रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का पर्व नहीं, यह दुर्बल की रक्षा का संकल्प है। पौराणिक इतिहास में यह धागा शक्तिशाली को भी बांधा गया। आज असली जरूरत है पर्यावरण, पशु-पक्षी, मातृभाषा और संस्कृति की रक्षा की। भाषा गई तो संस्कृति जाएगी, संस्कृति गई तो अध्यात्म और फिर मानवता। इस रक्षाबंधन पर प्रण लें कि इन अनमोल धरोहरों की रक्षा करेंगे।
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रक्षाबंधन अर्थात रक्षा का बंधन। इसमें बहनें अपने भाइयों को रक्षा का धागा बांधती हैं। वास्तव में इतिहास में रक्षाबंधन भाई और बहन के बीच का पर्व ही नहीं रहा। भविष्यपुराण, स्कंदपुराण, पद्मपुराण, भागवत पुराण में उल्लेख मिलते हैं, जहां एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को रक्षा बांधी। वहां जरूरी नहीं कि इन दो व्यक्तियों में एक पुरुष और एक स्त्री हो।
भविष्यपुराण में उल्लेख है कि जब देव-दानव युद्ध में इंद्र हार रहे होते हैं, तो देवगुरु बृहस्पति इंद्र को रक्षा सूत्र बांधते हैं, और स्वस्ति वाचन करते हैं: येन बद्धो बलिराजा, दानवेंद्रो महाबलः। तेन त्वमपि बधनामी, रक्षे मा चल मा चल।
भावार्थ-जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेंद्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बांधता हूं। हे रक्षा (राखी) तुम अडिग रहना। गुरुकुल परंपरा में शिक्षा पूर्ण होने पर गुरु और शिष्य परस्पर रक्षा बांधते थे। रानी कर्णावती ने हुमायूं को रक्षा भेजी। यह परंपरा में आ गया कि बहन भाई को रक्षा बांधती है। इसमें अभिप्राय यही है कि जो दुर्बल है उसकी रक्षा की जानी चाहिए।
परंतु आज बहनों को रक्षा की जरूरत नहीं है। आज महिला हर प्रकार से सशक्त है। आज कुछ और है जो अच्छा है, परंतु मर रहा है, उसको रक्षा की जरूरत है। आज कमज़ोर है पर्यावरण, पृथ्वी, पशु-पक्षी। मौसम चक्र बदलने के कारण सबसे ज्यादा रक्षा की जरूरत पृथ्वी को है। पशु-पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियां प्रति दिन विलुप्त हो रही हैं, उन्हें सुरक्षा की जरूरत है। हमारी मातृभाषा विलुप्त रही है, आज हिन्दी लिखने वाले बहुत कम लोग बचे हैं।




