
आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।





प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं गर्ल्स हॉस्टल (लड़कियों का छात्रावास) में रहती हूँ, इंदौर में। तो वहाँ पर बहुत बड़ा हॉस्टल है। सौ-डेढ़ सौ लड़कियाँ रहती हैं तो उसमें से


आचार्य प्रशांत: सिखों के पास अपना केंद्रीय ग्रंथ है, जैनों के पास भी अपना केंद्रीय दर्शन है। ग्रंथ, दर्शन; ठीक? ‘अहिंसा’ शब्द बोलते ही आपको जैन याद आएँगे। हिंदुओं के पास मुझे बताइए, कौनसा केंद्रीय ग्रंथ है? हिंदू माने क्या? आपने कोई ग्रंथ नहीं पढ़ा, आप तब भी हिंदू हो।



प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं तेईस वर्षीय हूँ। मेरा नाम शैलेश है। मेरा सवाल

प्रश्नकर्ता: ये जो परिस्थितियाँ वर्तमान में चल रही हैं जिसमें असत्य की सत्य के ऊपर जीत देखी जाती है तो ऐसी परिस्थितियों में एक मनुष्य अपने आदर्शों को कैसे कायम रख सकता है? कैसे दृढ़ संकल्प रह सकता है? उसके लिए आप कुछ ज्ञान या दिशानिर्देश दें।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं आपका स्पष्टीकरण चाहूँगा कि इतिहास में ये भी देखा गया है कि धर्म परिवर्तन भी सबसे ज़्यादा भारतीयों का या






दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आईआईटी रुड़की (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की) में ‘आज़ाद भवन’ नामक एक छात्रावास है, जो कि अभी तक पूरा शाकाहारी था, वहाँ के भोजनालय में माँसाहारी खाना नहीं मिलता था। अभी दो दिन पहले ख़बर आयी है कि वहाँ भी माँसाहारी खाना मिलना शुरू हो गया है,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मैं एक आर्टिकल (लेख) पढ़ रहा था, उस आर्टिकल में एक सर्वे (सर्वेक्षण) के बारे में बताया गया था, तो उस सर्वे में बेसिकली (मूल रूप से) था कि जो अमेरिका की मेजोरिटी पॉपुलेशन (अधिकांश जनसंख्या) है वो क्रिस्चियनिटी (ईसाईयत) को छोड़कर एथीज़्म (नास्तिकता) को फ़ॉलो…

प्रश्नकर्ता१: आचार्य जी, थैंक यू

आचार्य प्रशांत: तुम्हारे काम का जो उद्देश्य है और गीताकार का जो उद्देश्य है वो उद्देश्य ही मात्र भिन्न नहीं बल्कि दो अलग-अलग आयामों में है। गीता कही गई है अर्जुन को भ्रम, मोह, लोभ, देहभाव, ममत्व से मुक्त करने के लिए। ये गीताकार का, कृष्ण का उद्देश्य है कि


आचार्य प्रशांत: इस जीवनकाल में न जाने किसके-किसके हाथों लूट रहे हो और भूल ही गये हो कि असली बाप कौन है, यहाँ किसी के हाथों लुटने की, यहाँ किसी से दबने की ज़रूरत है क्या, बताओ? और उसने (परमात्मा ने) पूरी व्यवस्था बना रखी है कि अगर तुम न…

आचार्य प्रशांत: मैंने तो यहाँ तक देखा है कि लोग कहते हैं कि सारी धार्मिकता बस एक वाक्य में यही है किसी को चोट मत पहुँचाओ। अरे! शायर बिलकुल आसमान पर खड़े होकर के घोषणा करते हैं कि ये हटाओ सारे धर्म-मज़हब, असली बात बस एक है, किसी को तकलीफ़…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, सर। मैं रूपेश कुमार, आइआइटी कानपुर से हूँ। सर, मेरा प्रश्न था कि भारतीय लोग जानने के प्रति उदासीन क्यों हैं? कि या तो हम लोग किसी भी एक मान्यता को फॉलो करना चाहते हैं। जैसे कि जो लोग कोई भी पूजा-पाठ टाइप या फिर जो भी हमारे…


आचार्य प्रशांत: आपकी भाषा कितनी समृद्ध है इससे बहुत हद तक ये पता चलता है कि आप इंसान कितने समृद्ध हैं। आपकी भाषा कितनी ऊँची है इससे पता चलता है आप इंसान कितने ऊँचे हैं। आज की जो जवान पीढ़ी है, इसके पास शब्द ही नहीं हैं, इसकी पूरी वोकैबुलरी

