
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।



















मीरा अगर पुरुष होती, तो भी क्या श्रीकृष्ण को पति ही मानती? तुम्हें समझ में नहीं आ रही बात। ठीक है भाई दैहिकता है, शारीरिकता है, लेकिन फिर भी हम मूल्य देंगे, सम्मान देंगे कि इतना तो करा कि किसी जीवित पुरुष के जाकर के आलिंगन में नहीं बँध गई। उन्होंने कहा, "मुझे ऊँचे से ऊँचा चाहिए भले ही अभी वो जीवित ना हो, भले ही मुझे सामने शरीर–रूप में दिखाई ना देता हो।


बस अनंत प्रेम है आपसे इसलिए कुछ लिखा है। और सिर्फ़ दो-तीन पंक्तियाँ ही हैं।























प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं प्रेम के बारे में जानना चाहती हूँ। मैं पाँच साल से किसी के साथ थी और अब मुझे खुद को उसके साथ नहीं रहना है। मैं जानना चाहती हूँ कि क्या हम किसी को प्यार करने के लिए खुद को मजबूर कर सकते हैं, और


आचार्य प्रशांत: “घूॅंघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे।” मन के कुछ सिद्धान्त हैं जो इससे एकदम सामने आते हैं उनको समझ लेना है। पहला, प्रत्येक प्राणी प्रेमी है प्राण माने प्रेम; अज्ञान में प्रेम की ही ऊर्जा कुछ और बन जाती है। कुछ और क्या? कामना, भय, ईर्ष्या,


आचार्य प्रशांत: कई बार अपनेआप को एक चुनौती भरा लक्ष्य दे देना सहायक हो जाता है। पर जो भी कुछ जीवन में लाओ तो इतना चुनौतीपूर्ण, इतना आवश्यक, इतना अपरिहार्य होना चाहिए कि उसके आगे पुराना सबकुछ फीका लगे, तब तो पुराने से मुक्ति मिलेगी, नहीं तो नहीं मिलेगी। सतही

आचार्य प्रशांत: किसी मुर्दे को आज तक बीमार पड़ते देखा है तो इसका क्या अर्थ है? बीमारी कहाँ से उठती हैं? प्राणों से उठती है। बीमारी प्राण का सन्देश है तुम्हें, कुछ गलत हो रहा है। बीमारी प्राण का सन्देश है कि करीब आओ, मेरे पास रहो, मेरे जैसे हो
प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।
डर और जड़ता से बाहर निकलने का रास्ता किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि एक छोटे-से सही कदम से शुरू होता है। अपनी समस्याओं का बार-बार विश्लेषण और वर्णन करने के बजाय उनसे दूर जाने का निर्णय आवश्यक है। सत्य के प्रति प्रेम जागने पर भय अपने-आप पीछे छूट जाता है और साहस जुटाना नहीं पड़ता। सही संगति, अनुकूल वातावरण और आत्मिक विकास के अवसरों को अपनाने से परिवर्तन सहज होने लगता है। अपनी कमजोरियों से मोह रखने के बजाय उनके प्रति वैराग्य विकसित करना ज़रूरी है। शिकायत, बहाने और आत्म-दया में उलझे रहने से कुछ नहीं बदलता; निर्णायक कर्म, सत्य के प्रति प्रेम और वर्तमान स्थिति के विरुद्ध विद्रोह ही ऊँचे जीवन की वास्तविक शुरुआत हैं.
