
कोई खिलाड़ी देश के लिए मेडल जीतकर लौटती है, और बधाई के साथ ही सवाल आता है कि खुशखबरी कब दोगी। उम्र का पैमाना और परिवार की अपेक्षा मिलकर उसकी पूरी मेहनत को एक देह की भूमिका तक सीमित कर देते हैं। पर सफलता केवल वह नहीं जिसे दूसरे गिन सकें। जब हम स्वयं को देह भर मान लेते हैं, तो हमारे विचार, लहजा और अपनी छवि तक उसी में बँध जाते हैं। इंसान बनकर जीना और किसी के हाथों न बिकना अपने आप में बड़ी और बिरली सफलता है। हमारे लिए असली खुशखबरी क्या है?










ये खेल ऐसा है जिसमें ये नहीं देखा जाता कि किसने अंक ज़्यादा बनाये, इसमें ये देखा जाता है कि अन्त तक डटा कौन रहा, आख़िरी घड़ी तक खड़ा कौन रहा। इसमें बात ये नहीं है कि कौन कितना तेज़ दौड़ा, कहाँ तक पहुँच गया, इसमें बस बात ये है कि कौन मैदान छोड़कर भाग नहीं गया। जो मैदान छोड़कर नहीं भागा, वो जीत गया। ये नियम है इस खेल का। इसमें हार सिर्फ़ एक तरीक़े से होती है कि तुम मैदान छोड़ दो, *नॉक आउट* (पराजित) अपनेआप को घोषित कर दो कि भैया मेरा हो गया!



प्रश्नकर्ता: आईआईटी पटना के कुछ छात्रों के प्रश्न थे। जैसे काफ़ी सारे विद्यार्थी ये जानना चाह रहे थे कि

आचार्य प्रशांत: तुम्हारे काम का जो उद्देश्य है और गीताकार का जो उद्देश्य है वो उद्देश्य ही मात्र भिन्न नहीं बल्कि दो अलग-अलग आयामों में है। गीता कही गई है अर्जुन को भ्रम, मोह, लोभ, देहभाव, ममत्व से मुक्त करने के लिए। ये गीताकार का, कृष्ण का उद्देश्य है कि

आचार्य प्रशांत: सही लक्ष्य क्या होता है? सही लक्ष्य वो होता है जो आपके भीतर की कमज़ोरियों को तोड़े। आपके भीतर जो कुछ ऐसा है कि ख़त्म होना चाहिए, लक्ष्य बनाओ जो उसे ख़त्म ही कर दे। मेरे ख़याल से कार्ल जंग का है — या आप लोग जाँच लीजिएगा…

आचार्य प्रशांत: ज़िंदगी ऐसी जीनी है जो खाती कम-से-कम हो और पहुँचाती ऊपर-से-ऊपर हो। बात आ रही है समझ में?


आचार्य प्रशांत: बी पॉज़िटिव ताकि तुम इस दुनिया से और ज़्यादा लूट सको। बी पॉज़िटिव माने उम्मीदें बुलंद रखो। उम्मीद है किस बात की? तुम्हें सच्चाई की उम्मीद है, तुम्हें मुक्ति की उम्मीद है, तुम्हें सच्चे प्यार की उम्मीद है? या कोई तुम्हें तुम्हारे झूठे सपनों से झंझोड़ कर जगा


प्रश्नकर्ता: सर, सफलता के लिए एजुकेशन (शिक्षा) चाहिए या नहीं और अगर चाहिए तो कैसी एजुकेशन लेनी चाहिए?

प्रश्नकर्ता: जब अपने मन को, विचारों को देखता हूँ तो डर जाता हूँ। हाथ-पाँव तक काँपने लगते हैं। मन को और अपनी वृत्तियों को देख पाने का साहस कैसे आएगा?

