
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
























प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी! आचार्य जी, एक सिचुएशन है। जैसे बाहर कुछ हो रहा है दुख-सुख और वो मेरे पर घट रहा है और पीछे से कोई देख रहा है।और फिर उसको मैं जानना चाह रही हूँ कि वो कौन है। फिर जैसे ही मैं कोई भी चीज़ देख रही


प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं आपका स्पष्टीकरण चाहूँगा कि इतिहास में ये भी देखा गया है कि धर्म परिवर्तन भी सबसे ज़्यादा भारतीयों का या

आचार्य प्रशांत: तो अर्जुन ने जो स्थितप्रज्ञ के लक्षण पूछे थे उसी पर बात आगे बढ़ती है। अड़सठवाँ श्लोक है दूसरे अध्याय का, श्रीमद्भगवद्गीता, सांख्य योग —

आचार्य प्रशांत: सही काम करने का मतलब बुद्धू बनना नहीं होता। तुम अगर ये मानसिकता लेकर चलोगे या आप में से कोई और लोग भी वो कहते हैं न, “गुड गाइस फिनिश लास्ट”, कि आप अच्छे आदमी हो तो आप ज़िंदगी में सबसे पीछे रहोगे और मार खाओगे और लात

प्रश्नकर्ता: सर, मैं आपके साथ एकदम खुलकर बात करना चाहता हूँ। मैं आपको सुनने के साथ-साथ कई ऐसे व्यक्तियों को भी यूट्यूब पर बहुत सुनता हूँ जिनकी आप आलोचना करते हैं। मैं उनसे बहुत प्रभावित हूँ और वो मुझे बहुत


प्रश्नकर्ता: सर (महोदय), ये मेरा प्रश्न अपमानित करने के लिए नहीं है। तो जब आप कहते हैं कि— हमने शुरू में ही बात की थी कि


दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।

आचार्य प्रशांत


आचार्य प्रशांत: तुम्हारे काम का जो उद्देश्य है और गीताकार का जो उद्देश्य है वो उद्देश्य ही मात्र भिन्न नहीं बल्कि दो अलग-अलग आयामों में है। गीता कही गई है अर्जुन को भ्रम, मोह, लोभ, देहभाव, ममत्व से मुक्त करने के लिए। ये गीताकार का, कृष्ण का उद्देश्य है कि

आचार्य प्रशांत: तुम अच्छे-खासे नौजवान थे जब तुम घुस गए थे कि, "मुझे तो एमबीए करना है!" अब कह रहे हो एमबीए करके बड़े दुख में हूँ। इतने दिनों में, पच्चीस-सत्ताईस के होकर, तुम्हें ये समझ आया कि ऐसा नहीं होता कि सब काम एक बराबर होते हैं।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। प्रश्न ये है कि हमारे पास काफ़ी चीज़ों की कामनाएँ रहती हैं पर कुछ कामनाएँ मतलब अच्छी भी होती हैं।

प्रश्नकर्ता: कहीं-न-कहीं आज के समय में आम आदमी के मन में ये बात बहुत गहरे बैठ गयी है कि शायद बिना आसन जमाए, बिना कुछ ऐसा करे कि कुछ मन्त्र का जाप करे, कुछ भी करे बात नहीं बनेगी तो बहुत बार होता है कि लोग बोलते है कि आचार्य





यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव।





प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न है कि
श्रीमद् भगवत गीता प्रथम अध्याय अर्जुन विषाद योग
धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय || 1.1 ||
धृतराष्ट्र ने कहा, “हे संजय! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में युद्ध करने के लिए एकत्रित हुए मेरे पुत्रों और पांडवों ने क्या किया?”
आचार्य प्रशांत: जिज्ञासा से आरंभ हो…
गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।
प्रचलित धारणा है कि अध्यात्म में आकर आदमी अकर्मण्य हो जाता है, यह धारणा बिल्कुल ग़लत है। अध्यात्म तो आलसी को भी कर्मनिष्ठ बना देता है। श्रीकृष्ण की पूरी सीख ही यही है — युद्ध सही रखो और परिणाम की परवाह मत करो। आध्यात्मिक समर्पण का अर्थ होता है — संग्राम। यदि संग्राम नहीं है तो जीवन कायरता भरा समर्पण है। आध्यात्मिक आदमी हमेशा चुनौतियों से जूझता हुआ मिलेगा। जो लड़ गया, वह समर्पित है और जो पीठ दिखा रहा है, वह घोर कर्ताभाव रखता है।
कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।
श्रीकृष्ण भी तुम्हीं में हैं, और मीरा भी। इन्हें मिलने दो, फिर आफ़तों में भी नाचोगे जैसे मीरा नाचती थी। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, तुम मौज में रहोगे। मीरा होना अनिवार्य है; जीवन मिला ही इसीलिए है कि हमारी मीरा और हमारे श्रीकृष्ण मिल सकें। जिनमें यह मिलन नहीं होता, वे सूखे, उदास जीते हैं। समझ ही श्रीकृष्ण है; जब समझ जागेगी, तब मीरा नाचेगी। यही मिलन, यही योग, यही जीवन जीने की कला है।
“यज्ञ” का अर्थ है — जो कुछ भी किसी निचले स्तर पर है, उसे उठाकर ऊँचे स्तर पर रख देना। जो भी संसाधन आपके पास है — समय, ध्यान, चिंतन, धन, श्रम — उसे उच्चतम को समर्पित कर देना, यज्ञ है। एक बार जान जाओ कि कोई चीज़ ऊँची है, सर्वस्व समर्पित कर दो। अपने लिए कुछ बचाकर मत रखो। “आरोहण है गीता” — नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते चलो, यही यज्ञ है।
हर पर्व आपको यही बताने के लिए आता है कि बदलो, रुको, देखो कि तुम दुखी हो, बंधन में हो; श्रीकृष्ण का भी यही संदेश है। जन्माष्टमी को मनाने का सुंदर तरीक़ा यही है कि इसे श्रीकृष्ण का नहीं, अपना जन्म-दिवस मानें और स्वयं को पुनः जन्म दें — “मैं जैसे साल भर जीता आ रहा हूँ, अब वैसे नहीं जिऊँगा।” आप एक बार फ़ैसला तो कीजिए कि सच्चाई में जीना है, फिर जो ताक़त अपने आप उभरती है, उस ताक़त का नाम श्रीकृष्ण है।
बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं। ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।
कहानी कहती है कि नारद जी बड़े चक्कर में पड़े — सोलह हज़ार रानियाँ, और जिसके भी पास जाएँ, उसके साथ श्रीकृष्ण को ही पाएँ। सोलह हज़ार रानियाँ अनंतता का प्रतीक हैं। रानियों की श्रद्धा है, और श्रीकृष्ण ही ऐसे हैं, जिनमें सैकड़ों, हज़ारों, लाखों लोग पूर्ण श्रद्धा रख सकें। स्वयं श्रीकृष्ण भी चाहें तो रानियों से अपने-आप को छीन नहीं सकते। यदि तुम सत्य के प्रेमी हो, तो सत्य तुम्हें पूरा का पूरा उपलब्ध हो जाएगा।
जिस किसी में सत्य के प्रति अर्जुन जैसी प्रगाढ़ निष्ठा होगी, उसे श्रीकृष्ण मिल ही जाएँगे। तुम्हारे भीतर वो प्रश्न उठें तो सही, जो अर्जुन में उठते थे। केन्द्रीय बात है मुक्ति और बोध की — वो अगर है, तो फिर कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। जिसे चाहिए, उसे मिल ही जाता है, चाह मूल है। हर मार्ग पर तुम्हें अपनी मुमुक्षा का, अपनी आतुरता का परिचय देना ही पड़ता है — उसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।
