
भारत में जाति केवल सामाजिक या कानूनी समस्या नहीं, बल्कि धर्म से जुड़ चुकी मानसिक संरचना बन गई है। इसलिए संविधान, कानून और समाज-सुधार के प्रयास इसे समाप्त नहीं कर पाए। जन्म-आधारित जाति का आधार वैदिक दर्शन नहीं, बल्कि बाद की विकृत धार्मिक व्याख्याएँ हैं। जाति तभी समाप्त होगी जब धर्म अपने मूल वेदान्त और अद्वैत स्वरूप की ओर लौटे, जहाँ मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, सत्य से होती है।






पानी को आप खौलाते हो, देखा है जब वो 100 डिग्री के आसपास पहुँचने लगता है, तो आवाज़ करने लगता है। वैसे ही आकर आपको कोई खौला देता है, तो आप भी आवाज़ करने लगते हो, “भाग यहाँ से, मार दूँगा, ऐसे कर दूँगा, भाग यहाँ से।” पानी में कोई जान होती है? पर आवाज़ करने लग गया न, क्योंकि किसी ने बाहर से उसमें आग लगा दी। आपके भी कोई आग लगा देता है, तो आप आवाज़ करने लग जाते हो कि नहीं? करने लग जाते हो। तो आवाज़ करने के लिए, बेटा, बोलने के लिए, *कॉन्शियस* होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।














हम कहते हैं न कि ये पाँच इन्द्रियाँ तो झूठ दिखाती हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ सब झूठ हैं। ‘सच देखना है तो दो आँखों से नहीं, तीसरी आँख चाहिए होगी।’ कहते हैं न ये सब? और हम कहते हैं, ‘कानों से सच सुनाई नहीं देता, सच तो मौन में है, शब्द में नहीं।’ कहते हैं? वास्तव में वो बातें भी अतिश्योक्ति जैसी हैं। इन्हीं दो आँखों से सच दिखाई देता है, इन्हीं दो कानों से सच सुनाई भी देता है। अनहद इन्हीं दो कानों से सुनोगे, नीयत होनी चाहिए।




आप एक बन्धन छोड़ते हो तो दूसरा पकड़ लोगे। आप जब तक हो बन्धन अनिवार्य है। बन्धन को छोड़ने को तो एक बार को हम फिर भी रज़ामन्द हो जाएँगे, बँधे हुए को छोड़ने को रज़ामन्द नहीं होते। और जिसे बँधना ही है वो बेड़ियाँ तलाश लेगा, तुम लाख कोशिश करो उसे आज़ाद रखने की वो बेड़ियाँ तलाश लेगा। उसे बहाने मिल जाएँगे और उसके बहाने तर्कयुक्त होंगे, तुम उसके बहानों को गलत नहीं साबित कर पाओगे।

फ़ायदेबाज़ हो गये हैं! बात-बात पर पूछते हैं कि फ़ायदा क्या है? फ़ायदा क्या है? कर लेंगे स्केचिंग, कोई बता दे कि फ़ायदा है। जहाँ वास्तव में तुम्हारा हित हो, जाओ न वहाँ पर। बहुत ध्यान दो इस बात पर कि हित किसको कहते हैं, हित कहाँ है, बहुत पूछो अपने आप से। फ़ायदे की एक परिभाषा ये होती है कि जब फ़ायदा हो गया, उसके बाद फ़ायदे की बहुत आकांक्षा बचती नहीं है। अगर फ़ायदा ऐसा हो रहा है तुमको जिसके बाद और फ़ायदे और फ़ायदे चाहिए, तो फिर अभी लाभ हुआ नहीं।

तुलना तुम्हारा जोकर बना देती है, जो हो नहीं वो बनकर घूम रहे हो। जो तुम हो वही अभिव्यक्त हो जाता है। तुम्हें कैसे पता चलेगा कि तुम्हें भूख लगी है कि नहीं? तुलना करोगे? तुलना करोगे क्या? तुम्हें एक सौ चार बुखार है और सभी को बुखार है एक सौ चार — तो ये कहोगे कि मैं स्वस्थ हूँ क्योंकि तुलना से तो यही पता चल रहा है, जितना सबका है उतना मेरा भी है!