प्रेम कोई सामाजिक स्वीकृति, विवाह या रोमांटिक आकर्षण नहीं, बल्कि अहंकार के मिटने की प्रक्रिया है। सच्चा प्रेम अनुमति नहीं मांगता और न ही हार्मोन या परंपरा से पैदा होता है; वह सत्य और मुक्ति की ओर भीतर की यात्रा है। इसी तरह अहंकार सफलता पाने के लिए खुद को नहीं मिटा सकता — क्योंकि जब तक "मैं" बना हुआ है, तब तक हर त्याग, चाहे परिवार का हो, मित्रों का हो या स्वास्थ्य का, अहंकार का ही एक रूप रहता है। सही कर्म योजना बनाकर नहीं, बल्कि झूठे प्रभावों और बंधनों से मुक्त होकर स्वतः प्रकट होता है।
डेटिंग ऐप, कुंडली मिलान और “मेरी पसंद” जैसी धारणाएँ अक्सर प्रेम नहीं, बल्कि डर, सामाजिक कंडीशनिंग और अहंकार से संचालित होती हैं। परंपरा के दबाव में किया गया चुनाव और केवल व्यक्तिगत पसंद पर आधारित चुनाव, दोनों ही भ्रमित हो सकते हैं। सच्चा प्रेम तब संभव होता है जब व्यक्ति स्वयं को जाने और ऐसा संबंध चुने जो उसके बंधनों, भय और अहंकार को चुनौती देकर उसे भीतर से मुक्त करे।
रिश्तों में प्रेम को अक्सर जन्म, परिवार या सामाजिक भूमिकाओं से जोड़ दिया जाता है, जबकि अधिकांश संबंध अपेक्षाओं, स्वामित्व और तयशुदा व्यवहारों पर टिके होते हैं। केवल माता-पिता या संतान का रिश्ता होने से प्रेम नहीं जन्मता। प्रेम कोई जैविक घटना नहीं, बल्कि सीखने और समझने की प्रक्रिया है। जहाँ “मेरा” और “मेरे लिए” का आग्रह घटता है, वहीं प्रेम सीमाओं को लाँघकर स्वतंत्रता, करुणा और वास्तविक संबंध का रूप लेता है।
रिश्तों में प्रेम अक्सर मान लिया जाता है, पर अधिकांश संबंध तय भूमिकाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक ढाँचों पर चलते हैं। माता-पिता, पति-पत्नी या परिवार के रिश्ते भी कई बार समझ, स्वतंत्रता और संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि आदत, अधिकार और “मेरापन” से संचालित होते हैं। सच्चा प्रेम सीमित नहीं होता; वह स्वामित्व नहीं, बल्कि समझ, स्वतंत्रता और विस्तार देता है। प्रेम जन्म से नहीं, जागरूकता से सीखा जाता है।
थोड़ी जीवन में ठसक होनी चाहिए, एक्सक्लूसिविटी। एक शान, ऐरी-गहरी चीज़ों को भाव नहीं देना, ऐरे-गैरों को मुँह नहीं लगाना। “तू क्यों है ऐरा-गैरा?” मैं तेरा अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं तुझे प्रेरणा दे रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है तू भी वही संभावना रखता है, जो किसी ऊँचे-से-ऊँचे व्यक्ति में है। तू अपनी संभावना क्यों नहीं साकार कर रहा? और जिस दिन तक तू अपनी संभावना साकार नहीं करता, उस दिन तक मैं तुझे स्वीकार नहीं करता।
जिसको तुम कहते हो रोमांटिक लव, इसका बाज़ारवाद से बहुत सीधा ताल्लुक है। अच्छे कपड़े पहन लिए, तोहफ़े दे लिए और मज़े कर लिए, लेकिन कुछ पूरा नहीं पड़ रहा; एक अधूरापन, एक कसक रह जाती है। आपकी बेचैनी वैसी की वैसी है। प्रेम का मतलब है कि जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोल दो; वो ख़ुद को जानने लगे, मन को समझने लगे, यही प्रेम है। लेकिन ये करना आसान नहीं होता। ये करने की क़ीमत चुकानी पड़ती है। ये करने के लिए तुम्हें अपना सर्वस्व भी निछावर करना पड़े, तो कर दो। यही है वैलेंटाइन डे।
मुझे बड़ा ताज्जुब होता है। एक से एक नमूने, ज़िंदगी में जिनको कुछ नहीं समझ में आता, कुछ नहीं जानते। 14 साल के होंगे, 16 साल के होंगे, तभी से एक लफ्ज़ वो जान जाते हैं, क्या? प्यार। और ऐसे कभी सामने पड़ें, मैं कहूँ कि तुझे गणित नहीं आती, तुझे भूगोल नहीं आता, तुझे यहाँ से लेकर वहाँ तक सीधे चलना नहीं आता, तुझे किसी आदमी से दो बात करना नहीं आता, तुझे अपना गुस्सा संभालना नहीं आता, तुझे कहीं पर समय से पहुँचना नहीं आता, तुझे इंसान बनना नहीं आता, तुझे प्रेम करना कहाँ से आ गया?
