आचार्य प्रशांत: ध्यान की एक विधि। उत्सुकता आयी थी कि ध्यान की एक विधि दी जाए। तो आपमें से जो लोग उसके बारे में जानना चाहें, वो समझें।
शून्य-स्मरण। शून्य-स्मरण – जो कुछ भी बहुत आवश्यक और ज़रूरी लगता हो, जो कुछ भी नितांत क़रीबी, आवश्यक प्रतीत होता हो, उसको उसी आवश्यकता के क्षण में, यह कहकर देखें कि तू कुछ नहीं है, शून्य है, झूठा है।
देखिए, हम मौन का जब स्मरण करते हैं तो हम मौन को भी कोई वस्तु या विषय बना लेते हैं। मौन का, शून्य का वास्तविक स्मरण करने का तरीक़ा है कि जब शोर छा रहा हो मन पर — और शोर तभी छाता है जब शोर में कुछ खिंचाव होता है, शोर में कुछ ज़रूरी और आवश्यक लगता है — जब शोर छा रहा हो मन पर, जब कुछ बहुत प्यारा लग रहा हो या जब कुछ बहुत ही बुरा लग रहा हो, या मन में नफ़रत उठ रही हो, कुछ बहुत ही आकर्षक लग रहा हो या घोर विकर्षण हो, तब कहिए – शून्य है यह। ठीक तब।
वह पल, जब आप यह कहेंगे, खिंचाव का होगा, पर बीत जाएगा। बीत जाएगा और आपको हल्का कर जाएगा।
क्या विधि समझ में आयी है?
जब भी कोई चीज़ मन पर हावी हो जाए, जब भी कोई चीज़ अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत हो, जब भी आप किसी बाहरी वस्तु से घिर गए हों और ऐसा लगे कि यह जीवन और मृत्यु का मामला है, उसी क्षण अपनेआप से कहें, ‘यह कुछ भी नहीं है। यह कुछ भी नहीं है। यह कुछ भी नहीं है। यह कुछ भी नहीं है।’
अपनी पसंद के आधार पर आप यह भी कह सकते हैं कि ‘यह झूठ है’, या ‘यह महत्वपूर्ण नहीं है’, या ‘मुझे इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है।’ यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस भाषा का उपयोग करना चाहते हैं, और आप किसी भी भाषा का उपयोग करना चाहते हैं भी या नहीं। इसका अभ्यास करें।