Acharya Prashant: Man is both Prakriti and something else. Prakriti is y=sin(x). You are confined within duality- ups and downs, ups and downs, leading to nothing. The up will not remain up, forever; the down will not remain down, forever. Crests and troughs, crests and troughs; that is

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, बचपन से ही एक सवाल है जो काफ़ी अजीब लगता है कि अभी दिवाली आने वाली है और जैसे प्रचलित कहानी है कि दिवाली के दिन राम घर वापस आए थे। पर दिवाली के दिन राम का तो कहीं भी नाम नहीं होता है,











प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी! आचार्य जी, एक सिचुएशन है। जैसे बाहर कुछ हो रहा है दुख-सुख और वो मेरे पर घट रहा है और पीछे से कोई देख रहा है।और फिर उसको मैं जानना चाह रही हूँ कि वो कौन है। फिर जैसे ही मैं कोई भी चीज़ देख रही




प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब आप बोलते हो कि शुरुआत होगी तथ्य से, तो तथ्यों को देखना हैं, अब हर समय ऐसे तथ्यों को दूर ही से नहीं देखा जाता। जैसे अतीत है तो अतीत में भी उन तथ्यों के पास जाकर क्योंकि वो वहाँ लगातार हो रहे हैं तो


प्रश्नकर्ता: जो आपने प्रेम के बारे में मैंने आपके वीडियोज़ भी देखे, थोड़ा समझने की कोशिश करी तो ये समझ में आया कि हम कई बार व्यापार बहुत सारा कर रहे होते हैं, उनको प्रेम का नाम देते हैं। लेकिन जीवन में जो सम्बन्ध हैं, जैसे कोई भी सम्बन्ध है,


मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।
अध्यात्म यह नहीं सिखाता कि बाहरी प्रभावों से बचो, बल्कि यह सिखाता है कि उनके दास मत बनो। जानकारी, विचार और अनुभव बाहर से ही आते हैं, लेकिन उन्हें समझने और उनके आधार पर निर्णय लेने का अधिकार आपके विवेक का है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब जीवन बाहरी प्रभावों से नहीं, बल्कि अपने विवेक से संचालित हो। मन बाहरी प्रभावों पर आश्रित हो सकता है, लेकिन आप केवल मन नहीं हैं ।
तकनीक अपने-आप में समस्या नहीं है। असली प्रश्न यह है कि उसका उपयोग कौन और किस मानसिक अवस्था से कर रहा है। यदि भीतर भय, असुरक्षा और निर्भरता है, तो तकनीक सुविधा देने के बजाय बैसाखी बन जाती है। तब संवाद कृत्रिम हो जाता है, ज्ञान सतही रह जाता है और शक्ति विनाश का साधन बनती है। बाहरी प्रगति तभी सार्थक है जब उसके साथ भीतर की परिपक्वता और विवेक भी विकसित हों; अन्यथा हर नई तकनीक हमारी कमज़ोरियों को ही और बढ़ा देती है।
आध्यात्मिकता अहंकार को सांत्वना देने या स्वयं को विद्रोही घोषित करने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने भीतर बैठी गहरी गुलामी को पहचानने का साहस है। हमारी अधिकांश इच्छाएँ, मान्यताएँ और पसंद वास्तव में सामाजिक संस्कारों से बनी होती हैं, इसलिए केवल बाहरी विद्रोह स्वतंत्रता नहीं देता। सच्चा धर्म भीतर के अहंकार से संघर्ष कर जीवन में सत्य के पक्ष में खड़े होने का आह्वान करता है, चाहे उसकी कीमत संघर्ष और घाव ही क्यों न हों।
