
शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।















आचार्य प्रशांत: हम देखेंगे कि श्रीकृष्ण अर्जुन के सब भावुक, मार्मिक वक्तव्यों को किस प्रकाश में देख रहे हैं। तो अपनी ही मोहजनित पीड़ा को आगे अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं अर्जुन कि





आचार्य प्रशांत: कृष्ण वो, जिसे आगे-पीछे से कोई लेना-देना नहीं। जो न पीछे का कायल है, न आगे से आक्रान्त। आ रही है बात समझ में? इसीलिए उनके जीवन में आपको विरोधाभास-ही-विरोधाभास दिखाई देंगे। और इसीलिए बहुत सारे लोगों को कृष्ण सुहाते भी नहीं। उनको दूसरे लोग चलते हैं मर्यादित











आचार्य प्रशांत: जो तुम कर रहे हो वह तुम कर नहीं रहे, तुम्हें लग रहा है कि तुम कर रहे हो। पीछे से तुम्हारी वृत्तियाँ, तुम्हारा जो वह कलुषित मालिक बैठा है वह करवा रहा है, कौन सा मालिक? भगवान मालिक नहीं, कौन मालिक?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! डू वी नीड टू क्रिएट गॉड्स ऑर वी हैव ऑलरेडी (क्या हमें भगवान बनाने होंगे या वो पहले से हमारे पास हैं)? जैसे हम कुछ अच्छी क्वालिटीज़ हम जो पढ़ते हैं शास्त्रों में, कई बार हमारे पास नहीं होती है, या वो हमारे पास है, हम अनदेखा


आचार्य प्रशांत: तो अर्जुन ने जो स्थितप्रज्ञ के लक्षण पूछे थे उसी पर बात आगे बढ़ती है। अड़सठवाँ श्लोक है दूसरे अध्याय का, श्रीमद्भगवद्गीता, सांख्य योग —


प्रश्नकर्ता: सर, मैं आपके साथ एकदम खुलकर बात करना चाहता हूँ। मैं आपको सुनने के साथ-साथ कई ऐसे व्यक्तियों को भी यूट्यूब पर बहुत सुनता हूँ जिनकी आप आलोचना करते हैं। मैं उनसे बहुत प्रभावित हूँ और वो मुझे बहुत



दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।

प्रश्नकर्ता:

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२.७२॥
हे अर्जुन! यही ब्रह्मस्वरूप में अवस्थिति है। इस अवस्था को पाकर मनुष्य संसार में मोहित नहीं होता। मृत्यु के समय भी इस ब्राह्मी स्थिति में प्रतिष्ठित रहकर वह ब्रह्मस्वरूपता के आनन्द को प्राप्त करता है।

आचार्य प्रशांत: अर्चना है देवबंध से, दूसरे अध्याय का छठा श्लोक उद्धृत करा है।

आचार्य प्रशांत


आचार्य प्रशांत: तुम्हारे काम का जो उद्देश्य है और गीताकार का जो उद्देश्य है वो उद्देश्य ही मात्र भिन्न नहीं बल्कि दो अलग-अलग आयामों में है। गीता कही गई है अर्जुन को भ्रम, मोह, लोभ, देहभाव, ममत्व से मुक्त करने के लिए। ये गीताकार का, कृष्ण का उद्देश्य है कि

आचार्य प्रशांत: एक मुहावरा चल गया है कि अरे किताबों में क्या है वहाँ तो खोखले और थोथे शब्द हैं, असली ज्ञान तो भीतर है, बच्चा ध्यान करो। गीता उठाकर के कचरे में डाल दो, बच्चा ध्यान करो और असली ज्ञान भीतर से निकलेगा। मेरे पास शब्द नहीं हैं इस…