टूटफूट ही वो जरिया है जो आपको बताएगा कि आपके पास कुछ ऐसा भी है जो टूट नहीं सकता। जब सब बिखरा पड़ा होगा उसके बीच ही अचानक आपको पता चलेगा, अरे एक ऐसी चीज है जो नहीं बिखरी बड़ा मजा आएगा। उसके बाद यही लगेगा कि इसको और बार-बार पटको और जितना बार-बार पटको और जितना यह नहीं टूटता उतना इसमें विश्वास और गहरा होता जाता है और आदमी और खुलकर खेलता है। यह सबके पास है। यह सबके पास है। हमें इसका पता इसीलिए नहीं है क्योंकि हमने इसको कभी आजमाया ही नहीं।
मदद का एकमात्र अर्थ होता है चेतना को उसके अंजाम तक ले जाना। इसके अलावा मदद का कोई अर्थ नहीं होता। कमज़ोर की सेवा करने का अगर मतलब यह है कि कमज़ोर, कमज़ोर बना रहे, तो यह सेवा नहीं, साज़िश है। कमज़ोर की हमेशा मदद ही नहीं करनी होती, संहार भी बहुत ज़रूरी होता है। दुर्बल की तो एक ही सहायता हो सकती है कि उसको दुर्बल रहने ही मत दो। पर यदि कमज़ोरी ताकत बनना ही नहीं चाहती, तो उसका संहार करना भी सीखो।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: | तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ||3. 9||
अन्वय: यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र (यज्ञ के लिए किए कर्म के अलावा अन्य कर्म में) लोकोऽयं (लगा हुआ) कर्मबन्धनः (कर्मों के बन्धन में फँसता है) कौन्तेय (हे अर्जुन) मुक्तसङ्गः (आसक्ति छोड़कर) तत्-अर्थ (यज्ञ के लिए) कर्म (कर्म) समाचर (करो)
काव्यात्मक अर्थ: बाँधते…
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेषः योऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
अर्थ: सृष्टि के आरंभ में ही ब्रह्मा ने कहा था कि यज्ञ के द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त करोगे। यह यज्ञ ही तुम लोगों को अभीष्ट फल देगा और कामधेनुतुल्य सर्वाभीष्टप्रद होगा।
काव्यात्मक अर्थ:
सगुण हो बंधन चुना…
हमने ज्ञान को बड़ी एक परालौकिक चीज़ बना दिया है की ज्ञान माने आसमानों पर क्या हो रहा है। वही ज्ञान है। कभी मैंने आपसे कहा कि उपनिषद् साफ-साफ बताते हैं। विद्या और अविद्या दोनों चाहिए। और आसमानों की बात तो बाद में हो जाएगी। उपनिषद् कहते हैं कि जो ज़मीन की बात नहीं समझता, वो अगर आसमानों की बात करे तो दो चांटा लगाओ उसको।
जब-जब तुम सच्चाई की ओर नहीं बढ़ते, तब-तब जीवन दुख, दरिद्रता, कष्ट, रोग और बेचैनियों से भर जाता है। अधर्म अपने चरम पर चढ़ जाता है, और विवश होकर तुम्हें आँखें खोलनी पड़ती हैं। तब मानना पड़ता है कि तुम्हारी राह ग़लत थी, और ग़लत राह को छोड़कर तुम्हें सत्य की ओर मुड़ना पड़ता है। अतः जब तुम अंधेरे को पीठ दिखाते हो, तो श्रीकृष्ण को अपने समक्ष पाते हो। यही श्रीकृष्ण का अवतरण है।
यह आदमी जो अपने ऊपर हंसना शुरू करता है, यह अकर्ता हो जाता है। नॉन-डूअर हो जाता है। नॉन-डूअर का मतलब यह नहीं कि अब नॉन-डूइंग हो गई। डूइंग तो बहुत होगी! ज़बरदस्त होगी! घनघोर होगी! कल्याणप्रद होगी! ऑसपिसियस होगी! डूइंग होगी, डूअर नहीं होगा। पर कर्ता नहीं होगा। और जो यह कर्ता-हीन कर्म होता है, "द डीड विदाउट डूअर", इसके क्या कहने! यह फिर अवतारों की लीला समान हो जाता है। यह जीवन को खेल बना देता है। यह पृथ्वी पर स्वर्ग उतार देता है। यह बहुत पुराना जो कैदी है, उसे आकाश की आज़ादी दे देता है।