जीवन की बाहरी समस्याओं का समाधान केवल तकनीक, नीतियों या आर्थिक प्रगति से नहीं हो सकता, क्योंकि उनके पीछे मनुष्य की आंतरिक अवस्था काम करती है। विज्ञान और तकनीक उपयोगी हैं, लेकिन यदि मनुष्य स्वयं को नहीं समझता, तो वही उपलब्धियाँ विनाश का कारण भी बन सकती हैं। जलवायु संकट, अत्यधिक उपभोग और सामाजिक चुनौतियों की जड़ मानव की अतृप्त इच्छाओं और अचेतन जीवन में है। स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब बाहरी प्रगति के साथ आत्मज्ञान, ईमानदारी और आत्मबोध भी विकसित हो।
ऑब्ज़रवेशन का हमेशा एक ऑब्जेक्ट होता है। अटेंशन थोड़ी-सी अलग चीज़ है, क्योंकि उसका कोई ऑब्जेक्ट नहीं होता। इट्स जस्ट अ स्टेट ऑफ माइंड, इन विच द माइंड नोज़, इन विच द माइंड इज़ फ़्री ऑफ डिस्टरबेंस इन व्हाटएवर इट डज़। इट डज़ नॉट हैव एन ऑब्जेक्ट ऑर अ सेंटर।
आत्म-अवलोकन बस ये नहीं है कि बैठे-बैठे कह रहे हैं, 'मैं आत्म-अवलोकन कर रहा हूँ।' सक्रिय रूप से जाकर के पूछो। जैसे, आपने एक फ़िल्म देखी किसी के साथ। तो देखने के बाद आधे घंटे कहीं बैठ जाओ, और कहो, 'अच्छा, मैंने क्या देखा?' 'अच्छा, तुमने क्या देखा?' इससे पता चलता है कि कितने हम पक्षपाती हैं। फ़िल्म हो, समाज हो, घटना हो, जीवन हो, कुछ भी। जिन्हें स्वयं को बढ़ाना है, उनके लिए बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो दूसरों से बात ज़रूर करें। अपने पास सिर्फ़ अपना ही पक्ष नहीं, तीन-चार और पक्ष आने दें।
सतत् अवलोकन ऐसा होता है – लगातार चलता रहे। अपने आप को देखते रहो। देखते रहो – क्या चल रहा है? क्या कर रहे हो? क्या बोल रहे हो? कहाँ अपने आप को धकेल रहे हो? किन बातों में निवेशित हो रहे हो? किस बात से बिल्कुल घबरा के भाग ही जाते हो? क्या इरादे बना रखे हैं? योजनाएँ क्या हैं? यही सब। जो कुछ भी चल रहा है जीवन में, उसका सतत् निरीक्षण करना होता है। पिनपॉइंटेड निरीक्षण नहीं करना होता, फुल बॉडी स्कैन चाहिए।
समझ आ गया जैसा कुछ नहीं होता है, समझते रहना होता है, एक सतत प्रक्रिया है। दुनिया को समझना है न, तो स्वयं को समझ लो, पर्याप्त होता है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बचपन से जो लोगों ने सिखा दिया है, उसकी वजह से मैं भुगत रहा हूँ। अब क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: देखो, व्यवहारिक होकर देखा करो। किसी की भी गलती हो, भुगत कौन रहा है? जल्दी बताओ। तुम बिलकुल सही जा रहे हो अपनी सड़क पर। और सड़क…