तुम और क्या करोगे, भीतर परेशान हो तो दूसरों को परेशान करोगे। ‘आई लव यू’ भी बोलते हो, तो तुम्हारी आँखों में आशा रहती है। और फिर जब वो उम्मीद पूरी नहीं करेगा, तो कहोगे: ‘हर्ट।’ जो भी बात है, उसको थोड़ा खुला रखना सीखिए। देना सीखो और लो भी तो उसी से, जो बिना उम्मीद के दे रहा हो तुमको।
भारत के सारे जवान लोगों का अब यही नारा है: कुछ और न आता हो हमको, हमें प्यार निभाना आता है। प्रेम हल्की बात नहीं होती है, भाई! एक तरीके से प्रेमी बनने का अर्थ होता है चिकित्सक बनना; जिससे प्रेम करते हो, तुम्हारे ऊपर उसके सुधार और स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी आ जाती है। प्यार ऐसी चीज़ है, जिससे बच भी नहीं सकते, लेकिन बिना पात्रता के किया, तो फिर तुम्हें कोई बचा भी नहीं सकता। करना तो पड़ेगा ही, लेकिन बिना समझ-बूझ कर करा, तो फिर वो प्यार नहीं है, वो अत्याचार है।
प्रेम ऐसी चीज़ है जो बोध के पहले भी चाहिए और बोध के बाद भी आती है। बोध से पहले कौन-सा प्रेम चाहिए? मैं जो उच्चतम और सुंदरतम हो सकता हूँ, वो मुझे होना है; ये है आंतरिक प्रेम, परम प्रेम। परम प्रेम कहता है, बोध होना चाहिए और जब बोध होता है, तो फिर उसके होने से आप जान जाते हो कि दुनिया में आपके प्यार के लायक कौन-सा विषय है। तो सबसे पहले परम प्रेम, फिर बोध और फिर साधारण सांसारिक प्रेम।
हम अपने आप को बहाना दिए रहते हैं कि अगर मेरे जीवन में प्रेम नहीं है, तो इसलिए नहीं है क्योंकि कठिन है। संगति ऐसों की करिए, जिनकी ज़िंदगी में प्रेम हो, वो आपसे आपके बहाने छीन लेंगे। संगति इसीलिए बहुत बड़ी चीज़ होती है। सौ लोग मिलकर जो सिद्ध कर रहे हैं कि प्रेम असंभव है, इन सौ लोगों की बात को एक दूसरा उदाहरण, एक विपरीत उदाहरण काट सकता है, उसकी खोज करनी चाहिए। और ये सौ उस एक से बहुत घबराएँगे, क्योंकि एक करोड़ लोगों के झूठ को एक आदमी का सच काट सकता है।
कोई पूछे सुबह-सुबह, “कहाँ जा रहे हो?” बोलो, “मोहब्बत करने।” मैं जी रहा हूँ, और यूँ ही नहीं जी रहा हूँ, मेरी हर धड़कन में आशिक़ी है। ये ज़िंदगी के प्रति प्रेम है — ऐसा प्यार जो परिणाम माँगता ही नहीं। किसके लिए है बात ये सारी? जो कर रहे हैं, उसके लिए है। ये प्रेम यज्ञ की ज्वाला है — काम और आग, जिसमें वो आग हो, वो है योगी। आग का धर्म है हमारा; उपनिषद् कहते हैं, “तुम अमृत की औलाद हो।” मैं और साफ़ करके तुमसे कह रहा हूँ — तुम आग की औलाद हो और आग की औलाद नहीं हो, तो अपने आप को सनातनी मत बोलना।
जहाँ प्रेम है, वहाँ मोह हो नहीं सकता, और जहाँ मोह है, वहाँ प्रेम की कोई जगह नहीं है। मोह में सुविधा है, सम्मान है। प्रेम तो सब तोड़-ताड़ देता है—पुराने ढर्रें, पुरानी दीवारें, सुविधाएँ, आपका आतंरिक ढाँचा, और जो सामाजिक सम्मान मिलता है। प्रेम सब तोड़ देता है। प्रेम इतनी ऊँची चीज़ है कि आप उसमें पुरानी व्यवस्था का विरोध नहीं करते, पुरानी व्यवस्था को भूल जाते हो। प्रेम और मोह दो अलग-अलग दुनियाओं के हैं।
