प्रश्नकर्ता: सुबह ध्यान करने के लिए जाते हैं पहाड़ी पर, अच्छा रहता है, सुबह ध्यान होता है। शाम को भी जाते हैं। फिर बीच में ऑफिस से आने के बाद, दोपहर में एक घंटा घर पर बैठे तो उस तरह का नहीं हो पाता।
आचार्य: तुम कह रहे हो कि जब वातावरण अनुकूल होता है तभी ध्यान हो पाता है।
प्र: जी, ध्यान ऐसा होता है कि पता नहीं चलता है कि हम कहाँ हैं। शुरू में संगीत लगाते हैं फिर बंद करके हो जाता है। लेकिन फिर दिन में उस तरह बैठने से नहीं होता।
आचार्य: तुमने ख़ुद ही तय कर लिया न। जब तुम एक विशेष क्रिया करके ध्यान लगाते हो तो तुम अपनेआप को ही ये बताए दे रहे हो न कि मेरा ध्यान तो इस क्रिया के माध्यम से ही लगेगा।
जब तक वैसा माहौल होगा, वैसा संगीत होगा, वो जगह होगी, पहाड़ी होगी तभी मेरा ध्यान लगेगा। तो जब वो जगह छूटती है, वो समय, वो संगीत छूटता है, तो तुम्हारा ध्यान भी छूट जाता है।
जो लोग किसी तरीक़े से ध्यान करते हैं, उन बेचारों को ये कठिनाई आएगी-ही-आएगी। उनका ध्यान अब तरीक़े पर आश्रित हो गया न। बल्कि तरीक़ा ध्यान को उन तक लेकर आ रहा है, तो ध्यान छोटा, तरीक़ा बड़ा हो गया।
प्र: जो सुबह-शाम हो रहा है और रस और आनंद मिल रहा है, वो दिन में क्यों नहीं हो रहा? ये समझ नहीं आ रहा।