जब तक अपना कुछ नहीं होगा जीवन में, तब तक तो परायों पर आश्रित रहोगे ही न। अपने आप को किसी भी चीज़ से बाँधकर, जोड़कर मत देखो — जिससे भी जुड़ोगे, गुलाम हो जाओगे। क्योंकि गुलामी का मूल कारण होता है — धारणा। तुमने अपने और संसार के बारे में किसी मान्यता को सच का दर्ज़ा दे दिया है, जो सत्य तो छोड़ दो, तथ्य भी नहीं है। आज़ादी तो अकारण होती है। अपने आप को अपनी सारी मानसिक उठा-पटक से अलग रखो। अपनी निजता को अक्षुण्ण रखो, अस्पर्शित रखो।
जब भीतरी बदलाव आता है तो बाहरी बदलाव की भी माँग करता है, और जो बाहरी बदलाव से बचेंगे, उनका भीतरी बदलाव बाधित हो जाएगा। बाहर से आज़ादी की प्रेरणा आ रही होगी पर भीतर आपने क्या बैठा रखा है? ग़ुलामी। वो जो बाहरी प्रेरणा है, उसे भी बहुत-बहुत लंबे साल लग जाते हैं आपकी भीतरी ग़ुलामी को हराने में। जिन्हें भीतरी बदलाव चाहिए, उन्हें बाहरी बदलाव के लिए तैयार रहना पड़ेगा। वो क़ीमत है — चुकानी पड़ती है।
आत्म माने ‘सेल्फ’ की जितनी गतिविधियाँ हैं, जिनमें विचार और कर्म शामिल होते हैं, उनको जानना ही आत्म-ज्ञान है। मन क्या कर रहा है, क्या कह रहा है — इस पूरी प्रक्रिया का ज्ञान। देखो कि कोई सामने से गुज़र जाता है तो क्या विचार आता है? टी.वी. में कोई कार्यक्रम आ रहा है तो उसे किस दृष्टि के साथ देखते हो? जो कर रहे हो, वही देख लो — यही आत्म-ज्ञान है।
और वो जो नियति है वो आपके चाहने से, कहने से बदलनी नहीं है। कौन जाने जितना भी है यूज़ मी। पूरा इस्तेमाल कर लो। मेरी परवाह नहीं करो। मेरा इस्तेमाल करो। पूरे तरीके से निचोड़ लो मुझको। और वही मैं चाह रहा हूं। इसमें कुछ ऐसा नहीं है कि मेरा शोषण हो जाएगा। मैं वही चाह रहा हूं। पूरे तरीके से एक-एक बूंद निचोड़ लो। शरीर जले तो बस शरीर जले। कुछ बचा नहीं। पहले ही सब निचुड़ गया था। यमाचार्य आके खड़े हुए। उन्हें कुछ मिला ही नहीं। खाली हाथ लौटना पड़ा। कहां गया इसका सारा माल? वो मैंने बांट दिया था। पहले ही बांट दिया था।
एक रुपया अपने ऊपर मत खर्च करो अगर तुम्हारी ज़िंदगी किसी बुलबुले की तरह है। पर ज़िंदगी को ही अगर मिशन बना सकते हो, तो तुमने अपने ऊपर नहीं, मिशन के ऊपर खर्च करा है। वही कन्वर्जेंस, तुम्हारी ज़िंदगी ऐसी हो जाए अगर कि तुम्हारे लिए है ही नहीं, तो फिर कर सकते हो अपने ऊपर खर्च। तुम्हारी ज़िंदगी अगर इसीलिए है कि तुम्हें व्यक्तिगत तौर पर रसास्वादन करना है, चाट-पकौड़े झाड़ने हैं, तो फिर लानत है कि तुम यहाँ बैठकर चाट उड़ा रहे हो और बगल में कोई भूखा मर रहा है।
स्वार्थी होना गलत नहीं है, गलती तब है जब आपको अपना स्वार्थ पता ही न हो। जब मन पर डर और पुराने संस्कारों की धूल होती है, तब साफ़-साफ़ नहीं समझ में आता कि अपना स्वार्थ कहाँ है। इसलिए अध्यात्म चाहिए, जो आपको बताता है कि तुम्हारे लिए अच्छा क्या है। एक बार जब जान जाओगे कि अच्छा क्या है, तब ये परवाह नहीं करोगे कि कीमत क्या देनी पड़ेगी, कौन अच्छा बोलेगा, कौन बुरा बोलेगा? क्योंकि अपने लिए कुछ अच्छा करना बहुत अच्छा काम है। यही जीने का तरीका है।
