ब्रह्म मुहूर्त कहा गया। लेकिन अगर ब्रह्म चर्चा ही न हो रही हो, तो उसे ब्रह्म मुहूर्त कैसे कह सकते हैं? इसलिए कोई समय विशेष ब्रह्म मुहूर्त नहीं होता। विशेष वह समय है, जो तुम्हें समय के पार ले जाए। जहाँ ब्रह्म चर्चा हो, वही ब्रह्म मुहूर्त है।
यह बिल्कुल भी मत सोच लेना कि जिसको होश आ गया, वह कहीं हिमालय पहुँच जाता है और दुनिया से कट जाता है। अध्यात्म दुनिया को डटकर जीने के लिए है। संत योद्धा होता है। जो बोध साहित्य पढ़ेगा, वह इसी दुनिया में जिएगा और अपनी शर्तों पर जिएगा, अपने हिसाब से जिएगा।
हम न पूजा-पाठ जानते हैं, न भजन-कीर्तन जानते हैं। बस करते जाते हैं, निभाते जाते हैं। आप जो कुछ भी करते हो, पूजा-पाठ, तप, यज्ञ इत्यादि, पूछिए कि इससे आपकी परेशानी कैसे मिट रही है? बिना जाने-समझे पूजा-पाठ करते-करते यह स्थिति आ गई है कि अब एक पीढ़ी खड़ी हो गई है, जो किसी भी तरह की पूजा, पाठ या जप करना ही नहीं चाहती। मंदिर बहुत लाभ की जगह हो सकता है, अगर उसे रूढ़िवादी स्थान न बना दिया जाए।
जो आवश्यक है उसके साथ रहो। पूजा आवश्यक है, पूजा का कोई विशिष्ट रूप आवश्यक नहीं है। भजना आवश्यक है, भजन का कोई विशिष्ट प्रकार आवश्यक नहीं है। लेकिन ये बात भी समझना कि विशिष्ट प्रकारों से वही छूटते हैं जिनके मन में भजन गहराई से प्रवेश कर गया हो।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे एक चीज़ पूछनी थी कि जैसे आपकी चेतना है या ओशो रजनीश की चेतना, हम ये मान के चल रहे हैं कि आप लोगों की चेतना एक आम चेतना से बहुत ऊपर है। तो क्या हम ये मान के चलें जब ऐसे धर्मगुरु शरीर छोड़ते हैं…
आचार्य प्रशांत: देखो, डाउट और ट्रस्ट दोनों किसी ऑब्जेक्ट पर होते हैं। फ़ेथ भी जब तक उस तरह की है कि कोई ऑब्जेक्ट है उसका, तब तक तो घटेगी-बढ़ेगी है ही। फ़ेथ एबसोल्यूट तब होती है जब वो ऑब्जेक्टलेस (निष्प्रयोजन) होती है। अगर तुम इतना भी कह रहे हो न…
प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न नोट्स में से है: "बीइंग अवेयर ऑफ़ डिमांड्स ऑफ बॉडी, बीइंग अवेयर ऑफ़ स्ट्रे थॉट्स, दिस इज़ इंटेलिजेंस। इट ऑकर्स थॉट् इज़ एन इनेडिक्वेट रिस्पांस टू स्टिमुलस। एन एडीक्वेट रिस्पांस इज स्पॉनटेनिटी।" ("शरीर की माँगों के प्रति जागरूक होना, आवारा विचारों से अवगत होना, यह बुद्धिमत्ता है।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। पहले मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ कि मैं आपको लगभग छह महीने से मैं सुन रहा हूँ और मुझे बहुत फ़ायदा हुआ है।
मैं आगे बढ़ते हुए पूछना चाहता हूँ कि हमें हमेशा कुछ-न-कुछ चुनाव करना होता है कि ये करें या तो ये करें।…
प्रश्नकर्ता: जो इमैजिनेशन (कल्पना) है।
आचार्य प्रशांत: इमैजिनेशन का पैमाना क्या होता है? आप कह रहे हैं कि जो काल्पनिक…
यथा ह्नुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीज क्षेत्र पुररेवावपन-काले गुल्मतृणवीरुद्धिर्गह्नमिव। भवत्येवमेव गृहा श्रमः कर्मक्षेत्र यस्मिन्न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथ:।।
“जिस प्रकार यदि किसी खेत के बीजों को अग्नि द्वारा जला न दिया गया हो तो प्रतिवर्ष जोतने पर भी खेती का समय आने पर वह फिर झाड़-झंखाड़, लता और तृण से आदि…