संतों ने गाया है कि इश्क़ और मौत साथ-साथ नहीं चले, तो इश्क़ कैसा? हमारा जीवन अप्रेम का है। जो अपने ही प्रति सहानुभूति नहीं रखता, वो अपने आप को जैसा है, वैसा बचाए रखेगा और प्रेम जब आ गया तो अहम् मिटेगा। प्रेम जो तुम्हें तुम्हारे जैसा छोड़ दे, वो प्रेम तो है ही नहीं।
क़ुर्बानी का अर्थ यह नहीं होता कि कोई बहुत कीमती चीज़ छोड़ दी। क़ुर्बानी का अर्थ होता है कि कुछ ऐसा छोड़ा जो कीमती लगता था, पर कीमती नहीं था। क़ुर्बानी की पूरी बात यह है — “एक ही है जिससे मोहब्बत की जा सकती है, तुम्हें ख़ुदा के अलावा कोई चीज़ प्यारी हो कैसे गई? इसलिए तुम्हें जो कुछ भी प्यारा हो गया, उसकी क़ुर्बानी दो क्योंकि वो नकली है।” वास्तव में प्रेम सिर्फ़ एक से हो सकता है, बाकियों से सिर्फ़ मोह और आसक्ति होती है।
प्रकृति में पवित्र–अपवित्र कुछ नहीं होता, प्रकृति माने प्रकृति, यहाँ पवित्रता जैसी कोई चीज़ नहीं होती और कुछ अपवित्र भी नहीं होता। लेकिन जो प्राकृतिक है जब तुम उसको पवित्रता का नाम दे देते हो, तो वो अपवित्र हो जाता है।
आपसे अलग करने के लिए है ये जन्म, दुनिया, संसार। और आपको संघर्ष करना है। आपको कहना है — "नहीं, नहीं, प्रेम की बात है। मेरा मुझसे प्रेम।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्य के प्रति प्रेम में कैसे पड़ गये?
आचार्य प्रशांत: उसका दुपट्टा हरा था। (श्रोतागण हॅंसते हैं) और चूड़ियाॅं खनक रही थीं और कजरारे नैनों की तीखी धार थी। बिलकुल छुरी चल गयी। ऐसे बताऊँ या ऐसे बताऊँ कि कार्बन टेट्रा-फ्लोराइड और अमोनिया मिले और दस एटमॉस्फेरिक…
हमें प्रेम से तो कोई मतलब ही नहीं रहा; हमारा ज़्यादा वास्ता अब प्रेम से संबंधित छवियों से हो गया है। कोई मुस्कुरा दिया, तो हमें लगा कि प्यार ही करता है। और किसी ने ज़रा रुखाई से बात कर दी, तो तुरंत हम कह देंगे कि प्यार नहीं करता। प्रेम का अर्थ किसी व्यक्ति के प्रति किसी विशेष प्रकार का व्यवहार नहीं होता। सर्वप्रथम आपको ये देखना होगा कि आपके मन में दूसरे के हित की कामना है या नहीं। सच्चे प्रेम का एक ही लक्षण है — सत्य से मुलाक़ात करवा रहा है या नहीं।
ज्ञान को टटोलोगे तो मरते दम तक भी यही पाओगे कि ज्ञान अपूर्ण है क्योंकि ज्ञान तो पूर्ण हो ही नहीं सकता।
दूसरों से प्रेम पाने की इच्छा सबसे ज़्यादा उन्हीं में देखी जाती है, जो स्वयं को प्रेम नहीं कर सकते। अगर जीवन में सच्चाई और ऊँचाई नहीं है, तो आप अपने आप को प्रेम नहीं कर पाएँगे। दूसरे आपके दिल के कटोरे में कितना भी प्यार डाल दें, वो कटोरा खाली ही रह जाना है। आप ज़िन्दगी भर यही कहते रह जाओगे कि प्यार नहीं मिला। प्रेम मत माँगो, पात्रता पैदा करो। पात्रता पैदा कर लोगे, तो अपने ही इश्क़ में पड़ जाओगे। ऐसों को फिर बाहर भी बहुत आशिक़ मिल जाते हैं, लेकिन उन्हें उनकी ज़रूरत नहीं रह जाती।
