
काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए।









प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं आपका स्पष्टीकरण चाहूँगा कि इतिहास में ये भी देखा गया है कि धर्म परिवर्तन भी सबसे ज़्यादा भारतीयों का या

प्रश्नकर्ता: जो आपने प्रेम के बारे में मैंने आपके वीडियोज़ भी देखे, थोड़ा समझने की कोशिश करी तो ये समझ में आया कि हम कई बार व्यापार बहुत सारा कर रहे होते हैं, उनको प्रेम का नाम देते हैं। लेकिन जीवन में जो सम्बन्ध हैं, जैसे कोई भी सम्बन्ध है,

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं आपको पिछले दो सालों से सुन रहा हूँ। ये मेरा पहला सत्र है। तो पिछले काफ़ी टाइम से में तनाव में रहा। सत्र में आने से पहले काफ़ी चीज़ों, आपके सारे पुराने वीडियोज़ में देख रहा था। तो उसमें आपने ये कहा था कि अपनेआप

आचार्य प्रशांत: जो तुम कर रहे हो वह तुम कर नहीं रहे, तुम्हें लग रहा है कि तुम कर रहे हो। पीछे से तुम्हारी वृत्तियाँ, तुम्हारा जो वह कलुषित मालिक बैठा है वह करवा रहा है, कौन सा मालिक? भगवान मालिक नहीं, कौन मालिक?

आचार्य प्रशांत: जब मैंने ड्राइविंग सीखी थी, मैं छोटा था काफ़ी, लाइसेंस की उम्र भी नहीं थी, तभी घर पर एक


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। ऋषिकेश शिविर में आपने 'प्रायश्चित' शब्द बोला था। आपने बोला था कि प्रायश्चित करना चाहिए। तो आत्मप्रायश्चित कैसे करें, ये प्रक्रिया नहीं समझ आ रही। जैसे कि हम इस



प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। थोड़ा-सा पहली बार आया हूँ तो थोड़ा-सा बता दूँ कि कैसे आप तक पहुँचा। बहुत ज़ोर से भाग रहा था,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्कार। आपकी शिक्षाओं की वजह से मेरी निजी ज़िन्दगी में काफ़ी परिवर्तन आया है और एक चीज़ जो मैंने सीखी है वह है वर्तमान क्षण में जीना, जो आपने बहुत दिन पहले शुरुआती दिमाग वाली बात बतायी थी, वह निजी ज़िन्दगी में बहुत अच्छी तरह से काम

प्रश्नकर्ता: सर, मैं आपके साथ एकदम खुलकर बात करना चाहता हूँ। मैं आपको सुनने के साथ-साथ कई ऐसे व्यक्तियों को भी यूट्यूब पर बहुत सुनता हूँ जिनकी आप आलोचना करते हैं। मैं उनसे बहुत प्रभावित हूँ और वो मुझे बहुत

प्रश्नकर्ता: श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्म ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया है और उसे बहुत समय से अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न कर रहा हूँ, पर निष्काम कर्म के सिद्धान्तों पर चलना मुझे दुष्कर लगता है। कृपया मार्गदर्शन करें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम गुरुजी। मैं पुलिस ही हूँ और थाना एस.एच.ओ.(थाना प्रभारी) भी हूँ, तो मुझे एक दिक्कत आ गई है– आपके काम से मैं बहुत प्रभावित हुआ और थाना मैं ये सब करने लगा, अच्छा लगा; पहले तो बहुत टेंशन में आया, जब पहले आया तो नौकरी छोड़ने का…


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं इसरो बैंगलोर में कार्यरत हूँ। मैं चन्द्रयान-3 मिशन से भी जुड़ा हुआ हूँ, और आपको विगत चार वर्षों से सुन रहा हूँ। आचार्य जी इस चन्द्रयान-3 मिशन में कई उतार-चढ़ाव आये, और उतार-चढ़ाव के मध्य खासतौर पर जो आखिरी पैंतालीस दिन का मिशन था। उसमें

प्रश्नकर्ता: आज हमारे साथ मौजूद है एक ऐसी सख्सियत जिन्हें हम गुरु, हमारे टीचर,


एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२.७२॥
हे अर्जुन! यही ब्रह्मस्वरूप में अवस्थिति है। इस अवस्था को पाकर मनुष्य संसार में मोहित नहीं होता। मृत्यु के समय भी इस ब्राह्मी स्थिति में प्रतिष्ठित रहकर वह ब्रह्मस्वरूपता के आनन्द को प्राप्त करता है।

