“आशा हि परमं दुखम"— आशा से बड़ा दुख दूसरा नहीं। जैसे लॉटरी। मन कहता है, सौ बार नहीं लगी, कोई बात नहीं, एक बार लग गई तो सब वसूल। पहली गलती है गलत काम में लगना, दूसरी है सही अंजाम की उम्मीद। बीच-बीच में थोड़ा सुख मिलता है, ताकि सौ गुना दुख झेलो। अपने दुख से ज्यादा सुख को टटोलो। जब सुख की असलियत समझोगे, तो पूर्ण निराशा आएगी और तब नया जीवन शुरू होगा, जिसमें हल्कापन, आनंद और निर्भयता होगी।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, रोज़ इच्छाएँ उठती हैं, कामनाएँ उठती हैं। पूरी भी होती हैं, फिर निराशा भी होती है। उससे तंगी महसूस होती है जीवन में। ऐसी स्थिति में परम के साथ एकाकार या परम में डुबकी या घुलने की इच्छा मन में आती है बहुत बार कि कोई ऐसी चीज़ मिले जिसमें परम शांति मिले।
आचार्य प्रशांत: ये भी आप इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि बीच-बीच में निराशा मिल जाती है। ये तो छुपा ही गए कि निराशाएँ बहुत मिलती हों, लेकिन बीच-बीच में सफलताएँ भी मिल जाती हैं तो आशा बनी रहती है।
कोई ऐसा खेल क्यों खेलेगा जिसके प्रति वो पूरा ही निराश हो गया हो? आप उस खेल में जमे ही इसीलिए हैं, क्योंकि आशा है अभी, निराशा पूरी नहीं है। दस बार की निराशा पर एक बार की आशा भारी पड़ती है, जैसे लॉटरी। मन कहता है, ‘सौ बार नहीं लगी कोई बात नहीं, बेटा एक बार लग गई तो सब वसूल लेंगे!’
तो आशा का ऐसा हिसाब है। निराश आप होने कहाँ पाते हैं, उम्मीद तो अभी बँधी ही हुई है कि किसी न किसी दिन जैकपॉट लगेगा, मेरा भी नंबर आएगा। सब निराशाएँ आप झेल जाएँगे कि मेरा भी नंबर