प्रेम किसी घटना का, किसी अफ़साने का, किसी व्यक्ति का नाम नहीं है। "प्यार तो सिर्फ़ एक एहसास होता है न, एक भीतर की भावना; तो हमें भी हो गया है" — नहीं, ऐसा नहीं है। प्रेम तुम्हारी चेतना की मूल तड़प का नाम है। जिस रास्ते पर चलकर तुम ज़िन्दगी की ऊँचाइयाँ हासिल कर सको, तुम्हारी चेतना साफ़-से-साफ़ और ऊँची-से-ऊँची जगह पर पहुँच सके, 'प्रेम कहावे सोय,' — उसको प्रेम कहते हैं।
‘माँ’ शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं। एक अर्थ निकलता है नासमझी से और दूसरा अर्थ निकलता है समझ से। पहली माँ के पास मात्र ममता होती है, दूसरी माँ के पास मातृभाव होता है। ममता तो पशुओं में भी होती है, पर मातृभाव कोई-कोई माँ ही जानती है। मातृभाव का अर्थ है - वास्तविक रूप से जन्म देना - एक जन्म शरीर का और दूसरा जन्म ज्ञान का। ममता में प्रेम नहीं होता; इसमें मात्र हॉर्मोन्स होते हैं। वास्तविक माँ वो जो प्रेम जाने। उसके लिए माँ को स्वयं बोधयुक्त होना पड़ेगा।
दूसरों से दो ही तरह के संबंध हो सकते हैं — या तो प्रेम के, या फिर कामना के। कामना के रिश्ते उम्मीदों पर बनते हैं, जिनके पूरे न होने पर क्रोध आता है, और वही क्रोध फिर हिंसा बनता है। तुम्हारे भीतर यह गहराई से बैठा दिया गया है कि जीवन का अर्थ भोग है; और जिस रिश्ते की बुनियाद भोग हो, वहाँ प्रेम नहीं — हिंसा होती है। प्रेम में न कुछ चाहिए होता है, न भोगना होता है। प्रेम तब है जब बिना वजह, निःस्वार्थ, यूँ ही जुड़ जाते हो। अपने में जो पूरा है — सिर्फ वही प्रेम में स्वस्थ संबंध बना सकता है।
सच्चा प्रेमी ज़िंदगी में चुनौती बनकर आता है। वो आपको बेहतर होते देखना चाहेगा—बढ़ते, बदलते। उससे असुविधा होगी, मन में आएगा कि ये ज़िंदगी में आया ही क्यों? ये परेशान करता है, मेहनत करवाता है, चुनौती देता है। पर हम तो उन प्रेमियों को ढूंढ़ते हैं, जो बस सुख दें, झूठी तसल्ली दें, तारीफ़ें करें। तो परखना है कि प्रेम सच्चा है या नहीं—तो देखो, वो तुम्हें दे क्या रहा है? सुख या होश?
लव एट फर्स्ट साइट सबसे सशक्त प्रमाण होता है कि तुम गिरने जा रहे हो। इसीलिए उसके बाद होता है फॉलिंग इन लव। वास्तविक प्रेम होने में बहुत समय लगता है। सही व्यक्ति जब ज़िंदगी में आता है, तो कुछ भीतर चिढ़ेगा, और कुछ भीतर धीरे-धीरे प्रेम में पड़ता जाएगा। तुम अपने आप को बेहतर बनाने की कोशिश करते रहो। एक दिन पाओगे, सही दिशा में चलता हुआ कोई हमसफ़र मिल गया है।
प्रेम ही ज़िंदगी को अर्थ, आज़ादी और सच्चाई देता है, लेकिन हमारे जीवन में किसी भी क्षेत्र में प्रेम नहीं होता। जब मामला Loveless होता है, तो हर आदमी भागना चाहता है—अपने काम से, रिश्तों से और खुद से भी। हमें खुद से भी प्यार नहीं है। हमारा समाज और अर्थव्यवस्था ऐसी नौकरियां देती ही नहीं, जिनसे प्यार हो सके। न कंपनियां प्यार के कारण बनती हैं, न जॉब्स ऐसी होती हैं कि कोई उनसे चाहे भी तो प्रेम कर सके। हम काम से कैसे प्रेम कर लेंगे?
