किसी विशेष अनुभव की तलाश में मत रहो || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

जीवन में जो भी तुम्हें ऊँचे-से-ऊँचे अनुभव हों, उनको एक सीमा से ज़्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। और जो लोग सच्चाई के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं उनको थोड़े अलग तरह के अनुभव होने शुरू हो जाते हैं, इससे मैं सहमत हूँ। और वो अनुभव आपको तभी नहीं होते जब आप ध्यान करने बैठें, आँखे बन्द करें या कोई क्रिया वगैरह करें। वो आपको साधारण जीवन में चलते-फिरते भी होने लग जाते हैं।
ऐसे अनुभव जो आम आदमी को होते नहीं और आम आदमी को जो अनुभव नहीं होते वो आपको हो रहे हैं इसका मतलब ये नहीं है कि आपको काली-पीली लहरें दिखने लग गयी हैं या कुछ विशिष्ट तरह की स्वर लहरियाँ सुनाई देने लग गयी हैं। नहीं,नहीं,नहीं; विशिष्ट अनुभव का मतलब ये भी होता है कि आपको कहीं ऐसे प्रेम का अनुभव हो गया जो साधारण आदमी को नसीब नहीं होता।
कि एक जो सड़क पर कुत्ता है उससे आपने बात कर ली। हिंदी-अंग्रेज़ी में नहीं, हो गयी बात; बस। साधारण आदमी नहीं कर पाता, आपकी बात हो गयी। आँखों-ही-आँखों में हो गया। (1:18ये) आपको पता है, बात हुई है। मैं इन अनुभवों की बात कर रहा हूँ। मैं जो कह रहा हूँ वो बात आपने कुछ ऐसे सुन ली जैसे साधारण आदमी सुन ही नहीं पाता; ये खास अनुभव हैं।
लोग कहते हैं हम बड़े योगी हैं, बड़े ध्यानी हैं। हमें तब अनुभव होते हैं जब हम आसन मारकर बैठते हैं, आँख बन्द करते हैं और समाधि में जाने की कोशिश करते हैं। तब तो तुम अभी बहुत निचले स्तर की साधना पर हो। तुमको इतना आयोजन करना पड़ता है, आसन बिछाना पड़ता है, ये करना पड़ता है वो करना पड़ता है तब तुमको खास अनुभव होने शुरू होते हैं। बड़ी कोशिशों के बाद तुम्हें खास अनुभव होते हैं।
असली आध्यात्मिक आदमी तो वो है जिसको रसोई में खास अनुभव हो जाए। उसको नहाते-धोते खास अनुभव हो जाए। जो यहाँ ऐसे सामने बैठा हो और उसको खास अनुभव हो गया। उसने तो कोई प्रबन्ध भी नहीं किया था, कोई कोशिश, तैयारी, आयोजन नहीं किया था लेकिन उसको अनुभव हो गया। ऐसा होता है आध्यात्मिक आदमी के साथ। उसको दिन में सौ दफे खास अनुभव होते हैं। ऐसे भी कह सकते हो कि उसका जो पूरा जीवन ही है वो विशेष अनुभवों की एक लड़ी बन जाता है। पल-पल जैसे एक शृंखला चल रही हो विशेष अनुभवों की, उसका हर अनुभव ही विशेष है।