विधि तो एक ही है, जो भीतर बैठ कर के बोलता रहता है, मैं हूँ, मैं हूँ, उसके झूठ को बार बार रंगे हाथों पकडते रहो। इरादा नेक हो तो हर चीज़ विधि बन जाती है। घर पर जाएँगें अपने भाई बहनों को देखेंगे कहेंगे मैं कैसे कह दूँ मेरी शक्ल मेरी है, ये मेरा भाई है नालायक, इसकी शक्ल भी मेरे जैसी है। फिर दादा को देखेंगे कहेंगे कैसे कह दूँ कि मेरी जो चपटी नाक है, यह मेरी है, ये तो दादा की नाक है। तो जब मेरा सब कुछ किसी और का है तो मैं कहाँ हूँ या तो मैं कह दूँ, ‘मैं हूँ ही नहीं या मैं कह दूँ कि सब मैं ही मैं हूँ, मैं ही मैं हूँ, मैं ही मैं हूँ,’ जैसे मुनि अष्टावक्र कहते हैं न, या तो मैं कुछ नहीं हूँ या फिर मैं सब कुछ हूँ।
तुम्हारी जिज्ञासा को ही मार दिया गया है, तुम्हारी धार को कुंठित कर दिया गया है। तुम्हारा मन कोई प्रश्न करने लायक ही नहीं बचा है, तुम डर गये हो। तुम्हें लगता है, सवाल कर देंगे तो भगवान जी नाराज़ हो जाएँगे। याद रखना कि जो मन इन कथाओं पर सवाल नहीं कर सकता, जो इन कथाओं के मर्म तक नहीं पहुँच सकता, वो फिर अपने जीवन पर भी सवाल नहीं उठा पाएगा।
ये जितनें धूर्त हैं, ये कभी ये नहीं बताने आएँगे कि हम जितनें मूर्खतापूर्ण रास्तों पर चले हैं उनका हमने क्या कष्ट भोगा है, क्या अंजाम सहा है, उल्टे ये तुमको बताने आएँगें कि सही रास्ते न, अरे रे रे रे; काँटे ही काँटे बिछे हैं। तुम ऐसे रास्ते का ज्ञान दे रहे हो जिस रास्ते पर तुम कभी चले ही नहीं, तुम होते कौन हो? मत करो फ़ालतू लोगों की संगति वो तुम्हें कुछ नहीं भी बोलेंगे न तो उनके मुँह पर कुछ ऐसा होगा कि तुम थोड़े बिगड़ जाओगे; सिर्फ़ उसकी शक्ल देखने भर से बिगड़ जाओगे।
दुनिया आपको तोड़े वो एक संयोग होगा। हम उस संयोग से घबराते रहते हैं कि बाहर निकलेंगे, न जाने किस पग पर, किस चौराहे पर, कोई हम पर आघात कर दे और हम सह नहीं पाएँगे, हम बिखर जाएँगे। इतना क्यों इन्तज़ार कर रहे हो कि कोई और आकर आपको तोड़े? खुद ही खुद को तोड़ लो और देख लो कि बिखरते हो कि नहीं। पाओगे कि बिखरते तो हो, पर फिर सिमट भी जाते हो।
किसी अपने ही नीचे वाले से तुलना करके अपने आप को बस धोखा दिया जा सकता है। अपनी तुलना किसी ऐसे से करो, जो तुलना के पार चला गया हो। ये वो लोग होंगे, जिन्होंने जो कुछ भी तोला जा सकता है, उसके पार कुछ अर्जित करना चाहा। अपनी तुलना ऐसों से करो, जिन्होंने प्रेम, करुणा, आनंद और मुक्ति को ज़्यादा कीमत दी हो।
कोई एक उत्तर नहीं दिया जा सकता। बहुत सारे ऐसे कार्यकर्ता भी होते हैं उनके लिए यही उचित है कि वो उस जगह पर न रहें जहाँ पर वो फिलहाल हैं। वो अगर निकाले जाते हैं या वो स्वेच्छा से ही अपने *ऑर्गेनाइज़ेशन* (संस्था) का, कम्पनी का, संगठन का त्याग कर देते हैं तो इसमें उनके साथ अन्याय नहीं हो रहा, भलाई हो रही है।