बेवजह की मान्यता है कि संसारी वह, जो भोगता है, और आध्यात्मिक आदमी वह, जो त्यागता है। अगर मामला राम और मुक्ति का हो, तो आध्यात्मिक व्यक्ति संसारी से ज्यादा संसारी हो सकता है। शृंगार का अर्थ है स्वयं को और आकर्षक बनाना, बढ़ाना—ऐसा जो तुम्हारे बंधन काट दे। जो करना हो, सब करेंगे—घूमना-फिरना, राजनीति, ज्ञान इकट्ठा करना, कुछ भी हो; कसौटी बस एक है—‘राम’। जो राम से मिला दे, वही शृंगार और वही प्रेम।
प्रेम तो जीवन में उतरता ही तब है, जब उसका (परमतत्व) आगमन होता है, अगर वो नहीं आया जीवन में तो तुम किस प्रेम की बात कर रहे हो? तुम्हारा सिर अभी अगर झुका ही नहीं उस पारलौकिक सत्ता के सामने, तुम्हारा सिर अकड़ा ही हुआ है, तो तुम किस प्रेम की बात कर रहे हो? तुमने प्रेम जाना ही नहीं है, झूठ बोल रहे हो अपने आप से भी कि तुम्हें प्रेम है, प्रेम है। होगा तुम्हारा बीस साल, पचास साल का रिश्ता, कोई प्रेम नहीं है। प्रेम अध्यात्म की अनुपस्थिति में हो ही नहीं सकता। जिसको अध्यात्म से समस्या है, उसको प्रेम से समस्या है।
आपको क्या करना था? प्रेम। और आपने प्रेम कर लिया, अब तकलीफ़ क्या है? आपको सिर्फ़ प्रेम ही भर नहीं करना था, कामना कुछ और भी थी। क्या कामना थी? दूसरे से उत्तर भी मिले, कुछ लाभ भी हो, कुछ मान-सम्मान हो। दूसरा भी नफ़रत इसलिए करता हो क्योंकि उसको पता है कि हम सिर्फ़ प्रेम नहीं कर रहे हैं, प्रेम में उम्मीद छुपी हुई है। प्रेम बड़ी स्वतंत्रता की बात है—'तुझे हक़ है, तू जो करना चाहे, करे।' प्यार देने की चीज़ तो हो सकती है, लेने की बिल्कुल नहीं।
मुझे बड़ा आनंद रहेगा अगर आप कहो कि नहीं मात्र परमात्मा ही मात्र चाहिए, सत्य के अलावा कोई कामना नहीं है। पर जब तक आप उस स्थिति में न पहुँच जाओ जहाँ सत्य के अतिरिक्त कोई कामना नहीं, तब तक जो चाहिए वो साफ़-साफ़ जानो और साफ़-साफ़ बताओ भी, क्योंकि अगर साफ़-साफ़ नहीं बताओगे तो बात खुद से ही छुपी रह जाएगी। जब जो चाह रहे हो, वो बता पाना थोड़ा लज्जास्पद लगता है तो हम ऐसे जताते हैं कि जो हम चाह रहे हैं वो बात बताई ही नहीं जा सकती।
स्नेह, प्रेम, श्रद्धा, भक्ति समझाने के तरीके हैं। मन का मतलब होता है गति। या तो वो किसी दिशा में बढ़ता है, क्योंकि जो उसके सामने है वो उसे आकर्षक लग रहा है, या वो किसी दिशा से भागता है, क्योंकि जो उसके सामने है उससे उसे भय या विकर्षण हो रहा है। गति के यही दो कारण होते हैं — या तो राग या द्वेष, या तो आकर्षण या विकर्षण। तो विषय के आधार पर समझाने के लिए भेद किया जा सकता है, उसी प्रकार का एक भेद आपके द्वारा पढ़े गए साहित्य में उल्लिखित है।
जो लड़की अपने प्रेमी से जाकर बोले कि ‘मेरे पिताजी तुम्हारी जाति को पसंद नहीं करते,’ वो लड़की क्या किसी की जीवनसाथी बनेगी? या फिर वो लड़का? शारीरिक और जन्मगत श्रेष्ठता एकदम व्यर्थ की बात है। यह कौन-सा प्यार है जहाँ समाज, वर्ग, जाति और परिवार बीच में आ जाएं? साथी चुनने से पहले बोध, गहराई और समझदारी की बातें करनी होती हैं। ज़िंदगी, आशिकी और रिश्ते इतनी सस्ती नहीं होते कि कहीं भी जाकर बंध जाओ।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी प्रेम प्रसंग की आप बात कर रहे थे तो मेरे कुछ मित्र हैं, मेरे एक मित्र हैं पर्टिकुलर, तो हर टाइम क्या रहता है कि कोई रिलेशनशिप में जब एंटर करतें है, तो काफ़ी उम्मीद के साथ एंटर करते हैं रिलेशनशिप में कि काफ़ी कुछ…