प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, अभी कुछ दिनों से मैं एक घटनाक्रम को फॉलो कर रहा था। जिसमें एक महिला
तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।
गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।
कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।
“यज्ञ” का अर्थ है — जो कुछ भी किसी निचले स्तर पर है, उसे उठाकर ऊँचे स्तर पर रख देना। जो भी संसाधन आपके पास है — समय, ध्यान, चिंतन, धन, श्रम — उसे उच्चतम को समर्पित कर देना, यज्ञ है। एक बार जान जाओ कि कोई चीज़ ऊँची है, सर्वस्व समर्पित कर दो। अपने लिए कुछ बचाकर मत रखो। “आरोहण है गीता” — नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते चलो, यही यज्ञ है।
बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं। ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।
गीता में पहली बात तो कहीं लिखा नहीं है कि "कर्म कर और फल की चिंता मत कर" — ऐसा कोई श्लोक नहीं है। श्रीकृष्ण बस ये कहते हैं: सही कर्म कर, बस। अगर आपने सही काम उठा लिया, तो फल की चिंता आएगी ही नहीं। आपने सही काम उठाया है या नहीं — ये आप इसी बात से जाँच सकते हो कि आपको भविष्य कितना याद आ रहा है। अगर आपको बार-बार ये सोचना पड़ रहा है कि इस काम से मुझे क्या मिलेगा, तो आपने काम गलत उठाया है।
गीता एक एलीट डॉक्यूमेंट है, उत्कृष्टता है इसमें। इससे प्यार वही कर पाएँगे, जिन्हें ऊँचाइयों से प्यार है, जिन्हें एक्सीलेंस चाहिए। और जिनको ऐसे ही बीच में पड़े रह जाना है — मिडियॉकर — उन्हें गीता रुचेगी ही नहीं। जीवन में जो भी ऊँचे-से-ऊँचा, श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठतर हो सकता है, वो निष्काम कर्म से ही मिलेगा। घोर कर्म करना है, जज़्बे से खेलना है, दिल से चाहना है, डूबकर जीना है — ये श्रीकृष्ण का उपदेश है।
आजकल की जो पढ़ी-लिखी लड़कियाँ हैं, बोलती हैं कि धर्म का मतलब ही है नारी शोषण। नहीं, ऐसा नहीं है। धर्म के केंद्र पर जो ऋषि बैठे हैं, उन्होंने अपनी ओर से कभी भेदभाव नहीं किया। यह भेदभाव उस समाज ने किया है, जो कृषि और बाहुबल आधारित था। आज सौभाग्य की बात यह है कि महिलाओं के लिए ऊर्जा बाजुओं से नहीं आती, मस्तिष्क से आती है। तो परम आवश्यक है कि उनके हाथ मजबूत रहें और वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहें।
टूटफूट ही वो जरिया है जो आपको बताएगा कि आपके पास कुछ ऐसा भी है जो टूट नहीं सकता। जब सब बिखरा पड़ा होगा उसके बीच ही अचानक आपको पता चलेगा, अरे एक ऐसी चीज है जो नहीं बिखरी बड़ा मजा आएगा। उसके बाद यही लगेगा कि इसको और बार-बार पटको और जितना बार-बार पटको और जितना यह नहीं टूटता उतना इसमें विश्वास और गहरा होता जाता है और आदमी और खुलकर खेलता है। यह सबके पास है। यह सबके पास है। हमें इसका पता इसीलिए नहीं है क्योंकि हमने इसको कभी आजमाया ही नहीं।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: | तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ||3. 9||
अन्वय: यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र (यज्ञ के लिए किए कर्म के अलावा अन्य कर्म में) लोकोऽयं (लगा हुआ) कर्मबन्धनः (कर्मों के बन्धन में फँसता है) कौन्तेय (हे अर्जुन) मुक्तसङ्गः (आसक्ति छोड़कर) तत्-अर्थ (यज्ञ के लिए) कर्म (कर्म) समाचर (करो)
काव्यात्मक अर्थ: बाँधते…
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेषः योऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ १० ॥
अर्थ: सृष्टि के आरंभ में ही ब्रह्मा ने कहा था कि यज्ञ के द्वारा ही वृद्धि को प्राप्त करोगे। यह यज्ञ ही तुम लोगों को अभीष्ट फल देगा और कामधेनुतुल्य सर्वाभीष्टप्रद होगा।
काव्यात्मक अर्थ:
सगुण हो बंधन चुना…
यह आदमी जो अपने ऊपर हंसना शुरू करता है, यह अकर्ता हो जाता है। नॉन-डूअर हो जाता है। नॉन-डूअर का मतलब यह नहीं कि अब नॉन-डूइंग हो गई। डूइंग तो बहुत होगी! ज़बरदस्त होगी! घनघोर होगी! कल्याणप्रद होगी! ऑसपिसियस होगी! डूइंग होगी, डूअर नहीं होगा। पर कर्ता नहीं होगा। और जो यह कर्ता-हीन कर्म होता है, "द डीड विदाउट डूअर", इसके क्या कहने! यह फिर अवतारों की लीला समान हो जाता है। यह जीवन को खेल बना देता है। यह पृथ्वी पर स्वर्ग उतार देता है। यह बहुत पुराना जो कैदी है, उसे आकाश की आज़ादी दे देता है।