प्रश्नकर्ता: मेरे विचार से एक व्यक्तिगत संसार होता है और एक सामाजिक संसार होता है। और मेरी आयु वर्ग में — 21 से 30 वर्ष की आयु के बीच जहाँ पर आदमी के के सामाजिक संसार को दो हिस्सों में बाँट दिया जाता है — रिश्ता (पर्सनल लाइफ़) और कैरियर


आचार्य प्रशांत: आपने बहुत धर्म सुने होंगे लेकिन जिस धर्म का वास्तव में पालन किया जाता है, वह होता है युगधर्म। इस युग का धर्म पहचानिए! आप इस युग में पिछले युग के युद्ध नहीं लड़ सकते। कहाँ है दुर्योधन जिसको आप मारेंगे, बताइए? वह पिछले युग में मारा जा

प्रश्नकर्ता: मेरा नाम पंखुड़ी शुक्ला है। आचार्य जी, आप प्यार से भी तो समझा सकते हैं? हमेशा डाँटते क्यों रहते हैं? मुझे अच्छा नहीं लगता है जब मुझे कोई डाँटता है तो।

आचार्य प्रशांत: मीडिया इसीलिए नहीं है कि आप तक ख़बरें, असलियत, सच्चाई पहुँचा दे। मीडिया, ठीक इसीलिए है, ताकि आप तक ख़बरें और सच्चाई न पहुँचें। और आप तक ख़बरें और सच्चाई न पहुँचें, इसके लिए आवश्यक है कि आप तक जितना फ़िजूल कचरा है, वो पहुँचता रहे। और आपको

आचार्य प्रशांत: सर नमस्ते, लोग बोलते हैं कि बड़े-से-बड़ा जीवन मूल्य, लाइफ वैल्यू इंसानियत है, ह्यूमनिटी या ह्यूमनिज्म। वो कहते हैं कि किसी भी धर्म से ऊँची है इंसानियत और कहते हैं कि हमें एक अच्छा इंसान बनने के लिए किसी धर्म की ज़रूरत नहीं है इंसानियत ही काफ़ी है।’

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, मेरा सवाल था कि एक समय था गाँव में जब शायद ही कोई नशे से ग्रस्त था लेकिन आज ऐसा चलन हो गया है कि कोई भी युवा शराब-कबाब से अछूता नहीं रहा। कॉलेजों में सभी स्टूडेंट्स के पास ड्रग्स मिलना आम बात हो गयी है तो सर,

प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते। सर आपने पीछे एक एक्टिविटी दी थी कि आपकी किसी बात से हम सहमत नहीं हैं तो बताइए। तो मेरी इस बात पर सहमति नहीं बनी — जैसे, मैं गृहिणी हूँ। पर मैं अपना जीवन सत्य के साथ जीती हूँ अधिकतर। तो मज़बूत महसूस करती हूँ अपनेआप

आचार्य प्रशांत: जिन्होंने शरीर के ही दम पर प्रसिद्धि पायी, जिनको शरीर के ही नाते जानते हो, उन फिल्मी सितारों की जवानी की और बुढ़ापे की तसवीरें देख लिया करोl देह क्या है, स्पष्ट हो जाएगाl देह भाव से मुक्त होने का अच्छा तरीका हैl


प्रश्नकर्ता: आख़िर इतना उपद्रव में करने में मज़ा क्यों आता है हम लोगों को?

प्रश्नकर्ता: सर, साल की शुरुआत से ही जोशीमठ से कुछ ख़बरें आ रही हैं, ज़मीन धँसने की और इसरो ने

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसा कि आपने बताया कि गोवा में मई के महीने से बारिश शुरू हो जाती है लेकिन अभी जून महीने के अन्त तक यहाँ बारिश शुरू नहीं हुई है। तो मैं अपने जन्म स्थान में आयी हूँ जो कि कर्नाटक में है। मैंने वहाँ देखा कि बारिश


आचार्य प्रशांत:

आचार्य प्रशांत: आप जो चाहो, जिसको चाहो, दिखा सकते हो, कैमरे का मतलब ही होता है झूठ। कैमरे का तो मतलब ही झूठ है।
सत्य के मार्ग पर चलने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बाहरी समर्थन नहीं, बल्कि भीतर की निष्ठा और साहस की होती है। जब व्यक्ति स्वार्थ, भय और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय का साथ देता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य के प्रति अडिग रहना। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।
अगर जीवन में अनुशासन नहीं है, तो मतलब साफ़ है कि तुम जिस विषय के पास हो, उसमें इतनी जान ही नहीं है कि वह तुम्हें अनुशासित कर पाए। अधिकांशतः हमारे जीवन में एकाग्रचित्तता नहीं रहती, उसका कारण यह है कि हमने अपने लिए लक्ष्य ही मूल्यहीन चुन लिए होते हैं। स्वयं को अनुशासित करने की चेष्टा मत करो, उपयुक्त विषय ढूँढो। जब तुम सच के पास होते हो, तो अनुशासन अपने आप हो जाता है। तुम उसके निकट रहो, वो तुम में अनुशासन ला देगा।
प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…
प्रश्न: मनुष्य ‘स्वार्थी’ है या ‘मतलबी’?
उत्तर: तुमने ‘स्वार्थ, मतलब’ के बारे में जानना चाहा है।
अर्थ माने कुछ ऐसा जो तुम्हें लुभावना, प्रिय लगता हो।
(यहां पर) ‘स्व’ माने अहंकार।
स्वार्थ माने वो जो अहंकार को प्यारा लगे।और मतलब माने भी अर्थ।
सत्य मात्र ‘होता है’, और उसका ‘मतलब’…
प्रश्नकर्ता: मेरा प्रश्न नोट्स में से है: "बीइंग अवेयर ऑफ़ डिमांड्स ऑफ बॉडी, बीइंग अवेयर ऑफ़ स्ट्रे थॉट्स, दिस इज़ इंटेलिजेंस। इट ऑकर्स थॉट् इज़ एन इनेडिक्वेट रिस्पांस टू स्टिमुलस। एन एडीक्वेट रिस्पांस इज स्पॉनटेनिटी।" ("शरीर की माँगों के प्रति जागरूक होना, आवारा विचारों से अवगत होना, यह बुद्धिमत्ता है।…
हम अकसर प्रतीकों को यह बोलकर ठुकरा देते हैं कि यह सब तो यूँ ही है, आचरण गत बातें है इनमें कुछ रखा नहीं है। उनमें ही बहुत कुछ रखा है। आप मंदिर के बगल से निकल रहे हो और आपके मन में दुनिया भर के अंट-संट विचार उमड़-घुमड़ रहे हैं, जैसे कि आमतौर पर चलते रहते है मन में, लेकिन मंदिर को देखते ही आप एक क्षण को रुके और आपने नमस्कार कर लिया मंदिर को, तो जो विचारों का पूरा बहाव है, जो पूरी शृंखला है वह टूट जाती है, क्योंकि वह एक लगातार बहने वाला निरंतर प्रवाह था न, एक निरंतरता थी।
प्रश्नकर्ता: सर, मेरे पेरेंटस (माता-पिता) फ्यूचर को लेकर डराते हैं कि अभी यू आर थिंकिंग लाइक दैट, व्हेन यू विल बी ऐज़ ओल्ड ऐज़ अस, यू विल रिग्रेट, यू विल बी डिप्रेस्ड, यू विल बी अलोन (मेरे अभिभावक भविष्य को लेकर डराते हैं कि अभी तुम ऐसा सोचती हो पर…
आचार्य प्रशांत: पहली…
आचार्य प्रशांत: मैं जो बोलूँगा वो बात बहुत चुभेगी बहुत लोगों को, एकदम बरछी जैसी लगेगी, लेकिन बता देता हूँ। इस समय पृथ्वी पर बच्चा पैदा होने से ज़्यादा अशुभ काम दूसरा नहीं है। मातम का काम है यह अगर एक भी बच्चा और पैदा हो रहा है। पर हमारी…
आचार्य प्रशांत: भारत भी ऐसे ही थोड़ी है, अंग्रेजों से आज़ादी मिले भी सत्तर से ऊपर बरस हो गए और हम कहते हैं कि भारत विविधताओं का देश है। इतनी विविधताऍं होते हुए भी क्या है जो सब लोगों को एक सूत्र में पिरोकर रखता है? ज़रूर कोई शेयर्ड आइडियल…
वेदानधीत्य ब्रह्मचर्यण पुत्र पुत्रानिच्छेत् पावनारथं पितृणाम्। अंगीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो वनों प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत्।।
पिताने कहा- बेटा! द्विज को चाहिए कि वह पहले ब्रह्मचर्य- व्रत का पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करें; फिर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करके पितरों की सद्गति के लिए पुत्र पैदा करने की इच्छा करें। विधिपूर्वक त्रिविध…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा क्वेश्चन आज के सत्र से है जिसमें आपने बोला कि हिंसा कमज़ोरी की निशानी और अहिंसा मज़बूती की है। लेकिन आजकल हिंसा को कई तरीकों से उचित ठहराया जा रहा है।
