अंधविश्वास सफल कैसे हो जाता है - तीन कारण (तीसरा खतरनाक है) || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: जो अभी जिज्ञासा है मेरी आचार्य जी, यूट्यूब पर एक शॉर्ट्स देखा था, उसके सम्बन्ध में है। तो एक बहुत सुप्रसिद्ध व्यक्ति जो श्रीमद्भगवद्गीता पर बोलते हैं उनका वह शॉर्ट्स देखा था; काफ़ी चल रहा है, बार-बार मेरे फीड पर आया। तो वो निष्काम कर्म पर बोल रहे थे और जो निष्काम कर्म का बहुत क्लीशे (घिसा-पिटा) पिछल्लू चलता है कि कर्म करो फल की चिन्ता मत करो उसपर। मैं थोड़ी असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करूँगा, पर उन्होंने एकदम दो कौड़ी की फटीचर बात बोली है, बहुत कॉन्फिडेंस (आत्मविश्वास) के साथ बोली है। तो मुझे बहुत पीड़ा हुई कि ये चल भी रहा है शॉर्ट्स, लोग देख भी रहे है।
तो यह सवाल उठा कि अगर निष्काम कर्म को एक उच्च कोटि का सिद्धान्त मानें, तो सिद्धान्त तो भौतिकी के भी होते हैं, साइंटिफ़िक कॉन्सेप्ट्स (वैज्ञानिक अवधारणा) होते हैं, समाजशास्त्र में भी सिद्धान्त होते हैं, फिलॉसफी (दर्शनशास्त्र) में भी सिद्धान्त होते हैं। तो अगर एक स्केल (पैमाना) बनाएँ कि मटेरियल साइंस (सामग्री विज्ञान) से लेकर मटेरियलिटी (माद्दा) प्योर मटेरियलिटी (सुद्ध माद्दा), फिज़िक्स (भौतिक विज्ञान) से लेकर और इधर स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता) है, तो फिज़िक्स (भौतिकी), सोशियोलॉजी (समाजशास्त्र), साइकोलॉजी (मनोविज्ञान), फिलॉसफी (दर्शनशास्त्र) , स्पिरिचुअलिटी (आध्यात्मिकता); इन सबके अपने कॉन्सेप्ट्स (संकल्पनाएँ) हैं। जो एक नम्बर की हरामखोरी हो रही हैं वह स्पिरिचुअलिटी के कांसेप्ट के साथ क्यों हो रही है, यह मेरा सवाल हैं।
आचार्य प्रशांत: क्योंकि वहाँ जो प्रूफ़ (प्रमाण) है वो सिर्फ़ और सिर्फ़ सब्जेक्टिव (व्यक्तिपरक) हो सकता है।