क्या तुम यह चाहते हो कि तुम जो कुछ करते रहो, उसको लेकर भीतर कोई जिज्ञासा ही न उठे और तुम इसी निष्कर्ष में और आश्वस्ति में रहे आओ कि तुम जो भी कुछ कर रहे हो वह ठीक ही है? यह तो एक आंतरिक ईमानदारी और सतर्कता की निशानी होती है न कि जो कुछ भी कर रहे हो उसको लेकर के भीतर सवाल है। उस सवाल का होना अच्छा है। हाँ, उस सवाल के होने से थोड़ी खिसियाहट रहती है, असुविधा रहती है; क्योंकि तुम कभी भी अपनेआप को यह प्रमाण-पत्र नहीं दे सकते कि जो भी तुम कर रहे हो वह अच्छा कर रहे हो।
प्रश्नकर्ता: आपके हिसाब से एक साधक को, या जो इस रास्ते पर चल रहा है, उसको क्या करना चाहिए, उसका क्या कर्तव्य होना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: पूछने की बात ही नहीं है, बात तुम्हारे अपने अनुभव की है। दिन भर जो अनुभव हो रहे हैं, क्या जानते नहीं हो वो…
उत्साह और निरुत्साह एक दूसरे की छाया है। बेईमानी हमारी ये होती है कि अचानक किसी दिन आएँगे 'आज मैं ये कर दूँगा, वो कर दूँगा।' ऊँचे-ऊँचे दावे, बड़ी-बड़ी बातें और वो बड़ी बातें हम कर ही इसीलिए रहे हैं ताकि कल से फिर कुछ न करना पड़े। जो असली आदमी होता है उसके पास एक शान्त, स्थिर, शीतल उत्साह होता है। जब उत्साह सहज बन जाए, उत्साह में जब एक सहजता हो, आपको उत्साह चाहिए ही नहीं, आपका सहज काम ही ऊर्जावान हैं।
प्रश्नकर्ता : जीवन क्या है?
आचार्य प्रशांत: जीवन का क्या अर्थ है? क्या जीवन का अर्थ यही है- उठना, बैठना, खाना, पीना, चलना, सोना और मर जाना? क्या यही जीवन है, या जीवन कुछ और भी है, इसके अलावा, इसके परे, इससे आगे? समझेंगे इसको।
यह तुम जो कुछ भी…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम गवाक्ष जोशी है। मैं आइआइटी कानपुर में पीएचडी का छात्र हूँ। और विद्युत अभियान्त्रिकी विभाग से। मेरा प्रश्न धर्म को लेकर है। मैं हितोपदेश मित्रलाभ पढ़ रहा था! तो एक श्लोक आया था मेरे सामने, जिसका अर्थ ये था — भोजन, निद्रा, भय और…
प्रश्नकर्ताः धन्यवाद, सभा में उपस्थित सभी लोगों का अभिनन्दन! मैं डा. कुमार मनोज, मैं आधुनिक चिकित्सा में यूरोप से प्रशिक्षित एक चिकित्सक हूँ। और फिलहाल मैं दिल्ली के एक शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय में मनोरोग विभाग में कार्यरत हूँ। मैं जब भारत वापस आया तो मैं अपने भारतीय समाज की सेवा…
आचार्य प्रशांत: देखते हैं दुनिया को; उसमें पहली डुएलिटी (द्वैत) तो पैदा होने के साथ ही आ जाती है। पहली डुएलिटी है कि — ये मैं हूँ और ये रहा संसार, और ये दोनों अलग-अलग हैं। पैदा होने के कुछ ही समय बाद शरीर का बोध आ जाता है, और…
प्रश्नकर्ता: किसी भी मन को सत्य की तरफ़ दिशा कैसे मिलेगी अगर उसकी ज़िन्दगी में शरीर रुपी गुरु ही नहीं हो? गुरु के बिना क्या सत्य से साक्षात्कार होने की सम्भावना है भी?