आचार्य प्रशांत

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य, हमारी लाइफ़ (जीवन) में काफ़ी ऐसी सिचुएशन (परिस्थिति) आती है जब हमें फल को या कारणों को देखकर कर्म का चयन करना होता है। लेकिन गीता में लिखा हुआ है कि हमें उन कर्मों को करना चाहिए जिनको करते हुए हमें फल की चिन्ता ही न हो।…


आचार्य प्रशांत: तुम अच्छे-खासे नौजवान थे जब तुम घुस गए थे कि, "मुझे तो एमबीए करना है!" अब कह रहे हो एमबीए करके बड़े दुख में हूँ। इतने दिनों में, पच्चीस-सत्ताईस के होकर, तुम्हें ये समझ आया कि ऐसा नहीं होता कि सब काम एक बराबर होते हैं।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम संघर्ष करते हैं तो वह समय हमें बहुत कुछ सिखाता है, लेकिन फिर हम उसे कठिन समय क्यों कहते हैं? और जब समय अनुकूल चल रहा हो तो हम कुछ ऐसे काम कर देते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए था। मुझे यह समझ नहीं

आचार्य प्रशांत: ऐसे तरीक़े से कमाकर क्या करोगे जिसमें तुम्हारा मन टिकना ही नहीं चाहता? पेटभर चलता रहेगा, मन जलता रहेगा, ऐसे जीना है? पेट फूल जाएगा, मन राख हो जाएगा, ऐसे जीना है?
ऐसे नहीं देखा जाता रोज़गार को या आमदनी के स्रोत को कि पहले कुछ कमाने लगें…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरे फादर का स्कूल है और उसमें मैंने अभी रिसेंटली लाइफ एजुकेशन



यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन बन्दर की तरह उछलता-कूदता बहुत है। दृढ़ निश्चयी नहीं है। अपना शत-प्रतिशत सच्चाई के साथ किसी काम में दे नहीं पाती। क्या मेरा जीवन ऐसे ही अधूरेपन में कट जाएगा? इस कारण मुझे बेचैनी रहती है कि क्या ज़िन्दगी यूँही निकाल देनी है।
आचार्य प्रशांत: जाड़ों…

प्रश्नकर्ता: मेरा नाम पूनम साहू है और मै जर्नलिज़्म डिपार्टमेंट

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरे काफ़ी दोस्त हैं जो काफ़ी धर्मगुरुओं को



