गलत आदत इसलिए नहीं छूटती क्योंकि हम उस पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते। जो गलत है उसके दोष देखने के लिए कोई विशेष दार्शनिक दृष्टि नहीं चाहिए, केवल सीधा होश चाहिए। प्रतिपल यह जानना कि हम कहाँ खड़े हैं और कहाँ जा रहे हैं, यही जागरूकता गलत को छुड़ाती है। होश में रहो, बाकी सब अपने आप बन जाता है।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
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जो गलत है वो इसलिए नहीं छूटता क्योंकि अपने ठीक से देखा नहीं है कि वो गलत है। और ठीक से देखना कि कोई चीज गलत है, उसके लिए आपको कोई विशिष्ट शक्ति नहीं चाहिए। उसके लिए आपके पास कोई दैवीय सिद्धि हो ये कोई जरूरी नहीं है। उसके लिए तो बस मेहनत चाहिए, उसके लिए तो जाकर आज़माना पड़ेगा, प्रयोग करने पड़ेंगे, छान-बीन करनी पड़ेगी, सवाल करने पड़ेंगे, किसी से कोई कठिन प्रश्न खड़ा कर देना होगा, तभी तो पता चलेगा न। होता क्या है न, जब किसी बात की आपको बस साठ प्रतिशत आश्वस्ति होती है, तो बड़ी आसानी से हम बाकि चालीस प्रतिशत का दुरुपयोग करके अपने-आपको बता देते हैं कि, 'अभी तो जो मामला है न वो थोड़ा-सा अनिर्णीत है, अधर में अटका हुआ है।' अनिर्णीत समझते हैं? अनडिसाइडेड।
भले ही वो जो अभी अनिर्णय है, वो निन्यानवे और एक का अनिर्णय हो, कि निन्यानवे प्रतिशत आप किसी चीज को लेकर निश्चित हैं, और एक प्रतिशत आपके पास संदेह अभी कोई बचा हुआ है। लेकिन जब कर्म करने की बारी आएगी, तो आप फैसला उस निन्यानवे प्रतिशत के पक्ष में नहीं लेंगे, आप उस एक प्रतिशत के पक्ष में ले लेंगे ये बहाना देकर कि 'साहब, अभी तो फाइनल डिसिजन पेडिंग (अंतिम निर्णय बाकी) है। देखिए अभी कुछ पेंच बाकी है, अभी कुछ बातें सुलटनी बाकी हैं। आखिरी चीज अभी तय थोड़े ही हुई है।'