मनुष्य की देह होने भर से आपको कोई विशेषाधिकार नहीं मिल जाता, यहाँ तक कि आपको जीवित कहलाने का अधिकार भी नहीं मिल जाता। सम्मान इत्यादि का अधिकार तो बहुत दूर की बात है, ये अधिकार भी नहीं मिलेगा कि कहा जाए कि ज़िन्दा हो।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्तधिरप्रदिग्धान् ।।५।।
“मैं तो महानुभाव गुरुओं को न मारकर, इस लोक में भिक्षान्न भोजन करना कल्याणकर मानता हूँ, क्योंकि गुरुओं का वध करके मैं रक्त से सने हुए अर्थ और काम रूपी भोगों को ही तो भोगूँगा।“
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक…
आचार्य प्रशांत: तो शंखनाद होता है दोनों सेनाओं की ओर से। और संजय बताते हैं कि शंखनाद ने विशेषतया धृतराष्ट्र के पुत्रों के, कौरवों के हृदय में हलचल कर दी। मन उनके कम्पित हो गये, हृदय विदीर्ण हो गया। ये सुनने के बाद अब आते हैं दूसरे पक्ष पर। अर्जुन…
आचार्य प्रशांत: केतन हैं, गीता के पाँचवे अध्याय से अट्ठारवाँ श्लोक उद्दृत किया है। श्लोक कहता है-
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी | शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिन: ||
“वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं।”
भगवद्गीता,अध्याय…
आचार्य प्रशांत: बिना सोचे रिफ्लेक्शन (अवलोकन) लिखना, देखना लिख पाते हो कि नहीं। बस जब लिखा जा रहा हो तो रोक न देना उसको कि साबित करने के लिए कि लिखा ही नहीं जा सकता।
दुनिया की एक-एक कविता ऐसे ही लिखी गयी है। कवि हाथ को ढीला छोड़ देता…
प्रश्नकर्ताः धन्यवाद, सभा में उपस्थित सभी लोगों का अभिनन्दन! मैं डा. कुमार मनोज, मैं आधुनिक चिकित्सा में यूरोप से प्रशिक्षित एक चिकित्सक हूँ। और फिलहाल मैं दिल्ली के एक शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय में मनोरोग विभाग में कार्यरत हूँ। मैं जब भारत वापस आया तो मैं अपने भारतीय समाज की सेवा…
तत्व क्षेत्रं व्योमातीतमहं क्षेत्रज्ञ उच्यते। अहं कर्ता च भोक्ता च जीवनमुक्त: स उच्यते।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश इन पंच तत्वों से बना ये शरीर ही क्षेत्र है तथा आकाश से परे अहंकार ही क्षेत्रज्ञ है। ये ‘मैं’ ही समस्त कर्मों का कर्ता और कर्म फलों का भोक्ता है, इस…
“हे अर्जुन! जिसकी इन्द्रियाँ शब्द आदि विषयों से पूर्णतया संयत हैं उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है अर्थात् वही स्थितप्रज्ञ है।”
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा क्वेश्चन आज के सत्र से है जिसमें आपने बोला कि हिंसा कमज़ोरी की निशानी और अहिंसा मज़बूती की है। लेकिन आजकल हिंसा को कई तरीकों से उचित ठहराया जा रहा है।
अभी तीस जनवरी को गाँधीजी की पुण्यतिथि आने वाली है, तो जितना हमें उस…
"मैं छल करने वालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों की विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, दसवाँ अध्याय, छत्तीसवाँ श्लोक,
प्रश्नकर्ता: नमस्ते! श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि…
श्रीमद्भगवद्गीता सातवाँ अध्याय, चौदहवाँ श्लोक –
"जो ज्ञानी मुझे अनन्य भाव से भजते हैं, मेरा स्मरण करते हैं, वे मेरी त्रिगुणी माया का उल्लंघन कर जाते हैं”।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मैं मन व बुद्धि से श्रीकृष्ण का स्मरण…
