दबाव और संघर्ष का सामना अध्यात्म में भी उतना ही करना पड़ता है जितना कि संसार में। अगर संसार में तुम थोड़ा सा ही श्रम करके काम चला लेते हो, तो अध्यात्म में तो बहुत सारे श्रम की जरूरत पड़ने वाली है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
Originally published in Patrika on 20 February '24
संघर्ष, दबाव, भय या प्रतिस्पर्धा सिर्फ कॉलेज, व्यवसाय या दूसरे सांसारिक मामलों में ही है। हम आमतौर पर बस ऐसी ही छवि बना लेते हैं। हमें लगता है कि एक तो सांसारिक तल है, इसमें बड़ा घर्षण है, बड़े संघर्ष हैं, भय का सामना करना पड़ता है, खूब जोर लगाना पड़ता है, मेहनत करनी पड़ती है।
इसके विपरीत हम छवि बना लेते हैं अध्यात्म की दुनिया की। वहां हम कहते हैं कि बस प्रेम है, समन्वय है, सहिष्णुता है, आनन्द ही आनन्द है। तो कई बार अगर बात को ठीक से समझा नहीं है, इन दोनों ही जगतों से पूरा परिचय नहीं है, तो हमें ऐसा लगने लग जाता है कि बाहर की दुनिया को छोड़कर आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश करेंगे तो सब दबाव, तनाव, संघर्ष से निजात मिल जाएगी।
ऐसा नहीं है। दबाव और संघर्ष का सामना अध्यात्म में भी उतना ही करना पड़ता है जितना कि संसार में। अगर संसार में तुम थोड़ा सा ही श्रम करके काम चला लेते हो, तो अध्यात्म में तो बहुत सारे श्रम की जरूरत पड़ने वाली है। प्रतिस्पर्धा अगर संसार में है तो प्रतिस्पर्धा अध्यात्म में भी है। यह बात थोड़ी सी हो सकती है चौंकाए, लेकिन ऐसा ही है।