आचार्य प्रशांत: ऐसा किसी के साथ भी नहीं होता कि वो एक पर्सन (व्यक्ति) से ही खाली…
प्रश्नकर्ता: कई लोग जैसा बोलते हैं कि तुम संसार को छोड़कर यदि कुछ और तरफ जा रहे हो, तो वो पलायनवादिता है। असली स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) वो है जब तुम सब चीज़ों के बीच में रहते हुए, वो हो सको। तो इस बारे में थोड़ा सा प्रकाश डालें प्लीज़।
आचार्य प्रशांत:…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। पहले मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ कि मैं आपको लगभग छह महीने से मैं सुन रहा हूँ और मुझे बहुत फ़ायदा हुआ है।
मैं आगे बढ़ते हुए पूछना चाहता हूँ कि हमें हमेशा कुछ-न-कुछ चुनाव करना होता है कि ये करें या तो ये करें।…
प्रश्नकर्ता: हमारे जीवन में परिवर्तन कैसे सम्भव है?
आचार्य प्रशांत: हर समय हो तो रहा है परिवर्तन। अभी बैठे थे, अब खड़े हो गये। हो गया परिवर्तन। और कैसा परिवर्तन चाहते हो? टीशर्ट पहने हो, थोड़ी देर में उतार दोगे, तो हो गया परिवर्तन। परिवर्तन क्या है? दायें को अटके…
आचार्य प्रशांत: जब भी कभी मन में ये प्रश्न आये कि आचार्य जी क्या करूँ, किसी भी सन्दर्भ में जब ये प्रश्न आये, ठीक है? वो किस्सा कुछ भी हो सकता है। वो ये भी हो सकता है कि पुरानी गाड़ी अब हटाकर नयी गाड़ी लेनी है। वो ये भी…
प्रश्नकर्ता: समटाइम्स व्हेन देयर इज़ डीप इन्वॉल्वमेंट विथ रीडिंग, आई फ़ॉरगेट द सराउंडिंग्स। ऑनली द बुक रिमेंस। इज़ दैट इन्वॉल्वमेंट इन एस्केप फ़्रॉम व्हॉट इज़ हैपनिंग अराउंड और रियली बीइंग विथ ऑनसेल्फ़? (कभी-कभी जब पढ़ने से गहरा जुड़ाव होता है तो मैं अपने आस-पास का माहौल भूल जाता हूँ। केवल…
आचार्य प्रशांत: सेल्फ़ एस्टीम (आत्म सम्मान)। एस्टीमेशन (अनुमान लगाना) शब्द का क्या अर्थ होता है? एस्टीमेशन का क्या अर्थ होता है?
श्रोता: अनुमान।
आचार्य: अनुमान लगाना। है ना? अनुमान। बढ़िया है, अनुमान शब्द को ही पकड़ लो। तुम्हारा नाम क्या है?
श्रोता: आशा।
आचार्य: आशा। बैठो। ये नाम जानती हो…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते! कल के सेशन में आप एक बहुत ही एलिवेटेड स्टेट में लेकर गए, बहुत ट्रैंकफुल स्टेट(शान्ति की स्थिति) में लेकर गए। अब सवाल ये है कि वो स्टेट, वो मनोस्थिति को बरकरार कैसे रखें? डे टू डे ट्रिगर्स के बीच में वही पीसफ़ुलनेस कैसे मेंटेन…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी! आचार्य जी, आज के सत्र में आपने कहा कि सिर्फ़ जानने भर से बात नहीं बनेगी। हम जो जानते हैं, उसे हमको जीना भी पड़ेगा। और इस बात का मतलब जब मैं आत्मवलोकन करती हूँ कि मैं अपनी ज़िन्दगी में इस बात पर कितने हद तक…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम सारे योग के विद्यार्थी हैं और योग का दुनिया में बोल-बाला है। योग के विद्यार्थियों के लिए आपका क्या मार्गदर्शन है? वास्तविकता में योग क्या है?
आचार्य प्रशांत: खंडित मन दुख है और केन्द्र से विस्थापित मन दुख है, दोनो बातें समझनी होंगी।
आमतौर पर मन…