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मन चलना नहीं छोड़ता, जिस कारण जाग्रत अवस्था में तो मुझे समस्या होती है, रात में नींद में भी बहुत ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पहली दफ़ा तो नींद आती ही नहीं और अगर कुछ संघर्ष के बाद रात को नींद उतरती है, तो
मुक्त कर्म वही है जिसमें आनंद किसी भविष्य के परिणाम में नहीं, बल्कि कर्म करने में ही होता है। बच्चा खेलते समय किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता; खेल ही उसका सुख है। इसके विपरीत, बंधन और लालच से किए गए कर्म हमेशा हिसाब, मुआवज़े और भविष्य की आशा से भरे होते हैं। निष्काम कर्म वही है जहाँ कर्म स्वयं ही अपना पुरस्कार बन जाता है, और जीवन गणना नहीं बल्कि सहज उल्लास में बदल जाता है।
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कतई नहीं है। एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति यह होती है, “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा, उससे कोई लेना-देना नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।” सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो।
एक जगह धोखा खाया। अच्छा, वहाँ गए क्यों थे? धोखा खाने तो नहीं गए थे। वहाँ पर कुछ आशा थी, कुछ कामना थी, कुछ अच्छा-अच्छा सा लगा होगा। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि सामने जलेबी आई या कचौड़ी आई; लार तो वही की वही थी न। ये सब लोकधर्म है कि आपका किसी ने बुरा करा है, तो उसका कार्मिक बैलेंस ख़राब हो जाएगा। बाहर जो कुछ हो रहा है, सब रैंडम है। आपके पास एक ही चीज़ है: चॉइस, जिसको आप कह सकते हो कि आपकी है। उसके अलावा मत सोचिए कि आसमानों पर कहानियाँ लिखी गई हैं; मिट्टी हैं हम, धूल हैं हम।
प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…
गीता एक एलीट डॉक्यूमेंट है, उत्कृष्टता है इसमें। इससे प्यार वही कर पाएँगे, जिन्हें ऊँचाइयों से प्यार है, जिन्हें एक्सीलेंस चाहिए। और जिनको ऐसे ही बीच में पड़े रह जाना है — मिडियॉकर — उन्हें गीता रुचेगी ही नहीं। जीवन में जो भी ऊँचे-से-ऊँचा, श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठतर हो सकता है, वो निष्काम कर्म से ही मिलेगा। घोर कर्म करना है, जज़्बे से खेलना है, दिल से चाहना है, डूबकर जीना है — ये श्रीकृष्ण का उपदेश है।
आचार्य प्रशांत: दुर्गा सप्तशती ले रहे हैं। उसका जो मध्यम चरित्र, दूसरा चरित्र है, तीन चरित्र हैं उसमें। तो जो दूसरा उसका चरित्र है, वो अध्याय दो-तीन-चार से आता है। इसमें प्रकृति माने देवी अपने रजोगुणी रूप में प्रकट होती हैं। ठीक है? यहाँ जो उनका नाम है, वो है…
आचार्य प्रशांत: कर्मसंन्यास और कर्मयोग क्या हैं? दोनों में अन्तर क्या है? आमतौर पर हम जिसे कर्म कहते हैं; वो कैसे होता है? वो ऐसे होता है कि जैविक रूप से और सामाजिक रूप से मन संस्कारित रहता है। फ़िज़िकल, सोशल दोनों तरह के संस्कार। तो मन में पहले…
प्रश्नकर्ता: ये प्रश्न आपके व्यक्तिगत जीवन से जुड़ा है। बहुत सारे लोगों को शायद ये उत्सुकता होगी, मुझे भी है कि हमने आपको हमेशा सत्र में देखा है और यहाँ पर कैंप में आते हैं, यहाँ पर देखा है, यूट्यूब पर देखा है लेकिन उसके बाद आप क्या करते हैं?…
अयति: श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानस:। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।६.३७।।
अर्जुन बोले — हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस…
प्रश्नकर्ता: न आलस है, न उठा हुआ है, न सोया हुआ, कुछ ऐसा मतलब एक कंफ्यूजन (संशय) है कि क्या ये, ये क्या है? नींद भी है उसमें हल्की सी, जागृति भी है, अब जागृति का तो पता नहीं लेकिन कुछ है, विचार भी नहीं है लेकिन कुछ है। लेकिन…
श्रोता: अहम्।
आचार्य: हाँ, वह जो…