मनुष्य की देह होने भर से आपको कोई विशेषाधिकार नहीं मिल जाता, यहाँ तक कि आपको जीवित कहलाने का अधिकार भी नहीं मिल जाता। सम्मान इत्यादि का अधिकार तो बहुत दूर की बात है, ये अधिकार भी नहीं मिलेगा कि कहा जाए कि ज़िन्दा हो।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्तधिरप्रदिग्धान् ।।५।।
“मैं तो महानुभाव गुरुओं को न मारकर, इस लोक में भिक्षान्न भोजन करना कल्याणकर मानता हूँ, क्योंकि गुरुओं का वध करके मैं रक्त से सने हुए अर्थ और काम रूपी भोगों को ही तो भोगूँगा।“
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक…
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस:। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्।।
कथं न ज्ञेयम स्माभि: पापादस्माननिवर्तितुम। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यदिर्जनार्दन।।…
आचार्य प्रशांत: तो शंखनाद होता है दोनों सेनाओं की ओर से। और संजय बताते हैं कि शंखनाद ने विशेषतया धृतराष्ट्र के पुत्रों के, कौरवों के हृदय में हलचल कर दी। मन उनके कम्पित हो गये, हृदय विदीर्ण हो गया। ये सुनने के बाद अब आते हैं दूसरे पक्ष पर। अर्जुन…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कई बार ऐसा होता है कि विरोधी पक्ष के लोग विनीत भाव से मदद वग़ैरह माँगने आ जाते हैं, जैसे दुर्योधन ने शल्य का सहयोग माँगा, दुर्योधन ने बलराम से गदा सीखने का निवेदन किया और दुर्योधन ने श्रीकृष्ण से उनकी नारायणी सेना माँगी। ऐसी स्थितियों…
यस्वतंरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ।।१७।।
किन्तु जो लोग सत्य में ही अनुरक्त, तृप्त और संतुष्ट हैं उनके लिए तो कर्तव्य कर्म नहीं बचते।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, तीसरा अध्याय, कर्मयोग, श्लोक १७
आचार्य प्रशांत: सुंदर बात कही है! पिछला श्लोक समाप्त हुआ था ये कहने पर कि…
आचार्य प्रशांत: केतन हैं, गीता के पाँचवे अध्याय से अट्ठारवाँ श्लोक उद्दृत किया है। श्लोक कहता है-
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी | शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिन: ||
“वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं।”
भगवद्गीता,अध्याय…
जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वो दृश्य, जो उसको देखने वाला है, वो दृष्टा। तो देवता, मनुष्य, ऋषि आदि दिखाई दे रहे हैं अर्जुन को, तो ये सब क्या हो गए? दृश्य। और इनको देखने वाला कौन है? दृष्टा, अर्जुन स्वयं। और दृश्य और दृष्टा के आधार में कौन बैठा है? परमात्मा। दृश्य और दृष्टा, दोनों किससे आए हैं और किसमें लीन हो जाने हैं? ये इन तीनों का किस्सा है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे एक चीज़ पूछनी थी कि जैसे आपकी चेतना है या ओशो रजनीश की चेतना, हम ये मान के चल रहे हैं कि आप लोगों की चेतना एक आम चेतना से बहुत ऊपर है। तो क्या हम ये मान के चलें जब ऐसे धर्मगुरु शरीर छोड़ते हैं…
प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…
प्रश्नकर्ता: सर, मेरे पेरेंटस (माता-पिता) फ्यूचर को लेकर डराते हैं कि अभी यू आर थिंकिंग लाइक दैट, व्हेन यू विल बी ऐज़ ओल्ड ऐज़ अस, यू विल रिग्रेट, यू विल बी डिप्रेस्ड, यू विल बी अलोन (मेरे अभिभावक भविष्य को लेकर डराते हैं कि अभी तुम ऐसा सोचती हो पर…
प्रश्नकर्ता: सबको प्रणाम। आज की इस धर्म चर्चा में आपका स्वागत है। आज हमारे बीच में एक ऐसी विभूति या कहें शख्सियत आचार्य प्रशांत जी हैं। आपके बारे में मैं थोड़ा सा बताना चाहूँगा। आप बहुत ही ज्ञानी और पढ़े-लिखे एक आचार्य हैं। इन्होंने आइआइटी से इंजीनियरिंग की, आइआइएम से…
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति।।२.६४।।
राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त करता है।
आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता दूसरा अध्याय, सांख्य योग, श्लोक क्रमांक चौंसठ। “राग-द्वेष से वियुक्त वशीभूत इन्द्रियों द्वारा विषयों का उपभोग करके संयत मनुष्य अपने मन में प्रसाद प्राप्त…
