जो आम आदमी की फिलॉसफी है, वह यही है कि दुनिया की सबसे बड़ी जो ताकत है, जिस पर पूरा भरोसा किया जा सकता है, जो सब कुछ ठीक कर सकती है, जो सब कुछ चलाती है, वह ऊपर कहीं आसमानों में बैठी है। माने, वह इस दुनिया की नहीं है। माने, जो कुछ इस दुनिया का है, उसका भरोसा मत करो, वह ना कुछ जानता, ना समझता, वह तो गड़बड़ी है। माने, अगर आपकी कोई शारीरिक समस्या भी है, तो उसका समाधान वही करेगा, जो आसमानों में बैठा है। यही तो द्वैतवाद दर्शन है ना? हम गीता का दर्शन थोड़ी समझ पाए हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, मेरा नाम विनीता है, मैं बेंगलोर से हूँ और मैं यहां एक आंत्रप्रेन्योर हूँ। मेरा प्रश्न आज डॉक्टर्स को लेकर होने वाली हिंसा पर है।
हमने दो तरीके से चीजों को देखा है। अगर किसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए हम किसी नीम हकीम के पास जाते हैं, किसी पोंगा पंडित के पास जाते हैं या किसी बाबा के पास जाते हैं, तो हमारा स्वभाव एकदम से बड़ा श्रद्धालु होता है। हम एकदम एब्सलूट सरेंडर में जाते हैं और हमें लगता है वहां जाकर सब कुछ ठीक हो जाएगा। बहुत पोलाइट उनके साथ बिहेव करते हैं और हमें लगता है कि बस यहां आ गए तो अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। उनके साथ तो हिंसा तो छोड़ो, हम एकदम ऐसे बिहेव करते हैं जैसे वो हमारे अपने हों।
और दूसरी तरफ, अगर उसी बीमारी के इलाज के लिए हम किसी मेडिकल प्रोफेशनल को अप्रोच कर रहे हैं या कोई कैपेबल डॉक्टर है, तो वहां पर हमारा एटीट्यूड एक शॉपकीपर की तरह रहता है। हमें लगता है कि हमने पैसा दिया है तो बस आउटपुट ज्यादा से ज्यादा होना चाहिए और सब कुछ ठीक हो जाना चाहिए। और अगर ऐसा नहीं होता है, तो डॉक्टर्स के प्रति बहुत ज्यादा हिंसा हमने देखी है।
फिलहाल में ही अभी एक केस आया था चेन्नई में, जहां पर एक ऑंकोलॉजिस्ट के ऊपर काफी घातक हमला हुआ था। तो मेरा प्रश्न आपसे यह है कि दोनों ही केसेस में हमारा रवैया इतना अलग क्यों रहता है? जहां पर एक्चुअल में प्रॉब्लम सॉल्व होने के चांसेस नेगलिजिबल हैं, वहां पर तो हम इतनी श्रद्धा के साथ जाते हैं और इतना पोलाइटली बिहेव करते हैं, और जो एक्चुअल में कैपेबल है प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए, वहां पर हम इतने वायलेंट हो जाते हैं। डॉक्टर्स के लिए इतना कंटेमट क्यों है?