आचार्य प्रशांत: आचार्य विनोबा भावे के जीवन से एक घटना है। वो युवा ही थे अभी और जीवन का अर्थ खोजने की कोशिश कर रहे थे। तो कहते हैं — यूँही एक दिन उन्होंने ट्रेन पकड़ ली और उत्तर भारत की ओर आ गये। हिमालय जाना चाहते थे, उससे पहले…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! आचार्य जी अपनी निचाइयों से ऊपर उठने के जितने भी संकल्प लेता हूँ, वो कुछ दिन तो ठीक चलते हैं। लेकिन कुछ समय बाद संकल्पों से बाहर निकलने के लिए मैं जितना खींचता हूँ, उतना नीचे गिरता हूँ। और इस तरह फिर से उसी जगह पर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! दो-हज़ार-सोलह में प्रतियोगी परीक्षा देकर बैंक में लगा था। लेकिन लगभग एक साल से मुझे ऐसा लग रहा है कि इसे छोड़कर कुछ ऐसा करूँ जिससे मेरी ज़िन्दगी लोगों के काम आये। और अब मैं इस पड़ाव पर आ गया हूँ कि मैंने निर्णय लिया है कि…
प्रश्नकर्ता: जो सबसे प्रमुख सिद्धान्त मैं सुनता हूँ बाजार में या इंटरनेट पर वो है थ्योरी आफ़ कर्मा। जिसको मैं कर्म भी नहीं बोलूँगा, मैं थ्योरी ऑफ़ कर्मा ही बोलूँगा, क्योंकि वो अपने विकृत रूप में ऐसे ही बिकती और चलती है। जहाँ मैंने ये बोल दिया कि अच्छा काम…
आचार्य प्रशांत: निष्काम कर्म का अर्थ हमारे लिए है कि कामना…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सैक्स (यौन क्रिया) से सम्बन्धित बहुत विचार आते हैं तो उन्हें कैसे कम या नियन्त्रित कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँ ही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो, जो तुमको पता है…
आचार्य प्रशांत जी आपका बहुत बहुत स्वागत है। सर,…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये जो कुछ भी आप कर रहे हैं इसमें भी, क्या इसमें आपका कोई स्वार्थ है? और अगर है, तो क्या स्वार्थ है?
आचार्य प्रशांत: देखो, स्वार्थ तो पूरा-पूरा है, मैं क्यों कहूँ कि इसमें मेरे लिए कुछ नहीं है? तुम्हारे लिए किताबें पब्लिश (प्रकाशित) होती हैं, …
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ७२)
आचार्य…
आचार्य प्रशांत: जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम शुभम है। मैं एक-डेढ़ साल से सुन रहा हूँ आपको। मैं कॉर्पोरेट नौकरी में हूँ, इंजीनियरिंग जॉब भी है तो मेरा सवाल ये था कि किसी भी काम में जाते हैं शुरुआत में तो वो नया होता है, उसके बाद वो दिनचर्या बन जाता…
सब काम…
तो मैंने ये सोचा है कि जैसे जो गीता है, उपनिषद् जो…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी।
आचार्य प्रशांत: जी।
प्र: जब मैं कुछ लोगों को सुनता हूँ, जैसे कुछ ज्ञानी लोग, वो लोग बात ये कहते हैं कि आज-कल के युवाओं में हो चाहे जो भी लोगों में, जीवन जिस तरह से वो जिये हैं उनको उनके जीवन में।
आचार्य: आप थोड़ा…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न ये है कि जैसे न आत्मा जन्म लेती है न मरती है, तो जो आम धारणा यह है कि उसकी आत्मा भटक रही है या आत्मा अतृप्त है। तो जैसा कि आप बताते हैं कि आत्मा तो जन्मती ही नहीं है, न…
~ श्रीमद्भगवद्गीता, छठा अध्याय, दूसरा श्लोक।
जिसको संन्यास कहते हैं उसको तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी व्यक्ति योगी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं संकल्पों के त्याग का तात्पर्य समझना चाहता…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कर्मों के बारे में कुछ कहेंगे? कर्म क्या चीज़ है?
आचार्य प्रशांत: हमारे कर्म तो सही चीज़ को पाने का ग़लत प्रयास हैं। जो गहरी नीयत है वो तो ठीक ही है कि शान्ति मिल जाए, पर जो प्रयास की पूरी दिशा है, प्रयास करने वाले का…
प्रश्नकर्ता: वेदांत में बताया गया है कि जगत मिथ्या। यदि जगत मिथ्या है, तो जगत में किया हुआ कर्म भी मिथ्या ही होगा। फिर हम सही कर्म और गलत कर्म की इतनी चिंता क्यों करें?
आचार्य प्रशांत: जब कहा गया है “जगत मिथ्या,” तो उसके साथ ही कहा गया है…
आचार्य प्रशांत: परिस्थिति तो परिस्थिति है न?
प्र: वो जो विपरीत परिस्थितियाँ है; जैसे कि कोई हमारा काम…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मैं पच्चीस वर्ष का हूँ। मार्केटिंग का कार्य करता हूँ जिसमें लोगों के मन में लालच पैदा करना मेरे लिए अनिवार्य है। यह काम करते-करते आदत ऐसी पड़ गयी है कि अब मेरा स्किल स्किल सेट (कौशल) ही यही हो गया है कि कैसे दूसरे लोगों…
विणु गुण कीते भगति न होई। अर्थ: बिना गुण के भक्ति नहीं हो सकती। (जपुजी साहिब)
आचार्य प्रशांत: आप दीवार के पास बैठे हैं और आप ऊँघ जाते हैं और आपके सिर पर दीवार लगती है ज़ोर से। क्या आप दीवार से कहते हो कि कमीनी मेरे ही घर की…