अभी तीस जनवरी को गाँधीजी की पुण्यतिथि आने वाली है, तो जितना हमें उस…
प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते। आपसे मैं सर्वप्रथम शास्त्र-कौमुदी नामक कोर्स (पाठ्यक्रम) के जरिए जुड़ा था, तब से मुझे वेदांत और ग्रंथों का मूल्य पता चला। मैंने प्रस्थानत्रयी का पाठ शुरू किया है, तीन महीने हो गए हैं। मुश्किल हो रही है समझने में, पर आनंद आता है। कोरोना के कारण घर…
"मैं छल करने वालों में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों की विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, दसवाँ अध्याय, छत्तीसवाँ श्लोक,
प्रश्नकर्ता: नमस्ते! श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि…
श्रीमद्भगवद्गीता सातवाँ अध्याय, चौदहवाँ श्लोक –
"जो ज्ञानी मुझे अनन्य भाव से भजते हैं, मेरा स्मरण करते हैं, वे मेरी त्रिगुणी माया का उल्लंघन कर जाते हैं”।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मैं मन व बुद्धि से श्रीकृष्ण का स्मरण…
आचार्य प्रशांत: जिन्होंने शरीर के ही दम पर प्रसिद्धि पाई, जिनको शरीर के ही नाते जानते हो उन फ़िल्मी सितारों की जवानी की और बुढ़ापे की तस्वीरें देख लिया करो। देह क्या है स्पष्ट हो जाएगा। देहभाव से मुक्त होने का अच्छा तरीक़ा है। कोई रहे हों अपने ज़माने के…
आचार्य प्रशांत: ऐसों से बचना जो मिलते ही ये कहते हैं कि चल यार, वीकेंड (सप्ताहान्त) पर पीते हैं। ऐसों से बचना जो जब तुमसे मिलने आते हैं तो तुम्हारे लिए साथ में गलौटी कबाब लेकर आते हैं, बचना। ये तो आया ही है देह का सुख साथ लेकर के।…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा प्रश्न वीगनिज़्म (शुद्ध शाकाहार — पशु उत्पादों के उपयोग से परहेज़) के ऊपर है। मैं पिछले सात-आठ महीने से वीगनिज़्म फ़ॉलो कर रहा हूँ। मैंने अपने घरवालों को समझाने का भरसक प्रयास किया, इससे होने वाले वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन जैसे नुक़सान गिनाये। लेकिन वो हैं…
आचार्य प्रशांत: अब क्या कहें पंखुड़ी, तुम्हारा तो नाम ही ऐसा है। (श्रोतागण हँसते हैं) इसमें तुम्हारी ग़लती…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, अभी बारह जनवरी को युवा दिवस है और स्वामी विवेकानन्द जी ने युवा जागरण के लिए बहुत कुछ किया है। और आपकी संस्था भी युवा जागरण के लिए बहुत प्रयास कर रही है।
मैं नॉर्थ ईस्ट त्रिपुरा से बिलॉन्ग (सम्बन्धित) करती हूँ, अभी कुछ सालों से…
कोई सुपरस्टार हो, देख लो…
आचार्य प्रशांत: तुममें से भी ज़्यादातर लोग ट्वेंटीज़ (दूसरे दशक) में, थर्टीज़ (तीसवें दशक) में हैं। मुझे नहीं लगता कि अभी मेरे सामने जितने लोग हैं, उसमें से ज़्यादा लोग चालीस पार के हैं, शायद कोई भी नहीं।
क्या करते हो दफ़्तर के बाद, ये बताओ न। और कारण है…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मैं पच्चीस वर्ष का हूँ। मार्केटिंग का कार्य करता हूँ जिसमें लोगों के मन में लालच पैदा करना मेरे लिए अनिवार्य है। यह काम करते-करते आदत ऐसी पड़ गयी है कि अब मेरा स्किल स्किल सेट (कौशल) ही यही हो गया है कि कैसे दूसरे लोगों…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा रेगुलर वर्क (नियमित कार्य) ही नहीं ख़त्म हो पाता है। मैं अपना काम समय से पूरा नहीं कर पाती हूँ। आप कहते हैं कि गीता सत्र सुनो पर वो भी नहीं सुन पाती हूँ, नियमित काम ही चलता रहता है। मैं न स्पोर्ट्स जा पाती हूँ…
प्र: आख़िर हम लोगों से भूल कहाँ हो रही है?
आचार्य: भूल ये हो रही है कि जब शान्ति मिलती है, तो…