प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि आप कहें कि हम तो अधिक-से-अधिक वही कर सकते हैं जो हमने किया और फल नहीं मिला तो किस्मत की बात है। यहांँ किस्मत की बात बिलकुल भी नहीं है।
जब कोई व्यक्ति संसार में कुछ पाने निकलता है, तो किस्मत भी एक बड़ा मुद्दा बन जाती है। आप जा रहे हो परीक्षा देने हो गयी दुर्घटना, बड़ी तैयारी की थी आपने साल में, हो गयी दुर्घटना अब क्या करोगे? नहीं मिलेगा अब परीक्षा फल। नहीं मिलेगा न?
संसार में चीज़ें बड़ी अनियन्त्रित रहती हैं। कुछ पता नहीं चलता कहांँ, कब, क्या, कैसे हो जाए। अध्यात्म में मामला बिलकुल साफ़, खुला, पारदर्शी और ईमानदारी का है। जितनी शक्कर डालोगे पानी उतना मीठा होता जाएगा। बिलकुल तयशुदा है। आउटपुट-इनपुट रेशियो (निर्गम-निवेश अनुपात) बिलकुल ईमानदारी से बांँध दिया गया है, वन (एक)।
जितना श्रम करोगे ठीक उतना फल मिल जाएगा, और कब मिल जाएगा? तत्काल मिल जाएगा। ये भी नहीं कि भविष्य में मिल जाएगा, तो मामला अनिश्चित हो। सारा अनिश्चय और अनिर्णय चलता है संसार में। अध्यात्म में न अनिश्चय है, न अनिर्णय है, संशय की कोई जगह ही नहीं।
तुमने इरादा बनाया नहीं, तुमने श्रम किया नहीं, तुमने समय दिया नहीं कि फल मिल गया। वास्तव में तुम्हारा श्रम करना, तुम्हारा समय देना ही फल है। तो अगर कोई कहे कि मुझे फल नहीं मिल रहा, तो उसकी एक ही वजह होगी, किसी और को दोष मत देना। वजह ये होगी कि तुमने न श्रम किया है, न समय डाला है, न संसाधन डाले हैं।