तुम्हें कैसे पता चले कि कोई तुमसे प्यार करता है या नहीं? प्रेम क्या है? तुमने कुछ व्यवहारों की सूची बना रखी है, जैसे ही किसी ने तुम्हारे गले में बाँह डाली, तुम कह देते हो, “यह करता है मुझसे प्यार!” प्रेम का मतलब यह नहीं है: मैं तुम्हें खुश रखूँ, तुम मुझे खुश रखो। अगर कोई तुम्हें सच में प्यार करता है, तो तुम्हें बंधन से मुक्ति की ओर, भ्रम से सत्य की ओर लेकर चलेगा। बस तुम विरोध मत करना, यही उसकी माँग होती है।
प्रेम की कसौटी यह है कि दूसरे के लिए जो हम कर रहे हैं, वह वास्तव में उसके हित का है कि नहीं। और बड़ा मुश्किल होता है निरपेक्ष आँखों से देख पाना कि दूसरे का हित कहाँ पर है। जितना आप अपने साथ सहज और सन्तुष्ट होते जाएँगे, उतना आप समझते जाएँगे कि दूसरा कौन है, कैसा है और इसीलिए उसके लिए क्या उचित है।
‘आइ लव यू' कहने के लिए पहले ‘आइ’ को जानना होगा | तुम ठीक हो जाओ उसके बाद सामने वाले के दस चेहरे तुम्हारे लिए समस्या नहीं रह जाऍंगे। अभी तुम्हें उसके दस चहरों से इसलिए समस्या हो रही है क्योंकि तुम्हारे भी अपने दस चेहरे हैं। ‘आइ’ की, ‘मैं’ की, ‘अहम्’ की, अपनी बात हम नहीं करना चाहते। |‘यू’ ऐसे है, ‘यू’ ऐसे है, प्रेम ऐसा है। अरे वो ‘यू’ तो बहुत-बहुत बाद में आता है, शुरुआत किससे होती है? ‘आइ’ से। इस ‘आइ’ को ठीक करो पहले।
डरों को जीता नहीं जाता, "डरों को भूला जाता है।" बहुत सारे जो डर होते है न, वो प्रेम में ही तिरोहित होते हैं। अपने आपको प्रेम में पड़ने का अवसर तो दो। जो सत्य के प्रति जो परम प्रेम होता है, वो ऐसे साहस से भर , जिसे मैं कह रहा हूँ "साहस कहना भी ठीक नहीं है", वो एक तरह की सहजता है। तुम सहज ही बहुत सारे साहसिक काम कर डालोगे, बिना साहस का उपयोग किए। प्रेम साहस से ऊपर का होता है। जहाँ प्रेम है, वहाँ साहस चाहिए ही नहीं।
अगर प्रेम जैसा कुछ होता तो स्त्री को पुरुष से ही क्यों हो रहा है, पुरुष को स्त्री से ही क्यों हो रहा है? और एक उम्र के ही व्यक्ति से क्यों हो रहा है? पुरुष से भी करना है तो अस्सी साल वाले से क्यो नहीं करते जाकर? क्यों नहीं करते हो? ये सारी आशिकी समवयस्क लोगों में ही क्यों होती है? या अधिक-से-अधिक पाँच-दस साल का अन्तर। बोलो? बात नहीं समझ में आ रही? ये सारी आशिकी रिप्रोडक्टिव पीरियड में ही क्यों होती है? नहीं बात समझ में आ रही? और उसी से जुड़ी जो बाकी चीज़ें हैं, अकेलापन और बाकी सब जो कुछ भी होता है, ये साइड इफेक्ट्स ही होते हैं, लोनलिनेस और ये सबकुछ। ये सब बस एक चीज़ है, एक चीज़ है, अन्त में प्रकृति चाहती है, तुम बच्चा पैदा कर दो।
आचार्य प्रशांत: तुम अभी ये समझ ही नहीं पा रहे हो कि काल, समय, स्थान, परिस्थिति इनके लिए नहीं जी रहे हो तुम। ये सब देह के साथ भस्म हो जानी हैं, ये बड़ी चीज़ नहीं होती हैं। जो कीमती चीज़ है वो क्या है? कारण ये है कि जिस…
प्रश्नकर्ता: एक व्यक्तिगत स्थिति है। जिन्होंने पूछा उनका नाम नहीं लूँगा। कह रहीं हैं- मैं २८ साल की हूँ और शादी को दो साल हुए हैं। पति बहुत प्यार करते हैं हमारी लव मैरेज हुई थी। सालभर पहले तक राहुल (पति का नाम) बड़े एक्साइटेबल माने चंचल, जल्दी उत्तेजित हो…