आचार्य प्रशांत: हर उद्योग में हमको कोई एड़ा चाहिए, हर घर में हमें कोई सरफिरा चाहिए। हर स्कूल में, हर कॉलेज़ में हमें कोई विद्रोही चाहिए।

आचार्य प्रशांत: तुम जो कुछ भी कर रहे हो, उसमें तुम अपनी सीमाओं को और अपने बंधनों को चुनौती दो, और आगे-ही-आगे बढ़ो; ऐश्वर्य फिर उत्कृष्टता का ही दूसरा नाम हुआ। किसका दूसरा नाम हुआ? उत्कृष्टता,


आचार्य प्रशांत: कर्म दो जगहों से निकलता है, पूर्णता से और अपूर्णता से। अपूर्णता का नाम इच्छा है। मैं कहूँगा, 'अपूर्णता एक बीमारी है, क्योंकि अपूर्णता आपका स्वभाव नहीं है।' स्वभाव आपका पूर्णता है। अपूर्णता मात्र भ्रम है — मुझमें कोई कमी है, मुझमें कुछ कमी है, मुझे कुछ पाना

आचार्य प्रशांत: ज़िंदगी में पहले कुछ बन जाओ, कोई आंतरिक मुकाम हासिल कर लो, फिर तुम्हें समझ में आएगा न रिश्ता किससे बनाना है।


संघर्ष में हम सभी हैं; ज़िंदगी युद्ध तो है ही। दूसरे को क्या दिखाना चाहते हो? अपनी चोट, अपनी हार या अपना हौसला? अपना हौसला दिखाओ न दूसरे को!

यह सब अय्याशियाँ होती हैं, “मन कर रहा है, मन नहीं कर रहा है, आज दिल तन्हा सा है, उदास सा है।“ यह क्या है? मन गया भाड़ में! इधर काम रखा हुआ है, जो ज़रूरी चीज़ है वह करेंगे न, मन का क्या है!

मुक्तिका उपनिषद् है, उसमें राम ही कह रहे हैं, ‘एक उपनिषद् को कोई पढ़ ले वो तर जाएगा।‘ अच्छा एक में काम नहीं होता तो चलो जो १० या ११ प्रमुख उपनिषद् हैं उनको पढ़ लो! अच्छा उनसे भी काम नहीं होता तो लो मैं सूची दिए देता हूँ १०८

परीक्षाओं में सफल होने के, चयनित होने के किसके आसार ज़्यादा हैं, एक अशांत मन के या एक शांत परीक्षार्थी के? और शांति और स्पष्टता हमेशा साथ-साथ चलते हैं।

सफलता ऐसे नहीं देखी जा सकती कि कौन कहाँ पहुँचा। सफलता ऐसे नापिए कि किसने कितनी चुनौतियों का सामना किया आगे बढ़ने के लिए। व्हाट आर द ऑड्स (चुनौतियाँ क्या थीं), बाधाएँ क्या थी? तुम जितना भी आगे बढ़े हो, उतना आगे बढ़ने के लिए तुमने कितना जीता है, कितना

ज़िंदगी में पहले कुछ बन जाओ, कोई आंतरिक मक़ाम हासिल कर लो, फिर तुम्हें समझ में आएगा न कि रिश्ता किससे बनाना है। अब रिश्ता बना लिया छब्बीस की उम्र में ही, तुम्हारा लक्ष्य हो सकता है ज़िंदगी में ऊँचा उठना; जिससे तुमने रिश्ता बना लिया उसे ना उठने से…

ज़िन्दगी में पहले कुछ बन जाओ, कोई आंतरिक मक़ाम हासिल कर लो, फिर तुम्हें समझ में आएगा न कि रिश्ता किससे बनाना है। अब रिश्ता बना लिए छब्बीस की उमर में – तुम्हारा लक्ष्य हो सकता है जीवन में ऊपर उठना हो, जिससे तुमने रिश्ता बना लिया है उसे ना…


आचार्य प्रशांत: हिंदुस्तान में जानते हो न दस-लाख लोग आवेदन भरते हैं और चयन होता है दो-सौ का। ऐसे ही चलता है न? कितना प्रतिशत हुआ ये? प्रश्नकर्ता:

प्रश्नकर्ता: दो चीज़ें मेरे साथ एकसाथ हो रही हैं। एक तरफ तो मन में बेचैनी है कि ज़िंदगी व्यर्थ न चली जाए, तो उस बेचैनी के कारण मैं कुछ सार्थक कर के दिखाना चाहता हूँ। पर जो कुछ करने निकलता हूँ उसमें सफलता माँगता हूँ और सफलता अगर नहीं मिलती




