कुछ भी करने में एक डर क्यों बना रहता है कि कोई और मेरे विषय में क्या सोचेगा? ये डर सिर्फ कुछ स्थितियों में नहीं होता हमारे जीवन में। सच तो ये है कि हमारा जीवन ही डर बनकर रह गया है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
Originally published in Amar Ujala on 15 March '23
कुछ भी करने में एक डर क्यों बना रहता है कि कोई और मेरे विषय में क्या सोचेगा? ये डर सिर्फ कुछ स्थितियों में नहीं होता हमारे जीवन में। सच तो ये है कि हमारा जीवन ही डर बनकर रह गया है। एक-एक कदम जो लिया जा रहा है, एक-एक निर्णय, वो दूसरों के प्रभाव में लिया जा रहा है, दूसरों के डर में ही लिया जा रहा है।
क्यों डर रहे हैं? इसकी वजह को जाननी होगी, जो कुछ भी तुम अपना समझते हो वो तुम्हें दूसरों ने दिया है, वो बाहर से आया है। और दूसरों से मेरा आशय सिर्फ व्यक्तियों से नहीं है, दूसरों से मेरा अर्थ है वो सब कुछ जो तुम नहीं हो। वो कोई समय हो सकता है, कोई स्थिति हो सकती है, कोई व्यक्ति हो सकता है या कुछ और।
जब मेरा सब कुछ दूसरे से आया है तो दूसरा उसे वापस भी ले जा सकता है। नतीजा डर। मन में एक खटका बना रहता है कि कहीं जो मेरा है, जिसे मैं अपना समझता हूं, कहीं वो चला न जाए। 'मेरा कुछ है जो खो जाएगा', इसी विचार का नाम डर है।
डर क्या है? डर है ये विचार कि मेरे पास कुछ है जो खो सकता है, मुझसे दूर हो सकता है। दिक्कत उसमें ये है कि जो भी कुछ तुम्हारे पास है, वो बाहर से आया है। नतीजतन मन हमेशा डरा हुआ रहेगा क्योंकि जो बाहर से आया है, जो समय से आया है, जो स्थिति से आया है, जो दूसरे व्यक्ति से आया है उसे निश्चित रूप से समय, स्थिति या दूसरा व्यक्ति ही वापस भी ले जा सकते हैं।