आचार्य प्रशांत: कर्मसंन्यास और कर्मयोग क्या हैं? दोनों में अन्तर क्या है? आमतौर पर हम जिसे कर्म कहते हैं; वो कैसे होता है? वो ऐसे होता है कि जैविक रूप से और सामाजिक रूप से मन संस्कारित रहता है। फ़िज़िकल, सोशल दोनों तरह के संस्कार। तो मन में पहले…
अयति: श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानस:। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।६.३७।।
अर्जुन बोले — हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस…
तत्व क्षेत्रं व्योमातीतमहं क्षेत्रज्ञ उच्यते। अहं कर्ता च भोक्ता च जीवनमुक्त: स उच्यते।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश इन पंच तत्वों से बना ये शरीर ही क्षेत्र है तथा आकाश से परे अहंकार ही क्षेत्रज्ञ है। ये ‘मैं’ ही समस्त कर्मों का कर्ता और कर्म फलों का भोक्ता है, इस…
एवं बुद्धे: परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्।।३.४३।।
इस प्रकार हे महाबाहो अर्जुन! अपने आप को भौतिक इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि से परे जानकर और मन को निश्चयात्मिका बुद्धि की सहायता से स्थिर करके इस काम-रूपी दुर्जय शत्रु को जीतो।
~श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ३, श्लोक ४३
आचार्य प्रशांत: ‘संस्तभ्यात्मानमात्मना’—कहीं-कहीं…
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् विषीदंतमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः।।२.१।।
~ श्रीमद्भगवतगीता, द्वितीय अध्याय, सांख्य योग, प्रथम श्लोक
आचार्य प्रशांत: संजय कहते हैं कि श्री कृष्ण ने उस प्रकार भाव से आविष्ट और अश्रुपूरित नेत्रों वाले अर्जुन से कहा- 'हे अर्जुन, अनार्यों के योग्य, स्वर्ग प्राप्ति का विरोधी निंदाजनक ये मोह तुम्हें कहाँ से…
श्रोता: अहम्।
आचार्य: हाँ, वह जो…
प्रश्नकर्ता: “अहिंसा परमो धर्म:।” श्लोक के इस अंश में एक तरफ़ तो भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “अहिंसा परमो धर्म:” और दूसरी तरफ़ वो गीता का ही इस्तेमाल कर रहे हैं, अर्जुन से हिंसा करवाने के लिए। तो ये बात तो सरासर गलत है। कृष्ण हिंसा करवा रहे हैं और…
“हे अर्जुन! जिसकी इन्द्रियाँ शब्द आदि विषयों से पूर्णतया संयत हैं उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है अर्थात् वही स्थितप्रज्ञ है।”
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा पहला प्रश्न ये है, हमनें चोट के बारे में बात कही, तो मैं अपने अनुभव में जो देखती हूँ मुझे ऐसा लगता है कि जब भी मुझे चोट लगती है उसके साथ एक और भाव जो साथ में ही उठता है वो होता है कि…
प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते। आपसे मैं सर्वप्रथम शास्त्र-कौमुदी नामक कोर्स (पाठ्यक्रम) के जरिए जुड़ा था, तब से मुझे वेदांत और ग्रंथों का मूल्य पता चला। मैंने प्रस्थानत्रयी का पाठ शुरू किया है, तीन महीने हो गए हैं। मुश्किल हो रही है समझने में, पर आनंद आता है। कोरोना के कारण घर…
"मैं छल करने वालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों की विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, दसवाँ अध्याय, छत्तीसवाँ श्लोक,
प्रश्नकर्ता: नमस्ते! श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि…
श्रीमद्भगवद्गीता सातवाँ अध्याय, चौदहवाँ श्लोक –
"जो ज्ञानी मुझे अनन्य भाव से भजते हैं, मेरा स्मरण करते हैं, वे मेरी त्रिगुणी माया का उल्लंघन कर जाते हैं”।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मैं मन व बुद्धि से श्रीकृष्ण का स्मरण…
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ७२)
आचार्य…
~श्रीमद्भगवदगीता, अध्याय २, श्लोक ६
(अर्थ: हम यह भी नहीं जानते कि हम लोगों के लिए युद्ध करना…
आचार्य प्रशांत: जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, धर्म के किस्से-कहानियों में एक नायक की तरह, एक सर्व शक्तिमान वीर या ज्ञानी की तरह बार-बार अवतारों का उल्लेख आता है। अवतार का क्या मतलब होता है? नरसिंह अवतार ने प्रहलाद को बचाया, वामन अवतार छोटे थे, बौने थे, परशुराम क्रोधित रहते थे, मत्स्य अवतार मछली…