प्रश्नकर्ता: जैसे राबिया और हसन के वक्त में राबिया ने कहा कि सत्य बताने का एक टाइम आएगा और तभी तुम उस बात को जानोगे क्या इसकी तुलना ऐसे हो सकती है कि जब तक अपना वक्त नहीं आता, अच्छे वक्त की चाभी नहीं मिलती।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। बच्चों को लेकर चिंतित रहती हूँ। क्या औरत को सिर्फ़ घर में एक चूल्हे में सिमट जाना चाहिए? वो आगे बढ़ने की कोशिश करे या परिवार के दायित्व में बंध कर रह जाए? और बच्चे भी उसी में उलझ गए हैं, वो आगे बढ़ने की कोशिश


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मुझे अपने कैरियर के प्रति उलझाव सा रहता है। जो काम मुझे करना पसंद है, वह मैं कर रहा हूँ। लेकिन उस काम में जॉब सिक्योरिटी मुझे नहीं दिखती। और इस कारण मैं हमेशा ही चिंतित रहता हूँ। कृपा करके इसका समाधान बताएँ।


प्रश्न: आचार्य जी, आपकी सफलता के पीछे क्या राज़ है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई बार जीवन में ऐसे मौके आते हैं, जब हमें लगता है कि कोई काम है जो अवश्य ही होना चाहिए। और वो काम भी ऐसा है, जिसमें समाज की भी भलाई है। लेकिन उस काम करने में ऐसी बाधाएँ महसूस होती हैं, या मानसिक स्थिति इतनी
तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा।
जो कुछ भी तुम्हारे भीतर है न, जब तक उसके प्रति, उसके विरुद्ध सक्रिय ऊर्जा नहीं उठेगी, तब तक कोई परिवर्तन नहीं आता। बहुत सोच-समझ के कहा है — नफ़रत, घृणा होनी चाहिए। जो घृणा की ऊर्जा होगी न वही ऊर्जा काम आएगी। जो संतुष्ट हैं, उनकी ज़िन्दगी में कोई बदलाव नहीं आता।
श्रीकृष्ण अर्जुन को उच्चतम ज्ञान बता रहे हैं — आत्मज्ञान। उसके बाद व्यवहार की चीज़ें बहुत सरल हो जाती हैं। जो आख़िरी बात जान गया, उसको बाक़ी बातें समझाना बहुत आसान हो जाता है। जिसने ब्रह्मविद्या साध ली, उसको अब और कुछ भी साधना मुश्किल नहीं पड़ेगा। ब्रह्मविद्या माने स्वयं को हरा देना। जो गीता का हो गया, वह जान जाता है भली-भाँति कि सांसारिक परीक्षाएँ भी कैसे पार करनी हैं। उसको हराना असंभव हो जाएगा।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से जो लोगों ने सिखा दिया है, उसकी वजह से मैं भुगत रहा हूँ। अब क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: देखो, व्यवहारिक होकर देखा करो। किसी की भी गलती हो, भुगत कौन रहा है? जल्दी बताओ। तुम बिलकुल सही जा रहे हो अपनी सड़क पर। और सड़क…
दो ही चीज़ें होती हैं जो जीवन को समृद्ध करती हैं — तन के लिए व्यायाम, मन के लिए अध्यात्म। युवा होने का अर्थ होता है कि सुडौल शरीर हो, विराट हृदय और दुनिया की समझ। दुनिया की सारी क्रांतियाँ जवान लोगों ने की हैं; क्रांति का मतलब एक नया सृजन होता है। वो जवानी जो पढ़ती नहीं, लिखती नहीं, जो अपने आप को बोध से भरती नहीं — वो जवानी व्यर्थ ही जा रही है।
जीतने के लिए मत खेलो। तुम खेलो वो सर्वश्रेष्ठ करने के लिए, जो तुम कर सकते हो। और जो सर्वश्रेष्ठ तुम कर सकते हो, वो जीतने से ज़्यादा ऊपर की बात है। परिणाम की चिंता न करते हुए, प्रतिपक्षी की चिंता न करते हुए, जीवन के हर मैदान में, तुम अपना सर्वश्रेष्ठ करो। खिलाड़ी का धर्म है कि वो लगातार उत्कृष्टता की ही पूजा करे। चाहे क्रिकेट का मैदान हो, चाहे जीवन का कोई भी क्षेत्र हो।
सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि आपने अपने लक्ष्य की ओर कदम किन चुनौतियों का सामना करते हुए बढ़ाया है। आपके सामने कठिनाइयाँ क्या थीं, और किन मुश्किलों के खिलाफ़ आपने अपनी यात्रा की है, यही तय करेगा कि आप सफल हैं या असफल। अपने आप से यही पूछो—‘जो कुछ मैंने पाया है, कितनी चुनौतियों को हराकर पाया है?’ अगर बिना किसी चुनौती के पा लिया है, तो वह व्यर्थ है, क्योंकि परिस्थितिवश मिली चीज़ें सफलता नहीं, महज़ संयोग हैं।
दुनिया की लगभग 50% दौलत 1% से भी कम लोगों के हाथों में है। ये कैसी तरक्की है? और ध्यान से समझो, अगर एक व्यापारी कार बनाता है, तो उसे अपनी फैक्ट्री में वह मानसिकता भी बनानी पड़ेगी जो यह समझे कि कार खरीदना तरक्की की निशानी है। जो तुम्हें चीज़ें बेचना चाहता है, वह तुम्हें यही बताएगा कि तरक्की का मतलब है चीज़ें खरीदना, उपभोग करना। और तुम अपना सुख-चैन सब गवां कर तरक्की के पीछे भाग रहे हो।
मूलभूत शिक्षा लेनी ज़रूरी होती है। कुछ बातें हैं दुनिया की, जो नहीं पता होंगी तो पूरे इंसान भी नहीं बन पाओगे। विद्या-अविद्या दोनों चाहिए। अविद्या माने सांसारिक भौतिक शिक्षा और विद्या माने आध्यात्मिक शिक्षा। उपनिषद् कहते हैं, जिनके पास विद्या नहीं होती, वो गहरे कुएँ में गिरते हैं। लेकिन जिनके पास सांसारिक ज्ञान नहीं होता वो और ज़्यादा गहरे कुएँ में गिरते हैं। और जिनके पास दोनों हैं, वो मृत्यु को पार करके अमर हो जाते हैं।
प्रश्नकर्ता: जो सबसे प्रमुख सिद्धान्त मैं सुनता हूँ बाजार में या इंटरनेट पर वो है थ्योरी आफ़ कर्मा। जिसको मैं कर्म भी नहीं बोलूँगा, मैं थ्योरी ऑफ़ कर्मा ही बोलूँगा, क्योंकि वो अपने विकृत रूप में ऐसे ही बिकती और चलती है। जहाँ मैंने ये बोल दिया कि अच्छा काम…
आचार्य प्रशांत: सिर्फ़ एक व्यक्ति है जिसका सच तुम्हें पता हो सकता है, किसका?
श्रोतागण: अपना।
आचार्य: तो उसकी ओर क्यों नहीं देखते?
जिस एक आदमी का तुम्हें सच पूरा पता हो सकता है उसकी ओर क्यों नहीं देख रहे? क्यों इधर-उधर निहारते हो ? क्यों मन को भटकने देते…
और जो ऊपर नहीं पहुँच रहा है उसको दुनिया चाहे कुछ भी बोले, आपको उसे बड़ा आदमी नहीं मानना है। जो बस यहीं पसरता जा रहा है और ऊपर को…
आचार्य प्रशांत: दत्तात्रेय कह रहे हैं कि जो व्याप्य और व्यापक दोनों से मुक्त है, उस एक — बस एक कहा है — उस एक के प्रति यदि तुम सफल हो, तो फिर तुम कैसे कहोगे कि आत्मा प्रत्यक्ष है कि परोक्ष है।
बात मीठी है और बात इतनी–सी ही…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आपसे जो भी सत्संग सुना है उसमें ईमानदारी शब्द बार-बार दोहराया गया है। मेरी जिज्ञासा ये है कि जीवन में ईमानदारी और सफलता दोनों को एक साथ कैसे साझा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: पहले ईमानदारी से ये पता तो करो और मानो तो कि सफलता…
प्र: सर,…
आचार्य प्रशांत: देखो, मन मलिन है, कोई शक नहीं। वृत्तियों में विकार है, कोई शक नहीं। और बात घाटे की…
कोई सभा हो, कोई बैठक हो, कोई मजलिस हो, हमें एक क्रान्तिकारी चाहिए। और एक कह रहा हूँ…
सुन रहे हो तो सुनने का ऐश्वर्य क्या है? समझना। एक श्रोता…