आचार्य प्रशांत: जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना…
सब काम…
आचार्य प्रशांत: नहीं, बुरी वाली भी होती हैं?
प्र १: नहीं मतलब जैसे…
आचार्य: सारी ही अच्छी होती हैं।
प्र १: कि जैसे हमें किसी की…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, धर्म के किस्से-कहानियों में एक नायक की तरह, एक सर्व शक्तिमान वीर या ज्ञानी की तरह बार-बार अवतारों का उल्लेख आता है। अवतार का क्या मतलब होता है? नरसिंह अवतार ने प्रहलाद को बचाया, वामन अवतार छोटे थे, बौने थे, परशुराम क्रोधित रहते थे, मत्स्य अवतार मछली…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं आपको काफ़ी समय से सुन रहा हूँ, और आपको सुनने के बाद आपसे खुश नहीं हूँ। जब से मैंने आपको सुनना शुरू किया है, तब से मेरा पूरा जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। (दर्शकों की हँसी और तालियाँ)
मैं पहले जैसा जीवन जीता था और…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न ये है कि जैसे न आत्मा जन्म लेती है न मरती है, तो जो आम धारणा यह है कि उसकी आत्मा भटक रही है या आत्मा अतृप्त है। तो जैसा कि आप बताते हैं कि आत्मा तो जन्मती ही नहीं है, न…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। महाभारत में हम देखते हैं कि युद्ध से पूर्व अर्जुन को आत्यन्तिक पीड़ा होती है अपने सगे-सम्बन्धियों के विरुद्ध युद्ध करने में। उनका मन शोक से भर जाता है, वो नहीं चाहते हैं युद्ध करना। वहीं उनके दूसरे भाई — युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव — तैयार…
~ श्रीमद्भगवद्गीता, छठा अध्याय, दूसरा श्लोक।
जिसको संन्यास कहते हैं उसको तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी व्यक्ति योगी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं संकल्पों के त्याग का तात्पर्य समझना चाहता…
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।
मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थिर होकर आत्मा को परमात्मा में लगाए। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक १०
प्रश्नकर्ता: श्रीकृष्ण बोल रहे हैं कि “मन और इन्द्रियों सहित शरीर…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आपने एक बात कही थी कि सत्य की ओर बढ़ने के लिए समझ सबसे ज़्यादा ज़रूरी होती है, प्रयत्न भी उसके बाद आता है। मेरा सवाल इसी से जुड़ा है।
मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि मुझे समझ आ रहा है, तो मैं कई बार दावा…
प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी प्रणाम। गीता आदि ग्रन्थों को दूर से ही पढ़ने का मन करता है, क़रीब से पढ़ने पर शान्ति की जगह अशान्ति मिलती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार का मूल कृष्ण ही है। कबीर साहब भी कहते हैं:-
कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूँढे वन माही। घटघट…
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते।।
सुहृद् (दिल का अच्छा), मित्र और वैरी के प्रति उदासीन (अर्थात् निष्पक्ष, पक्षपातरहित), मध्यस्थ (द्वैत के दोनों सिरों में से कहीं भी स्थापित नहीं), द्वेष्य और बन्धुगणों में (शत्रुओं और मित्रों में), धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यंत श्रेष्ठ है।…
आचार्य प्रशांत: कुल मिलाकर के आप…