प्रश्नकर्ताः आचार्य जी, पिछले आठ-नौ महीनों से आपको सुन रहा हूँ, काफ़ी स्पष्टता आ गयी है। अपनी समस्या सुनाने से पहले आपके बारे में कुछ कहना चाहूँगा। सर, मैंने आपके आर्टिक्लस (लेख) पढ़े, आपकी वीकिपीडिया पेज भी पढ़ी। मुझे एक बात पता चली आपके बारे में कि आपने हर आयाम…
अब रिश्ता बना लिये छब्बीस की उम्र में ही। तुम्हारा लक्ष्य हो सकता है ज़िंदगी में ऊँचे उठना। जिससे तुमने रिश्ता बना लिया, उसे न उठने…
आचार्य प्रशांत: इक्कीस-चौबीस साल की उम्र में जब बाहर निकलते हो तो ये अचानक से पता चलता है, अरे! ये क्या हो गया? कैंपस में तो ऐसा होता था कि अगर मेहनत कर ली है तो मार्क्स आ जाते थे। थोड़ा ऊपर-नीचे हो जाते थे पर आ ही जाते थे।…
मनचलों के लिए दुनिया की…
अगर जीवन में स्पष्टता होगी, तो फिर परीक्षाओं में भी चयन होने की संभावना बढ़ जाएगी।
यह लो, आध्यात्म का व्यवहारिक…
अगर यही बात है कि काम चुनना है कि, “काम क्या करें?” वह काम चुनो जिसमें तुम सबसे कमज़ोर हो। लेकिन अगर ऐसा काम चुनोगो तो तनख्वाह भी कम मिलेगी तो अधिकांश लोग वह काम चुनते हैं जिसको बोलते हैं, ‘मेरी स्ट्रेंथ (शक्ति)।‘ जबकि आध्यात्मिक दृष्टि से देखो तो तुम्हें…
प्रश्नकर्ता: सर, जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती है जब अपने लक्ष्य के लिए पूरी मेहनत करने के बावजूद सफलता नहीं मिलती, हिम्मत पूरी तरह से टूट जाती है। ऐसे में कुछ भी करने का मन नहीं करता, कोई मोटिवेशन काम नहीं आता। ऐसी परिस्थिति से बाहर कैसे निकलें?
आचार्य प्रशांत:…
आचार्य: अगर मैं काम करने के बाद खुश हूँ तो काम करने के दौरान मैं कैसा हूँ?
नाखुश!
अगर मैं लगातार खुश ही हूँ तो काम करने के बाद…
प्रश्नकर्ता: क्या सफ़लता सब कुछ होती है समाज के लिए? क्या हमें सिर्फ सफ़लता से ही मतलब होना चाहिए।
आचार्य प्रशांत: समाज तो यही चाहता है! समाज तो यही चाहता है कि तुम एक पूर्व निर्धारित राह पर चलो और उस राह पर जो जितनी ज़ोर से चले और जितनी…
आचार्य प्रशांत: बहुत बुरा वक्त…
(दिवस 1)
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम।
मेरा नाम निधीश है। शुरू से ही मैं निर्णय लेने में बहुत कमज़ोर रहा हूँ। मैंने इंजीनियरिंग करने का निर्णय भी दूसरों के प्रभाव में लिया था। इंजीनियरिंग ख़त्म हो चुकी है और अब मुझे आगे के करियर का चुनाव करना है। आप से…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपकी सफलता के पीछे क्या राज़ है?
आचार्य प्रशांत: राज़ कुछ भी नहीं है। बात सिर्फ इतनी सी थी कि सक्सेस (सफलता) वगैरह का कभी बहुत सोचा नहीं। हर कदम पर जो उचित लगा वो करता गया, उसी से अगला कदम निकलता चला गया। सक्सेस की बात…
आचार्य प्रशांत: ये…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आजकल कुछ भी मन नहीं करता करने क — न धन के लिए, न ध्यान के लिए। आलस से भरा रहता हूँ। कुछ कहें।
आचार्य प्रशांत: कौन कह रहा है कि मन कुछ भी करने का नहीं करता? आलस करने का नहीं करता? मन यदि कुछ नहीं…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या सफलता सिर्फ़ कठोर परिश्रम (हार्ड-वर्क) कर के ही पाई जा सकती है?
आचार्य प्रशांत: देखो, ये प्रश्न बहुत अच्छा उदाहरण है ऐसे सभी सवालों का जिसमें बहुत सारी चीज़ें मान ली गई हैं।
(छात्रों को सुझाव देते हुए) ये प्रयोग तुम ख़ुद करो कि इस सवाल…